Sunday, November 30, 2008

सुशासन की हकीकत

सूबे में जबतक सुशासन नहीं आएगा, यहां के हालात नहीं सुधर सकते। आप हमें तीन महीने का समय दीजिए, मेरी सरकार बनते ही भयमुक्त समाज का निर्माण होगा जिसमें न तो दोषियों को बचाया जाएगा और न ही निर्दोषों को फंसाया ही जाएगा।'
ये वायदे वर्ष 2005 के चुनावी सभाओं में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करते फिर रहे थे। लालू-राबड़ी शासनकाल में लगातार बिगड़ती जा रही कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने में नीतीश सरकार ने बहुत हद तक सफलता भी पाई है। देशभर में सबसे अधिक अपराधियों (26125) को सजा इसी राज्य में हुए। संगीन अपराध के जुर्म में 80 अपराधियों को निचली अदालत से फांसी की सजा हुई। जबकि 5616 को उम्रकैद तथा 1598 अपराधियों को 10 वर्ष से अधिक का कारावास की सजा सुनाई गयी है। 10 वर्ष से कम सजायाफ्ता अपराधियों की संख्या 18831 है। के बाद पहली बार बाहुबलियों पर शिकंजा कसा गया। हत्या के जुर्म में पूर्णिया के राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, सीवान के सांसद मो.शहाबुद्दीन, जिलाधिकारी जी.कृष्णैय्या हत्याकांड में पूर्व सांसद आनंद मोहन व उनकी पत्नी लवली आनंद, पूर्व विधायक अरुण कुमार व अखलाक अहमद, पूर्व विधायक राजन तिवारी तथा जदयू विधायक मुन्ना शुक्ला को फांसी व अन्य सजाएं सुनाई गयीं, वहीं दोहरे हत्याकांड के आरोपी लोजपा सांसद सूरजभान, डा. रमेश चन्द्रा अपहरण कांड में जदयू से निलंबित विधायक सुनील पांडेय, पूर्व मंत्री आदित्य सिंह, सपा विधायक रामदेव यादव समेत दर्जनभर नेताओं को निचली अदालत में सजा मुकर्रर हुई हैं।
हत्या के जुर्म में दाउदनगर अनुमंडल कारा में बंद गोह के जदयू विधायक प्रो.रणविजय कुमार, अतरी के पूर्व विधायक राजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री सुरेंद्र प्रसाद यादव, बनियापुर के जदयू विधायक धूमल सिंह, लोजपा विधायक रामा सिंह, डेहरी के विधायक प्रदीप जोशी, भाजपा विधायक नित्यानंद राय, राजद विधायक बब्लू देव समेत विभिन्न दलों के दो दर्जन विधायकों पर कानून की तलवार लटक रही है। {H$Z हाल के दिनों में जिस तरीके से जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह को दोहरे हत्याकांड से उबारने के लिए नियमों को ताक पर रखा गया उससे सरकार के इरादों पर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगे हैं। कहा जाता है कि इस हत्याकांड की सुनवाई के दौरान जब में प्रभुनाथ ने अपने बाहुबल का इस्तेमाल किया तो इस मामले को भागलपुर की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार भी लगाई। मामले की सुनवाई भागलपुर में शुरू हुई लेकिन वहां भी सरकारी हस्तक्षेप के मामले उजागर हुए। अंत में पटना सिविल कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई जहां से वे बाइज्जत बरी हो गये। हालांकि उक्त सांसद के एक अन्य मामले की सुनवाई पटना सिविल कोर्ट में चल रही है। पर इस बात की चर्चा है कि क्या इस बार भी गवाहों को सरकारी हथकंडों का इस्तेमाल कर प्रभावित किया जाएगा? इस बाबत पूर्व विधि मंत्री व राजद नेता शकील अहमद खान कहते हैंे कि सरकार राजनीतिक द्वेष से काम कर रही है। प्रभुनाथ सिंह प्रकरण में सारे नियमों को ताक पर रखा गया है और अनुभवहीन (10 वर्ष से कम अनुभव) एपीपी से बहस करवायी गयी। गवाहों को भी डराया-धमकाया गया। जबकि विपक्षी दलों के नेताओं को फटाफट सजा करवा दी जा रही है। शकील अहमद के आरोप कितने सच हैं इसका जवाब तो अपराध अनुसंधान में लगे पुलिस अधिकारी ही दे सकते हैं।ंकि यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें प्रभुनाथ सिंह बाइज्जत बरी हुए हैं। पुलिस सूत्रों की मानें तो इनका राजनीतिक सफर ही हत्या जैसे संगीन आरोपों से शुरू हुआ है। 1977 में जब वे पहली बार विधायक बने थे उस समय भी वे मशरख के कांग्रेसी विधायक रामदेव सिंह की हत्या के आरोपी थी। तब से लेकर अबतक इन पर तीन दर्जन से अधिक हत्या, लूट एवं अन्य अपराधों के आरोप लगे। फिर भी राजनीतिक पहुंच की बदौलत प्रभुनाथ बराबर कानूनी शिकंजे से बचते रहे।
टाल क्षेत्र के कुख्यात जदयू विधायक अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार के आपराधिक किस्से चर्चित रहे हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार अकेले मोकामा में ही उनपर हत्या, लूट व बलात्कार के दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं। तीन साल में पटना के कोतवाली थाने में ही पत्रकार को जान से मारने, जमीन हड़पने व रंगदारी के चार मामले दर्ज हुए हैं। बावजूद इसके अनंत singh पर हाथ डालने में पुलिस के पसीने छूट रहे हैं। इस बाबत राज्य पुलिस प्रवक्ता-सह-सहायक पुलिस महानिदेशक अनिल सिन्हा बताते हैं कि कानून अपना काम कर रहा है। समय आने पर अनंत सिंह भी कानून के शिकंजे में होंगे।
सूबे के देहाती इलाकों की कौन कहे, राजधानी पटना भी पूरी तरह से अपराधमुक्त नहीं हो पाया है। तीसरी वर्षगांठ के जश्न में डूबी सरकार को अपराधियों ने कड़ी चुनौती देते हुए 19 नवंबर को सुल्तानगंज थाने से महज 50 गज की दूरी पर दिनदहाड़े कांग्रेसी नेता यदुनंदन यादव को गोलियों से भून दिया। वहीं लुटेरों ने एनएमसीएच के पास पुलिस की मौजूदगी में ही एक दवा दुकान में जमकर लूटपाट की। इसके तीन दिन पहले राजधानी में ही बाटा शू कंपनी के कार्यकारी प्रबंधक को गोलियों से भून दिया गया।
स्पीडी ट्रायल के आंकड़ों के खेल में मशगूल नीतीश सरकार के तीन वर्ष के शासनकाल में ही करीब 2103 डकैतियां हुईं। 8474 निर्दोष नागरिक गोलियों के शिकार हुए। जिला मुख्यालयों समेत अन्य जगहों पर दिनदहाड़े लूट की 5034 व चोरी की 35693 घटनाएं हुईं। स्कूली छात्रों समेत 6487 लोग अपहृत हुए। सामंती जुर्म के लिए सदा से कुख्यात बिहार में नीतीश शासनकाल के दौरान 3005 मासूमों एवं अबलाओं की अस्मत लूटी गई। लूट व छिनतई की 3552 व बैंक लूट व डकैती की 66 घटनाएं हुईं। आजादी के बाद बैंक लूट की अबतक की सबसे बड़ी घटना राजधानी के कंकड़बाग इलाके में हुई जहां घोड़े पर सवार लुटेरों ने 50 लाख रुपये लूट लिये। राजेन्द्र नगर व पटना जंक्शन के बीच चलती ट्रेन में दिनदहाड़े पूर्व डीआईजी की हत्या गोली मारकर कर दी गयी। बोरिंग रोड में सेवानिवृत आइएएस को गोलियों से भून दिया गया। पाटलिपुत्रा इलाके में प्रो. पापिया घोष हत्याकांड की गूंज देशभर में सुनी गयी। प्रदेश में तीन दर्जन से अधिक मानवाधिकार उल्लंघन के मामले भी प्रकाश में आए। phir भी अपराधों का यह आंकड़ा लालू-राबड़ी शासनकाल से काफी कम है
पाक साफ कोई नही ना लालू ना नीतिश
डीजीपी डीपी ओझा बताते हैं कि हमाम में सारे राजनीतिक दल नंगे हैं। इनका दावा है कि बिना राजनीतिक संरक्षण के अपराध हो ही नहीं सकते। पेश है बिहार की कानून-व्यवस्था पर संवाददाता श्याम सुन्दर के साथ हुई बातचीत के अंश
क्या सूबे में अपराधियों का मनोबल टूटा है?
हां, यह सही है कि प्रदेश में भयमुक्त समाज निर्माण की दिशा में सरकार के प्रयास दिखने शुरू हो गये हैं। फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं आए हैं। अपराधियों पर अंकुश लगाने में पुलिस बहुत हद तक सफल हुई है।
क्या पुलिस सत्ता के दबाव में भी काम करती है?
जब तक प्रशासनिक व पुलिस संगठन स्वायत्त नहीं होंगे तबतक राजनेताओं का हस्तक्षेप जारी रहेगा। जब मैं डीजीपी था, उस समय भी मैंने कहा था कि हमाम में सारे दल नंगे हैं। आज भी इस वाक्य पर मैं कायम हूं। अगर पुलिस का दबाव नहीं होता तो ऊं चे रसूख वाले सारे अपराधी, चाहे वे विधायक अथवा सांसद ही क्यों नहीं हों, नहीं बचते।
क्या सूबे में अभी भी सत्ता संरक्षित अपराधियों का बोलबाला है?
सीधे तौर पर तो नहीं कहा जा सकता। फिर भी पाक साफ न तो लालू प्रसाद हैं और न ही नीतीश कुमार व रामविलास पासवान। एक ओर जहां लालू को मो. शहाबुद्दीन जैसे बाहुबली सांसद की जरूरत है तो वहीं नीतीश कुमार को प्रभुनाथ सिंह एवं मोकामा विधायक अनंत सिंह की वहीं रामविलास पासवान को भी सूरजभान व मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबली नेताओं की दरकार है। राष्ट्रवाद का राग अलापने वाली भाजपा भी कम नहीं है। उसे भी नित्यानंद राय सरीखे लोग चाहिए। इन लोगों के रहते भयमुक्त समाज की कल्पना बेमानी है।
इसके जनता की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है?
जब राजनीति में अपराधियों का वर्चस्व बढ़ता है तब जनता असहाय हो जाती है। ऐसी स्थिति में जनता व सूबे की बेहतरी युवा ही सोच सकते हैं। युवाओं में अंगड़ाई शुरू हो गयी है। दो पीढ़ी आते-आते युवाओं की यही अंगड़ाई तूफान बनकर आएगी। नौजवान जागेगा, तो बदलाव अपने-आप आ जाएगा।
कैसा बदलाव आएगा?
यह एक बड़ा सवाल है। बदलाव वोट से आएगा या बंदूक से, फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह तय है कि तीन साल पहले नेपाली माओवादी नेता प्रचंड ने पशुपतिनाथ से तिरुपतिनाथ का जो नारा दिया था, उसका असर देश में भी दिखने लगा है।

Tuesday, November 11, 2008

...कहां गया हेलीकॉप्टर

रेड कोरिडोर बनाने का सपना देख रहे नक्सलियों ने पूरी तरह से छत्त्ाीसगढ़ को अपने कब्जे में ले रखा है। प्रदेश के बड़े इलाके में सुरक्षाकर्मी जाने से कतराते हैं। तभी तो बस्तर के आकाश से डेढ़ महीने पहले गायब हुआ रैन एयर (रैन बैक्सी गु्रप से संबद्ध) हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ने में सुरक्षा बल पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहा है। उसमें पायलट, सहायक पायलट, एक-एक इंजीनियर व तकनीिश्ायन सवार थे।
छत्त्ाीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ अबतक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ रखा है। इसमें सीआरपीएफ, सीएएफ, एसटीएफ के साथ ही एसपीओ को मिलाकर 12,600 जवान लगाये गये हैं। उसकी टोह में राज्य सरकार ने किराये पर पांच हेलीकॉप्टर ले रखा है। पुलिस व वायु सेना के जवान हेलीकॉप्टरों से अबतक 150 किलोमीटर की उड़ानें भर चुके हैं। इस अभियान में चार एयर बस भी लगाये गये हैं। 30 थाना क्षेत्रों में रेड अलर्ट घोषित किया गया है। फिर भी अबतक नतीजा सिफर ही रहा है। इस बाबत पुलिस प्रमुख विश्व रंजन का कहना है कि बारिश व खराब माैसम की वजह से विजिविलिटी (नजर आने वाली दूरी) 20 फीट से अधिक नहीं है। इसी वजह से हेलीकॉप्टर ढूंढ़ने में सफलता नहीं मिल पा रही है।
हैदराबाद से जगदलपुर आ रहा रैन एयर हेलीकॉप्टर बेल-430 तीन अगस्त को 4.30 बजे उड़ान भरा था। बताया जाता है कि 16 नाटिकल माइल्स (60 किलोमीटर) उड़ान भरने के बाद उसका वायुयान मार्ग नियंत्रण (एटीसी) से संपर्क भंग हो गया। इसे जगदलपुर से इंर्धन लेकर छत्त्ाीसगढ़ के गृहमंत्री रामविचार नेताम को लेने अंबिकापुर जाना था।
इस अभियान में लगे सुरक्षाकर्मियों को आशंका है कि हेलीकॉप्टर आंध्रप्रदेश-छत्त्ाीसगढ़ की सीमा पर या इससे लगे बस्तर के जंगलों में नक्सलियों के पास पहुंच गया है। शायद इसीलिए तलाशी की जद्दोजहद उसी इलाके में चल रही है। यह इलाका जंगलों-पहाड़ों से घिरा है आैर संयोग से नक्सलियों की गिरफ्त में है। हालांकि रिमोट सेंसिंग उपकरण ने संभावित जिन दो स्थलों को चिह्नित किया है उनमें से एक पर नक्सलियों के स्मारक मिले हैं जबकि दूसरी जगह पर ट्रैक्टर व पुलिस की जेसीबी। पुलिस महानिदेशक का कहना है कि हेलीकॉप्टर उड़ान भ्ारने के समय से ही नार्मल फ्लाइट पाथ यानी खम्मम, भद्राचलम आैर कोंटा होकर उड़ा ही नहीं। पायलट ने जंगलों, पहाड़ों वाला सीधा रास्ता अपनाया। उधर, मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है आैर हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ने में दुनिया की सबसे उच्च्ास्तरीय तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया है।
18,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में छेड़े गये अभियान की सफलता सिर्फ इतनी ही है कि यह क्षेत्र सिकुड़कर 8,000 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इस दाैरान नक्सलियों के साथ सुरक्षाकर्मियों का छह-सात बार मुठभेड़ हो चुकी है। दर्जनभर पुलिसकर्मियों ने शहादत भी दी है। 5 सितंबर को सुबह करीब 10.30 बजे छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में नक्सलियों के साथ पुलिस की मुठभेड़ हुई जिसमें तीन सीआरपीएफ व दो जिला पुलिस के जवान शहीद हो गये। इसका नेतृत्व बलरामपुर एसपी स्वयं कर रहे थे। पुलिस को इस बात की जानकारी मिली थी कि झारखंड सीमा से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर सामरी इलाके में नक्सलियों का कैंप चल रहा है उसमें करीब सौ नक्सली मौजूद हैं।
दूसरी ओर, गायब हुआ हेलीकॉप्टर नक्सलियों के कब्जे में ही है, ऐसा दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता। फिर भी हेलीकॉप्टर समेत गायब पायलट व अन्य चार लोगों को ढूंढ़ने की विनती उनके परिजनों ने नक्सलियों से की है। हेलीकॉप्टर में पायलट बीपी सिंह, सहायक पायलट कैप्टन आरके गाैर, इंजीनियर संतोष सिंह व तकनीिश्ायन अिश्वनी कुमार सवार थे।
उनके परिजनों ने नक्सलियों से मार्मिक अपील करते हुए निवेदन किया है कि उन लोगों से चार परिवारों का रोजी-रोटी जुड़ा हुआ है। इसलिए इंसानियत का ख्याल रखते हुए इस असमंजस की िस्थति से उबारने का प्रयास किया जाय। परिजनों का कहना है कि पुलिस दुर्गम जंगली इलाकोंं में नक्सलियों के डर से जाने से कतरा रही है।
नक्सलियों के खिलाफ अबतक का सबसे बड़ा अभियान
क्षेत्रफल-18,000 वर्ग किलोमीटर
जवान-12,600
कुल उड़ानें-100 घंटे
इस्तेमाल हेलीकॉप्टर-पांच (एयर फोर्स समेत)
इस्तेमाल एयर बस-चार
थाने अलर्ट-30

