Tuesday, December 30, 2008

पहले बाढ़, अब सुखाड़




एक ओर बाढ़ तो दूसरी ओर सुखाड़। बिहार के लोग कोसी की विभीषिका से अभी जूझ ही रहे थे कि राज्य का अधिकांश इलाका सूखे की चपेट में आ गया। लाखों हेक्टेयर में लगी धान की फसल सूख रही है। खरीफ फसल भी बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। सूबे में यह स्थिति सितंबर महीने में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश होने की वजह से उत्पन्न हुई है।
प्रदेश में 15 वृहद व 78 मध्यम नहर सिंचाई योजनाएं हैं। इनमें औरंगाबाद में 12, भागलपुर में 31, डेहरी में 4 व पटना जिले में 30 मध्यम योजनाएं हैं। अगर इन योजनाओं को ही सुचारू तरीके से चलाया जाए तो बहुत हद तक प्रदेश को सूखे से बचाया जा सकता था लेकिन इनका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। मौसम की बेरुखी सेे पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। हालांकि नीतीश सरकार के अस्तित्व में आते ही सूबे की तकदीर बदलने के लिए एक सार्थक प्रयास की शुरुआत की गयी थी लेकिन कोसी इलाके की बाढ़ व शेष इलाके में सुखाड़ ने सरकार के सारे प्रयासों को विफल कर दिया है। सूखे के कहर से प्रदेश के अधिकांश किसान त्राहिमाम कर रहे हैं।
बात चाहे सोन उच्चस्तरीय नहर के किनारे बसे औरंगाबाद जिले के ओबरा, दाउदनगर, अरवल व पटना के देहाती इलाके की हो या फिर उत्तरी कोयल सिंचाई परियोजना से सिंचित होने वाले औरंगाबाद, रफीगंज, नबीनगर, मदनपुर, बारूण (2 पंचायत), गुरूआ, गुरारू व टिकारी की। हर जगह पानी के लिए हाहाकर मचा हुआ है। "चावल का कटोरा' कहा जाने वाले कैमूर, भभुआ, भोजपुर व बक्सर के इलाके भी इससे अछूते नहीं रहे। धान की लहलहाती फसलें अंतिम पटवन के अभाव में मर रही हैं। कमोबेश यही स्थिति उत्तरी बिहार की गंडक परियोजना से लाभांवित होने वाले पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी व समस्तीपुर जिलों की भी है।
हालात ऐसे हैं कि जहानाबाद जिले के कुर्था,करपी, कांको, मखदुमपुर, कैमूर जिले के अधौरा, अरवल जिले के बैदराबाद, कलेर के निचले इलाके, जहानाबाद से सटे औरंगाबाद जिले के देवकुंड के साथ ही गोह के दक्षिणी इलाके, हमीदनगर पुनपुन बराज परियोजना के आसपास बसे गांव के साथ ही बक्सर जिले के चौसा इलाके के दर्जनों गांवों में पानी के लिए हिंसक झपड़ें तक हो चुकी हैं। किसानों के गुस्से का शिकार सासाराम में दो दिवसीय दौरे पर आईं केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार को होना पड़ा। आलमगंज की सभा में किसानों ने करमचट सिंचाई परियोजना को लेकर जमकर हंगामा किया।
गोह प्रखंड की झिकटिया पंचायत के पूर्व मुखिया नंदलाल सिंह बताते हैं कि अंतिम पटवन नहीं होने की वजह से धान की लहलहाती फसल मारी गयी। उन्होंने बताया कि गोह व रफीगंज इलाके में उत्तरी कोयल व टिकारी माइनर के आसपास के दर्जनों गांवों में भीषण सुखाड़ हो गया है। अगर दशहरा तक बारिश नहीं हुई तो इस इलाके में रबी फसल की भी बुवाई नहीं हो सकेगी, क्योंकि खेतों में दरारें पड़ गयी हैं। बारिश नहीं होने की वजह से धान के उत्पादन में कितना अंतर आएगा, इस संबंध में जब हमने कृषि निदेशक बी. राजेन्द्र सेजानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी स्पष्ट कहने से इंकार कर दिया।
पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह का कहना है कि शुरू में अच्छी बारिश हुई जिससे धान की अच्छी उपज होने की उम्मीद थी लेकिन सितंबर के शुरू से ही बारिश ने धोखा दे दिया। वहीं दोषपूर्ण जल बंटवारे की वजह से सोन नहर से सिंचित होने वाले इलाकोें में भी सिर्फ एक पटवन के लिए धान की फसल मारी गयी।
नीतीश सरकार जुलाई महीने में ही कर रही थी कि अतिवृष्टि की वजह से राजधानी पटना डूबा है। अगर उन दिनों वाकई सरकार का यह बयान सही था तो फिर सितंबर आते ही आखिर कैसे अधिकांश सिंचाई योजनाओं में पानी की किल्लत हो गयी? किसानों का कहना है कि अगस्त के अंतिम दिनों से ही तीखी धूप होने की वजह से खेतों में पानी की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। सितंबर के अंत तक इसने भयावह रूप ले लिया। राज्य सिंचाई कोषांग के निदेशक दिनेश कुमार चौधरी ने बताया कि अंतिम पटवन के अभाव में धान की फसलों को मरने नहीं दिया जाएगा। पानी के लिए मचे हाहाकार को देखते हुए ही सरकार उत्तर प्रदेश की रिहन्द सागर व मध्य प्रदेश की बांध सागर परियोजनाओं से प्रतिदिन 14275 क्यूसेक पानी खरीद रही है। यही पानी पश्चिमी सोन नहर में 9798 क्यूसेक व पूर्वी सोन नहर में 4477 क्यूसेक प्रतिदिन छोड़ा जा रहा है। जबकि गंडक परियोजना के मुख्य कैनाल में प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक व पूर्वी कैनाल में 5700 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। इससे उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में सिंचाई हो रही है।
सरकार के यह दावे अगर सही हैं तो फिर आखिर किन परिस्थितियों में सरकार ने सूबे के सभी हिस्सों के किसानों को अनुदान पर डीजल देने का ऐलान किया है। प्रधान सचिव विजय शंकर का कहना है कि 20 सितंबर को ही पानी के लिए मचे हाहाकार के मद्देनजर सरकार ने 63 करोड़, 16 लाख, 50 हजार रुपये जारी किये हैं। हालांकि जमीनी सच्चाई यह है कि घोषणा के 15 दिनों के बाद भी अबतक जिलाधिकारी को कोई आदेश नहीं मिले हैं। सवाल यह है कि इस अनुदान का लाभ किसानों को कब मिलेगा? नाम नहीं छापने की शर्त पर एक जिलाधिकारी ने बताया कि घोषणाएं पटना में हुई हैं। घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में महीनों लग सकते हैं।
प्रदेश में लघु सिंचाई योजनाएं भी कागजों पर ही दिखती हैं। अकेले बक्सर जिले में ही लगभग 120 पंपिंग सेट हैं लेकिन उनमें से अधिकांश बंद पड़े हैं। 15 पंपिंग सेट ठीक हालत में हैं भी तो खपत के अनुसार बिजली की आपूर्ति नहीं होने की वजह से ये पंप क्षमता के अनुसार पानी नहीं दे पा रहे हैं। स्थानीय बसपा विधायक हृदय नारायण सिंह बताते हैं कि पिछली राजद सरकार ने इलाके में सिंचाई की समस्या को दूर करने के लिए गंगा-चौसा पंप लाइन का निर्माण करवाया था लेकिन तीखी धूप के बावजूद सरकार जिले में औसत बिजली की आपूर्ति 32 के बजाय 15 मेगावाट कर रही है। इस वजह से सौ क्यूसेक पानी की क्षमता वाली यह परियोजना भी किसानों का साथ नहीं दे रही है। अधौरा प्रखंड में कर्मनाशा नदी पर बना पंप हाउस भी जंग खा रहा है। इससे लाभान्वित होेने वाले हजारों एकड़ जमीन में लगी फसल जल रही है। इधर 30 सितंबर को हुई बारिश से किसानों के चेहरे खिले दिख रहे हैं।
स्थिति की नजाकत इसी से समझी जा सकती है कि पानी बंटवारे को लेकर सूबे में पहली बार दो राज्यों के बीच विवाद खड़ा हो गया। औरंगाबाद के भाजपा विधायक रामाधार सिंह ने प्रदेश की 26 हजार हेक्टेयर जमीन में लगी धान की फसल को बचाने के लिए झारखंड प्रदेश के कुटकू बांध के समीप उत्तरी कोयल के मुख्य द्वार को ही काट दिया। इस संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में हुए समझौते के अनुसार बिहार को 2500 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए था लेकिन समझौते का उल्लंघन करते हुए झारखंड सरकार मात्र 1700 क्यूसेक पानी छोड़ रही थी जबकि उत्तरी कोयल को बिहार के एक लाख हेक्टेयर में सिंचाई करनी है।
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पानी से बिजली पर छिड़ी जंग
सूखे की चपेट में आए किसानों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए पक्ष-विपक्ष के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। पानी की किल्लत का ठीकरा विपक्षी नेताओं ने बिजली विभाग पर फोड़ना शुरू कर दिया है। राजद नेता व पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि अतिवृष्टि के बावजूद सितंबर महीने में ही सारे नदी-नाले सूख गये। जिन इलाकांें के किसान पंपिंग सेट से खेतों में सिंचाई करते थे वहां बिजली नहीं देकर सरकार दूसरे राज्यों को बेच रही है। उनका कहना है कि वैसे तो अधिकांश बिहार पहले से ही अंधेरे में डूबा हुआ है लेकिन जहां बिजली है वहां भी सरकार देने में सक्षम नहीं है। केंद्रीय पुल की बिजली में से 300 मेगावाट प्रतिदिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत अन्य दूसरे राज्यों को बेची जा रही है। दूसरी ओर, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह का कहना है कि केन्द्र सरकार बिहार के कोटे के अनुसार भी बिजली नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि औसतन बिजली का आवंटन सूबे में करीब 1400 मेगावाट है जबकि यहां मिल रही है मात्र एक हजार मेगावाट। पक्ष-विपक्ष के आरोप के बीच सच्चाई चाहे जो भी हो इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सूबे के अधिकांश इलाकों में औसतन बिजली प्रतिदिन पांच से छह घंटे ही मिल रही है।
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वृहद सिंचाई योजनाएं लाभांवित जिले
सोन उच्चस्तरीय नहर------भोजपुर, रोहतास, पटना, जहानाबाद, गया, औरंगाबाद
बदुआ जलाशय योजना----भागलपुर, मुंगेर
चंदन जलाशय योजना---भागलपुर
मोरहर सिंचाई योजना---गया
किउल जलाशय योजना---मुंगेर
कोसी योजना----पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, किशनगंज, सुपौल, अररिया
कुहिरा बांध-----कैमूर
मुसाखांड सिंचाई योजना---कैमूर
गंडक योजना-पूर्वी व पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर
लिलाजन सिंचाई योजना---गया
सकरी सिंचाई योजना---गया, नवादा
उदेरास्थान सिंचाई योजना---जहानाबाद, गया, नवादा
अपर मोरहर सिंचाई योजना--गया, नवादा
कमला, बलान, त्रिशुला सिंचाई योजना---मधुबनी

क्यों जल रहा है बिहार?

नालंदा के गदीश प्रसाद का परिवार स्तब्ध, माैन आैर शोकसंतप्त है। ये वही जगदीश हैं, जिनकी इकलाैती संतान पवन उर्फ दीपू (24) को बेवजह आैर असमय नफरत की राजनीति की बलि वेदी पर चढ़ा दिया गया। जगदीश आैर उनके ही जैसे लाखों परिवारों को पता नहीं कि पेट की आग बुझाने के लिए दूसरे राज्यों की खाक छानने को कब गुनाह का दर्जा दिया गया। लेकिन, महाराष्ट्र में भड़की आग की लपट जिस तरह बिहार पहुंची, उसने यह बता दिया कि सिसायतदानों के मन में क्या है। पवन जैसे मासूमों की लाश की चाबी ही सत्त्ाा के द्वार खोलती है। हाल के वर्षों में सबसे सफल प्रयोग भाजपा की राम लहर थी, जिसने अन्य दलों को भी नकारात्मक राजनीति की दिशा दिखाई।
महाराष्ट्र से लेकर बिहार आैर यूपी तक राजनेताओं को इस उबलते मुद्दे के बीच इंतजार रहेगा, तो बस आम चुनाव का। इस पूरे प्रकरण की जिस तरह राजनीतिक साैदेबाज़ी होती दिखी, उसने यह संकेत दे दिया है कि बिहार आैर महाराष्ट्र में होनेवाले आम चुनाव में बाहरी-भीतरी का मुद्दा काफी अहम भूमिका अदा करेगा।
बिहार में राजद के लिए अभी एक चुनाैती यह है कि वह सत्त्ाा में नहीं। उसे चुनाव सिर्फ मुद्दों के आधार पर लड़ना है। चूंकि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजग सरकार है, इसलिए वह राज ठाकरे का ठीकरा राजग के बहाने नीतीश पर फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यद्यपि, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद सीधे ताैर पर अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना नहीं साध रहे, लेकिन उनकी पार्टी के श्याम रजक सरीखे नेता वार का एक भी माैका चूक नहीं रहे।
यही वजह है कि जब राज की गिरफ्तारी हुई, तो श्याम रजक ने कहा-"ऐसे लोगों के खिलाफ मारपीट का नहीं बल्कि देशद्राेह का भी मुकदमा चलना चाहिए।' वहीं दूसरी ओर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने भी कांग्रेस पर निशाना साधने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया। पार्टी प्रवक्ता विजय कुमार चौधरी ने कहा-" राज को गिरफ्तार करने में महाराष्ट्र सरकार ने देरी कर दी वरना बिहार के युवकों की पिटाई नहीं होती।'
नेतृत्वविहीन छात्रों का उग्र प्रदर्शन आगामी लोकसभा चुनाव में कुछ नया गुल खिलाएगा, यह अभी कहना मुिश्कल है। लेकिन जिस तरह पहली बार छात्रों की गोलबंदी हुई है, उससे 1974 के आंदोलन की उपज रेल मंत्री लालू प्रसाद से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत अन्य नेताओं के सामने एक चुनाैती खड़ी हो गयी है।
राज्य प्रशासन छात्रों के उग्र तेवर भांप चुका था, लेकिन इसे राजनीतिक मजबूरी ही कहेंगे, जिसके चलते हिंसा का जवाब कठोरता से नहीं दिया गया। यह उसी तरह का मामला है, जैसा राज ठाकरे के साथ आज तक महाराष्ट्र में होता आया है। फरवरी 2008 में राज ठाकरे के भड़काऊ भाषणों से वैमनस्यता फैली थी, जिसके शिकार बिहार आैर यूपी के कई मासूम हुए थे। उस समय भी महाराष्ट्र सरकार की थू-थू हुई थी, लेकिन मराठी जनमानस की उपेक्षा से जो राजनीतिक नुकसान हो सकता है, उसकी शायद विलासराव देशमुख को अच्छी तरह से समझ है। यही वजह रही होगी कि उनकी सरकार ने उस समय राज पर इतना हल्का मुकदमा ठोंका कि उन्हें जेल से बाहर आने में सिर्फ दो घंटे आैर 15 हजार के मुचलके ज़ाया करने पड़े। अगस्त 2008 में भी एमएनएस कार्यकर्ताओं ने मराठी में दुकानों के नाम लिखने की हिदायत दी आैर तय समय से पहले ही व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर हमले बोल दिये। लाखों की संपित्त्ा का नुकसान हुआ। इस मामले में राज्य सरकार ने सिर्फ एक मामूली किस्म की जांच का आदेश दे दिया। जब व्यापारी हाइकोर्ट गये, तो वहां से सरकार को कड़े कदम उठाने के निर्देश मिले, पर अचरज की बात यह है कि कुछ ही दिनों के बाद कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार ने एक शपथपत्र दायर कर यह बताया कि मनसे नेताओं का कोई कुसूर नहीं है। कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ। गिरफ्तारी आैर रिहाई के नाटक के बीच, जो कुछ हुआ उसे देश भर के करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा। आम आदमी के मन में एक आम धारणा यह ज़रूर बनी कि सत्य जितना जिखता है, उतना स्पष्ट नहीं होता। वैसे बिहार में भी उग्र आंदोलन के ज़रिए, जिस प्रकार एक-दूसरे पर निशाना साधा जा रहा है, वह समस्या के समाधान से ़़ज्यादा सियासी फायदा झपटने की तरकीब नज़र आ रहा है।
दूसरी ओर मुद्दे के चुनाव तक जिंदा रहने के भी कई प्रमाण मिल रहे हैं। मसलन, 23 अक्टूबर को हुई छात्रों की आपात बैठक में महाराष्ट्र के सारे उत्पादों के बहिष्कार का निर्णय लिया गया। छात्रों ने सभी दलों के नेताओं को कड़ी चेतावनी दी कि अगर इस बार नेता चुप रहते हैं तो वे आगामी लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे। छात्रों ने जिस तरह से रेलवे को क्षति पहुंंचायी है उसे देख राजद प्रमुख व रेल मंत्री लालू प्रसाद खासे दबाव में दिख रहे हैं। उन्होंने भी दबी जबान ही सही, पर इस प्रतिहिंसा का सारा दोष राज्य सरकार पर मढ़ दिया है। लेकिन प्रदेश के राजग नेता इसे आक्रोश की अभिव्यिक्त मान रहे हैं। क्योंकि इसके पहले भी चार बार हिन्दी भाषियों के नाम पर बिहारी छात्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के शिकार बने हैं। लाख टके का सवाल यह है कि आखिर हिन्दीभाषी के नाम पर बिहारियों को ही निशाना क्यों बनाया जाता है? आैर, अगर यूपी भी हिंदीभाषी प्रदेश है, तो वहां के नेता इस बर्बरता पर माैन क्यों रहे। जाहिर सी बात है, मायावती आैर मुलायम की महत्वाकांक्षा अब यूपी से बाहर निकल कर केंद्र तक पहुंच गयी है। ऐसी िस्थति में किसी एक प्रदेश की राजनीति के लिए मुद्दों को हथियाने की तीर गलत निशाने पर भी लग सकती है। यही वजह है कि आज बिहार अपने जख़्म खुद सी रहा है। कब तक सीना पड़ेगा, यह अनििश्र्चत है।