पहले बाढ़, अब सुखाड़/प्रकृति की दोहरी मार

एक ओर बाढ़ तो दूसरी ओर सुखाड़। बिहार के लोग कोसी की विभीषिका से अभी जूझ ही रहे थे कि राज्य का अधिकांश इलाका सूखे की चपेट में आ गया। लाखों हेक्टेयर में लगी धान की फसल सूख रही है। खरीफ फसल भी बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। सूबे में यह स्थिति सितंबर महीने में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश होने की वजह से उत्पन्न हुई है।
प्रदेश में 15 वृहद व 78 मध्यम नहर सिंचाई योजनाएं हैं। इनमें औरंगाबाद में 12, भागलपुर में 31, डेहरी में 4 व पटना जिले में 30 मध्यम योजनाएं हैं। अगर इन योजनाओं को ही सुचारू तरीके से चलाया जाए तो बहुत हद तक प्रदेश को सूखे से बचाया जा सकता था लेकिन इनका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। मौसम की बेरुखी सेे पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। हालांकि नीतीश सरकार के अस्तित्व में आते ही सूबे की तकदीर बदलने के लिए एक सार्थक प्रयास की शुरुआत की गयी थी लेकिन कोसी इलाके की बाढ़ व शेष इलाके में सुखाड़ ने सरकार के सारे प्रयासों को विफल कर दिया है। सूखे के कहर से प्रदेश के अधिकांश किसान त्राहिमाम कर रहे हैं।
बात चाहे सोन उच्चस्तरीय नहर के किनारे बसे औरंगाबाद जिले के ओबरा, दाउदनगर, अरवल व पटना के देहाती इलाके की हो या फिर उत्तरी कोयल सिंचाई परियोजना से सिंचित होने वाले औरंगाबाद, रफीगंज, नबीनगर, मदनपुर, बारूण (2 पंचायत), गुरूआ, गुरारू व टिकारी की। हर जगह पानी के लिए हाहाकर मचा हुआ है। "चावल का कटोरा' कहा जाने वाले कैमूर, भभुआ, भोजपुर व बक्सर के इलाके भी इससे अछूते नहीं रहे। धान की लहलहाती फसलें अंतिम पटवन के अभाव में मर रही हैं। कमोबेश यही स्थिति उत्तरी बिहार की गंडक परियोजना से लाभांवित होने वाले पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी व समस्तीपुर जिलों की भी है।
हालात ऐसे हैं कि जहानाबाद जिले के कुर्था,करपी, कांको, मखदुमपुर, कैमूर जिले के अधौरा, अरवल जिले के बैदराबाद, कलेर के निचले इलाके, जहानाबाद से सटे औरंगाबाद जिले के देवकुंड के साथ ही गोह के दक्षिणी इलाके, हमीदनगर पुनपुन बराज परियोजना के आसपास बसे गांव के साथ ही बक्सर जिले के चौसा इलाके के दर्जनों गांवों में पानी के लिए हिंसक झपड़ें तक हो चुकी हैं। किसानों के गुस्से का शिकार सासाराम में दो दिवसीय दौरे पर आईं केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार को होना पड़ा। आलमगंज की सभा में किसानों ने करमचट सिंचाई परियोजना को लेकर जमकर हंगामा किया।
गोह प्रखंड की झिकटिया पंचायत के पूर्व मुखिया नंदलाल सिंह बताते हैं कि अंतिम पटवन नहीं होने की वजह से धान की लहलहाती फसल मारी गयी। उन्होंने बताया कि गोह व रफीगंज इलाके में उत्तरी कोयल व टिकारी माइनर के आसपास के दर्जनों गांवों में भीषण सुखाड़ हो गया है। अगर दशहरा तक बारिश नहीं हुई तो इस इलाके में रबी फसल की भी बुवाई नहीं हो सकेगी, क्योंकि खेतों में दरारें पड़ गयी हैं। बारिश नहीं होने की वजह से धान के उत्पादन में कितना अंतर आएगा, इस संबंध में जब हमने कृषि निदेशक बी. राजेन्द्र सेजानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी स्पष्ट कहने से इंकार कर दिया।
पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह का कहना है कि शुरू में अच्छी बारिश हुई जिससे धान की अच्छी उपज होने की उम्मीद थी लेकिन सितंबर के शुरू से ही बारिश ने धोखा दे दिया। वहीं दोषपूर्ण जल बंटवारे की वजह से सोन नहर से सिंचित होने वाले इलाकोें में भी सिर्फ एक पटवन के लिए धान की फसल मारी गयी।
नीतीश सरकार जुलाई महीने में ही कर रही थी कि अतिवृष्टि की वजह से राजधानी पटना डूबा है। अगर उन दिनों वाकई सरकार का यह बयान सही था तो फिर सितंबर आते ही आखिर कैसे अधिकांश सिंचाई योजनाओं में पानी की किल्लत हो गयी? किसानों का कहना है कि अगस्त के अंतिम दिनों से ही तीखी धूप होने की वजह से खेतों में पानी की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। सितंबर के अंत तक इसने भयावह रूप ले लिया। राज्य सिंचाई कोषांग के निदेशक दिनेश कुमार चौधरी ने बताया कि अंतिम पटवन के अभाव में धान की फसलों को मरने नहीं दिया जाएगा। पानी के लिए मचे हाहाकार को देखते हुए ही सरकार उत्तर प्रदेश की रिहन्द सागर व मध्य प्रदेश की बांध सागर परियोजनाओं से प्रतिदिन 14275 क्यूसेक पानी खरीद रही है। यही पानी पश्चिमी सोन नहर में 9798 क्यूसेक व पूर्वी सोन नहर में 4477 क्यूसेक प्रतिदिन छोड़ा जा रहा है। जबकि गंडक परियोजना के मुख्य कैनाल में प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक व पूर्वी कैनाल में 5700 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। इससे उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में सिंचाई हो रही है।
सरकार के यह दावे अगर सही हैं तो फिर आखिर किन परिस्थितियों में सरकार ने सूबे के सभी हिस्सों के किसानों को अनुदान पर डीजल देने का ऐलान किया है। प्रधान सचिव विजय शंकर का कहना है कि 20 सितंबर को ही पानी के लिए मचे हाहाकार के मद्देनजर सरकार ने 63 करोड़, 16 लाख, 50 हजार रुपये जारी किये हैं। हालांकि जमीनी सच्चाई यह है कि घोषणा के 15 दिनों के बाद भी अबतक जिलाधिकारी को कोई आदेश नहीं मिले हैं। सवाल यह है कि इस अनुदान का लाभ किसानों को कब मिलेगा? नाम नहीं छापने की शर्त पर एक जिलाधिकारी ने बताया कि घोषणाएं पटना में हुई हैं। घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में महीनों लग सकते हैं।
प्रदेश में लघु सिंचाई योजनाएं भी कागजों पर ही दिखती हैं। अकेले बक्सर जिले में ही लगभग 120 पंपिंग सेट हैं लेकिन उनमें से अधिकांश बंद पड़े हैं। 15 पंपिंग सेट ठीक हालत में हैं भी तो खपत के अनुसार बिजली की आपूर्ति नहीं होने की वजह से ये पंप क्षमता के अनुसार पानी नहीं दे पा रहे हैं। स्थानीय बसपा विधायक हृदय नारायण सिंह बताते हैं कि पिछली राजद सरकार ने इलाके में सिंचाई की समस्या को दूर करने के लिए गंगा-चौसा पंप लाइन का निर्माण करवाया था लेकिन तीखी धूप के बावजूद सरकार जिले में औसत बिजली की आपूर्ति 32 के बजाय 15 मेगावाट कर रही है। इस वजह से सौ क्यूसेक पानी की क्षमता वाली यह परियोजना भी किसानों का साथ नहीं दे रही है। अधौरा प्रखंड में कर्मनाशा नदी पर बना पंप हाउस भी जंग खा रहा है। इससे लाभान्वित होेने वाले हजारों एकड़ जमीन में लगी फसल जल रही है। इधर 30 सितंबर को हुई बारिश से किसानों के चेहरे खिले दिख रहे हैं।
स्थिति की नजाकत इसी से समझी जा सकती है कि पानी बंटवारे को लेकर सूबे में पहली बार दो राज्यों के बीच विवाद खड़ा हो गया। औरंगाबाद के भाजपा विधायक रामाधार सिंह ने प्रदेश की 26 हजार हेक्टेयर जमीन में लगी धान की फसल को बचाने के लिए झारखंड प्रदेश के कुटकू बांध के समीप उत्तरी कोयल के मुख्य द्वार को ही काट दिया। इस संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में हुए समझौते के अनुसार बिहार को 2500 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए था लेकिन समझौते का उल्लंघन करते हुए झारखंड सरकार मात्र 1700 क्यूसेक पानी छोड़ रही थी जबकि उत्तरी कोयल को बिहार के एक लाख हेक्टेयर में सिंचाई करनी है।
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पानी से बिजली पर छिड़ी जंग
सूखे की चपेट में आए किसानों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए पक्ष-विपक्ष के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। पानी की किल्लत का ठीकरा विपक्षी नेताओं ने बिजली विभाग पर फोड़ना शुरू कर दिया है। राजद नेता व पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि अतिवृष्टि के बावजूद सितंबर महीने में ही सारे नदी-नाले सूख गये। जिन इलाकांें के किसान पंपिंग सेट से खेतों में सिंचाई करते थे वहां बिजली नहीं देकर सरकार दूसरे राज्यों को बेच रही है। उनका कहना है कि वैसे तो अधिकांश बिहार पहले से ही अंधेरे में डूबा हुआ है लेकिन जहां बिजली है वहां भी सरकार देने में सक्षम नहीं है। केंद्रीय पुल की बिजली में से 300 मेगावाट प्रतिदिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत अन्य दूसरे राज्यों को बेची जा रही है। दूसरी ओर, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह का कहना है कि केन्द्र सरकार बिहार के कोटे के अनुसार भी बिजली नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि औसतन बिजली का आवंटन सूबे में करीब 1400 मेगावाट है जबकि यहां मिल रही है मात्र एक हजार मेगावाट। पक्ष-विपक्ष के आरोप के बीच सच्चाई चाहे जो भी हो इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सूबे के अधिकांश इलाकों में औसतन बिजली प्रतिदिन पांच से छह घंटे ही मिल रही है।
बॉक्स
वृहद सिंचाई योजनाएं लाभांवित जिले
सोन उच्चस्तरीय नहर------भोजपुर, रोहतास, पटना, जहानाबाद, गया, औरंगाबाद
बदुआ जलाशय योजना----भागलपुर, मुंगेर
चंदन जलाशय योजना---भागलपुर
मोरहर सिंचाई योजना---गया
किउल जलाशय योजना---मुंगेर
कोसी योजना----पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, किशनगंज, सुपौल, अररिया
कुहिरा बांध-----कैमूर
मुसाखांड सिंचाई योजना---कैमूर
गंडक योजना-पूर्वी व पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर
लिलाजन सिंचाई योजना---गया
सकरी सिंचाई योजना---गया, नवादा
उदेरास्थान सिंचाई योजना---जहानाबाद, गया, नवादा
अपर मोरहर सिंचाई योजना--गया, नवादा
कमला, बलान, त्रिशुला सिंचाई योजना---मधुबनी

क्यों जल रहा है बिहार?

नालंदा के जगदीश प्रसाद का परिवार स्तब्ध, माैन आइर शोकसंतप्त है। ये वही जगदीश हैं, जिनकी इकलाैती संतान पवन उर्फ दीपू (24) को बेवजह आैर असमय नफरत की राजनीति की बलि वेदी पर चढ़ा दिया गया। जगदीश आैर उनके ही जैसे लाखों परिवारों को पता नहीं कि पेट की आग बुझाने के लिए दूसरे राज्यों की खाक छानने को कब गुनाह का दर्जा दिया गया। लेकिन, महाराष्ट्र में भड़की आग की लपट जिस तरह बिहार पहुंची, उसने यह बता दिया कि सिसायतदानों के मन में क्या है। पवन जैसे मासूमों की लाश की चाबी ही सत्त्ाा के द्वार खोलती है। हाल के वर्षों में सबसे सफल प्रयोग भाजपा की राम लहर थी, जिसने अन्य दलों को भी नकारात्मक राजनीति की दिशा दिखाई।
महाराष्ट्र से लेकर बिहार आैर यूपी तक राजनेताओं को इस उबलते मुद्दे के बीच इंतजार रहेगा, तो बस आम चुनाव का। इस पूरे प्रकरण की जिस तरह राजनीतिक साैदेबाज़ी होती दिखी, उसने यह संकेत दे दिया है कि बिहार आैर महाराष्ट्र में होनेवाले आम चुनाव में बाहरी-भीतरी का मुद्दा काफी अहम भूमिका अदा करेगा।
बिहार में राजद के लिए अभी एक चुनाैती यह है कि वह सत्त्ाा में नहीं। उसे चुनाव सिर्फ मुद्दों के आधार पर लड़ना है। चूंकि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजग सरकार है, इसलिए वह राज ठाकरे का ठीकरा राजग के बहाने नीतीश पर फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यद्यपि, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद सीधे ताैर पर अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना नहीं साध रहे, लेकिन उनकी पार्टी के श्याम रजक सरीखे नेता वार का एक भी माैका चूक नहीं रहे।
यही वजह है कि जब राज की गिरफ्तारी हुई, तो श्याम रजक ने कहा-"ऐसे लोगों के खिलाफ मारपीट का नहीं बल्कि देशद्राेह का भी मुकदमा चलना चाहिए।' वहीं दूसरी ओर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने भी कांग्रेस पर निशाना साधने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया। पार्टी प्रवक्ता विजय कुमार चौधरी ने कहा-" राज को गिरफ्तार करने में महाराष्ट्र सरकार ने देरी कर दी वरना बिहार के युवकों की पिटाई नहीं होती।'
नेतृत्वविहीन छात्रों का उग्र प्रदर्शन आगामी लोकसभा चुनाव में कुछ नया गुल खिलाएगा, यह अभी कहना मुिश्कल है। लेकिन जिस तरह पहली बार छात्रों की गोलबंदी हुई है, उससे 1974 के आंदोलन की उपज रेल मंत्री लालू प्रसाद से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत अन्य नेताओं के सामने एक चुनाैती खड़ी हो गयी है।
राज्य प्रशासन छात्रों के उग्र तेवर भांप चुका था, लेकिन इसे राजनीतिक मजबूरी ही कहेंगे, जिसके चलते हिंसा का जवाब कठोरता से नहीं दिया गया। यह उसी तरह का मामला है, जैसा राज ठाकरे के साथ आज तक महाराष्ट्र में होता आया है। फरवरी 2008 में राज ठाकरे के भड़काऊ भाषणों से वैमनस्यता फैली थी, जिसके शिकार बिहार आैर यूपी के कई मासूम हुए थे। उस समय भी महाराष्ट्र सरकार की थू-थू हुई थी, लेकिन मराठी जनमानस की उपेक्षा से जो राजनीतिक नुकसान हो सकता है, उसकी शायद विलासराव देशमुख को अच्छी तरह से समझ है। यही वजह रही होगी कि उनकी सरकार ने उस समय राज पर इतना हल्का मुकदमा ठोंका कि उन्हें जेल से बाहर आने में सिर्फ दो घंटे आैर 15 हजार के मुचलके ज़ाया करने पड़े। अगस्त 2008 में भी एमएनएस कार्यकर्ताओं ने मराठी में दुकानों के नाम लिखने की हिदायत दी आैर तय समय से पहले ही व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर हमले बोल दिये। लाखों की संपित्त्ा का नुकसान हुआ। इस मामले में राज्य सरकार ने सिर्फ एक मामूली किस्म की जांच का आदेश दे दिया। जब व्यापारी हाइकोर्ट गये, तो वहां से सरकार को कड़े कदम उठाने के निर्देश मिले, पर अचरज की बात यह है कि कुछ ही दिनों के बाद कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार ने एक शपथपत्र दायर कर यह बताया कि मनसे नेताओं का कोई कुसूर नहीं है। कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ। गिरफ्तारी आैर रिहाई के नाटक के बीच, जो कुछ हुआ उसे देश भर के करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा। आम आदमी के मन में एक आम धारणा यह ज़रूर बनी कि सत्य जितना जिखता है, उतना स्पष्ट नहीं होता। वैसे बिहार में भी उग्र आंदोलन के ज़रिए, जिस प्रकार एक-दूसरे पर निशाना साधा जा रहा है, वह समस्या के समाधान से ़़ज्यादा सियासी फायदा झपटने की तरकीब नज़र आ रहा है।
दूसरी ओर मुद्दे के चुनाव तक जिंदा रहने के भी कई प्रमाण मिल रहे हैं। मसलन, 23 अक्टूबर को हुई छात्रों की आपात बैठक में महाराष्ट्र के सारे उत्पादों के बहिष्कार का निर्णय लिया गया। छात्रों ने सभी दलों के नेताओं को कड़ी चेतावनी दी कि अगर इस बार नेता चुप रहते हैं तो वे आगामी लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे। छात्रों ने जिस तरह से रेलवे को क्षति पहुंंचायी है उसे देख राजद प्रमुख व रेल मंत्री लालू प्रसाद खासे दबाव में दिख रहे हैं। उन्होंने भी दबी जबान ही सही, पर इस प्रतिहिंसा का सारा दोष राज्य सरकार पर मढ़ दिया है। लेकिन प्रदेश के राजग नेता इसे आक्रोश की अभिव्यिक्त मान रहे हैं। क्योंकि इसके पहले भी चार बार हिन्दी भाषियों के नाम पर बिहारी छात्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के शिकार बने हैं। लाख टके का सवाल यह है कि आखिर हिन्दीभाषी के नाम पर बिहारियों को ही निशाना क्यों बनाया जाता है? आैर, अगर यूपी भी हिंदीभाषी प्रदेश है, तो वहां के नेता इस बर्बरता पर माैन क्यों रहे। जाहिर सी बात है, मायावती आैर मुलायम की महत्वाकांक्षा अब यूपी से बाहर निकल कर केंद्र तक पहुंच गयी है। ऐसी िस्थति में किसी एक प्रदेश की राजनीति के लिए मुद्दों को हथियाने की तीर गलत निशाने पर भी लग सकती है। यही वजह है कि आज बिहार अपने जख़्म खुद सी रहा है। कब तक सीना पड़ेगा, यह अनििश्र्चत है।

Monday, October 6, 2008

इन्हें पहचानिए!

अगर आपसे कोई पूछे कि देश में पहले "कसाई (मुसलमान) फिर ईसाई'... का नारा किसने दिया तो इसका जवाब होगा देश में सक्रिय हिन्दूवादी संगठनों ने। फिर आपसे कोई पूछे कि "कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे' का नारा किसने दिया तब भी कहेंगे-हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे कि शांतिदूत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या किसने की तो जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। उड़ीसा में वर्ष 1992 में ईसाई ग्राहम स्टेन्स व उनके बच्चों की हत्या किसने की तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। गांधी के गुजरात को साम्प्रदायिकता की आग में किसने झोंका-तब भी जवाब होगा-राज्य प्रायोजित हिन्दूवादी संगठनों ने। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में विवादित ढांचा बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि को विध्वंस किसने किया, तब भी जवाब होगा-अतिवादी हिन्दूत्ववादी संगठनों ने। फिर अगर कोई पूछे कि उड़ीसा के कंधमाल में 23 अगस्त को हिन्दूवादी नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या किसने की तो जवाब होगा-पता नहीं, लेकिन इस हत्या की जिम्मेवारी भाकपा (माओवादी) से जुड़े नक्सलियों ने ली है। फिर भी इसकी सही जानकारी पुलिसिया अनुसंधान के बाद ही पता चल सकेगा। तो फिर अगर आपसे कोई पूछे कि लक्ष्मणानंद को शहीद कौन कह रहा है तो जवाब होगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल सरीखे हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे के स्वामी की हत्या के बाद उड़ीसा, कर्नाटक, केरल समेत देश के अन्य भागों में साम्प्रदायिकता का ताना-बाना कौन बुन रहा है? आखिर किसके उकसावे पर एकतरफा ईसाईयों का कत्लेआम शुरू है। शायद तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। तो फिर सवाल उठता है कि इन मुट्ठीभर हिन्दूवादी संगठनों की आड़ में आखिर कबतक हिन्दुस्तान बदनाम होता रहेगा? कबतक मानवता तार-तार होती रहेगी? हिन्दुस्तानियों के खून के प्यासे आखिर कबतक अपने ही भाई-बहनों का कत्लेआम कर अपनी प्यास बुझाते रहेंगे? इस अंतहीन सिलसिला का अंत आखिर कब होगा? इसका जवाब कहां और किसके पास है? इस मुल्क में आखिर कबतक कभी मुसलमानों का तो कभी ईसाईयों का कत्लेआम होते रहेगा? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आखिर कबतक धर्मांतरण का झूठा स्वांग रचा जाता रहेगा? सत्ता के सौदागरों के हाथों तबतक देश कलंकित होते रहेगा?
उड़ीसा, कर्नाटक, झारखंड समेत देश के अन्य हिस्सों में धर्मांतरित दलित हिन्दुओं, आदिवासियों का दुनाह तो सिर्फ यही है न, कि वे अपने स्वाभिमान के लिए धर्मांतरण का सहारा लिया। इसका फायदा भी समाज में दिखा। लाखों वर्षों से "मनु स्मृति' की चक्की में पीसते आ रहे दलितों व आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार हुआ। प्रगतिशील व सभ्य समाज की अवधारणा अगर इस देश में कहीं से आई है तो वह ब्रिटेन की देन है और इसके लिए अंग्रेजों को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। सचमुच उन्होंने ही सामंती दासता के जकड़न में फंसे भारतीयों को जीने की कला सीखाई।
इतिहास गवाह है। इसी देश में हिन्दू सम्राट चक्रवर्ती अशोक जब कंधमाल के आसपास के इलाकों में बेइन्तहां कत्लेआम बरपाने के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया था तब तो हिन्दूओं को कोई खतरा ही नहीं हुआ। एक हजार वर्षों तक मुसलमानों की हुकूमत से हिन्दूओं को कोई खास खतरा नहीं हुआ। डचों, फ्रांसीसियों व अंग्रेजों से भारतीयों को कोई खतरा नहीं हुआ तो फिर आज के जमाने में किससे हिन्दुस्तानियों को खतरा महसूस हो रहा है। आखिर समाज के पिछड़े, दलित इलाके के लोगों ने अपने स्वाभिमान व सुख-सुविधा के लिए धर्म-परिवर्तन कर ही लिया तो हिन्दुओं पर कौन सा पहाड़ टूट गया? दरिंदों को समझना चाहिए कि आज धर्म के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में बहाये जा रहे खून भी हिन्दुस्तानियों का ही है। आखिर धर्म व जाति के नाम पर नफरत कौन फैला रहा है? आखिर दलितोंे को क्या, कभी किसी मनुवादियों से स्वाभिमान से जीने देना पसन्द किया? शायद नहीं। खुले समाज में आखिर कौन महिलाओं को बच्चा पैदा करने वाली मशीन समझता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आखिर कौन लगाम लगाना चाहता है? गाय को माता मानने वाले लोग क्यों भूल रहे हैं कि देश की केन्द्रीय राजधानी दिल्ली समेत अन्य शहरों में हजारों विदेशी नस्ल की गायें आवारा कुत्तों की तरह रोज सड़कों पर घूमती रहती हैं। जिस देश में हर महीने में देवियों की पूजा होती हैं उसी देश में आए दिन क्यों मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं घटती हैं? आश्चर्य तो यह कि बजरंग के संस्थापक व सांसद विनय कटियार पर वर्ष 1992 में ही एक हिन्दू कन्या के साथ बलात्कार का आरोप लग चुका है। फिर भी यह संगठन हिन्दुओं का ठेकेदार बना हुआ है। याद रहे कि दुष्कर्मियों का न कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। उनके शिकार हिन्दू कन्याएं भी होती हैं और अन्य दूसरे समुदाय की कन्याएं भीं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में जितने भी दुष्कर्म की घटनाएं हुई हैं उनमें से अधिकांश घटनाओं को लंपट हिन्दू लड़कों ने अंजाम दिया है और शिकार भी हिन्दू कन्याओं को ही होना पड़ा है। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर समाज की इन कुरीतियों की ओर बजरंग दल का ध्यान क्यों नहीं जाता?
वेलेंटाइन डे के नाम पर प्यार का इजहार करने वाली जोड़ियों पर बजरंग दल क्यों कहर बरपाता है? इस मौके की ताक में मुस्लिम व ईसाई ही नहीं, देश की लाखों-करोड़ों हिन्दू युवतियां रहती हैं। इस मौके पर मुंबई, दिल्ली से लेकर अन्य शहरों में प्यार कर इजहार कर रहने वाली हिन्दू किशोरियों को भी बजरंग दल ने नहीं छोड़ा? हिन्दूवादी संगठन आखिर कौन सी भारतीय संस्कृति की बात करती है? क्या इसके कार्यकर्ता भूल रहे हैं कि सूर्य पुत्र कर्ण का जन्म कुंवारी कन्या कुन्ती ने दी थी। जगत जननी सीता ने अपना ब्याह स्वयंवर में रचाया था। अपने को क्षत्रीय कहलाने वाले राम व लक्ष्मण ने रावण की बहन सूर्पनखा का नाक इसलिए काट लिया था कि वह अपनी जवानी का इजहार उनके सामने कर रही थी। यही हिन्दू संस्कृति है जिसने भरी सभा में अपने ही परिवार की एक सदस्या द्रोपदी का चीरहरण कर तब सभ्य समाज को शर्मसार कर दिया था। क्या यह बात किसी से छुपी हुई है कि इन्द्र के दरबार में अप्सराओंं से आंख लड़ाने की इजाजत सिर्फ और सिर्फ इन्द्र को ही थी। क्या प्यार भी बंदूक के बल से हो सकता है? उपद्रवी हिन्दुओं! अभी भी समय है। चेतो। इतिहास से सीख लो। नहीं तो सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था। उस समय अशोक के धुआंधार धर्म प्रचार की वजह से बौद्ध धर्म का परचम पूरे दुनिया में लहराया था। आज तुम्हारे ही कुकर्मों का परिणाम है कि यहां के आदिवासी व दलित धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। बंदूक की भाषा न तो कभी सभ्य समाज समझा है और न ही आगे भी समझने वाला है। इसलिए संभालो अपने-आप को। बचाओ, भारत की अस्मिता और नये सिरे से गढ़ो भारत की तकदीर। बनाओ स्वामी विवेकानंद का भारत, जिसमें न कहीं ऊ ंच-नीच का भेदभाव रहे और न ही छुआछूत की भावना समाज में रहे। न ही कोई शोषक हो और न हो कोई शासक।
कम नहीं है बजरंग दल
बजरंग दल एक बार फिर अपनी स्थापना के 25वें वर्षगांठ पर यह संगठन चर्चा में है। बजरंग दल ने देश में हालात ऐसे उत्पन्न कर दिये हैं कि देश की धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक बार फिर इस पर प्रतिबंध की मांग करने लगी हैं। बताते चलें कि इसके पहले भी इस संगठन पर दो बार प्रतिबंध लग चुके हैं। बजरंग दल के पूर्व संयोजक और भाजपा के सांसद विनय कटियार बताते हैं कि बजरंग दल की स्थापना विहिप के युवा दल के रूप में की गई थी लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि आप पर 13 वर्षीय एक लड़की के साथ दुुष्कर्म का आरोप भी लगा है। क्या वह लड़की गैर-हिन्दू थी? या फिर गैर-हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार जायज है
बजरंग दल नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं, ""उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पिछले 40 वर्षों से वहां के वनवासियों के बीच काम कर रहे थे। उनकी हत्या के कारण वनवासियों में रोष उत्पन्न हुआ और फिर जो कुछ हुआ, वह उस रोष की प्रतिक्रिया थी। भारत सरकार और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल इसे हमारे सिर मढ़ने का प्रयास कर रहें हैं। मेरा यह मानना है कि कर्नाटक और उड़ीसा की घटनाओं में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद कहीं शामिल नहीं है।'' दूसरी ओर ईसाई नेता फ़ादर डोमेनिक इमैनुअल का आरोप है-""देश में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे बजरंग दल का हाथ है।'' बजरंग दल के संयोजक चाहे हिंसा के आरोपों को ख़ारिज करें लेकिन अपने संगठन की हिन्दू राष्ट्र स्थापना की मंशा को ज़रूर स्वीकार करते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहेगा। फिर भी, इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि इसी वर्ष अगस्त में कानपुर में बम बनाते हुए दो लोग मारे गए थे। पुलिस का कहना है कि इनका संबंध बजरंग दल से है। वर्ष 2006 में नांदेड में बम बनाते बजरंग दल के दो तथाकथित सदस्य मारे गए थे। बजरंग दल के अमानवीय हरकत व हिंसक तेवर पर आरएसएस के सदस्य रह चुके और अब संगठन पर पैनी निगाह रखने वाले डीएल गोयल कहते हैं-"अकेले बजरंग दल ही क्यों? अन्य कई हिन्दूवादी संगठन भी हैं जो संविधान को नहीं मानते और इन पर अंकुश लगाना जरूरी है।' उनका यह भी कहना है कि विश्व हिन्दू परिषद ने आज तक जो कुछ भी किया वह भारतीय संविधान के हिसाब से गलत है। उन्होंने बजरंग दल प्रमुख के एक बयान का हवाला देते हुए कहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र बनाना है। लेकिन सवाल उठता है कि देश तो हिन्दू राष्ट्र नहीं है। तो इसका मतलब है कि माओवादियों की तरह से वह भी एक अलग संविधान बनान चाहते हैं। इसलिए ही ये संगठन भारतीय संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं।'' मुंबई के सामाजिक कार्यकर्ता जावेद आनंद कहते हैं-"नांदेड में बम बना रहे कार्यकर्ता बजरंग दल के ही थे। इसके पक्के सबूत महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के पास मौजूद है। उनका कहना है कि 5-6 अप्रैल, 2006 में नांदेड में एक सेवानिवृत अभियंता के घर में बम विस्फोट हुआ, उस समय वहां छह लोग उपस्थित थे। इसके बाद पुलिस ने अनुसंधान रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले रिपोर्ट जारी किये। पुलिस का कहना है कि वर्ष 2003-04 में परभणी, जालना और पूर्णा की मस्जिदों में हुए धमाकों में बजरंग दल से जुड़े दर्जनों कार्यकर्ता शामिल थे। इन लोगों ने पूना में बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था। मात्र एक घटना से ही स्पष्ट है कि ये लोग बम बनाने व उसे फोड़ने में लगे हुए हैं। सूत्रों का कहना है कि लोकतांत्रिक देश में उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि अगर एक कार्यकर्ता दूसरे समुदाय के चार सौ से कम लोगों को मारा तो वह "हिजरा' कहा जाएगा। तो भी सवाल उठता है कि सिमी व बजरंग दल में क्या अंतर है? और अगर वाकई सरकार धर्म निरपेक्ष है तो सिमी समेत अन्य कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के साथ ही बजरंग दल समेत दूसरे चरम कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाने जाने की जरूरत है। इधर, राजद नेता व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव कहते हैं-"जबतक ठोकर नहीं लगती आदमी बढ़ता जाता है, कहीं कोई स्पीड ब्रेकर नहीं है। सरकार के पास इन लोगों की सूची है। इन्हें जेल में बंद कर दीजिए।'
हालांकि सिमी के साथ बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात पर इसके नेता भड़क उठते हैं। दल के नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं कि सिमी से जुड़े लोग कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का झंडा फहराते हैं। इसके लोग बम बलास्ट करते हैं। इस संगठन पर आइएसआइ व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से संबंध का आरोप है वहीं जावेद आनंद कहते हैं कि अगर अनलॉफ़ुल एक्टीविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट 1967 के प्रावधानों के अनुसार सिमी पर प्रतिबंध लगता है तो बजरंग दल पर इससे दस गुना ज्यादा प्रतिबंध लगना चाहिए।
प्रकाश शर्मा बताते हैं-"हम भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे। भारत के हिन्दू राष्ट्र बनने पर ही देश सुखी होगा। हिन्दू अपमानित महसूस कर रहा है। हिन्दू मारा जा रहा है और उसके बाद हिन्दुओं को ही कटघरे में खड़ा भी किया जा रहा है।'

इन्हें पहचानिए!

अगर आपसे कोई पूछे कि देश में पहले "कसाई (मुसलमान) फिर ईसाई'... का नारा किसने दिया तो इसका जवाब होगा देश में सक्रिय हिन्दूवादी संगठनों ने। फिर आपसे कोई पूछे कि "कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे' का नारा किसने दिया तब भी कहेंगे-हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे कि शांतिदूत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या किसने की तो जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। उड़ीसा में वर्ष 1992 में ईसाई ग्राहम स्टेन्स व उनके बच्चों की हत्या किसने की तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। गांधी के गुजरात को साम्प्रदायिकता की आग में किसने झोंका-तब भी जवाब होगा-राज्य प्रायोजित हिन्दूवादी संगठनों ने। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में विवादित ढांचा बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि को विध्वंस किसने किया, तब भी जवाब होगा-अतिवादी हिन्दूत्ववादी संगठनों ने। फिर अगर कोई पूछे कि उड़ीसा के कंधमाल में 23 अगस्त को हिन्दूवादी नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या किसने की तो जवाब होगा-पता नहीं, लेकिन इस हत्या की जिम्मेवारी भाकपा (माओवादी) से जुड़े नक्सलियों ने ली है। फिर भी इसकी सही जानकारी पुलिसिया अनुसंधान के बाद ही पता चल सकेगा। तो फिर अगर आपसे कोई पूछे कि लक्ष्मणानंद को शहीद कौन कह रहा है तो जवाब होगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल सरीखे हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे के स्वामी की हत्या के बाद उड़ीसा, कर्नाटक, केरल समेत देश के अन्य भागों में साम्प्रदायिकता का ताना-बाना कौन बुन रहा है? आखिर किसके उकसावे पर एकतरफा ईसाईयों का कत्लेआम शुरू है। शायद तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। तो फिर सवाल उठता है कि इन मुट्ठीभर हिन्दूवादी संगठनों की आड़ में आखिर कबतक हिन्दुस्तान बदनाम होता रहेगा? कबतक मानवता तार-तार होती रहेगी? हिन्दुस्तानियों के खून के प्यासे आखिर कबतक अपने ही भाई-बहनों का कत्लेआम कर अपनी प्यास बुझाते रहेंगे? इस अंतहीन सिलसिला का अंत आखिर कब होगा? इसका जवाब कहां और किसके पास है? इस मुल्क में आखिर कबतक कभी मुसलमानों का तो कभी ईसाईयों का कत्लेआम होते रहेगा? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आखिर कबतक धर्मांतरण का झूठा स्वांग रचा जाता रहेगा? सत्ता के सौदागरों के हाथों तबतक देश कलंकित होते रहेगा?
उड़ीसा, कर्नाटक, झारखंड समेत देश के अन्य हिस्सों में धर्मांतरित दलित हिन्दुओं, आदिवासियों का दुनाह तो सिर्फ यही है न, कि वे अपने स्वाभिमान के लिए धर्मांतरण का सहारा लिया। इसका फायदा भी समाज में दिखा। लाखों वर्षों से "मनु स्मृति' की चक्की में पीसते आ रहे दलितों व आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार हुआ। प्रगतिशील व सभ्य समाज की अवधारणा अगर इस देश में कहीं से आई है तो वह ब्रिटेन की देन है और इसके लिए अंग्रेजों को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। सचमुच उन्होंने ही सामंती दासता के जकड़न में फंसे भारतीयों को जीने की कला सीखाई।
इतिहास गवाह है। इसी देश में हिन्दू सम्राट चक्रवर्ती अशोक जब कंधमाल के आसपास के इलाकों में बेइन्तहां कत्लेआम बरपाने के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया था तब तो हिन्दूओं को कोई खतरा ही नहीं हुआ। एक हजार वर्षों तक मुसलमानों की हुकूमत से हिन्दूओं को कोई खास खतरा नहीं हुआ। डचों, फ्रांसीसियों व अंग्रेजों से भारतीयों को कोई खतरा नहीं हुआ तो फिर आज के जमाने में किससे हिन्दुस्तानियों को खतरा महसूस हो रहा है। आखिर समाज के पिछड़े, दलित इलाके के लोगों ने अपने स्वाभिमान व सुख-सुविधा के लिए धर्म-परिवर्तन कर ही लिया तो हिन्दुओं पर कौन सा पहाड़ टूट गया? दरिंदों को समझना चाहिए कि आज धर्म के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में बहाये जा रहे खून भी हिन्दुस्तानियों का ही है। आखिर धर्म व जाति के नाम पर नफरत कौन फैला रहा है? आखिर दलितोंे को क्या, कभी किसी मनुवादियों से स्वाभिमान से जीने देना पसन्द किया? शायद नहीं। खुले समाज में आखिर कौन महिलाओं को बच्चा पैदा करने वाली मशीन समझता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आखिर कौन लगाम लगाना चाहता है? गाय को माता मानने वाले लोग क्यों भूल रहे हैं कि देश की केन्द्रीय राजधानी दिल्ली समेत अन्य शहरों में हजारों विदेशी नस्ल की गायें आवारा कुत्तों की तरह रोज सड़कों पर घूमती रहती हैं। जिस देश में हर महीने में देवियों की पूजा होती हैं उसी देश में आए दिन क्यों मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं घटती हैं? आश्चर्य तो यह कि बजरंग के संस्थापक व सांसद विनय कटियार पर वर्ष 1992 में ही एक हिन्दू कन्या के साथ बलात्कार का आरोप लग चुका है। फिर भी यह संगठन हिन्दुओं का ठेकेदार बना हुआ है। याद रहे कि दुष्कर्मियों का न कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। उनके शिकार हिन्दू कन्याएं भी होती हैं और अन्य दूसरे समुदाय की कन्याएं भीं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में जितने भी दुष्कर्म की घटनाएं हुई हैं उनमें से अधिकांश घटनाओं को लंपट हिन्दू लड़कों ने अंजाम दिया है और शिकार भी हिन्दू कन्याओं को ही होना पड़ा है। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर समाज की इन कुरीतियों की ओर बजरंग दल का ध्यान क्यों नहीं जाता?
वेलेंटाइन डे के नाम पर प्यार का इजहार करने वाली जोड़ियों पर बजरंग दल क्यों कहर बरपाता है? इस मौके की ताक में मुस्लिम व ईसाई ही नहीं, देश की लाखों-करोड़ों हिन्दू युवतियां रहती हैं। इस मौके पर मुंबई, दिल्ली से लेकर अन्य शहरों में प्यार कर इजहार कर रहने वाली हिन्दू किशोरियों को भी बजरंग दल ने नहीं छोड़ा? हिन्दूवादी संगठन आखिर कौन सी भारतीय संस्कृति की बात करती है? क्या इसके कार्यकर्ता भूल रहे हैं कि सूर्य पुत्र कर्ण का जन्म कुंवारी कन्या कुन्ती ने दी थी। जगत जननी सीता ने अपना ब्याह स्वयंवर में रचाया था। अपने को क्षत्रीय कहलाने वाले राम व लक्ष्मण ने रावण की बहन सूर्पनखा का नाक इसलिए काट लिया था कि वह अपनी जवानी का इजहार उनके सामने कर रही थी। यही हिन्दू संस्कृति है जिसने भरी सभा में अपने ही परिवार की एक सदस्या द्रोपदी का चीरहरण कर तब सभ्य समाज को शर्मसार कर दिया था। क्या यह बात किसी से छुपी हुई है कि इन्द्र के दरबार में अप्सराओंं से आंख लड़ाने की इजाजत सिर्फ और सिर्फ इन्द्र को ही थी। क्या प्यार भी बंदूक के बल से हो सकता है? उपद्रवी हिन्दुओं! अभी भी समय है। चेतो। इतिहास से सीख लो। नहीं तो सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था। उस समय अशोक के धुआंधार धर्म प्रचार की वजह से बौद्ध धर्म का परचम पूरे दुनिया में लहराया था। आज तुम्हारे ही कुकर्मों का परिणाम है कि यहां के आदिवासी व दलित धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। बंदूक की भाषा न तो कभी सभ्य समाज समझा है और न ही आगे भी समझने वाला है। इसलिए संभालो अपने-आप को। बचाओ, भारत की अस्मिता और नये सिरे से गढ़ो भारत की तकदीर। बनाओ स्वामी विवेकानंद का भारत, जिसमें न कहीं ऊ ंच-नीच का भेदभाव रहे और न ही छुआछूत की भावना समाज में रहे। न ही कोई शोषक हो और न हो कोई शासक।
कम नहीं है बजरंग दल
बजरंग दल एक बार फिर अपनी स्थापना के 25वें वर्षगांठ पर यह संगठन चर्चा में है। बजरंग दल ने देश में हालात ऐसे उत्पन्न कर दिये हैं कि देश की धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक बार फिर इस पर प्रतिबंध की मांग करने लगी हैं। बताते चलें कि इसके पहले भी इस संगठन पर दो बार प्रतिबंध लग चुके हैं। बजरंग दल के पूर्व संयोजक और भाजपा के सांसद विनय कटियार बताते हैं कि बजरंग दल की स्थापना विहिप के युवा दल के रूप में की गई थी लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि आप पर 13 वर्षीय एक लड़की के साथ दुुष्कर्म का आरोप भी लगा है। क्या वह लड़की गैर-हिन्दू थी? या फिर गैर-हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार जायज है। ़
बजरंग दल नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं, ""उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पिछले 40 वर्षों से वहां के वनवासियों के बीच काम कर रहे थे। उनकी हत्या के कारण वनवासियों में रोष उत्पन्न हुआ और फिर जो कुछ हुआ, वह उस रोष की प्रतिक्रिया थी। भारत सरकार और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल इसे हमारे सिर मढ़ने का प्रयास कर रहें हैं। मेरा यह मानना है कि कर्नाटक और उड़ीसा की घटनाओं में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद कहीं शामिल नहीं है।'' दूसरी ओर ईसाई नेता फ़ादर डोमेनिक इमैनुअल का आरोप है-""देश में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे बजरंग दल का हाथ है।'' बजरंग दल के संयोजक चाहे हिंसा के आरोपों को ख़ारिज करें लेकिन अपने संगठन की हिन्दू राष्ट्र स्थापना की मंशा को ज़रूर स्वीकार करते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहेगा। फिर भी, इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि इसी वर्ष अगस्त में कानपुर में बम बनाते हुए दो लोग मारे गए थे। पुलिस का कहना है कि इनका संबंध बजरंग दल से है। वर्ष 2006 में नांदेड में बम बनाते बजरंग दल के दो तथाकथित सदस्य मारे गए थे। बजरंग दल के अमानवीय हरकत व हिंसक तेवर पर आरएसएस के सदस्य रह चुके और अब संगठन पर पैनी निगाह रखने वाले डीएल गोयल कहते हैं-"अकेले बजरंग दल ही क्यों? अन्य कई हिन्दूवादी संगठन भी हैं जो संविधान को नहीं मानते और इन पर अंकुश लगाना जरूरी है।' उनका यह भी कहना है कि विश्व हिन्दू परिषद ने आज तक जो कुछ भी किया वह भारतीय संविधान के हिसाब से गलत है। उन्होंने बजरंग दल प्रमुख के एक बयान का हवाला देते हुए कहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र बनाना है। लेकिन सवाल उठता है कि देश तो हिन्दू राष्ट्र नहीं है। तो इसका मतलब है कि माओवादियों की तरह से वह भी एक अलग संविधान बनान चाहते हैं। इसलिए ही ये संगठन भारतीय संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं।'' मुंबई के सामाजिक कार्यकर्ता जावेद आनंद कहते हैं-"नांदेड में बम बना रहे कार्यकर्ता बजरंग दल के ही थे। इसके पक्के सबूत महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के पास मौजूद है। उनका कहना है कि 5-6 अप्रैल, 2006 में नांदेड में एक सेवानिवृत अभियंता के घर में बम विस्फोट हुआ, उस समय वहां छह लोग उपस्थित थे। इसके बाद पुलिस ने अनुसंधान रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले रिपोर्ट जारी किये। पुलिस का कहना है कि वर्ष 2003-04 में परभणी, जालना और पूर्णा की मस्जिदों में हुए धमाकों में बजरंग दल से जुड़े दर्जनों कार्यकर्ता शामिल थे। इन लोगों ने पूना में बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था। मात्र एक घटना से ही स्पष्ट है कि ये लोग बम बनाने व उसे फोड़ने में लगे हुए हैं। सूत्रों का कहना है कि लोकतांत्रिक देश में उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि अगर एक कार्यकर्ता दूसरे समुदाय के चार सौ से कम लोगों को मारा तो वह "हिजरा' कहा जाएगा। तो भी सवाल उठता है कि सिमी व बजरंग दल में क्या अंतर है? और अगर वाकई सरकार धर्म निरपेक्ष है तो सिमी समेत अन्य कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के साथ ही बजरंग दल समेत दूसरे चरम कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाने जाने की जरूरत है। इधर, राजद नेता व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव कहते हैं-"जबतक ठोकर नहीं लगती आदमी बढ़ता जाता है, कहीं कोई स्पीड ब्रेकर नहीं है। सरकार के पास इन लोगों की सूची है। इन्हें जेल में बंद कर दीजिए।'
हालांकि सिमी के साथ बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात पर इसके नेता भड़क उठते हैं। दल के नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं कि सिमी से जुड़े लोग कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का झंडा फहराते हैं। इसके लोग बम बलास्ट करते हैं। इस संगठन पर आइएसआइ व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से संबंध का आरोप है वहीं जावेद आनंद कहते हैं कि अगर अनलॉफ़ुल एक्टीविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट 1967 के प्रावधानों के अनुसार सिमी पर प्रतिबंध लगता है तो बजरंग दल पर इससे दस गुना ज्यादा प्रतिबंध लगना चाहिए।
प्रकाश शर्मा बताते हैं-"हम भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे। भारत के हिन्दू राष्ट्र बनने पर ही देश सुखी होगा। हिन्दू अपमानित महसूस कर रहा है। हिन्दू मारा जा रहा है और उसके बाद हिन्दुओं को ही कटघरे में खड़ा भी किया जा रहा है।'