ऐसे ही नहीं बना चीन नंबर वन


बीजिंग ओलंपिक में चीन ऐसे ही नहीं बन गया दुनिया का बेताज बादशाह। इसके लिए उसने एड़ी-चोटी एक कर दी। पानी की तरह पैसे बहाया। खिलाड़ियों का मनोेबल बराबर ऊं च्चा रखा वहीं आम लोगों में इसके प्रति जज्बा भर दिया आैर राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़कर देखा। तभी आज से 20 साल पहले सोल ओलंपिक में मात्र 20 मेडल लेने वाला चीन, इस बार दुनिया में सबसे अधिक मेडल लेने में कामयाब रहा। उसने कुल 51 स्वर्ण पदक लिये। लाख टके का सवाल यह है कि आखिर 20 वर्षों के भीतर चीन में ऐसा क्या बदलाव आया जिससे वह करिश्माई साबित हुआ। इसके लिए उसकी तैयारियों व समर्पण के साथ ही अन्य पहलुओं पर भी गाैर करना होगा।
चीन में 44,000 खेल विद्यालय हैं जहां 3, 72, 290 विद्यार्थियों को खेल का प्रशिक्षण दिया गया। इसी में से बीजिंग ओलंपिक के लिए खिलाड़ियों का चयन हुआ। वे पेशेवर खिलाड़ी तो बने ही, सरकर ने उन्हें वेतन भी देना शुरू कर दिया। इससे उनमें हाैसला अफजाई हुआ आैर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर दिखाया। इन खिलाड़ियों को कड़ी आैर उच्चस्तर के प्रशिक्षण के लिए 25,000 पूर्णकालीन प्रशिक्षक मुहैया कराये गये। इसके बाद राष्ट्रीय स्पद्धर्ाओं के लिए 15,925 राष्ट्रीय खिलाड़ियों को चुना गया आैर अंत में अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन के आधार पर 3,222 एलीट एथलीटों को चुना गया जबकि अन्य खिलाड़ियों को ओलंपिक में भाग लेने की इजाजत नहीं मिली।
ऐसी बात नहीं है कि बीजिंग ओलंपिक की तैयारियां सिर्फ सरकारी स्तर तक ही सीमित रहा। बिल्क आम लोगों ने भी इसका भरपूर समर्थन किया। सरकारी इलीट सिस्टम के साथ ही मास स्पोर्ट्‌स सिस्टम चलाया गया। इसमें देश में अधिकांश बुिद्धजीवियों ने हिस्सा लिया। इस मद में भी कई अरब यूनान (चीनी मुद्रा) खर्च किये गये।
बीजिंग ओलंपिक पर चीनी सरकार द्वारा अपनाये गये उपाय-----
मैदान---------8,50,000
स्टेडियम------------6,20,000
स्पोर्ट्‌स मीट्‌स----------40,000 (हर साल)
खेल विद्यालय----------44,000
प्रशिक्षित खिलाड़ी---3,72,290
पेशेवर खिलाड़ी--------46,758
प्रशिक्षक---------------25,000
राष्ट्रीय खिलाड़ी----------15,924
अंतराष्ट्रीय खिलाड़ी-----3,222

ऑखों के सामने नाचती रही मौत

अंतर्राष्ट्रीय जल मार्ग के रास्ते अमेिरका के हुस्टन बंदरगाह से मुंबई के िलए रवाना हुए जहाज को सोमालिया के िनकट जल दस्युओं ने 15 िसतंबर को अपने कब्जे में ले िलया। लगातार दो महीनों तक जल दस्युओं के कब्जे में रहे लोगों के मन से भय अभी तक दूर नहीं हो पाया है।
"ये बहुत बुरा अनुभव था। हमें मानिसक प्रता़डना दी गयी। आंखों के सामने बराबर मौत नाचती रहती थी। फिर भी भगवान का शुिक्रया और परिवारजनों का प्यार और दुआओं ने आपलोगों के सामने खींच लाया। अपने पूरे दल के साथ देशवािसयों के बीच जो खुशी हो रही है उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता।' यह कहना है सोमािनया में जल दस्युओं के कब्जे से मुक्त हुए जापानी मालवाहक जहाज स्टोल्ट वेलर (फ्लीटिशप मैनेजमेंट कंपनी, हांगकांग) के कैप्टन प्रभात गोयल का। श्री गोयल ने कहा-"हमें मानिसक तौर पर प्रताि़डत किया गया। लेिकन अंत में हम सुरिक्षत लौटने पर खुश हैं। मैं मििश्रत भावनाओं के साथ वापस पहुंचा हूं और मीिडया का धन्यवाद करना चाहता हूं। मुझे अपनी पत्नी पर गर्व है। अपह्त लोगों का कहना है िक अपहर्ता गोलीबारी किया करते थे तािक लोगों में दहशत व्याप्त रहे। यही बात चालक दल के सदस्य राजिंदर मलिक ने भी कही। मिलक कहते हैं-"अपराधी बराबर मानिसक प्रता़डना देते रहते थे। लगातार दो महीनों तक पानी व खाना के लिए वे तरसते रहे।'
वहीं पटना (िबहार) के रहने वाले चालक दल के सदस्य संतोष कुमार बताते हैं "वे दो महीने दहशत भरे थे। आंखों के सामने मौत नाचती रहती थी। कब, िकसकी मौत हो जाये, कहना मुश्िकल हो रहा था। भोजन भी खत्म होता जा रहा था। जहाज में ईंधन की भी कमी थी। एक-एक पल िबताना मुश्िकल हो रहा था। भगवान न करे िकसी दुश्मन को भी वैसे दिन देखने को िमले। परिवार से भी संपर्क टूट गया था। हमलोगों ने जिंदगी की आस ही छो़ड दी थी। मौत से जीतकर परिवार के बीच आने की जो खुशी हो रही है, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता'।
वे बताते हैं िक संतोष की मानें तो फ्लीटिशप कंपनी का यह जहाज 24 अगस्त को अमेिरका के हुस्टन बंदरगाह से रवाना हुआ था, उसे 19 िसतंबर को मुंबई पहुंचना था। 22-23 दिन बीत चुके थे। चालक दल के सभी सदस्य लंच की तैयारी में ही थे। स्वदेश पहुंचने की खुशी समुद्र की लहरों की तरह तरंगें मार रही थीं। अभी जहाज सोमालिया के िनकट पहुंचा ही था कि 15 िसतंबर को दोपहर करीब डे़ढ बजे अचानक जल दस्युओं ने हमला बोल िदया। दो स्पीड वोट पर सवार हिथयारबंद हमलावरों ने जहाज को अपने कब्जे में लेकर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। लोग माजरे को समझ पाते, उसके पहले ही हमलावरों ने कैप्टन प्रभात कुमार गोयल समेत तीन सदस्यों को अपने कब्जे में ले िलया और धमकाते हुए इशारों में ही सोमालिया चलने को कहा। हालांिक वे नहीं जानते थे कि सोमालिया िकधर है? और न ही वे अंग्रेजी जानते थे। आपस में ही कुछ बातें करते थे। फिर क्या था? डरे-सहमे कैप्टन ने जहाज का रुख सोमालिया की ओर कर िदया। रास्ते भर अपह्र्ता गुस्साये स्वर में चालक दल के अन्य सदस्यों को धमकाते रहते। जब पूरी तरह से हमलोग उसके कब्जे में आ गये तब भी बराबर जगह बदलते रहे, शायद उन्हें भी डर था िक कहीं भारतीय नौसेना या अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना उन पर हमला न कर दे। अंत में सुरक्षित ठिकाना समझकर हमलावरों ने आइल (सोमालिया) नामक स्थान पर सभी को िटकाये रखा। इस दौरान लगातार फिरौती के िलए दबाव बनाया जाता रहा। कैप्टन व चीफ इंजीिनयर के माध्यम से यागामारू टैंकर (मालवाहक जहाज का मािलक) के साथ ही फ्लीटिशप मैनेजमेंट कंपनी पर दबाव ब़ढता जा रहा था। शुरू में 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर फिरौती की मांग की गयी जबकि िदल्ली में अखबारों से जानकारी मिली कि 2.5 मििलयन डॉलर पर कंपनी ने हमलोगों को छु़डाया। इस दौरान कई बार अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना भी जहाज के नजदीक आती रही फिर भी मामला सुलझने की बजाय उलझता ही जा रहा था। भारतीय नौसेना का भी जहाज दूर में िदखाई देता था।
कैसे बीते वे िदन? इस पर उन्होंने कहा कि हमलावरों ने मानिसक प्रता़डना जरूर दी, कई बार ऐसी भी नौबत आई जब लगा िक अब जीना मुश्िकल है। वे इशारों-इशारों में ही गला काट लेने, गोिलयों से उ़डा देने आदि की धमिकयां देते रहे। 5 नवंबर को अपरािधयों ने कैप्टन गोयल, सेकेंड अफसर व चीफ इंजीिनयर को धमकाते हुए व्हील हाउस ले गये। थो़डी देर बाद ही गोिलयों की आवाज सुनी गयी। इससे सारे लोग सहम गये और िकसी अनहोनी की आशंका से भयभीत हो गये। इस दौरान सिफर् दाल व मछली खाकर अपनी जिंदगी गुजारी, क्योंिक खाना पहले ही खत्म हो चुका था, जो बचा था उसी में से शुरू के एक सप्ताह तक हमलावरों ने भी खाया।