Monday, September 29, 2008

सशंकित उद्यमी : पूंजी निवेश की धीमी रफ्तार
भूषण स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ हुई बदसलूकी ने राज्य के औद्योगिक विकास की संभावनाओं पर नये सिरे से सवाल खड़े कर दिये हैं। अब उद्योगपति सरकारी मंशा को भांपने में लगे हैं।
पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशिया के रासायनिक कंपनी सलीम गु्रप के खिलाफ महासंग्राम, इसी राज्य में टाटा के लिए गहरी समस्या बन चुका सिंगूूूूूूूूूूूूूूूूर, उड़ीसा में पोस्को के खिलाफ अवाम का प्रदर्शन और अब झारखंड में एक स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी...। अगली पंक्ति में कौन होगा फिलहाल कहना मुश्किल है। अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे राज्यों में आधारभूत संरचनाएं झारखंड के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं। झारखंड गठन के बाद से राज्य औद्योगिक विकास के लिए सिर्फ तैयारियों में ही जुटा है। इस स्थिति में औद्योगिक समूह के कर्मचारियों के साथ पुलिस और प्रशासन की उपस्थिति में दुर्व्यहार इसके रास्ते में रोड़े अटका रही है। बीते दिनों जमशेदुपर के पोटका प्रखंड के ग्रामीणों ने पुलिस-प्रशासन की मौजूदगी में भूषण स्टील कंपनी के लिए काम कर रहे द सर्वेयर एंड एलायड इंजीनियरिंग कंपनी के कर्मचारियों के साथ जिस तरह का सलूक किया उससे सरकार की मंशा साफ हो जाती है।
देसी-विदेशी कंपनियों के लिए देश में कोई प्रोजेक्ट शुरू करना एवरेस्ट की चढ़ाई के समान है। हर जगह मुद्दा जमीन अधिग्रहण का है। कई कंपनियां ने तो अपनी परियोजनाओं से हाथ भी खींच लिया है। आखिर इसके लिए जिम्मेवार कौन है? और गलतियां किससे हो रही हैं...। कंपनियों से या फिर अदूरदर्शी सरकारों से? या फिर उद्योग स्थापना के नाम पर सिर्फ सस्ते दर पर जमीन लेने की एक नई प्रथा चल पड़ी है, जिसमें लोग उद्योग लगाते तो नहीं अलबत्ता इसी बहाने पानी के भाव जमीन हासिल कर लेते हैं।
रांची से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पोटका प्रखंड। इसी प्रखंड के सरमंदा व रोलाडीह गांव में भूषण स्टील कंपनी के लिए काम करने गये द सर्वेयर एंड एलायड इंजीनियरिंग कंपनी के तीन कर्मचारियों, युसूफ अहमद, सहदेव सिंह व शीतल कुमार भारद्वाज को पहले ग्रामीणों ने बंधक बनाया। उसके बाद स्थानीय झामुमो विधायक अमूल्य सरदार के समर्थकों ने उन्हें जूते का हार पहनाकर करीब चार किलोमीटर तक तपती धूप मेंं घुमाया। नंगे पाव दहशत में घूम रहे कर्मचारियों के पैरों में छाले पड़ गये। वहीं एक-दूसरे के गालों पर थप्पड़ भी मारे गये। फिर कभी इस इलाके में नहीं आने की कसम खिलवायी। तब जाकर सर्वेयरों की जान बख्शी गयी।
इधर, घटना के विरोध में निवेशक बौखला गये। राजधानी रांची में विरोध प्रदर्शन का दौर शुरू हुआ। मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। तब जाकर मामला शांत हुआ। हालांकि अभी भी निवेशकों में भय व्याप्त है। घटना के विरोध में भूषण स्टील कंपनी समेत अन्य नये उद्यमियों ने फिलहाल काम ठप कर दिया है।
यह पहला मौका नहीं है जब उद्योगपतियों को इस तरह की बेइज्जती का सामना करना पड़ा हो। इसके पहले भी सूबे की ओर आकर्षित होने वाले निवेशकों को सरकार की ओर से परेशानियां उठानी पड़ी हैं। यही कारण है कि खनिज संपदाओं से भरपूर होने के बावजूद सूबे में अबतक बड़े निवेशकों में से एक कोहिनूर स्टील कंपनी (चांडिल) को ही धरातल पर उतारने में सरकार कामयाब हो पाई है। हालांकि गत वर्ष इस कंपनी के कर्मचारियों को भी केंदरा के समीप पीटा गया था।
भूषण स्टील कंपनी व सरकार के बीच वर्ष 2006 में ही एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुआ था। दोनों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि कंपनी के लिए 70 फीसदी जमीन का इंतजाम सरकार करेगी। अन्य जमीन कंपनी स्वयं ही किसानों से खरीदेगी। इसी जमीन अधिग्रहण के सिलसिले में सर्वेक्षकों की टीम वहां गयी थी। कंपनी का इरादा सूबे में 10,500 करोड़ रुपये निवेश करने की है। इनमें तीन स्टील प्लांट व एक मेगा पावर प्लांट होंगे। कंपनी को अपने स्टील प्लांट के लिए 3,400 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करना है। लेकिन अब तक मात्र सौ एकड़ जमीन का ही अधिग्रहण हो पाया है। कंपनी ने वर्ष 2010 तक उत्पादन का लक्ष्य भी रखा है। ऐसी स्थिति में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या कंपनी अपने निर्धारित समय से अपना लक्ष्य पूरा कर पाएगी? उद्योग मंत्री सुधीर महतो बताते हैं कि प्रदेश में उद्यमियों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी। उनका कहना है कि भूषण कंपनी के सर्वेक्षकों को पहले स्थानीय प्रशासन को सूचना देनी चाहिए थी। तब मौके पर जाना चाहिए था। लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि दो थानों की पुलिस व प्रशासन की मौजूदगी में ही सारी वारदातें क्यों हुई? वह कहते हैं कि यह सारा नाटक सरकार को बदनाम करने की साजिश है। हालांकि इस मामले में सौ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है लेकिन अबतक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इस बाबत पूछने पर स्थानीय विधायक का कहना है कि भूषण कंपनी के कर्मचारियों के साथ सिर्फ धक्का-मुक्की हुई है।
लाख टके का सवाल यह है कि आखिर खनिज संपदाओं से भरपूर होने के बावजूद सूबे की ओर उद्यमी क्यों नहीं आकर्षित हो रहे हैं? जबकि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ही पिछली मधु कोड़ा सरकार ने नयी पुनर्वास नीति की घोषणा भी की थी। जिसमें एक बात पर जोर दिया गया था कि निवेशक सीधे किसानों के पास जाकर जमीन का मोल-भाव करेंगे और उन्हें उचित मुआवजा देंगे। नीति के अनुसार रोजगार में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं कंपनियां ही स्थानीय गांवों के विकास की चिंता भी करेंगी। किसान भी स्वेच्छा से ही जमीन देंगेे। लेकिन हाल के दिनों में भूषण स्टील कंपनी व उसके दो दिनों केे बाद ही जूपीटर स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ जो सलूक किया गया, उससे साफ हो जाता है कि सरकार की नीति व नीयत में कितनी खोट है। भूषण कंपनी के निदेशक एचसी वर्मा बताते हैं कि कंपनी के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी राजनीतिक संरक्षण में हुआ है। यह वही कंपनी है जिसका स्टील प्लांट चंडीगढ़, डेराबस्ती, कोलकाता व उड़ीसा में स्थापित हो चुके हैं।
एक समय ऐसा भी था जब दुनिया के उद्योगपति संयुक्त बिहार के दक्षिणी हिस्से यानी आज के झारखंड में निवेश करने को लालायित रहते थे। आजादी के पहले से ही दुनिया भर के कोयला, लोहा, बाक्साइड, अबरख, लाह समेत अन्य उद्योगों से जुड़े हुए निवेशकों ने यहां पूंजी लगायी लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि पुराने निवेशक भी यहां से कहीं दूसरी जगह स्थानांतरित होना चाहते हैं।
फिलहाल उद्यमी सरकार के मूड भांपने में लगे हैं। सूबे में 50 परियोजनाएं सरकार की नीतियों का इंतजार कर रही हैं। कोई 93 उद्यमी सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर करने के बावजूद आनन-फानन में पूंजी फंसाने की फिराक में नहीं हैं। इनमें टाटा, अर्सेलर-मित्तल, जेएसडब्ल्यू, जिंदल, एस्सार स्टील कंपनी आदि हैं।
वैसे तो सरकार का दावा है कि प्रदेश के निर्माण के साथ ही निवेशकों की लंबी लाइन लग चुकी है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चांडिल स्थित कोहिनूर स्टील कंपनी ने ही सहमति-पत्र के अनुसार 300 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश किया है। इनका सहमति-पत्र पर समझौता 35,000 करोड़ रुपये का हुआ है। अन्य निवेशकों का काम सिर्फ कागजों पर ही चल रहा है। वहीं समझौते के अनुसार सरकार विभिन्न परियोजनाओं के लिए 109225.7 एकड़ देने का समझौता कर चुकी है। अब सवाल यह है कि सरकार किसानों की इस जमीन को उद्योगपतियों के लिए कैसे मुहैया कराएगी?
प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर इस प्रदेश में कोई स्पष्ट औद्योगिक नीति नहीं बनी है। वर्तमान औद्योगिक नीति की समय-सीमा वर्ष 2005 में ही खत्म हो चुकी है। नयी नीति कैसी होगी और कब लागू होगी? फिलहाल सरकार का ध्यान इस ओर नहीं दिख रहा है। नयी पुनर्वास व राहत नीति को अगर छोड़ दिया जाए तो निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की अन्य कोई नीतियां नहीं दिख रही हैं। दूसरी बड़ी समस्या कानून-व्यवस्था की है। सूबे में नक्सलियों का आतंक जिस कदर बढ़ रहा है उससे निवेशकों में भय व्याप्त है। इसके लिए जरूरत है भयमुक्त समाज निर्माण की। लेकिन सरकार दिनों-दिन नक्सलियों के साथ ही भू-माफियाओं व बिचौलियों से घिरती जा रही है।
झारखंड चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष मनोज नरेडी बताते हैं कि प्रदेश के अधिकांश इलाके नक्सलियों की चपेट में हैं। उनके डर से प्रशासन भी सहमी रहती है फिर बाहर से आने वाले निवेशकों की क्या बिसात कि वे नक्सलियों से टक्कर लेकर अपना उद्योग लगाएं? कानून-व्यवस्था की बाबत पूछे जाने पर उन्होंने दावे के साथ कहा कि कुछ जनप्रतिनिधि नक्सलियों के सहयोग से ही विधानसभा पहुंचते हैं। यही कारण है कि सरकार नक्सलियों के सफाये के लिए कोई कारगार नीति नहीं बना पा रही है।
नया राज्य बनते ही सूबे में भू-माफियाओं की सक्रियता भी उद्यमियों के मनोबल को तोड़ रही है। हालात ऐसे हो गये हैं कि बिना बिचौलियों के निवेशक जमीन का अधिग्रहण कर ही नहीं सकते। बिचौलियों के सहयोग से अगर भूषण कंपनी के सर्वेक्षक वहां जाते तो शायद यह घटना नहीं घटती।
बिजली की किल्लत भी देसी-विदेशी उद्योगपतियों को आकर्षित करने में व्यवधान पैदा कर रही है। फिलहाल प्रदेश की बिजली की जरूरत का अधिकांश हिस्सा सेंट्रल पुल से खरीदा जा रहा है। वैसे झारखंड अपने कोटे की पूरी बिजली भी लेने की स्थिति में नहीं है। राज्य के तीन बिजली उत्पादन संयंत्रों से औसतन चार सौ मेगावाट बिजली ही तैयार होती है। जबकि यहां 3600 मेगावाट बिजली क्षमता की जरूरत है। कई अन्य कंपनियां भी प्रदेश में पूंजी लगाना चाहती हैं। समझौते के अनुसार अगर वे सभी यहां निवेश करने लगे तो उस स्थिति में सूबे में करीब 5000 मेगावाट बिजली की जरूरत होगी। इसके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं दिख रही है। कहने के लिए सूबे में तेनुघाट व पतरातु पनबिजली परियोजनाएं काम कर रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि वहां क्षमता से काफी कम बिजली का उत्पादन हो रहा है। सरकार की इच्छाशक्ति सूबे का विकास करने की है तो सरकार को ऊ र्जा संयंत्रों के निर्माण पर जोर देना चाहिए। सिर्फ जिंदल कंपनी ही 15-20 पावर प्लांट लगाने की मंशा जाहिर कर चुकी है। अब यह सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि यहां जिंदल की पावर प्लांट योजना कैसे सफल होगा।
यही नहीं, प्रदेश की राजनीतिक अस्थिरता भी निवेशकों को हतोत्साहित कर रही है। सूबे में मात्र आठ साल में ही पांच मुख्यमंत्री आए और गये। कोई एक साल के लिए बना तो कोई तीन साल के लिए। किसी के एजेंडे में हिन्दुत्व रहा तो किसी को केंद्र सरकार की कृपा से कुर्सी मिली। कोई नक्सलवाद को असली समस्या मानते रहे। किसी मुख्यमंत्री की इच्छा निवेशकों को आकर्षित करने की रही भी तो उनके सामने कानून-व्यवस्था समेत अन्य नीतियों का अभाव दिखा। वैसे तो शिबू सोरेन इसके पहले भी नौ दिनों (2 मार्च से लेकर 10 मार्च, 2005 तक) के लिए प्रदेश की सत्ता संभाल चुके हैं। इस बार वे प्रदेश के छठें मुख्यमंत्री के रूप में सत्तासीन हुए हैं। झारखंडी अस्मिता के लिए सदा संघर्षशील रहे सोरेने के सत्ता में आते ही भूषण स्टील व जूपीटर स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ हुई बदसलूकी इस बात का गवाह है कि झारखंडी मिट्टी को समझने वाले शिबू सोरेन भी अन्य मुख्यमंत्रियों से अलग नहीं हैं। हालांकि भूषण कंपनी के अधिकारियों के साथ आयोजित बैठक में उन्होंने इस बात का भरोसा दिलाया है कि आगे से निवेशकों के हितों का भरपूर ध्यान रखा जाएगा। अब आगे देखना है कि मुख्यमंत्री की बातों में कितना दम है।
पुनर्वास नीति की विशेषताएं
जिस परिवार की जमीन किसी परियोजना के लिए अधिगृहीत की जाएगी। उस परिवार के सदस्यों को नौकरी में प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रभावित परिवार के सदस्यों को नौकरी में 10 साल की छूट दी जाएगी।
नौकरी के अलावा कंपनी अपने लाभांश का एक फीसदी हिस्सा प्रभावित ग्रामीणों के बीच बांटेगी, जो अधिग्रहण के हिसाब से तय होगा।
आवासीय क्षेत्र के अधिग्रहण की स्थिति में कंपनी ग्रामीण क्षेत्रों में 10 डिसमिल व शहरी क्षेत्रों में 5 डिसमिल की जमीन पर मकान बनाकर देगी।
विस्थापितों के स्थानांतरण के लिए प्रति परिवार 15 हजार रुपये की व्यवस्था कंपनी करेगी।
कंपनी की ओर से प्रभावित परिवारों के समर्थ लोगों को दक्षता विकास व छात्रवृत्ति की सुविधा दी जाएगी।
कुछ बड़े निवेशकों की सूची
बर्नपुर सीमेंट इंडस्ट्रीज, पतरातू-500 करोड़ रुपये
रांची इंटीग्रेटेड स्टील लिमिटेड, सिल्ली-5,452 करोड़ रुपये
जिंदल साउथ वेल्थ स्टील लिमिटेड-3,5000 करोड़ रुपये
जिंदल स्टील व पावर लिमिटेड, सरायकेला-11,500 करोड़ रुपये
मित्तल स्टील लिमिटेड, रांची-40,000 करोड़ रुपये
वीएस डेम्पो एंड कंपनी लिमिटेड, मोहनपुर-1016 करोड़ रुपये
टाटा स्टील लिमिटेड, सरायकेला-42,000 करोड़ रुपये
कल्याणी स्टील लिमिटेड, रांची-1,883 करोड़ रुपये
भूषण स्टील लिमिटेड, जमशेदपुर-6,510 करोड़ रुपये
एचवाई ग्रेड पेलेट्‌स लिमिटेड, चाईबासा-4,285 करोड़ रुपये
हिंडाल्को इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, लातेहार-7,800
बीएमडब्ल्यू इंडस्ट्रीज लिमिटेड, सरायकेला-591 करोड़ रुपये
रूंगटा माइंस, चाईबासा-517 करोड़ रुपये
अनिन्दिता ट्रेडर्स एंड इंवेस्टमेंट लिमिटेड, हजारीबाग-94 करोड़ रुपये
नरबेहराम गैस प्वाइंट लिमिटेड, सरायकेला-200 करोड़ रुपये
गोल स्पंज लिमिटेड, सरायके ला-67 करोड़ रुपये
कोहिनूर स्टील लिमिटेड, सरायकेला-410 करोड़ रुपये