मजबूत होते नक्सली

िसयासतदानों के भाषणों में नक्सलवाद को उखा़ड फेंकने के दावे तो कई बार किये गये पर यह उख़डने की बजाय तेजी से पसरता गया। िहन्दुस्तान के मानिचत्र पर 15 नवंबर,2000 को 28वें राज्य के रूप में झारखंड का उदय हुआ। झारखंड अब पूरे आठ साल का हो चुका है। इन आठ सालों में कई क्षेत्रों में बहुत कुछ बदला, लेकिन नहीं बदल सका तो वर्षों से चला आ रहा नक्सली आंदोलन का स्वरूप। उम्मीद तो यही की जा रही थी िक राज्य की िसयासतदान झारखंड में अपना नया रंग िदखाएंगे और खद्दर (खादी) के रास्ते नक्सलवाद धीरे-धीरे दम तो़ड देगा। लेिकन उम्मीद के उलट िपछले आठ सालों में मुख्यमंत्रियों के चार चेहरे बदले। लेकिन अफसोस की ये चारों मुख्यमंत्री झारखंड के नक्सली चेहरे को बदलने में नाकामयाब ही रहे। इन आठ सालोें में ही ऐसे हालात उत्पन्न हो गये िक नक्सिलयों की हिंसक तेवर से राजधानी रांची भी थर्राने लगी।
वैसे तो संयुक्त िबहार के झारखंड वाला िहस्सा पहले से ही नक्सलियों की िगरफ्त में रहा है लेकिन जिस तेजी से िपछले आठ सालों में नक्सलियों ने अपना दबदबा कायम िकया है। वह सरकार के िलए एक क़डी चुनौती बन गयी है। नवंबर, 2000 में प्रदेश के 18 िजलों में से 9 ही नक्सलियों की िगरफ्त मेंं थे, जहां उनकी अपनी अदालतें लगती थीं और नक्सिलयों की लाल सेना कानून को धत्त्ाा बताते हुए अपना फैसला सुनाया करती थी। तब नक्सिलयों का ध़डा भी बंटा हुआ था लेिकन नवंबर, 2004 में एमसीसी और पीपुल्सवार का िवलय हुआ और नयी माओवादी संगठन भाकपा (माओवादी) ब़डी ताकत के साथ उभरा। देखते ही देखते संपूर्ण झारखंड नक्सिलयों की आगोश में समा गया। आज हालात ऐसे हैं िक राज्य पुिलस के अलावा केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद 24 में से 22 िजले नक्सलियों की िगरफ्त में आ गये हैं। इनमें से 16 िजलों में उनकी अपनी हुकूमत चल रही है। झारखंड का "चतरा' इलाका छत्त्ाीसग़ढ का "बस्तर' सािबत हो रहा है जहां के सुदूर इलाकों में दिन के उजाले में भी पुिलस जाने से कतराने लगी है। वहीं 120 से अिधक थाने नक्सलियों के ही रहमोकरम पर सुरिक्षत चल रहे हैं। मात्र आठ वर्षों में ही एक सांसद, दो विधायक, एक एसपी व दो डीएसपी समेत करीब 400 पुिलस व सुरक्षाबल नक्सलियों की गोलियों के िशकार हुए हैं। वहीं 900 आम नागरिक भी नक्सली हिंसा में मारे गये हैं। हालांिक नक्सिलयों के तांडव को रोकने के लिए सरकार ने भी दबिश बनाने की कोिशश की है। इस दौरान दर्जनों हार्डकोर नक्सली हिरासत में िलए गये हैं। फिर भी िजस तरीके से नक्सलियों का हिंसक तेवर िसयासतदानों को थर्रा रहा है उसके मुकाबले पुलिसिया दबिश बरसात में पानी के बुलबुले की तरह ही सािबत हो रही है।
आश्चर्य तो यह िक सरकार की सारी लोक-लुभावन घोषणाओें व योजनाओं को धत्त्ाा बताते हुए तेजी से मिहलाओं का भी नक्सिलयों के प्रित आकर्षण ब़ढा है। आिखर क्या कारण है िक इतने अल्प समय में ही ग्रामीण मिहलाएं व किशोर व्यवस्था को चुनौती देते फिर रहे हैं और अपनी आवाज हिंसक तेवर के साथ सुनाने को उतावले हैं। इस बाबत सामाजिक िवश्लेषक प्रो.रामदयाल मुंडा बताते हैं िक आठ साल बीतने के बावजूद सत्त्ाा की हुकूमत असली आदिवािसयों के हाथों में नहीं पहुंची है। चारों आेर लूट-खसोट मची हुई है। जबतक प्रदेश की हुकूमत साम्राज्यवादी पूंजी के इर्द-िगर्द मंडराती रहेगी, नक्सलवाद का वीभत्स चेहरा सामने आता जाएगा। प्रशासिनक उपेक्षाओं और पूंजीपितयों, ठेकेदारों और उद्योगपितयों के शोषण ने झारखंड के आिदवासी अंचलों में प्रितिक्रया के रूप में नक्सलवाद को सिक्रय होने का अवसर जुटाया है।
नक्सली िवद्रोह को सामाजिक-आिर्थक समस्या मानने वाले मुख्यमंत्री िशबू सोरेन एक ओर नक्सलियों को बातचीत के िलए खुला आमंत्रण देते फिर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर झारखंड एवेन्यू, नारी मुिक्त संघ, क्रांितकारी किसान समिित व क्रांितकारी सांस्कृितक संघ जैसे लोकतांत्रिक अिधकारों की आवाज बुलंद करने वाले संगठनों को प्रितबंिधत करके कुछ दूसरा संदेश दे रहे हैं। पीयूसीएल के महासचिव शिशभूषण पाठक बताते हैं िक शुरू से ही शोिषतों, गरीबों की आवाज बंदूक के बल पर दबाया गया परिणामस्वरूप यहां के ग्रामीण भी हिथयार से लैस होते गये और अपनी आवाज बंदूक से सुना रहे हैं।
नक्सलियों के शिकार पुिलस व आम नागरिक (आंक़डों में)
वर्ष पुलिस आम नागरिक
2001---56
---------107
2002----69--------77
2003----20---------93
2004----45------106
2005----30------79
2006-----45-----93
2007------11-----175
2008(अक्तूबर तक)---34---124
क्षितग्रस्त सरकारी भवन
वर्ष
2002-----04
2003-----06
2004-----14
2005-----06
2006-----15
2007-----12
2008(अक्तूबर)----10
9 जुलाई,2008---झारखंड के बुरूहातू गांव में माओवािदयों ने पूर्व मंत्री व िवधायक रमेश सिंह मुंडा को गोली मार कर हत्या कर दी।
15 अप्रैल, 2008---माओवादी बंदी के दौरान झारखंड के चांिडल में दो आम लोगों की हत्या
26 अप्रैल, 2008---झारखंड के दुमका के िशकारीपा़डा इलाके मेें एक एएसआई, 3 पुलिसकर्मी मारे गये, 6 घायल।
8 अप्रैल,2008---माओवादी व शांितसेना के बीच आपसी झ़डप में शांितसेना के आठ लोग मारे गये। इसमें सेना प्रमुख भादो सिंह शामिल है।
एक अप्रैल, 2008---हजारीबाग के िबष्णुगढ इलाके में मुठभे़ड में 9 सीआरपीएफ मारे गये, 11 घायल वहीं दूसरी ओर, खूंटी िजले में 4 ग्रामीणों की हत्या माओवािदयों ने कर दी।
9 फरवरी, 2008---िगरीडीह के घने जंगलों में माओवािदयों ने परितांड थाने को उ़डा िदया वहीं सौ से अधिक पुलिसकर्मी दो दिनाें तक माओवादियों से िघरे रहे।
30 अगस्त, 2008---झारखंड के घाटिशला क्षेत्र में बारूदी सुरंग िवस्फोट में एक इंस्पेक्टर समेत 12 पुिलसकर्मी मारे गये।
(िशबू को सत्त्ाा संभालते ही माओवादियों ने िवस्फोट कर एक ब़डी चुनौती दी है। गौरतलब है कि माओवादियों ने यूपीए सरकार के न्यूक्लीयर डील के िवरोध मंें िहंसक वारदातों को अंजाम देने की पहले ही चेतावनी दे रखी है।)

छत्त्ाीसग़ढ में रमन प्रभाव

प्रदेश में न नक्सिलयों की चली और न ही कांग्रेसियों की बल्कि स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा दूसरी बार सत्ता में लौटी है। 90 विधानसभा सीटों में से 50 सीटें भाजपा को मिली हैं। कांग्रेस की झोली में 37 सीटें गयी हैं। वैसे तो भाजपा को वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भी 50 सीटें हासिल हुई थीं और 39.26 फीसदी मत प्राप्त हुआ था वहीं इस बार उसका वोट बैंक ब़ढकर 40.36 फीसदी हो गया है। जबकि कांग्रेसी वोट बैंक में भी दो फीसदी की ब़ढोतरी हुई है। hलकी प्रदेश में सबसे अिधक मतों से जीतने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ही रहे। मारवाही िवधानसभा सीट वे हैिट्रक बनाते हुए 42092 मतों से विजयी घोिषत हुए हैं। वहीं प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपनी उपस्िथित दर्ज कराने में सफल रही है। उसने दो सीटों पर अपना कब्जा जमाया है।
"चावल बाबा' के नाम से प्रिसद्ध हो चुके डा. रमन सिंह की राजनीति "चावल' के इर्द-िगर्द ही उफनती रही। "राम-कृष्ण हरे-हरे, कमल छाप घरे-घरे' के नारे लगाते हुए रमन मंत्रीमंडल ने गरीबों के लिए तीन रुपये के िहसाब से प्रितमाह 35 िकलोग्राम चावल देने का वायदा ही नहीं िकया बल्िक उसे पूरा भी किया। वहीं सरकार ने िकसानों के लिए अपनी पूरी झोली खोल दी और ब्याज दर 14 फीसदी से घटाकर तीन फीसदी कर दिया। इसका उसे फायदा भी हुआ। इसकेे अलावा महंगाई,गरीबों के साथ न्याय, गांवों के विकास व रोजगार के साथ ही नक्सलवाद का मुद्दा भी प्रभावी रहा। हालांिक कांग्रेस ने तीन रुपये के बदले दो रुपये चावल देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र ने किया लेकिन भाजपा ने एक रुपये किलो चावल देने का गुगली फेंककर कांग्रेस को घेर लिया। वहीं रमन सिंह का सौम्य छवि भी कांग्रेस के िलए भारी प़डा। बतौर मुख्यमंत्री वे चुनावी सभाओं में गये जिसके सामने अजीत जोगी टिक नहीं सके। यही नहीं आपसी कलह की वजह से कांग्रेस न तो भ्रष्टाचार का मुद्दा सकी और न ही सत्त्ाा विरोधी लहर (एंटी इनकंबेन्सी ) का ही लाभ ले सकी। अनमने ढंग से ही सही लेिकन नक्सिलयों के मुद्दे पर मौन रहने वाली कांग्रेस पार्टी को नक्सल प्रभािवत क्षेत्रों में भी करारा झटका लगा और बस्तर, बीजापुर समेत अन्य क्षेत्रों में उसे मुंह की खानी प़डी। वहीं भाजपा के लिए सलवा जुडूम अिभयान रंग लाया। जहां उसे मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिला। िवश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस ने मतदाताओं के सामने बेहतर िवकल्प पेश नहीं किया परिणामत: भाजपा को फायदा हुआ।
राज्य के इितहास मेें पहली बार बुलेट (नक्सली धमकी) पर बैलेट (लोकतंत्र) भारी रहा। सूबे के नक्सल प्रभािवत बस्तर, सरगुजा, बीजापुर व नारायणपुर समेत अन्य इलाकों में मतदाताओं ने भाजपा को जीताकर एक संदेश भी िदया है िक सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ जो सलवा जुडूम अभियान चलाया था वह जनता के हितों की रक्षा के लिए ही था। इन इलाकाें में 61 फीसदी मतदान इस बात का गवाह है कि आने वाले िदनों में इस इलाके में लोकतंत्र का ही बयार बहेगा। सारे पूर्वानुमान को तो़डते हुए नक्सल प्रभािवत इलाकों में भाजपा की भारी जीत सूबे में ही नहीं, देशव्यापी राजनीितक प्रेक्षकों के सामने एक सवाल ख़डा कर दिया है। नक्सली प्रजातंत्र के िवरोधी तो रहे ही हैं। वे भाजपा को एक सांप्रदाियक पार्टी भी मानते रहे हैं। बावजूद इसके इस क्षेत्र में नक्सिलयों की ब़ढी गतिविधियों व वारदातों के बाद भी आिदवासी बहुल बस्तर के लोगों ने भाजपा को अपना िवश्वास देकर सबको चौंका दिया है। गौरतलब है िक चुनाव के पूर्व मानवािधकार संगठनों के यह दावा किया था िक नक्सली आतंक व सलवा जुडूम के कारण दिक्षणी बस्तर के ही 200 से अिधक गांव खाली हो गये हैं जबिक मतदान के बाद इस बात का खुलासा हुआ है िक पूरे बस्तर संभाग में 55 मतदान केन्द्रों पर ही नक्सलियों की धमकी का असर दिखा।
इस चुनाव में सरकार के खिलाफ माहौल नजर नहीं आया। फिर भी सरकार में शािमल कई िदग्गजों को हार का मुंह देखना प़डा। केन्द्रीय नेतृत्व लोकसभा चुनाव को देखते हुए अभी से ही आत्ममंथन में जुट गयी है। एक ओर जहां सत्त्ााधारियों में िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय, स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर, कृिष मंत्री मेघाराम साहू, आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत, सत्यानन्द राठिया चुनाव हार गये वहीं प्रदेश में नक्सलियों के घोर िवरोधी रहे कांग्रेसी नेता महेन्द्र सिंह कर्मा, कांग्रेस िवधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल, प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा को भी हार का मुंह देखना प़डा। राज्य के चुनावी इितहास में यह पहला मौका है जबिक चुनाव ल़डने वाले सभी प्रमुख दलों के प्रदेश अध्यक्षों को िशकस्त का सामना करना प़डा।
फिर भी भाजपा का यह जनादेश कांटों भरा ताज है। आने वाले दिनों में अपने चुनावी वायदे पर सरकार को खरा उतरना होगा तभी यह िवश्वास स्थायी जनाधार में तब्दील हो सकता है। सूबे के परिणाम ने स्पष्ट िकया है ब़डे चुनावी मुद्दे न ही राज्यों पर हावी होता है और ही राज्यों के मुद्दे लोकसभा चुनाव में ज्यादा कारगर सािबत हो सकते हैं।
िदग्गज हारे
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष िवष्णुदेव साय
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू
एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष नोबेल वर्मा
िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय
नेता प्रितपक्ष महेन्द्र सिंह कर्मा
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा
कांग्रेस विधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल
स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर
कृिष मंत्री मेघाराम साहू
आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत
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िदग्गज जीते
राजनांदगाव से मुख्यमंत्री रमन सिंह विजयी
मरवाही से पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी विजयी
कोटा से कांग्रेस की डा. रेणु जोगी विजयी
रामविचार नेमात (गृहमंत्री)
बृजमोहन अग्रवाल (रायपुर दक्षिण), राजस्व मंत्री
अमर अग्रवाल (बिलासपुर), नगरीय प्रशासन मंत्री
राजेश मूणत (रायपुर पश्िचम) पीडब्लूडी मंत्री
दुर्ग से भाजपा के हेमचंद यादव
िबलासपुर िसटी से भाजपा के अमर अग्रवाल
कांकेर से भाजपा की सुिमत्रा मरकोले
दंतेवा़डा से भाजपा के भीमा मांडवी ने
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संकट में माओवादी राजनीति