सशंकित उद्यमी : पूंजी निवेश की धीमी रफ्तार

भूषण स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ हुई बदसलूकी ने राज्य के औद्योगिक विकास की संभावनाओं पर नये सिरे से सवाल खड़े कर दिये हैं। अब उद्योगपति सरकारी मंशा को भांपने में लगे हैं।
पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशिया के रासायनिक कंपनी सलीम गु्रप के खिलाफ महासंग्राम, इसी राज्य में टाटा के लिए गहरी समस्या सिंगुर , उड़ीसा में पोस्को के खिलाफ अवाम का प्रदर्शन और अब झारखंड में एक स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी...। अगली पंक्ति में कौन होगा फिलहाल कहना मुश्किल है। अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे राज्यों में आधारभूत संरचनाएं झारखंड के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं। झारखंड गठन के बाद से राज्य औद्योगिक विकास के लिए सिर्फ तैयारियों में ही जुटा है। इस स्थिति में औद्योगिक समूह के कर्मचारियों के साथ पुलिस और प्रशासन की उपस्थिति में दुर्व्यहार इसके रास्ते में रोड़े अटका रही है। बीते दिनों जमशेदुपर के पोटका प्रखंड के ग्रामीणों ने पुलिस-प्रशासन की मौजूदगी में भूषण स्टील कंपनी के लिए काम कर रहे द सर्वेयर एंड एलायड इंजीनियरिंग कंपनी के कर्मचारियों के साथ जिस तरह का सलूक किया उससे सरकार की मंशा साफ हो जाती है।
देसी-विदेशी कंपनियों के लिए देश में कोई प्रोजेक्ट शुरू करना एवरेस्ट की चढ़ाई के समान है। हर जगह मुद्दा जमीन अधिग्रहण का है। कई कंपनियां ने तो अपनी परियोजनाओं से हाथ भी खींच लिया है। आखिर इसके लिए जिम्मेवार कौन है? और गलतियां किससे हो रही हैं...। कंपनियों से या फिर अदूरदर्शी सरकारों से? या फिर उद्योग स्थापना के नाम पर सिर्फ सस्ते दर पर जमीन लेने की एक नई प्रथा चल पड़ी है, जिसमें लोग उद्योग लगाते तो नहीं अलबत्ता इसी बहाने पानी के भाव जमीन हासिल कर लेते हैं।
रांची से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पोटका प्रखंड। इसी प्रखंड के सरमंदा व रोलाडीह गांव में भूषण स्टील कंपनी के लिए काम करने गये द सर्वेयर एंड एलायड इंजीनियरिंग कंपनी के तीन कर्मचारियों, युसूफ अहमद, सहदेव सिंह व शीतल कुमार भारद्वाज को पहले ग्रामीणों ने बंधक बनाया। उसके बाद स्थानीय झामुमो विधायक अमूल्य सरदार के समर्थकों ने उन्हें जूते का हार पहनाकर करीब चार किलोमीटर तक तपती धूप मेंं घुमाया। नंगे पाव दहशत में घूम रहे कर्मचारियों के पैरों में छाले पड़ गये। वहीं एक-दूसरे के गालों पर थप्पड़ भी मारे गये। फिर कभी इस इलाके में नहीं आने की कसम खिलवायी। तब जाकर सर्वेयरों की जान बख्शी गयी।
इधर, घटना के विरोध में निवेशक बौखला गये। राजधानी रांची में विरोध प्रदर्शन का दौर शुरू हुआ। मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। तब जाकर मामला शांत हुआ। हालांकि अभी भी निवेशकों में भय व्याप्त है। घटना के विरोध में भूषण स्टील कंपनी समेत अन्य नये उद्यमियों ने फिलहाल काम ठप कर दिया है।
यह पहला मौका नहीं है जब उद्योगपतियों को इस तरह की बेइज्जती का सामना करना पड़ा हो। इसके पहले भी सूबे की ओर आकर्षित होने वाले निवेशकों को सरकार की ओर से परेशानियां उठानी पड़ी हैं। यही कारण है कि खनिज संपदाओं से भरपूर होने के बावजूद सूबे में अबतक बड़े निवेशकों में से एक कोहिनूर स्टील कंपनी (चांडिल) को ही धरातल पर उतारने में सरकार कामयाब हो पाई है। हालांकि गत वर्ष इस कंपनी के कर्मचारियों को भी केंदरा के समीप पीटा गया था।
भूषण स्टील कंपनी व सरकार के बीच वर्ष 2006 में ही एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुआ था। दोनों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि कंपनी के लिए 70 फीसदी जमीन का इंतजाम सरकार करेगी। अन्य जमीन कंपनी स्वयं ही किसानों से खरीदेगी। इसी जमीन अधिग्रहण के सिलसिले में सर्वेक्षकों की टीम वहां गयी थी। कंपनी का इरादा सूबे में 10,500 करोड़ रुपये निवेश करने की है। इनमें तीन स्टील प्लांट व एक मेगा पावर प्लांट होंगे। कंपनी को अपने स्टील प्लांट के लिए 3,400 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करना है। लेकिन अब तक मात्र सौ एकड़ जमीन का ही अधिग्रहण हो पाया है। कंपनी ने वर्ष 2010 तक उत्पादन का लक्ष्य भी रखा है। ऐसी स्थिति में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या कंपनी अपने निर्धारित समय से अपना लक्ष्य पूरा कर पाएगी? उद्योग मंत्री सुधीर महतो बताते हैं कि प्रदेश में उद्यमियों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी। उनका कहना है कि भूषण कंपनी के सर्वेक्षकों को पहले स्थानीय प्रशासन को सूचना देनी चाहिए थी। तब मौके पर जाना चाहिए था। लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि दो थानों की पुलिस व प्रशासन की मौजूदगी में ही सारी वारदातें क्यों हुई? वह कहते हैं कि यह सारा नाटक सरकार को बदनाम करने की साजिश है। हालांकि इस मामले में सौ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है लेकिन अबतक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इस बाबत पूछने पर स्थानीय विधायक का कहना है कि भूषण कंपनी के कर्मचारियों के साथ सिर्फ धक्का-मुक्की हुई है।
लाख टके का सवाल यह है कि आखिर खनिज संपदाओं से भरपूर होने के बावजूद सूबे की ओर उद्यमी क्यों नहीं आकर्षित हो रहे हैं? जबकि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ही पिछली मधु कोड़ा सरकार ने नयी पुनर्वास नीति की घोषणा भी की थी। जिसमें एक बात पर जोर दिया गया था कि निवेशक सीधे किसानों के पास जाकर जमीन का मोल-भाव करेंगे और उन्हें उचित मुआवजा देंगे। नीति के अनुसार रोजगार में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं कंपनियां ही स्थानीय गांवों के विकास की चिंता भी करेंगी। किसान भी स्वेच्छा से ही जमीन देंगेे। लेकिन हाल के दिनों में भूषण स्टील कंपनी व उसके दो दिनों केे बाद ही जूपीटर स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ जो सलूक किया गया, उससे साफ हो जाता है कि सरकार की नीति व नीयत में कितनी खोट है। भूषण कंपनी के निदेशक एचसी वर्मा बताते हैं कि कंपनी के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी राजनीतिक संरक्षण में हुआ है। यह वही कंपनी है जिसका स्टील प्लांट चंडीगढ़, डेराबस्ती, कोलकाता व उड़ीसा में स्थापित हो चुके हैं।
एक समय ऐसा भी था जब दुनिया के उद्योगपति संयुक्त बिहार के दक्षिणी हिस्से यानी आज के झारखंड में निवेश करने को लालायित रहते थे। आजादी के पहले से ही दुनिया भर के कोयला, लोहा, बाक्साइड, अबरख, लाह समेत अन्य उद्योगों से जुड़े हुए निवेशकों ने यहां पूंजी लगायी लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि पुराने निवेशक भी यहां से कहीं दूसरी जगह स्थानांतरित होना चाहते हैं।
फिलहाल उद्यमी सरकार के मूड भांपने में लगे हैं। सूबे में 50 परियोजनाएं सरकार की नीतियों का इंतजार कर रही हैं। कोई 93 उद्यमी सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर करने के बावजूद आनन-फानन में पूंजी फंसाने की फिराक में नहीं हैं। इनमें टाटा, अर्सेलर-मित्तल, जेएसडब्ल्यू, जिंदल, एस्सार स्टील कंपनी आदि हैं।
वैसे तो सरकार का दावा है कि प्रदेश के निर्माण के साथ ही निवेशकों की लंबी लाइन लग चुकी है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चांडिल स्थित कोहिनूर स्टील कंपनी ने ही सहमति-पत्र के अनुसार 300 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश किया है। इनका सहमति-पत्र पर समझौता 35,000 करोड़ रुपये का हुआ है। अन्य निवेशकों का काम सिर्फ कागजों पर ही चल रहा है। वहीं समझौते के अनुसार सरकार विभिन्न परियोजनाओं के लिए 109225.7 एकड़ देने का समझौता कर चुकी है। अब सवाल यह है कि सरकार किसानों की इस जमीन को उद्योगपतियों के लिए कैसे मुहैया कराएगी?
प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर इस प्रदेश में कोई स्पष्ट औद्योगिक नीति नहीं बनी है। वर्तमान औद्योगिक नीति की समय-सीमा वर्ष 2005 में ही खत्म हो चुकी है। नयी नीति कैसी होगी और कब लागू होगी? फिलहाल सरकार का ध्यान इस ओर नहीं दिख रहा है। नयी पुनर्वास व राहत नीति को अगर छोड़ दिया जाए तो निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की अन्य कोई नीतियां नहीं दिख रही हैं। दूसरी बड़ी समस्या कानून-व्यवस्था की है। सूबे में नक्सलियों का आतंक जिस कदर बढ़ रहा है उससे निवेशकों में भय व्याप्त है। इसके लिए जरूरत है भयमुक्त समाज निर्माण की। लेकिन सरकार दिनों-दिन नक्सलियों के साथ ही भू-माफियाओं व बिचौलियों से घिरती जा रही है।
झारखंड चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष मनोज नरेडी बताते हैं कि प्रदेश के अधिकांश इलाके नक्सलियों की चपेट में हैं। उनके डर से प्रशासन भी सहमी रहती है फिर बाहर से आने वाले निवेशकों की क्या बिसात कि वे नक्सलियों से टक्कर लेकर अपना उद्योग लगाएं? कानून-व्यवस्था की बाबत पूछे जाने पर उन्होंने दावे के साथ कहा कि कुछ जनप्रतिनिधि नक्सलियों के सहयोग से ही विधानसभा पहुंचते हैं। यही कारण है कि सरकार नक्सलियों के सफाये के लिए कोई कारगार नीति नहीं बना पा रही है।
नया राज्य बनते ही सूबे में भू-माफियाओं की सक्रियता भी उद्यमियों के मनोबल को तोड़ रही है। हालात ऐसे हो गये हैं कि बिना बिचौलियों के निवेशक जमीन का अधिग्रहण कर ही नहीं सकते। बिचौलियों के सहयोग से अगर भूषण कंपनी के सर्वेक्षक वहां जाते तो शायद यह घटना नहीं घटती।
बिजली की किल्लत भी देसी-विदेशी उद्योगपतियों को आकर्षित करने में व्यवधान पैदा कर रही है। फिलहाल प्रदेश की बिजली की जरूरत का अधिकांश हिस्सा सेंट्रल पुल से खरीदा जा रहा है। वैसे झारखंड अपने कोटे की पूरी बिजली भी लेने की स्थिति में नहीं है। राज्य के तीन बिजली उत्पादन संयंत्रों से औसतन चार सौ मेगावाट बिजली ही तैयार होती है। जबकि यहां 3600 मेगावाट बिजली क्षमता की जरूरत है। कई अन्य कंपनियां भी प्रदेश में पूंजी लगाना चाहती हैं। समझौते के अनुसार अगर वे सभी यहां निवेश करने लगे तो उस स्थिति में सूबे में करीब 5000 मेगावाट बिजली की जरूरत होगी। इसके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं दिख रही है। कहने के लिए सूबे में तेनुघाट व पतरातु पनबिजली परियोजनाएं काम कर रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि वहां क्षमता से काफी कम बिजली का उत्पादन हो रहा है। सरकार की इच्छाशक्ति सूबे का विकास करने की है तो सरकार को ऊ र्जा संयंत्रों के निर्माण पर जोर देना चाहिए। सिर्फ जिंदल कंपनी ही 15-20 पावर प्लांट लगाने की मंशा जाहिर कर चुकी है। अब यह सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि यहां जिंदल की पावर प्लांट योजना कैसे सफल होगा।
यही नहीं, प्रदेश की राजनीतिक अस्थिरता भी निवेशकों को हतोत्साहित कर रही है। सूबे में मात्र आठ साल में ही पांच मुख्यमंत्री आए और गये। कोई एक साल के लिए बना तो कोई तीन साल के लिए। किसी के एजेंडे में हिन्दुत्व रहा तो किसी को केंद्र सरकार की कृपा से कुर्सी मिली। कोई नक्सलवाद को असली समस्या मानते रहे। किसी मुख्यमंत्री की इच्छा निवेशकों को आकर्षित करने की रही भी तो उनके सामने कानून-व्यवस्था समेत अन्य नीतियों का अभाव दिखा। वैसे तो शिबू सोरेन इसके पहले भी नौ दिनों (2 मार्च से लेकर 10 मार्च, 2005 तक) के लिए प्रदेश की सत्ता संभाल चुके हैं। इस बार वे प्रदेश के छठें मुख्यमंत्री के रूप में सत्तासीन हुए हैं। झारखंडी अस्मिता के लिए सदा संघर्षशील रहे सोरेने के सत्ता में आते ही भूषण स्टील व जूपीटर स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ हुई बदसलूकी इस बात का गवाह है कि झारखंडी मिट्टी को समझने वाले शिबू सोरेन भी अन्य मुख्यमंत्रियों से अलग नहीं हैं। हालांकि भूषण कंपनी के अधिकारियों के साथ आयोजित बैठक में उन्होंने इस बात का भरोसा दिलाया है कि आगे से निवेशकों के हितों का भरपूर ध्यान रखा जाएगा। अब आगे देखना है कि मुख्यमंत्री की बातों में कितना दम है।
पुनर्वास नीति की विशेषताएं
जिस परिवार की जमीन किसी परियोजना के लिए अधिगृहीत की जाएगी। उस परिवार के सदस्यों को नौकरी में प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रभावित परिवार के सदस्यों को नौकरी में 10 साल की छूट दी जाएगी।
नौकरी के अलावा कंपनी अपने लाभांश का एक फीसदी हिस्सा प्रभावित ग्रामीणों के बीच बांटेगी, जो अधिग्रहण के हिसाब से तय होगा।
आवासीय क्षेत्र के अधिग्रहण की स्थिति में कंपनी ग्रामीण क्षेत्रों में 10 डिसमिल व शहरी क्षेत्रों में 5 डिसमिल की जमीन पर मकान बनाकर देगी।
विस्थापितों के स्थानांतरण के लिए प्रति परिवार 15 हजार रुपये की व्यवस्था कंपनी करेगी।
कंपनी की ओर से प्रभावित परिवारों के समर्थ लोगों को दक्षता विकास व छात्रवृत्ति की सुविधा दी जाएगी।
कुछ बड़े निवेशकों की सूची
बर्नपुर सीमेंट इंडस्ट्रीज, पतरातू-500 करोड़ रुपये
रांची इंटीग्रेटेड स्टील लिमिटेड, सिल्ली-5,452 करोड़ रुपये
जिंदल साउथ वेल्थ स्टील लिमिटेड-3,5000 करोड़ रुपये
जिंदल स्टील व पावर लिमिटेड, सरायकेला-11,500 करोड़ रुपये
मित्तल स्टील लिमिटेड, रांची-40,000 करोड़ रुपये
वीएस डेम्पो एंड कंपनी लिमिटेड, मोहनपुर-1016 करोड़ रुपये
टाटा स्टील लिमिटेड, सरायकेला-42,000 करोड़ रुपये
कल्याणी स्टील लिमिटेड, रांची-1,883 करोड़ रुपये
भूषण स्टील लिमिटेड, जमशेदपुर-6,510 करोड़ रुपये
एचवाई ग्रेड पेलेट्‌स लिमिटेड, चाईबासा-4,285 करोड़ रुपये
हिंडाल्को इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, लातेहार-7,800
बीएमडब्ल्यू इंडस्ट्रीज लिमिटेड, सरायकेला-591 करोड़ रुपये
रूंगटा माइंस, चाईबासा-517 करोड़ रुपये
अनिन्दिता ट्रेडर्स एंड इंवेस्टमेंट लिमिटेड, हजारीबाग-94 करोड़ रुपये
नरबेहराम गैस प्वाइंट लिमिटेड, सरायकेला-200 करोड़ रुपये
गोल स्पंज लिमिटेड, सरायके ला-67 करोड़ रुपये
कोहिनूर स्टील लिमिटेड, सरायकेला-410 करोड़ रुपये






Friday, September 19, 2008

बिहार: सुनहरा अतीत, अंधकारमय भविष्य-2 (शिक्षा के क्षेत्र में)