रोल्पा में नेपाली सरकार की नहीं, आज भी माओवादियों की सत्ता है। इस जिले में न तो सरकार की नीतियां लागू हैं और न ही सरकारी कायदे कानून। कमोवेश यही स्थिति रुकुम, डोल्पा, जाजरकोट, चितवन, दैलेख, उदयपुर, सिन्धुली समेत पश्चिमांचल से लेकर पूर्वांचल तक के 60 जिलों की है। लगातार 10 वर्षों तक राजशाही को चुनौती देने वाले नेपाली छापामार इन दिनों पूरी तरह से बेरोजगार हो चुके हैं। इनकी बेरोजगारी पार्टी को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया है। एक ओर प्रचंड गठबंधन धर्म निभाने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर उन्हें पार्टी के आंतरिक संघर्ष से भी दो-चार होना पड़ रहा है।
पार्टी के तीन बड़े नेताओं पुष्प कमल दहल "प्रचंड', बाबूराम भट्टाराई औैर रामबहादुर थापा उर्फ बादल के सरकार में शामिल होने के बाद पोलित ब्यूरो में बचे हुए लोग चाहते हैं कि पार्टी का नेतृत्व उनके हाथों में सौंप दिया जाए। इस दौर में गुरिल्ला आर्मी की ओर से कृष्णबहादुर महरा और मोहन वैद्य उर्फ किरन सबसे आगे चल रहे हैं। ये दोनोंं नेता कट्टर माओवादी व हार्डकोर सदस्य माने जाते हैं। सूत्रों का कहना है कि गुरिल्ला कैम्पों में रह रहे लगभग 20 हजार महिला-पुरुष छापामारों पर दोनों नेताओं का काफी असर है। इनके समर्थकों का मानना है कि प्रचंड "जनयुद्ध' से अपना ध्यान पूरी तरह से हटा लिये हैं और "संसदीय राजनीति' के कुचक्र में फंसते चले जा रहे हैं। नेपाली मीडिया का भी कहना है कि प्रचंड इन दिनों गहरे राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। यह संकट सरकार में शामिल सहयोगी दलों से भी है और अपनी पार्टी से भी। पार्टी के आंतरिक विद्रोहियों का कहना है कि प्रचंड पूरी तरह से संशोधनवादी लाइन अख्तियार करते जा रहे हैं। (मार्क्सवादियों की भाषा में कम्युनिस्टों के लिए संशोधनवाद एक गाली है।) आश्चर्य तो यह कि कभी नेपाली माओवादी पार्टी 1974 के बाद के चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को संशोधनवादी घोषित की थी। लेकिन बदले माहौल में प्रचंड ही संशोधनवादी करार दिये जा रहे हैं। प्रचंड विरोधी खेमे के तेवर को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में अगर प्रचंड गुरिल्ला आर्मी और माओवादियों द्वारा जब्त किये गये भू-माफियाओं की संपत्तियों पर जल्द कोई कारगर निर्णय नहीं लिए, तो हो सकता है कि प्रचंड स्वयं सशस्त्र संघर्ष करने वाले माओवादी पार्टी से ही अलग-थलग नहीं पड़ जाएं। इसके संकेत भी दिखने लगे हैं। सरकार चलाने में मशगूल दिख रहे प्रचंड अब तक न तो शिविरों में रह रहे छापामार लड़ाकों के लिए कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाए हैं और न ही समान भूमि वितरण के बारे में उनकी कोई सोच दिख रही है। प्रचंड के विरोधियों का कहना है कि सरकार के पास विकास की स्पष्ट कोई नीति नहीं दिख रही है और न ही वह बाहरी निवेशकों को आकर्षित करने में सफल रहे हैं। देश में जमींदारों की संख्या सैैंकड़ों में हैं जिनके पास खेती योग्य 65 फीसद भूमि हैं। इन खेतिहर जमीनों पर माओवादियों का अवैध कब्जा अभी भी बरकरार है। देशवासी घोर बिजली संकट झेल रहा है। 70 फीसद आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है। 85 फीसद लोग आज भी गांवों में रह रही है। देशवासी पीने के पानी और सफाई व रोजी-रोजगार की बुनियादी सुविधाओं का नामोनिशान नहीं है।
कुछ दिनों पहले ही पार्टी की केन्द्रीय कमिटी की बैठक में "जनवादी लोकतंत्र' और पार्टी के नाम पर प्रचंड लाइन का 11 में से 8 सदस्यों ने जमकर विरोध किया। बावजूद इसके इन विरोधों का प्रचंड पर कोई असर नहीं दिख रहा है। इस बाबत उन्होंने कहा कि जब वर्ष 2005 में पार्टी भूमिगत संघर्ष छोड़कर राजशाही के खात्मे के लिए सड़कों पर निकली थी तब भी कुछ इसी तरह के कयास लगाये जा रहे थे कि पार्टी अब टूटी, तब टूटी। लेकिन जब उस समय ऐसे विरोध का कोई असर नहीं हुआ तब अब क्या होगा। प्रचंड चाहे जो भी कहें लेकिन इस सच्चाई से कौन इनकार कर सकता है कि जो युवा बंदूक के सहारे व्यवस्था परिर्वतन करने का सपना देखकर "जनयुद्ध' में शामिल हुए थे। जिन लोगों ने "जनयुद्ध' में अपनी पूरी ताकत झोंकी थी और करीब 13 हजार लोगों की शहादतों का लाभ आखिर संसदीय राजनीति करने वाले कैसे उठा सकते हैं। किरन समेत अन्य विरोधियों को मिल सकता है।
हाल ही में प्रचंड में नेपालगंज के एक सभा में कहा, "सरकार चलाने से आसान है बंदूक के सहारे क्रांति करना।' वैसे तो इस बयान से प्रचंड एक ही साथ कई निशाने साधने की कोशिश में थे लेकिन पार्टी के अंदर इस बात से एक बार फिर भूचाल आ गया है। इसी सभा में उन्होंने आगे कहा,"जब पार्टी सत्ता में होती है, ऐसे मतभेद आते ही रहते हैं। प्रचंड ने कहा कि मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बता चुका हूं कि माओवादियों को सिर्फ देश की चिंता है और वे लोकतांत्रिक मूल्यों का आदर करते हैं।' फिर भी पार्टी के अंदर उठे राजनीतिक भूचाल जब शांत होता नहीं दिखा तो उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में अपने इस्तीफे की धमकी भी दे डाली। अब तक नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड ऐसी चार बार धमकियां दे चुके हैं।
एक ओर प्रचंड संसदीय रास्ते से क्रांति का राग अलापने में लगे हैं वहीं कट्टरपंथियों के आगे उनकी बेबसी भी साफ झलक रही है। जब वे नेपालगंज में जनता को सत्ता चलाने के गुर सिखला रहे थे। उसके कुछ दिनों के बाद काठमांडू में कम्युनिस्ट युवा लीग के दर्जनभर समर्थकों ने "हिमालयन टाइम्स' के दफ्तर में धावा बोलकर संपादक समेत अन्य मीडियकर्मियों को मारा-पीटा। इसका नेपाल में खासा विरोध हुआ। बावजूद इसके प्रचंड राजनीतिक बयान देकर इस मामले में माओवादियोंे का हाथ होने से इंकार करते रहे। लेकिन जब मीडिय समेत अन्य नेपाली समुदाय का दबाव काफी बढ़ गया तो उन्हें दबाव में आकर इस घटना की जांच की घोषणा करनी पड़ी। यह तो एक उदाहरण मात्र है। नेपाल के सुदूर इलाकों में संघर्ष के दिनों की तरह ही अभी भी माओवादी बेलगाम होकर हिंसक वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
दक्षिणी तराई क्षेत्र समेत कई ऐसे इलाके हैं जहां इन दिनों घोर अशांति छाई हुई है। यहां माओवादियों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि कानून-व्यवस्था की स्थापना के लिए गुरिल्ला सेना के उप कमांडर रह चुके जनार्दन शर्मा के नेतृत्व में एक सप्ताह पहले ही जनतांत्रिक तराई मुक्ति मोर्चा के बीच पांच सूत्री एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर हुआ है। आंतरिक सूत्रों का कहना है कि प्रचंड माओवादियों के वैसे सारे कैडरों से गुप्त बाचचीत की फिराक में हैं जो हथियार छोड़ना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में माओवादियों का आतंरिक संकट किस करवट मोड़ लेगा फिलहाल कहना मुश्किल है।
नवंबर महीने में ही पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसमें भी दोहरा संघर्ष (टू लाइन स्ट्रगल) उभरकर सामने आया। इसके पहले भी केन्द्रीय कमिटी की बैठक में प्रचंड 11 में से 8 सदस्यों ने प्रचंड लाइन का विरोध किया था। इस बाबत मोहन वैद्य का कहना है कि जनवादी लोकतंत्र (साम्यवाद) के लिए ही करीब 13 हजार माओवादियों ने अपने प्राणों को न्योक्षावर किया है। न की मिश्रित अर्थव्यवस्था के लिए। जिसके प्रचंड हिमायती हैं।
अब सवाल उठता है कि शिविरों में रह रहे छापामारों पर इस बयान का असर किस रूप में पड़ता है। क्योंकि छापामारों को प्रचंड ने चीनी कम्युनिस्ट नेता माओत्सेतुऽग के नारे को सिखलाया था,"सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।' इस नारे को शिविरों में रह रहे हजारों लड़ाके अभी भी नहीं भूले हैं। नाम नहीं छापने की शर्त्त पर एक माओवादी छापामार ने बताया कि सोवियत नेता लेनिन ने यह भी कहा था कि नेताआें पर बराबर दुश्मन की निगाह रखना चाहिए। शायद कुछ हद तक माओवादियों की गुरिल्ला आर्मी प्रचंड पर पैनी निगाहें रख रही है।
इधर नेपाली माओवादी पार्टी की हर गतिविधियों पर भारतीय माओवादियों की भी पैनी निगाहें हैं। भारतीय माओवादी अभी भी प्रचंड लाइन के विरोधी हैं और सशस्त्र विद्रोह छेड़े हुए हैं। यही नहीं सूत्रों का कहना है कि नेपाली माओवादी के दूसरे गुट (हार्डकोर) से भारतीय माओवादियों का संपर्क लगातार बढ़ते जा रहा है। फिर भी प्रचंड लाइन पर भारतीय माओवादी दो खेमों में दिख रहे हैं। बिहार-बंगाल स्पेशल एरिया कमिटी के सचिव रहे माओवादी राजनीति के समर्थक व बंदी मुक्ति संग्राम समिति के अध्यक्ष पूर्व विधायक रामाधार सिंह कहते हैं कि दुनिया में प्रचंडवाद स्वीकार्य नहीं हो सकता। क्योंकि कभी सर्वहारा क्रांति का राग अलापने वाले प्रचंड इन दिनों संसदीय राग अलापने लगे हैं। वहीं नाम नहीं छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ भारतीय माओवादी बताता है कि संघर्ष की भी एक सीमा होती है। जनता के सामने राजशाही का खात्मा असली मुद्दा था। अब जबकि राजशाही खत्म हो चुकी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि शायद दूसरे चरण में वहां भी माओत्सेतुऽग की तरह सांस्कृतिक क्रांति की ओर प्रचंड बढ़े।