हमने कल लिखा था कि किस तरह से आजादी के पूर्व से ही सत्ता संरक्षित अपराध ने बिहार को अपने पैरों तले रौंदा। हमने आपसे यह भी वादा किया था कि आने वाले दिनोंं में बिहार की बदहाली या सुखहाली में वर्तमान रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव का कितना योगदान रहा है। इसके बारे में चर्चा करेंगे। लेकिन फिर हमने सोचा कि वर्ष 1990 के पूर्व तक राजनीति के अलावा और किन-किन संस्थाओं में अपना कहर बरपाया। कानूनों को अपने पैरों तले रौंदा। इसी सोच के साथ हमने आज बिहार में शिक्षा माफियाओं पर चर्चा की है।
दुुनिया भर के छात्र प्राचीन मगध के नालंदा व विक्रमशीला विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते के लिए आया करते थे। आज भी राजगीर व आसपास के इलाकों में उसके भग्नावशेष दिख जाते हैं। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगा दी। पुस्तकालय व अन्य विभागों से आग की धधक लगातार छह महीनों तक आती रही। उसके बाद फिर कभी बिहार, शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष उपलब्धि हासिल नहीं कर सका। आजादी के बाद भी यहां के छात्रों का पलायन दिल्ली व दक्षिण भारत के राज्यों में होते रहा। शिक्षा के विकास के नाम पर सूबे में हुक्मरानों व शिक्षा माफियाओं की दुकानदारी फलती-फूलती रही। नेतरहाट विद्यालय, सैनिक स्कूल, केन्द्रीय विद्यालय आदि की बात अगर न की जाय तो प्रदेश में शिक्षा का धंधा खूब चला। पटना विश्वविद्यालय को अगर छोड़ दिया जाए तो प्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालयों का गठन भी जातीय आधार पर हुए। इसकी चर्चा बाद में करूंगा।
वर्ष 1970 आते-आते प्रदेश में जातीय आधार पर खुलने वाले शिक्षक संस्थानों की बाढ़ आ गई। सामाजिक सरोकार के नाम पर खोले जा रहे स्कूल व कॉलेज राजनीति का निजी अड्डा बनने लगा। इससे खीज कर उस समय एक कुलपति ने कहा था-"जो लोग अपने ही जीवनकाल में अपने नाम पर स्कूल कॉलेज-खोलते हैं। दरअसल इस भ्रष्ट नेताओं को इस बात का भरोसा ही नहीं कि उनके निधन के बाद श्रद्धावश उनकी याद में कोई व्यक्ति शिक्षण-संस्थान खोलने में आस्था रखेगा।'
शेरे बिहार की उपाधि से नवाजे गये प्रदेश के चर्चित नेता रामलखन सिंह यादव के नाम पर 60 से अधिक स्कूल-कॉलेज खोले गयेतो तत्कालीन शिक्षा मंत्री नागेन्द्र झा के विधायक बेटा मदन मोहन झा ने अपने पिता नागेन्द्र झा के नाम से एक महिला कॉलेज खोलकर वहीं से शिक्षा की दुकानदारी चलाते रहे। जब नागेन्द्र झा विश्वविद्यालय शिक्षा परिषद के सचिव बने तो बेटे ने इंडियन इंस्ट्‌ीच्यूट ऑफ मैंनेजमेंट नामक संस्था खोला और पिता की कृपादृष्टि से इंटर कौंसिल के सारे डाटा प्रोसेसिंग का काम अपने जिम्मे में ले लिया। यही नहीं, उन्होंने इस काम को पटना के एक बिना निबंधित कंपनी के जिम्मे दे दिया। उन पर सैंकड़ों अवैध बहालियांें का आरोप लगा। तब प्रदेश में डा.जगन्नाथ मिश्र की सरकार थी। कहा जाने लगा कि मैथिल ब्राहणों ने शिक्षा को रोगग्रस्त बना दिया है।
प्रदेश में रामलखन सिंह यादव इकलौते ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने अपने नाम पर शिक्षा की दुकानदारी चलाई। बल्कि इसी लाइन में शामिल हैं-पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र, पूर्व सांसद स्व.राजो सिंह, पूर्व मंत्री रघुनाथ झा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष राधानंदन झा, पूर्व मंत्री उमा पांडेय समेत दर्जनांें जनप्रिय नेता। जिनके नामों पर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में शिक्षा की दुकानदारी चलती रही। अपने नाम से कॉलेज खुलवाने में पूर्व मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा भी पीछे नहीं रहे। लेकिन उन्होंने शिक्षण-संस्थाओं को दुकान नहीं बनाई। श्री सिन्हा ने भी अपने व अपने परिवार के अन्य सदस्यों के नाम से राजधानी पटना समेत दो दर्जन से अधिक कॉलेज खुलवाए।
अस्थावा से विधायक रहे स्व.आरपी शर्मा के किस्से तो नायाब रहे हैं। वर्तमान समय में इनके नाम पर पटना में ही दर्जनभर शिक्षण संस्थान चल रहे हैं। स्व.शर्मा पटना स्थित टीपीएस कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे। बावजूद इसके उनकी कॉलेज प्राचार्य कुटेश्वर प्रसाद सिंह से कभी नहीं बनी। इसी विवाद में उन्होंने पटना में शिक्षा का साम्राज्य खड़ा करने को ठानी। धून के पक्के आरपी शर्मा इस काम में लगे सो फिर कभी उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। अपने ही जीवन काल में उन्होंने पटना में आरपीएस कॉलेज, टे्रनिंग कॉलेज, महिला कॉलेज, लॉ कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, हाई स्कूल आदि शिक्षण संस्थानों की बाढ़ ला दी।
सूबे में शिक्षा माफियाओं के बढ़ते हौंसले को देखते हुए इस जरसी गाय रूपी धंधे की शुरुआत में आने वाले लोगों की लाइन बड़ी होती चली गई। इसी लाइन में खड़े हुए सचिवालय से वर्ष 1970 में निलंबित कर्मचारी रामावतार वात्स्यायन। इनके किस्से भी कम दिलचस्प नहीं हैं। शिक्षा माफिया बनने के पहले ये रामावतार सिंह थे। निलंबन के बाद इनके सामने भूखमरी की समस्या आ गई। सो इन्होंने सोचा कि क्यों नहीं, धंधा किया जाए और इसी सोच के साथ ये शिक्षा के धंधे में लग गये। पहले इन्होंने पटना में जेडी वीमेंस कॉलेज खोला। फिर हाई स्कूल। पटना के अलावा इन्होंने रांची, रामगढ़ व जमशेदपुर में ही शिक्षा का साम्राज्य फैलाया। सरकार ने जब जेडी वीमेंस कॉलेज व हाई स्कूल को अधिग्रहण कर लिया तो उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। विश्व बौद्ध धर्म की स्थापना की और पटना में ही सिद्धार्थ महिला कॉलेज, शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, संत एमजी हाई स्कूल, रांची में संघमिश्रा महिला कॉलेज आदि की स्थापना की। आश्चर्य तो यह शिक्षा का अलख जगाने वाले वात्स्यायन पर सिद्धार्थ महिला कॉलेज की शिक्षिकाओं ने यौनाचार तक का आरोप लगाया।
लौह नगरी जमशेदपुर भला इस धंधे में कैसे पीछे रहता? यहां के ए.रवि नामक एक व्यक्ति ने बौद्ध एजुकेशन सोसायटी की स्थापना की और इस धंधे में लग गये। इन्होंने अपने संस्था का नाम रखा-गौतम बुद्ध कॉलेज ऑफ एजुकेशन। इसके तहत बीइएड ट्रेनिंग कॉलेज समेत दर्जनभर शिक्षण संस्थानों की स्थापना की। जमशेदपुर में चल रहे शिक्षा के इस दुकानदारी को बंद करने के लिए जमशेदपुर के नागरिक कल्याण परिषद के महामंत्री वैदेही शरण सिंह ने इसकी लिखित शिकायत जिला प्रशासन से की।
और फिर दरभंगा। देश के शिक्षा के नक्शे में इसे शायद ही भुलाया जा सके। यहां वर्षों तक फर्जी विश्वविद्यालय चलता रहा। सत्ता से गंठजोर के लिए जिले में चर्चित हो चुके दिनराज शांडिल्य नामक व्यक्ति ने इसकी नींव डाली। इसमें दक्षिण भारत के हजारों छात्रों ने फर्जी डिग्रियां हासिल की। भला खुलेआम चल रहे फर्जी विश्वविद्यालय की खबर से सरकार अनभिज्ञ रही, यह कैसे हो सकता है। लेकिन सामरथ के नहीं दोष गोसाई की तर्ज पर बिहार में सबकुछ चलता रहा।
बिन्देश्वरी दूबे शासनकाल की बात है। मुख्यमंत्री के आवास पर भोज का आयोजन हुआ था। इस भोज की व्यवस्था शिक्षा मंत्री लोकेश्वर नाथ झा को करनी थी। लेकिन उन्हें सूझ नहीं रहा था कि भोज में खर्च होने वाले लाखों रुपयों का इंतजाम इतना जल्दी कहां से किया गया। अभी वे उधेड़-बुन में फंसे ही हुए थे कि मुख्यमंत्री ने कहा-पैसे की कमी है तो क्यों नहीं किसी कॉलेज को मान्यता (एफजिएशन) दे देते हैं। तुरंत पैसे हो जाएंगे। मुख्यमंत्री के इस एक बयान से ही समझा जा सकता है कि सूबे में सरकार संरक्षित शिक्षा की दुकानदारी किस तरह से फल-फूल रही थी।
शिक्षक से मुख्यमंत्री बने डा.जगन्नाथ मिश्र के समय में 36 कॉलेजों को रातोरात मंजूरी दे दी गई। इस पर काफी विवाद हुआ। औने-पौने दामों के लिए दर्जनों लोगों को व्याख्याता बना दिया गया। सैंकड़ों लोग कॉलेज कर्मचारी बनाये गये। इनमें नियमों की जिस तरह से धज्जियां उड़ी। उससे बिहारवासियों को वाकिफ होना चाहिए। इन कॉलेजों में सबसे चर्चित मामले सर्व नारायण सिंह कॉलेज, सहरसा, गुरू गोविन्द सिंह कॉलेज, पटना सिटी, डीएन कॉलेज, मसौढ़ी के रहे। इन कॉलेजों में शासी निकाय को अंधेरे में रखकर रातोरात दर्जनों व्याख्याता के पद सृजित कर दिये गये। 26 सितंबर, 1986 को छह महीने के भीतर ही सर्व नारायण सिंह, कॉलेज, सहरसा में 42 से बढ़ाकर 72 पद सृजित कर दिये गये। लाख टके का सवाल यह है कि क्या मात्र छह महीने में ही छात्रों की इस तरह से वृद्धि हुई कि दुगीनी सीट बढ़ाने की नौबत आ गई। यही भागलपुर विश्वविद्यालय के कोऑडिनेटर प्रो. रामेश्वर प्रसाद सिंह ने अपनी पत्नी का नाम खगड़िया महिला कॉलेज में जुड़वा लिया।
समाज के प्रबुद्ध लोगों के कारनामों से मगध, रांची, मिथिला विश्वविद्यालय भी अछूता नहीं रहा। सत्ता के शीर्ष से जुड़े लोगों ने प्रदेश में 250 वित्तरहित कॉलेजों के सहारे अपनी दुकानदारी चलाते रहे।
ऐसी बात नहीं है कि शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक दखलअंजादी अचानक शुरू हो गयी। बल्कि इसकी शुरुआत 1965 से ही हो चुकी थी। जब प्रदेश के सिहासन पर महामाया प्रसाद सिन्हा बैठे तो उन्होंने छात्रों को अपने संबोधन में जिगर के टुकड़े कहा। इसके बाद से छात्र राजनीति में राजनीतिक दलों की बेतहासा दखलअंदाजी हुई जो फिर थमने का नाम नहीं लिया। हालांकि परीक्षाओं में लगातार जारी कदाचार व शिक्षण संस्थाओं में जारी भ्रष्टाचार को रोकने के लिए वर्ष 1972 में मुख्यमंत्री बने केदार पांडेय के शासनकाल में रोकने का असफल प्रयास हुआ। फिर भी शिक्षा में गुणात्मक सुधार व व्याप्त भ्रष्टाचार को रोेकने के लिए 1966 में गठित एसपी सिंह कमीशन की रिपोर्ट गतलखाने में डाल दिया गया। यही नहीं, उसके बाद गठित जस्टिस केके बनर्जी कमीशन, पाटणकर कमीशन, केएसवी रमण कमीशन, अब्राहम, जब्बार हुसेन के साथ ही वीएस झा का प्रतिवेदन भी ठंढ़े बस्ते में डाल दिया गया।
कल लिखेंगे प्राकृतिक संपन्नता के बावजूद 1990 आते-आते बिहार कैसे विपन्नता का शिकार हुआ।

बिहार: सुनहरा अतीत, अंधकारमय भविष्य

कोसी की कहर ने एक बार फिर बिहार को चर्चा में ला दिया है। इसे प्राकृतिक प्रलय की संज्ञा दी जाए या मानवीय त्रासदी। यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, जब लोगों को अपना ठिकाना याद आएगा। अभी तो कोसीवासी इसकी विभिषिका को भूले भी नहीं हैं। इसलिए किसी को अपना आसियाना शायद याद नहीं आ रहा है।
आज का बिहार यानी कल का मगध साम्राज्य का स्वर्णीम इतिहास रहा है। बिहार की खूबसूरती, यहां की संस्कृति, लोगों का रहन-सहन, चाल-चलन व बोलचाल के साथ ही आपसी साहार्य को देखकर ही अंगेज लेखक सर जॉन हुल्टन ने अपनी पुस्तक "दी हर्ट ऑफ बिहार' में लिखा है-"हिन्दुस्तान की धड़कन अगर कोई है तो बिहार है, बिहार।' वाकई बिहार का अतीत गाैरवमयी रहा है। बिंबिसार व सम्राट अशोक का मगध साम्राज्य प्राचीन वर्षों के भारत का इतिहास रहा है। तब से लेकर आज तक बिहार ने शासन-प्रशासन के साथ ही राजनीतिक उथल-पुथल का लंबा सफर तय चुका है। इसी के साथ बिहार ने कई उतार-चढ़ाव भी देखा है। कभी बिहार, सर्वोच्च प्रशासनिक केन्द्र के रूप में देश में शुमार था लेकिन आज के समय में सबसे अधिक प्रशासनिक गिरावट इसी बिहार में देखने को मिलती है।
आखिर इसकी शुरुआत कब आैर कैसे हुई-कहना मुिश्कल है। फिर भी इतिहास के पन्नों की तहकीकात करने के ज्ञात होता है कि सत्त्ाा के केन्द्रीयकरण के साथ ही हिंसा का जो दाैर शुरू हुुआ वह फिर कभी थमने का नाम नहीं लिया। मगध सम्राट बिंबिसार ने अपने पिता को सत्त्ाा के लिए कारावास में डाल कर रखा तो दूसरी ओर सत्त्ाा संरक्षित महत्वाकांक्षा के आगे सम्राट अशोक ने अपने 99 भाईयों को एकमुश्त माैत के घाट उतार दिया। वैसे तो कबीलों के बारे में भी कहा जाता है कि वे लोग भी सत्त्ाा के लिए हिंसा पर उतारू रहते थे। हालांकि उनका कोई केन्द्रीकृत सत्त्ाा नहीं था इसलिए वह इतिहास के पन्नों में समेटा नहीं जा सका।
सभ्यता के विकास के साथ ही सत्त्ाा व हिंसा का अटूट रिश्ता बना रहा लेकिन जब आैद्योगिकीकरण का सिलसिला व्यविस्थत रूप से शुरू हुआ तो सत्त्ाा के लिए अहिंसक क्रियाओं को असहनीय माना जाने लगा। वे लोग बराबर मारे जाते रहे जिन्होंने सत्त्ाा में हिंसा के बेदखल का विरोध किया। फिर, यही माना जाने लगा कि राजनीति आैर सत्त्ाा के पास वही बैठ सकता है जिनके पास हिंसक तेवर हैं। कानून की मर्यादा भी उसी समय तक रही जबतक उसे बनाने वाले शासकों ने पूरी निष्ठा से उसका पालन किया। लेकिन जब से खुद शासकों ने खुलेआम कानून का उल्लंघन करना शुरू कर दिया तब से समाज आैर अंतत: राजनीति का अपराधीकरण शुरू हो गया।
राम द्वारा निर्दोष शंबूक की हत्या, राजा हिरण्यकश्यप व चेदि के राजा वसु की कथाएं आज के शासकों से कम भ्रष्ट नहीं दिखते। अगर आधुनिक विश्व की कल्पना करें तो चीन के क्रांतिकारी नेता व गणतांित्रक चीन के निर्माता माओत्सेतुंड ने एक कदम आगे बढ़कर सत्त्ाा में हिंसक तेवर को स्वीकारते हुए कहा-"सत्त्ाा का जन्म बंदूक की नली से होता है।' माओ के इस बयान से दुनिया में बलबली मच गयी। साथ ही, सत्त्ाा में हिंसा को नकारने वाली विश्व बिरादरी भाैचक रह गयी।
भारत के साथ ही दुनिया में सत्त्ाा संरक्षित हिंसा की चर्चा बाद में करेंगे। पहले गाैरवमयी अतीत संवारे बिहार में सत्त्ाा संरक्षित अपराध की चर्चा करते हैं। वैसे तो वर्ष 1990 के बाद सूबे में सत्त्ाा संरक्षित अपराध का ऐसा बोलबाला हुआ कि लोगों की जुबान में हमेशा यह बात निकलती रही कि बिहार को लालू प्रसाद यादव के दो साले साधु व सुभाष यादव चला रहे हैं। नरसंहारों का ऐसा दाैर चला कि सूबे मंें एक महीने में ही पांच-पांच नरसंहार हुए। हालांकि लालू-राबड़ी के शासनकाल में आैरंगाबाद जिले के बहुचर्चित मियांपुर नरसंहार के बाद यानी 16 जून, 1999 के बाद एक भी नरसंहार नहीं हुए। उस दौरान राजधानी पटना की सड़कों पर बेइंतहा कत्लेआम हुए। बैंक डकैती, अपहरण का ऐसा बोलबाला बढ़ा कि कब, काैन आैर कहां से अगवा कर लिया जाए-कहना मुिश्कल हो गया। नरसंहार का दाैर तो राबड़ी देवी शासनकाल में ही खत्म हो गया लेकिन बैंक डकैती, अपहरण, हत्याएं आदि आपराधिक घटनाओं में राबड़ी देवी के शासन के बाद सत्त्ााच्युत हुई नीतीश सरकार भी रोकने में पूरी तरह से सफल नहीं हुई है। हालांकि अपराधियों को स्पीडी ट्रायल के तहत सजा दिलवाने में जरूर सरकार राबड़ी देवी से बाजी मार ली है। फिर भी मैं मानता हूं कि बिहार को बेबस बनाने में न तो अकेले वर्ष 1990 में सत्त्ाा में आए लालू प्रसाद यादव जिम्मेवाद हैं आैर न ही नीतीश कुमार। बिल्क बिहार की सही तस्वीर जानने के लिए आजादी के चंद दिनों बाद से ही गहन अध्ययन करने की जरूरत है।
बात आजादी के थोड़े दिनों पहले की है। 28 मार्च, 1947 को महात्मा गांधी हजारीबाग से पटना आने वाले थे। उनकी अगवानी करने के लिए तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रो.अब्दुल बारी हजारीबाग से पटना आ रहे थे। फतुहा के पास तस्कर विरोधी दस्ते ने उनकी अम्बेस्डर कार को जांचना चाहा। लेकिन प्रो.बारी को जल्दी थी। सो, उन्होंने अपना परिचय दिया आैर कहा कि महात्मा गांधी चंद घंटों में पटना पहुंचने वाले हैं। कृपया करके आप बेवजह हमें विलम्ब नहीं करें। वे अभी अपनी बात भी खत्म नहीं किये थे कि तस्कर विरोधी दस्ता में से एक ने प्रो.बारी को गोली मार दी। वे वहीं ढेर हो गये। कहा जाता है कि प्रो.बारी हत्यारी राजनीति की बेदी पर चढ़ गये। बेहद ईमानदार व साफ छवि के प्रो.बारी की हत्या आखिर किन कारणों से हुई? आजतक यह जांच का विषय बना हुआ है। कहा जाता है कि उनके राजनीति में बढ़ते कद से प्रदेश नेतृत्व खफा रहता था।
12 अगस्त, 1955 बिहार के लिए विस्मरणीय दिन है। आज ही के दिन विधानसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने कहा था-"आज हमारी एक बेटी विधवा हो गयी।' सचमुच विधवा हो चुकी पटना महिला कॉलेज की बीए-पाट्‌स-वन की छात्रा शांति पांडेय के पति व उभरते छात्र नेता दीनानाथ पांडेय भी हत्यारी राजनीति के शिकार हुए थे। पुलिस ने उन्हें बीएन कॉलेट परिसर में गोलियों से भून दिया था। हत्या के बाद उबल रहे बिहार को बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को हस्तक्षेप करना पड़ा था। तब जाकर मामला शांत हुआ था। बाद में विधवा शांति पांडेय एक चिकित्सक से शादी करके शांति पांडेय से शांति ओझा बन गयीं। फिलहाल पटना में महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह चलाती हैं आैर जागो बहना नामक पित्रका की संपादक भी हैं।
आजादी के बाद दूसरी घटना पटना के गांधी मैदान के समीप घटी। 5 जनवरी, 1967 को 10 हजार की भीड़ पर पुलिस ने गोलियों की बरसात कर दी। इसमें 35 से अधिक लोग मारे गये। पुलिस ने 75 चक्र गोलियां चलाइंर्। जबकि सरकारी रिकार्ड के अनुसार मात्र नाै लोग ही मारे गये थे। एक ओर जहां इस जघन्य गोलीकांड से प्रदेश दहल गया था वहीं पटना के तत्कालीन जिलाधिकारी जे.एन. साहु ने इसे कांग्रेस की अंदरूनी कलह बताया था। गोलीकांड के समय जयप्रकाश नारायण जमशेदपुर में थे वहीं उन्होंने कहा था-"बिहार में निरंकुशता के मजबूत होते पंजे पता नहीं, इस संवेदनशील प्रदेश को कहां ले जाकर छोड़ेंगे।' सरकार मामले को निपटाने में लगी रही फिर भी नतीजा सिफर ही रहा था। वहीं सत्त्ाा से हटते ही पूर्व मुख्यमंत्री कृष्णवल्लभ सहाय की माैत एक सड़क दुर्घटना में हो गई। विपरीत दिशा से आ रही एक ट्रक राैंदते हुए सहाय की कार को पार कर गई। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री की हत्या आैर शासन-प्रशासन बेखबर। तब से लेकर आज तक प्रशासनिक अधिकारी इस बात से अनभिज्ञ रहे कि सहाय की सड़क दुर्घटना में माैत एक साजिश थी या स्वाभाविक परिघटना।
13 अप्रैल, 1955 को बिहार विधानसभा का पूरा सदन तब सन्न रह गया था जब विरोधी दल के नेता एस.के.बागे ने श्रीकृष्ण सिंह पर लाए गये अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में बोल रहे थे। उन्होंने सदन को जानकारी दी कि देशभर में सबसे अधिक डकैतियां बिहार में हो रही हैं। वर्ष 1952 में उनके भी घर में डकैतोंं ने धावा बोलकर सबकुछ लूट लिया थाआैर पुलिस देखती रही थी। वहीं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता महामाया प्रसाद सिन्हा ने सदन को जानकारी दी कि बिहार विधान परिषद के उप सभापति के घर डकैती हुई। पुुलिस की ओर से तैयार आंकड़ों को पेश करते हुए नेताओं ने सदन को बताया कि वर्ष 1954 को बिहार में 1581 डकैतियां हुइंर् जबकि महाराष्ट्र में 575 व हैदराबाद में 344 डकैतियां हुइंर् थीं।
आजादी के पहले भारतीय जेलों में एक नारा गूंजता था-"यह झंडा तुमसे कहता है, दिन-रात जुल्म क्यों सहता है, खामोश सदा क्यों रहता है, उठ होश में आ आंधी बन जा।' लेकिन आजादी के बाद बिहार पुलिस के गुंडों ने इस क्रांतिकारी गाना गाने वाले को सदा के लिए गहरी नींद में सुला दिया था। इस गाने को इजात किया था शोषितों,मलजूमांें के नेता सूरज नारायण सिंह ने। गुलामी के दिनों में हजारीबाग केन्द्रीय कारा से जय प्रकाश नारायण समेत छह क्रांतिकारियों को अपने कंधे पर बिठाकर जेल से भागने वाले वीर बांकुरे सूरज बाबू 21 अप्रैल, 1973 को सत्त्ाा संरक्षित हत्यारी राजनीति के शिकार बन गये। रांची के टाटी सिलवे िस्थत उषा मार्टिन कंपनी के सामने मजदूरों की हक व हुकूक की लड़ाई लड़ रहे सूरज बाबू को कंपनी के गुंडों व रांची पुलिस ने उन्हें लाठी से पीट-पीटकर हत्या कर दी। हत्या के समय वे मधुबनी से सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे। सूरज बाबू की हत्या से आहत जयप्रकाश नारायण ने पटना के बांस घाट पर उनके अंतिम संस्कार के समय पत्रकारों से कहा था-"मैं अपनी पत्नी प्रभावती के निधन से उतना आहत नहीं हुआ जितना सूरज बाबू के निधन से हूं।'
उस समय अब्दुल गफ्फार विधान परिषद के सदस्य रहते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। इसके पहले तक बिहार में विधानसभा के सदस्य ही मुख्यमंत्री हुआ करते थे। जिसे कांग्रेस नीति सरकार ने अपने पैरों तले कानून को राैंदा।
सूरज बाबू की खाली सीट पर हुए उप चुनाव में एक ओर सोशलिस्ट पार्टी की ओर से उनकी पत्नी चन्द्रकला देवी खड़ी थी जबकि कांग्रेस पार्टी की ओर से स्वयं मुख्यमंत्री अब्दुल गफ्फार। बताया जाता है कि कांग्रेसी गुंडों ने जबरदस्ती चन्द्रकला देवी को हरवा दिया था। उनकी हार से आहत जयप्रकाश ने कहा था-"अब आैर अधिक नहीं सहा जा सकता। लोकतंत्र की हत्या अब आैर बर्दाश्त नहीं कर सकता।' सचमुच लोकतंत्र प्रेमी लोग कांगे्रस नीत सरकार के कारनामों से आहत हो रहे थे। फिर भी सत्त्ाा संरक्षित अपराध थमने का नाम नहीं ले रहा था।
देश में किसी केन्द्रीय मंत्री के मारे जाने की पहली घटना बिहार में ही हुई। 3 जनवरी, 1975 को तत्कालीन रेलमंत्री व देश के तेजतर्रार नेता ललित नारायण मिश्र को अपराधियों ने समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर बम से उड़ा दिया। उनकी हत्या से आहत तत्कालीन प्रधानमंत्री इिन्दरा गांधी ने पत्रकारों से कहा था-"यह ललित बाबू की हत्या नहीं, बिल्क मेरी हत्या का पूर्वाभ्यास है।' सचमुच इिन्दरा गांधी की यह भविष्यवाणी 31 अक्टूबर, 1984 को उनके अंगरक्षकों को गोलियों से भून कर सही साबित कर दिया था।
निरंकुश शासन से देश लगातार भयभीत होते जा रहा था। अभी देशवासी ललित बाबू की हत्या को भूले भी नहीं थे कि 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इिन्दरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। न्यायालय का फैसला आते ही हत्यारी राजनीति ने तथाकथित लोकतंत्र का गला भी घोंट लिया आैर 26 जून, 1975 को देशव्यापी आपातकाल लागू कर दिया गया। अखबारों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अभी देश में आपातकाल लागू ही था कि मटिहानी के कम्युनिस्ट विधायक सीताराम मिश्र की हत्या कांग्रेसी गुंडों ने कर दी।
बिहार के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 1980 सदा याद किया जाता रहेगा। आपातकाल के दूसरे आम चुनाव में एक ही साथ अपराधियों की जमात बिहार विधानसभा में पहुंची। सूबे में पहली बार बुलेट के आगे बैलेट विवश दिखने लगा। निर्वाचित सदस्यों में से कोई हाथी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचा तो कोई संगीनों के साये में। किसी पर तीन दर्जन हत्या के मामले दर्ज हैं तो कोई मुजफ्फरपुर से लेकर पटना तक जमीन हथियाने के लिए जाना जाता है। भोजपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय वीर बहादुर सिंह जीते तो वैशाली जिले के जनदाहा विधानसभा सीट से वीरेन्द्र सिंह महोबिया। सरदार कृष्णा सिंह, काली पांडेय, विनोद सिंह समेत कुख्यात विधायकों की लंबी लाइन लग गई।
अपराध के सहारे सत्त्ाा के शीर्ष पर पहुंचे ये विधायक एक-एक कर अपराध के ही शिकार बनते गये। एक मई, 1987 को वीर बहादुर सिंह अपराधी राजनीति के शिकार बन गये। इनके किस्से दिलचस्प रहे हैं। एक बार टिकट मांगने वाले ठिकट कलेक्टर को इन्होंने चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया था। वहीं एक दर्जन इंजीनियरों से गाड़ी छिनने के आरोप भी इन पर लगे। सर्कस मैनेजर से बंदूक की नोक पर पैसे छीनने व नहीं देने पर मैनेजर को अगवा करने के किस्से खासे चर्चित रहे हैं। 22 से अधिक हत्याकांडों के संगीन आरोप में वीर बहादुर सिंह उत्त्ार भारत के अधिकांश जेलों में सजा काट चुके थे। करीब 80 आपराधिक मामलों के अभियुक्त पलामू जिले के विश्रामपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने विनोद सिंह की हुंकार से पटना की सियासत भी कांपती थी। वर्ष 1970 में एक दारोेगा की हत्या के बाद चर्चा में आए विनोद दर्जनों मासूम लेकिन कमजोर वर्ग की लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाते रहे। उनके गुंडों के करतूतों से पूरा पलामू थर्राते रहता था। 25 जून, 1987 को चंदवा के समीप बिरसा गेस्ट हाउस में वे अपराधियों की गोलियों के शिकार हुए। हालांकि उनकी हत्या के वर्षों बाद तक इलाके में दहशत व्याप्त रहा। किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वाकई विनोद सिंह मारे गये हैं। क्योंकि कई बार इस तरह की अफवाहें पहले भी उड़ती रही थीं। "वीर महोबिया क्राम-क्राम, वैशाली में धड़ाम-धड़ाम' के नारे 1980 से 1985 के दाैर में वैशाली में बराबर गूंजते थे। मुख्यमंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र के अनन्य भक्त वीरेन्द्र सिंह महोबिया पर दर्जनों हत्या के मामले विभिन्न थानों में दर्ज थे। उन्हें पागल हाथी पालने का शाैक था। उनकी बेटी की शादी बिहार के चर्चित शादियों में एक थी। कहा जाता है कि लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की ओर से रातभर के लिए सैंकड़ों नल गड़वाये गये थे वहीं बारातियों के स्वागत के लिए रातभर हेलीकॉप्टर से फू ल बरसते रहा था। वर्ष 1980 में ही बिहारशरीफ से विधायक बने रामनरेश सिंह पर भी डकैती व हत्या के दर्जनों मामले दर्ज थे। इसी साल रघुनाथ पांडेय मुजफ्फरपुर जिले से विधायक निर्वाचित हुए। इनके कारनामे से एकबारगी व्यवसायी जगत थर्रा गया। मुजफ्फरपुर से लेकर पटना तक उन्होंने दर्जनों मकानों को अवैध रूप से कब्जाया आैर बाद में बंदूक का भय दिखाकर अपने सगे-संबंधियों के नाम पर आवंटित करा लिया।
25 जनवरी, 1981 को पटना से लेकर दिल्ली तक एक हत्या की चर्चा जोरों पर थी। हुआ यह था कि तत्कालीन केन्द्रीय पुनर्वास एवं आपूर्ति राज्य मंत्री भागवत झा आजाद के दिल्ली िस्थत सरकारी आवास-7 अकबर रोड में उनके आजाद के सुरक्षा गार्ड तेजपाल सिंह को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस मामले की तहकीकात के इसे दबाने में लगी रही।
वर्ष 1981 में छात्र लोकदल नेता परमेश्वर यादव का खून हो गया। इसी वर्ष पटना में लोकदल नेता शिवनंदन चन्द्रवंशी मारे गये वहीं नालंदा में लोकदल कार्यकर्ता उपेन्द्र शर्मा का सिर कलम कर राजनीतिक हमलावारों ने उनका सिर देवी मंदिर में चढ़ा दिया।
लगातार हो रही राजनीतिक हत्याओं से बिहार का सूरत बिगड़ते जा रहा था। पुलिसिया सुस्ती का आलम यह था कि मानवीय विधायक तक सुरक्षा की गुहार लगाने लगे। विधायक अिश्वनी शर्मा ने अपनी सुरक्षा की गुहार मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक लगाई। सूबे में जारी हत्याओं के दाैर के उजागर करने के लिए सरकार मीडिया को दोषी मान रही थी। उन दिनों अखबार के पन्ने आए दिन राज्य में जारी हत्या, लूट, अपहरण, दुष्कर्म आदि से भरे रहते थे। इसकी रोकथाम के लिए राज्य में सत्त्ाारूढ़ कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र ने विवादास्पद प्रेस बिल घोषित किया। इससे पूरा पत्रकारिता जगत बाैखला गया वहीं बिल के माध्यम से सरकार ने अपनी निरंकुशता का साफ तेवर दिखलाया।
आैर फिर भागलपुर का बहुचर्चित आंखफोडवा कांड। इस कांड ने सत्त्ाा की चूले हिला दी। इसके किस्से राज्य क्या, देश में चर्चित हुए। फिलहाल उस किस्से को मैं दोहराना नहीं चाहता। उन्हीं दिनों जगन्नाथ मिश्र के गांव बलुआ से दो किलोमीटर की दूरी पर इलाके के चर्चित कम्युनिस्ट नेता कामरेड राजकिशोर झा की हत्या राजनीतिक अपराधियों ने कर दी। 11 फरवरी, 1983 को मधुबनी इलाके के तेजतर्रार नेता पीतांबर झा मारे गये। "बिहार का मास्को' कहा जाने वाला बेगुसराय में भी राजनीतिक हत्याओं का अंतहीन सिलसिला जारी रहा। सिर्फ 1983 में ही पुलिस आंकड़ों के अनुसार 53 विरोधी दल के कार्यकर्ताओं व नेताओं की हत्या कर दी गई। इन हत्याओं में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने का आरोप लगा डा.जगन्नाथ मिश्र का दाहिना हाथ कुख्यात तस्कर कामदेव सिंह पर। राजनीतिक हत्याओं की धधक से सीवान भी अछूता नहीं रहा। 27 अगस्त, 1983 को दो बार विधायक रहे राजाराम चाैधरी को बम से उड़ा दिया गया।
सेक्सजनित बॉबी हत्याकांड बिहार का एक ऐसा अध्याय है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। बिहार विधानसभा के उपसभापति राजेश्वरी सरोज दास की दत्त्ाक पुत्री श्वेतनिशा उर्फ बॉबी को नेताओं के बिगड़ैल बेटे ने हवस का शिकार बनाकर माैत के घाट उतार दिया। इसमें बिहार विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष राधानंदन झा के बेटा रघुवर झा का नाम उछला था। लेकिन उच्चस्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद मामले को सीबीआई के सुपुर्द कर दिया गया। इसका अभी भी पटना के तत्कालीन एसएसपी किशोर कुणाल को मलाल है कि इस मामले की सही जांच नहीं हो सकी। लोग इस हत्याकांड को भूले भी नहीं थे कि मनेर के कांग्रेसी विधायक रामनगीना सिंह गोलियों के शिकार हो गये। इनकी हत्या कैसे हुई? इसकी जांच आज तक नहीं हुई है फिर भी उन दिनों इस हत्याकांड में कांग्रेसी मंत्री बुद्धदेव सिंह का नाम आया था। उस दौरान पटना व आसपास के इलाकों में दर्जनभर नेताओं की हत्याएं हुई थीं। इसके पहले सुकन यादव, सरकारी बैंकों के अवैतनिक मंत्री जंगी सिंह, मनेर के बाहुबली ज्वाला सिंह समेत दर्जनों लोग मारे गये थे।
बिन्देश्वरी दुबे के शासनकाल में पूरा बिहार नरसंहार से कराह उठा। जातीय नरसंहारों का ऐसा दौर चला जो मियांपुर नरसंहार के बाद ही थमने का नाम लिया। दुबे शासनकाल में ही दिल दहला देने वाली घटना बिहार के चितौड़गढ़ औरंगाबाद के दलेलचक-बघौरा में घटी जहां चरमपंथी संगठन एमसीसी ने एकमुश्त 56 राजपूतों की हत्या कर दी थी। इसके पूर्व इसी जाति के रामनरेश सिंह (जो बाद में औरंगाबाद के सांसद भी चुने गये) के लठैतों ने छेनानी में पिछड़ी जाति के छह लोगों को गोलियों से भून दिया था। दुबे शासनकाल में दर्जनभर नरसंहार हुए। बिहार बेकाबू होते जा रहा था। उन्हीं दिनों, 8 अगस्त, 1987 को झामुमो नेता निर्मल महतो की हत्या जमशेदपुर में दुबे समर्थक लोगों ने कर दी। इसके पूर्व 25 मार्च, 1985 को झारखंड के बांझी इलाके में पूर्व सांसद फादर एंथोनी समेत छह लोगों को गोलियों से भून दिया गया। कैथोलिक फादर ने राजनीति में आने के लिए रोम के पोप से इजाजत ली थी। दुबे के शासनकाल में ही कोलियरी मजदूर संघ के नेता जगदीश नारायण सिंह को कर दी गई। उनकी हत्या पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए हजारीबाग के तत्कालीन सांसद दामोदर पांडेय ने इसे कांग्रेसी की अंदरूनी राजनीति बताया था।
सत्ता संरक्षित अपराधियों के बोलबाला से पूरा बिहार आक्रांत होते जा रहा था। वैसी ही स्थिति में बिहार की हुकूमत तेजतर्रार नेता भागवत झा आजाद के हाथों में सौंप दी गई। मजदूर नेता आजाद अपने ही मानस पुत्रों के करतूतों से बदनाम होते गये। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूवाई के छात्र नेताओं की जमात ने भागलपुर के चर्चित चिकित्सक की बेटी पापिया घोष का अपहरण शादी की नीयत से कर लिया था। इस अपहरण की गूंज देशभर में सुनाई पड़ी थी। अपहर्ताओं ने गुप्त स्थान से एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर अपने को आजाद का मानस पुत्र घोषित किया था।
मानस पुत्रों की वजह से गद्दी गंवाये आजाद कुछ ही महीनों में दिल्ली तलब कर दिये गये थे। बिहारी नेताओं की वजह से देशव्यापी कांग्रेसियों की फजीहत हो रही थी। वैसी ही स्थिति में बिहार की बागडोर औरंगाबाद के सांसद सत्येन्द्र नारायण सिन्हा उर्फ छोटे साहब के हाथों में सौंप दिया गया। उन्होंने सत्ता संभालने के पूर्व 20 मार्च, 1989 को दिल्ली में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा-"माफिया सुंदर शब्द नहीं है। कौन है माफिया? जिन लोगों को बिहार में माफिया कहा जाता है वे तो हमारे सहकर्मी हैं। वे ही लोग सांसद और विधायक हैं। भला उन लोगों को माफिया कहना कहां तब जायज होगा! अगर इनमेें से कुछ लोगों ने सहकारिता पर अपना प्रभाव जमाया है तो उन्हें माफिया नहीं, मैनीपुलेटर कहा जा सकता है।' ऐसा रहा है बिहार में नेताओं का चरित्र। सूबे में अपराधियों को महिमामंडित करने वाले छोटे साहब कोई पहले मुख्यमंत्री नहीं रहे हैं। अन्य मुख्यमंत्रियों की चर्चा आने वाले दिनों में करेंगे। फिलहाल डूबते बिहार को उबारने का जिम्मा उठा रहे सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के बारे में कर रहे हैं।
इनके शासनकाल की ही देन है कि कांग्रेस का पूरे देश से सफाया हो गया। भागलपुर का चर्चित साम्प्रदायिक दंगा इन्हीं के शासनकाल में हुआ। दंगों में क्या हुआ? यह किसी से छुपी हुई नहीं है। उन्हीं के शासनकाल में बिहार के चंबल के नाम से प्रसिद्ध बगहा के इंका विधायक त्रिलोकी हरिजन की हत्या उनके घर पर डकैती के दौरान कर दी गयी। इसके कुछ दिनों बाद 6 जुलाई, 1989 को धनहा के पूर्व विधायक रामनगीना यादव का अपहरण उस समय कर लिया गया जब वे अपनी बेटी की शादी में व्यस्त थे। कहा जाता है कि अपहर्ताओं ने दो लाख रुपये फिरौती की रकम लेने के बाद ही छोड़ा था। हालांकि पुलिस बराबर इस बात से इंकार करती रही।
10 मार्च, 1990 को बिहार की हुकूमत युवा नेता लालू प्रसाद यादव के हाथों में आया। लालू के शासन काल में क्या हुआ? "राज करब तो ठोक के करब' का राग अलापने वाले लालू ने लोकतंत्र को मजबूती दिया या डूबते बिहार में रसातल में ले जाने में सहायक का काम किये। आप कल पढ़ेंगे।

Tuesday, September 16, 2008

बैलेटे की तराजू पर देशवासियों की सुरक्षा

देश की सुरक्षा बैलेट की तराजू पर निर्भर करता है। तभी तो यहां हर सरकारी नीतिगत फैसले वोट बैंक को ध्यान में रखकर किया जाता है। 13 सितंबर को दिल्ली में हुए आतंकी बम धमाके भी इसी की एक कड़ी है। आम लोगों की मौत और उनके लहू से ही लिखी जा रही है सत्ता की इबादत। यही कारण है कि देश के हुक्मरान सिर्फ और सिर्फ आश्वासनों का पुलिंदा बांधने में लगे हुए हैं तो दूसरी ओर वोट के लालची नेताओं ने खुफिया व्यवस्था को समृद्ध बनाने की एक योजना अस्तित्व में आने से पहले ही दम तोड़ दिया।
देशवासियों को इस बात की जानकारी है या नहीं, फिर भी मैं उन्हें याद दिलाने का प्रयास कर रहा हूं कि जब 11 सितंबर, 2001 को दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला हुआ था उसी समय भारत सरकार की ओर से सुरक्षा मामलों की कैबिनेट बैठक बुलवाई गयी थी, उस बैठक में इस बात का फैसला हुआ था कि देश के खुफिया तंत्र को धारदार बनाने के लिए मल्टी एजेंसी टास्क फोर्स के गठन किये जाने की जरूरत है। सरकार ने इसके गठन का निर्णय भी ले लिया था। केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के अधीन बनायी जाने वाली इस टास्क फोर्स में रॉ, सेना खुुफिया के साथ ही राज्यों की खुफिया इकाईयों के प्रतिनिधित्व की रूपरेखा बनायी गयी थी। लेकिन पता नहीं, गठन के प्रस्ताव को पास हुए सात साल होने को है फिर भी क्यों नहीं अबतक इस योजना को अमलीजामा पहनाया गया। इसका जवाब गृह मंत्रालय के पास नहीं है। आश्चर्य तो यह कि विश्व की तेजी से बनते जा रहे आर्थिक शक्ति के बावजूद भारत में सरकार बदलते ही प्राथमिकताएं क्यों बदल जाती हैं।
हालांकि यह कहने की बात है। जब मल्टी एजेंसी टास्क फोर्स का गठन करने का निर्णय किया गया था उस समय केन्द्र में राजग की सरकार थी। उसके बाद भी ढाई वर्षों तक राजग सत्तारूढ रहा फिर भी यह अस्तित्व में नहीं आया। यानी आतंकवाद के मुद्दे पर राजग-यूपीए दोनों ने ही कोताही बरती। देश में अगर राजग के शासनकाल में अक्षरधाम मंदिर, संसद भवन समेत अन्य दूसरी जगहांंें पर हमले होते रहे वहीं यूपीए शासन काल भी इससे अछूता नहीं रहा। अगर उसी समय राजग सरकार इस निर्णय को अमलीजामा पहना देती तो शायद देश में एक के एक धमाके नहीं होते और न ही मासूमों की जानें ही जातीं।
वर्ष 1999 में जब कारगिल में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों का गुरिल्ला घुसपैठ हो रहा था और वे बंकर बनाने मंें मस्त थे उस वक्त देश का खुफिया विभाग सोया हुआ था। धन्य हो उस चरवाहे का जिसने कड़ाके की ठंढ के बावजूद पाक के घुसपैठियों की गतिविधियों की जानकारी भारतीय सेना को दी। सरकार ने उसी समय देश की खुफिया एजेंसियों को मजबूर बनाने पर जोर दिया था। गृह मंत्रालय ने एक इंटेलीजेंस कोआर्डिनेशन ग्रुप और एक ज्वाइंट मिलीटरी इटेलीजेंस एजेंसी के गठन की योजना बनायी थी। यघपि बाद में ज्वाइंट इंटेलीजेंस कमेटी का गठन किया जरूर लेकिन यह भी एक तरह से सफेद हाथी ही साबित हुआ। इस कमेटी में केंद्र के सभी खुफिया तंत्र का प्रतिनिधित्व रखा गया है। बेहतर समन्वयन और राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में यह कमेटी भी महज खानापूर्ति करने का एक जरिया ही रह गयी है। भारत में जो खुफिया तंत्र का ढांचा है वह बिखरा हुआ है। इसलिए अमरीका की जांच एवं खुफिया एजेंसियों की तर्ज पर यहां भी एक संघीय एजेंसी की जरूरत महसूस की जा रही है। राज्य की खुफिया इकाईयों का केंद्रीय खुफिया तंत्र से कोई वास्ता ही नहीं है। सूचनाओं का आदान-प्रदान तक नहीं होता।

मनोरमा, तुम्हारी मौत पर हम शर्मिदा हैं।


मनोरमा, तुम्हारी मौत पर हम शर्मिदा हैं। सरकार ने तुम्हारी मौत के बाद भी न्याय नहीं दिला सकी। मनोरमा, तुम्हारी मौत की खबर से देश बौखला गया तहा। तब मणिपुर की सड़कों पर गिरे तुम्हारे खून के छींटों की दाग दिल्ली स्थित संसद भवन की दिवारों पर भी दिखी थी। उस समय देशव्यापी आंदोलन हुए थे। तुम्हारी मौत से बौखलाए नोबेल पुरस्कार विजेता शर्मिला टैगोर, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर समेत सैंकड़ों लोगों का हुजूम प्रधानमंत्री समेत तमाम हुक्मरानों से सवाल पूछ रहा था-"हमें बताते चलो कि आखिर मनोरमा का क्या कसूर था?' "चरमपंथियों पर लगाम कसने के बहाने आम लोगों का कत्लेआम कहां तक जायज है?' "आखिर तब तक बुलेट को दबाने के लिए बैलेटरूपी बूलेट का इस्तेमाल करती रहेगी सरकार?' तब से लेकर आजतक इन सवालों का जवाब देश के किसी हुक्मरान के पास नहीं है। आखिरकर, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था "द ह्मूमन राइट्‌स वॉच' ने सरगर्मी दिखलाई और 15 सितंबर, 2008 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाले हैं।
ह्मूमन राइट्‌स वॉच संस्था का कहना है कि मौत के बाद भी सरकार की ओर से मनोरमा को न्याय नहीं मिल सका है। मेरा मानना है कि मनोरमा, तुम्हारी मौत नहीं हुई है बल्कि तुमने मणिपुर के लोगों की हक और हुकूक के लिए शहादत दी है। मनोरमा, तुम जुर्म के खिलाफ लड़ने की आवाज बनी हो। तुझे विश्वास है कि एक न एक दिन तुम्हारी शहादत जरूर रंग लाएगी। बस इंतजार है तो उस दिन का। जिस दिन अपना वतन होगा। न किसी पर जुर्म होगा और न होगी इंतहा।
मनोरमा, अगर तुम्हारा कोई जुर्म था तो बस यही कि तुम आसाम राइफल्स को मिले विशेष सुरक्षा अधिकार का विरोध कर रही थी। जिसमें यह प्रावधान है कि सुरक्षाबल किसी को भी इस कानून के तहत उठा (गिरफ्तार) सकता है और उसे गोली मार सकता है। मनोरमा के साथ भी यही हुआ।
सुरक्षा बलों को अंदेशा था कि उसका संबंध चरमपंथियों से है। इसी आशंका के आधार से मनोरमा को वर्ष 2004 में उसके घर से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के थोड़ी देर बाद ही उसका गोलियांें से छलनी शव सड़क किनारे मिला था। सुरक्षा बलों के इस कार्रवाई से पूरा देश स्पब्ध रह गया था। बेशर्म अधिकारियों ने तब भी दावा किया था कि मनोरमा का संबंध एक चरमपंथी गुट से है। लेकिन उसका खुलास आज तक नहीं किया गया। वहीं उसके परिजन भी सुरक्षाबलों के इस आरोप को खारिज करते रहे हैं। इसलिए हम शर्मिदा हैं।
मनोरमा, तुम भले ही सदा के लिए गहरी नींद में सो गयी हो लेकिन देश व दुनिया राजव्यवस्था की हर चाल पर नजर रखे हुए है। तुम्हारी मौत के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आक्रोशित लोगों को शांत करने व अमल-चैन बहाल करने के बाबत सूबे के एक दिवसीय दौरे पर आये थे। आक्रोशित लोगों को आश्वस्त करते हुए भरोसा दिलाया था कि किसी भी सूरत में दोषियों कोे बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन अफसोस कि प्रधानमंत्री ने भी तुम्हें झूठा आश्वासन दिया। प्रधानमंत्रीजी तबतक लोगों से झूठे आश्वासन करते रहेंगे।
गिरफ्तारी के बाद सुरक्षाबलों ने तुम्हारे साथ क्या सलूक किया। इसका गवाह "द ह्यूमन राइट्‌स वॉच' है। अपनी रिपोर्ट में संस्था ने कहा है कि मनोरमा के साथ हत्या पूर्व संभावित बलात्कार हुए। इसे आसाम राइफल्स के जवानों ने अंजाम दिया। "द ह्यूमन राइट्‌स वॉच' की एक वरीय सदस्य मीनाक्षी गांगुली का कहना है कि मनोरमा की हत्या का दोषी चाहे कोई भी क्यों न हो अगर जांच एजेंसियां या सरकार के लोग सचेत रहते तो प्रदेश में आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगता। लेकिन ऐसा नहीं होने से प्रदेश में अपराध बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि मनोरमा देवी की मौत के बाद सुरक्षा बलों के मानवाधिकार उल्लंघन के अनेक मामले सामने आए हैं।'
रिपोर्ट में भारत सरकार से अपील की गई है कि वह सेना, अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस के उन लोगों को सज़ा दें जो मणिपुर में इस हत्या के ज़िम्मेदार हैं। रिपोर्ट का कहना है कि भारत की सरकार सेना और अर्द्धसैनिक बलों की हिरासत के दौरान होने वाली ज़्यादतियों को रोक पाने में विफल साबित हुई है। मीनाक्षी गांगुली ने कहा, "सुरक्षा बल क़ानून का पालन नहीं करते और चरमपंथी होने का शक होने पर न्यायाधीश के सामने लाने की बजाय उन्हें मार डालते हैं।'
गांगुली का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना के नाम की नैतिकता के नाम पर राज्य सरकार इन लोगों का बचाव करती है। इससे मणिपुर के निवासियों के पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रहता। मणिपुर में अनेक विद्रोही गुट काम कर रहे हैं जिनमें से कई राज्य की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं और कुछ स्वायत्त कबायली राज्य चाहते हैं। चरमपंथियों से लड़ने के लिए राज्य में बड़ी संख्या में सेना और अर्द्धसैनिक बल तैनात हैं। राज्य में तैनात इन बलों को सेना के विशेष कानून के तहत शक्ति मिली हुई है जिससे उन्हें सज़ा नहीं दी जा सकती। मानवाधिकार गुट काफ़ी समय से इस कठोर क़ानून को समाप्त करने की मांग करता आ रहा है।

Friday, September 5, 2008

फुलवरिया बांध बन गया बाधा

आजादी को शर्मसार करती है फुलवरिया जलाशय परियोजना से प्रभावित ग्रामीणों की कहानी। बांध ने करीब 20 हजार लोगों को ऐसा उजाड़ा कि वे जानवरों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। न खाने का ठिकाना और न ही रहने का आशियाना। शिक्षा-चिकित्सा की तो बात ही अलग है। पूरा इलाका तंगहाली में जी रहा है और इसकी सूध लेने वाला कोई नहीं है। महादलितों की इस आबादी की ओर न तो सरकार का ध्यान गया है और न ही अन्य कोई समाजसेवी ही इन गरीबों की ओर रूख किया है।
फुलवरिया जलाशय परियोजना के अिस्तत्व में आने के बाद इलाके के लगभग दो दर्जन गांव बाहरी दुनिया से कट गये हैं। ग्रामीणों को अपने ही प्रखंड मुख्यालय में जाने के लिए या तो उबाऊ नाैका यात्रा या थकाऊ पैदल यात्रा करनी पड़ती है।
नवादा जिले की हरदिया पंचायत में जहोरा नदी पर जब बांध नहीं बना था तब पूरा इलाका गुलजार था। इलाके में शिक्षा-चिकित्सा के बेहतर इंतजाम थे। बिजली की चकाचाैंध देखते ही बनती थी। सिनेमा देखने के लिए भानेखान गांव में रजाैली तक के लोग आते थे। वहां कभी अबरख (ढिबरा) का खान था। इस वजह से पूरे इलाके पर देश की नजर थी। लेकिन 1988 में फुलवरिया जलाश्ाय परियोजना के बनते ही पूरा इलाका देश-व-दुनिया से कट गया।इलाके के 20 हजार लोग अपने ही जिले, अनुमंडल व प्रखंड मुख्यालय से बेगाने हो गये हैं। जब कभी इन्हें प्रखंड मुख्यालय जाने की जरूरत होती है तो 70 किलोमीटर की दूरी तय कर पड़ोसी प्रदेश झारखंड के कोडरमा होकर वे रजाैली आते हैं, वह भी जंगल-पहाड़ के कंक्रीट व संकीर्ण रास्तों से। नहीं तो, डिलवा से गझंडी स्टेशन होते हुए गया के रास्ते। दोनों रास्ते जंगलों-पहाड़ों से घिरे हैं। इस वजह से बराबर विषैले सांप, भालू समेत अन्य जंगली जीव-जंतुओं के आक्रमण का खतरा बना रहता है। जबकि अगर सीधे सड़क मार्ग से इन गांवों को जोड़ दिया जाय तो दूरी मात्र 12 किलोमीटर ही पड़ेगी। तीसरा विकल्प है नदी मार्ग से। 179.20 वर्ग किलोमीटर में फैले फुलवरिया जलाश्ाय को ग्रामीण नाव से पार करते हैं। यह बेहद खर्चीला आवागमन है आैर समय भी अधिक लगता है। समय पर नाव मिल ही जाएगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। यही नहीं, जलाश्ाय के दो छोरों से नाव खुलती है। एक नाव भानेखान, मरमो आदि गांवों की ओर जाती है जबकि दूसरी नाव डिलवा समेत अन्य टोले व गांवों के लिए।
जलाश्ाय बनते ही यानी 20 वर्षों से हरदिया पंचायत की बड़ी आबादी "जल कैदी' की तरह रहने को विवश है। "जल कैदी' बने इन महादलितों को न तो जॉब कार्ड मिला है आैर न ही इिन्दरा आवास ही मय्यसर है। इलाके में शिक्षा-चिकित्सा का भी घोर अभाव है। ग्रामीणों को राष्ट्रीय गारंटी रोजगार योजना (नरेगा)के बारे में भी कुछ इल्म नहीं है।
ऐसी बात नहीं है कि ग्रामीणों की यह परेशानी सदियों पुरानी है। 1988 के पहले इलाके में सड़क संपर्क अच्छा था। चिरैला गांव में साप्ताहिक हाट लगती थी, यहां रजाैली तक के ग्रामीण बाजार करने आते थे। यहीं मध्य विद्यालय थाजिसमें आसपास के ग्रामीण बच्चे शिक्षा ग्रहण करते थे। भानेखाप में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था जहां करमा टीबी अस्पताल के टीबी विशेषज्ञ बैठा करते थे। सिंगर के रामचरितर राजवंशी बताते हैं कि चिरैला से नवादा के लिए उस समय पावापुरी व रोहिणी नामक बसें खुला करती थीं। भानेखाप में अबरख खान की वजह से इलाके में संपन्नता थी। ग्रामीण इसी खान में नाैकरी किया करते थे। इसके अलावा केंदू पत्त्ाा व कत्था से भी ग्रामीणों की अच्छी आय हो जाया करती थी।
फुलवरिया जलाश्ाय परियोजना बनते ही 40 गांवों-टोले के ग्रामीणों का मानो सबकुछ लुट गया। जलाश्ाय ने पहले तो हरदिया पंचायत के 14 गांवों (चिरैला, सिंगर, मरमो, रनिमास, बिगहा, कमात, धुरीताड़, पीपरा, कांसतरी, जहुरा आदि) को डुबोया। इन ग्रामीणों को पटना-रांची हाइवे के बगल में बसाया गया है। इनमें से कुछ को मुआवजा मिला लेकिन अन्य ग्रामीण अभी भी विस्थापन के मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऊंचाई वाले भानेखाप (कभी अबरख के लिए प्रसिद्ध), सुअरलेटी, कुंभियातरी, खिरकिया, चोरडीहा, डिलवा, कोसदरिया, झराही, परताैनिया, जमुंदाहा आदि गांव उसी हालात में छोड़ दिये गये। इन्हीं गांवों के ग्रामीण आदिम युग में जीने को मजबूर हैं आैर 20 वर्षों से "जल कैदी' बने हुए हैं।
पूर्ववर्ती सरकारों से लेकर वर्तमान सरकार ने दलितों के विकास के लिए खूब रोना रोया। पर उनका ध्यान इन महादलितों की बदहाली की ओर नहीं गया है। स्थानीय विधायक बनवारी राम स्वीकारते हैं कि ग्रामीणों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है लेकिन जल्द ही इनकी समस्याएं दूर कर दी जाएंगी। उनका कहना है कि रजाैली के पास से धमनी होते हुए डिलवा स्टेशन तक सड़क के लिए योजना बनाई गई है। जल्द ही टेंडर होने वाला है।हरदिया पंचायत की मुखिया मुन्ना देवी (महादलित) बताती हैं कि पंचायत कोष में सड़क का कोई प्रावधान नहीं है। इलाके के विधायक व सांसद ग्रामीणों की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते। टापू पर रह रही चिरैला की रजिया देवी बताती है कि वह कभी पांच बीघे की मालकिन थी, आज भूमिहीन हो गई है। विस्थापन का भी मुआवजा नहीं मिला। मरमो गांव के कृष्णा राजवंशी बताते हैं कि वतर्मान विधायक बनवारी राम दलित वर्ग से आते हैं फिर भी, आज तक उनका चेहरा ग्रामीणों ने नहीं देखा है।
बांध के उस पार 20 हजार की आबादी पर मात्र दो ही प्राथमिक विद्यालय हैं। आंगनबाड़ी भी कागजों पर ही चल रही है। दलितों के विकास के लिए बनी अन्य योजनाओं के लाभ से ग्रामीण वंचित हैं। मरमो गांव निवासी व मुखिया के समधी कृष्णा भुइंर्या बताते हैं कि दलितों में शिक्षा का नामोनिशान नहीं है। इस वजह से सरकारी योजनाओं का कुछ पता ही नहीं चलता।
समय पर नाव की उपलब्धता नहीं होने से इलाके के मासूम बच्चे शिक्षा से पूरी तरह से वंचित हो गये हैंे। सिंगर निवासी संजय बताता है कि नयी सिंगर में रहकर किसी तरह से 6वीं पास किया हूं। लेकिन अब आगे की पढ़ाई संभव नहीं हैं। पूछने पर बताता है कि एक तो समय पर नाव नहीं मिलती। अगर किसी दिन समय पर मिल भी गई तो नाव पर ही तीन घंटे समय लग जाते हैं, फिर पेट का सवाल है। घर में इतने पैसे नहीं हैं कि आगे की पढ़ाई जारी रखी जाय। वहीं सैंकड़ों मासूमों जिनके हाथों में कलम होनी चाहिए थी उनके हाथों में परििस्थति ने छेनी-हथाैड़ी थमा दी है।
जलाश्ाय बनाकर सरकार कितने किसानों को लाभािन्वत कर रही है। इसका तो अनुमान ही लगाया जा सकता है । लेकिन सरकार ने जाने-अनजाने ही पूरे इलाके को नक्सलियों के हवाले जरूर कर दिया है। जिला मुख्यालय से सीधा संपर्क मार्ग नहीं होने की वजह से इलाके में नक्सलियों की तूती बोलती है। कानून-व्यवस्था के लिए पुलिस भी होती है, यह बात अब ग्रामीण भूल चुके हैं। इलाके का कोई भी मामला (खनन को छोड़कर) पुलिस के पास नहीं पहुंचती। सीपीएम नेता व विस्थापितों के लिए संघर्षरत कृष्णा चंदेल बताते हैं कि रजाैली ब्लॉक व थाना मुख्यालय है। यहां आने के लिए लोगों को दो दिनों का समय आैर साै रुपये की जरूरत होती है। इस वजह से ग्रामीण कभी पुलिस के पास जाते ही नहीं हैं। फिर वहां न्याय मिलने में भी देर होती है। दूसरी ओर, जब भी कोई मामला नक्सलियों के पास पहुंचता है, फटाफट उसका समाधान नक्सली कर देते हैं। इसके कारण नक्सली ग्रामीणों के बीच पैठ बना चुके हैं।
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सरकार ने मछली मारने का भी हक छीना
सरकार महादलितों के कल्याण के लिए गंभीर तो दिखती है पर व्यावहारिक ताैर पर इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाती। इसका उदाहरण है फुलवरिया जलाशय परियोजना। सरकार ने पहली बार अक्टूबर, 2007 में फुलवरिया जलाशय के लिए खुला निविदा (टेंडर) जारी किया था। लेकिन निविदा जारी करते वक्त फुलवरिया परियोजना के अभियंता ने राष्ट्रीय पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन नीति-2007 का खयाल नहीं किया। उक्त नीति की कंडिका-सात में स्पष्ट उल्लेख है कि प्राथमिकता के आधार पर परियोजना से प्रभावित परिवार को ही मछली मारने का हक बनता है। इस क्षेत्र में ग्रामीणों के लिए रोजी-रोजगार का एक मात्र साधन मछली मारना ही बचा है।
जलाशय बनते ही खेतिहर जमीन डूब क्षेत्र में चला गया। विस्थापित ग्रामीण इसी नीति का हवाला देते हुए जिलाधिकारी से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को भेजे ज्ञापन में अनुरोध किया है कि खुला निविदा रद्द कर "नयी सिंगर मत्स्यजीवी स्वावलंबी समिति' (सहकरी समिति) के नाम से बंदोबस्त कर दिया जाय।