Wednesday, December 10, 2008

chhatishgarg में रमन प्रभाव

प्रदेश में न नक्सिलयों की चली और न ही कांग्रेिसयों की बल्िक स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा दूसरी बार सत्त्ाा में लौटी है। 90 विधानसभा सीटों में से 50 सीटें भाजपा को मिली हैं। कांग्रेस की झोली में 37 सीटें गयी हैं। वैसे तो भाजपा को वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भी 50 सीटें हािसल हुई थीं और 39.26 फीसदी मत प्राप्त हुआ था वहीं इस बार उसका वोट बैंक ब़ढकर 40.36 फीसदी हो गया है। जबकि कांग्रेसी वोट बैंक में भी दो फीसदी की ब़ढोतरी हुई है। हालांिक प्रदेश में सबसे अिधक मतों से जीतने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ही रहे। मारवाही िवधानसभा सीट वे हैिट्रक बनाते हुए 42092 मतों से विजयी घोिषत हुए हैं। वहीं प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपनी उपस्िथित दर्ज कराने में सफल रही है। उसने दो सीटों पर अपना कब्जा जमाया है।
"चावल बाबा' के नाम से प्रिसद्ध हो चुके डा. रमन सिंह की राजनीति "चावल' के इर्द-िगर्द ही उफनती रही। "राम-कृष्ण हरे-हरे, कमल छाप घरे-घरे' के नारे लगाते हुए रमन मंत्रीमंडल ने गरीबों के लिए तीन रुपये के िहसाब से प्रितमाह 35 िकलोग्राम चावल देने का वायदा ही नहीं िकया बल्िक उसे पूरा भी किया। वहीं सरकार ने िकसानों के लिए अपनी पूरी झोली खोल दी और ब्याज दर 14 फीसदी से घटाकर तीन फीसदी कर दिया। इसका उसे फायदा भी हुआ। इसकेे अलावा महंगाई,गरीबों के साथ न्याय, गांवों के विकास व रोजगार के साथ ही नक्सलवाद का मुद्दा भी प्रभावी रहा। हालांिक कांग्रेस ने तीन रुपये के बदले दो रुपये चावल देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र ने किया लेकिन भाजपा ने एक रुपये किलो चावल देने का गुगली फेंककर कांग्रेस को घेर लिया। वहीं रमन सिंह का सौम्य छवि भी कांग्रेस के िलए भारी प़डा। बतौर मुख्यमंत्री वे चुनावी सभाओं में गये जिसके सामने अजीत जोगी टिक नहीं सके। यही नहीं आपसी कलह की वजह से कांग्रेस न तो भ्रष्टाचार का मुद्दा सकी और न ही सत्त्ाा विरोधी लहर (एंटी इनकंबेन्सी ) का ही लाभ ले सकी। अनमने ढंग से ही सही लेिकन नक्सिलयों के मुद्दे पर मौन रहने वाली कांग्रेस पार्टी को नक्सल प्रभािवत क्षेत्रों में भी करारा झटका लगा और बस्तर, बीजापुर समेत अन्य क्षेत्रों में उसे मुंह की खानी प़डी। वहीं भाजपा के लिए सलवा जुडूम अिभयान रंग लाया। जहां उसे मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिला। िवश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस ने मतदाताओं के सामने बेहतर िवकल्प पेश नहीं किया परिणामत: भाजपा को फायदा हुआ।
राज्य के इितहास मेें पहली बार बुलेट (नक्सली धमकी) पर बैलेट (लोकतंत्र) भारी रहा। सूबे के नक्सल प्रभािवत बस्तर, सरगुजा, बीजापुर व नारायणपुर समेत अन्य इलाकों में मतदाताओं ने भाजपा को जीताकर एक संदेश भी िदया है िक सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ जो सलवा जुडूम अभियान चलाया था वह जनता के हितों की रक्षा के लिए ही था। इन इलाकाें में 61 फीसदी मतदान इस बात का गवाह है कि आने वाले िदनों में इस इलाके में लोकतंत्र का ही बयार बहेगा। सारे पूर्वानुमान को तो़डते हुए नक्सल प्रभािवत इलाकों में भाजपा की भारी जीत सूबे में ही नहीं, देशव्यापी राजनीितक प्रेक्षकों के सामने एक सवाल ख़डा कर दिया है। नक्सली प्रजातंत्र के िवरोधी तो रहे ही हैं। वे भाजपा को एक सांप्रदाियक पार्टी भी मानते रहे हैं। बावजूद इसके इस क्षेत्र में नक्सिलयों की ब़ढी गतिविधियों व वारदातों के बाद भी आदवासी बहुल बस्तर के लोगों ने भाजपा को अपना िवश्वास देकर सबको चौंका दिया है। गौरतलब है िक चुनाव के पूर्व मानवािधकार संगठनों के यह दावा किया था िक नक्सली आतंक व सलवा जुडूम के कारण दिक्षणी बस्तर के ही 200 से अिधक गांव खाली हो गये हैं जबिक मतदान के बाद इस बात का खुलासा हुआ है िक पूरे बस्तर संभाग में 55 मतदान केन्द्रों पर ही नक्सलियों की धमकी का असर दिखा।
इस चुनाव में सरकार के खिलाफ माहौल नजर नहीं आया। फिर भी सरकार में शािमल कई िदग्गजों को हार का मुंह देखना प़डा। केन्द्रीय नेतृत्व लोकसभा चुनाव को देखते हुए अभी से ही आत्ममंथन में जुट गयी है। एक ओर जहां सत्त्ााधारियों में िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय, स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर, कृिष मंत्री मेघाराम साहू, आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत, सत्यानन्द राठिया चुनाव हार गये वहीं प्रदेश में नक्सलियों के घोर िवरोधी रहे कांग्रेसी नेता महेन्द्र सिंह कर्मा, कांग्रेस िवधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल, प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा को भी हार का मुंह देखना प़डा। राज्य के चुनावी इितहास में यह पहला मौका है जबिक चुनाव ल़डने वाले सभी प्रमुख दलों के प्रदेश अध्यक्षों को िशकस्त का सामना करना प़डा।
फिर भी भाजपा का यह जनादेश कांटों भरा ताज है। आने वाले दिनों में अपने चुनावी वायदे पर सरकार को खरा उतरना होगा तभी यह िवश्वास स्थायी जनाधार में तब्दील हो सकता है। सूबे के परिणाम ने स्पष्ट िकया है ब़डे चुनावी मुद्दे न ही राज्यों पर हावी होता है और ही राज्यों के मुद्दे लोकसभा चुनाव में ज्यादा कारगर सािबत हो सकते हैं।
िदग्गज हारे
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष िवष्णुदेव साय
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू
एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष नोबेल वर्मा
िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय
नेता प्रितपक्ष महेन्द्र सिंह कर्मा
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा
कांग्रेस विधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल
स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर
कृिष मंत्री मेघाराम साहू
आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत
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िदग्गज जीते
राजनांदगाव से मुख्यमंत्री रमन सिंह विजयी
मरवाही से पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी विजयी
कोटा से कांग्रेस की डा. रेणु जोगी विजयी
रामविचार नेमात (गृहमंत्री)
बृजमोहन अग्रवाल (रायपुर दक्षिण), राजस्व मंत्री
अमर अग्रवाल (बिलासपुर), नगरीय प्रशासन मंत्री
राजेश मूणत (रायपुर पश्िचम) पीडब्लूडी मंत्री
दुर्ग से भाजपा के हेमचंद यादव
िबलासपुर िसटी से भाजपा के अमर अग्रवाल
कांकेर से भाजपा की सुिमत्रा मरकोले
दंतेवा़डा से भाजपा के भीमा मांडवी
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Sunday, November 30, 2008

सुशासन की हकीकत

सूबे में जबतक सुशासन नहीं आएगा, यहां के हालात नहीं सुधर सकते। आप हमें तीन महीने का समय दीजिए, मेरी सरकार बनते ही भयमुक्त समाज का निर्माण होगा जिसमें न तो दोषियों को बचाया जाएगा और न ही निर्दोषों को फंसाया ही जाएगा।'
ये वायदे वर्ष 2005 के चुनावी सभाओं में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करते फिर रहे थे। लालू-राबड़ी शासनकाल में लगातार बिगड़ती जा रही कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने में नीतीश सरकार ने बहुत हद तक सफलता भी पाई है। देशभर में सबसे अधिक अपराधियों (26125) को सजा इसी राज्य में हुए। संगीन अपराध के जुर्म में 80 अपराधियों को निचली अदालत से फांसी की सजा हुई। जबकि 5616 को उम्रकैद तथा 1598 अपराधियों को 10 वर्ष से अधिक का कारावास की सजा सुनाई गयी है। 10 वर्ष से कम सजायाफ्ता अपराधियों की संख्या 18831 है। के बाद पहली बार बाहुबलियों पर शिकंजा कसा गया। हत्या के जुर्म में पूर्णिया के राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, सीवान के सांसद मो.शहाबुद्दीन, जिलाधिकारी जी.कृष्णैय्या हत्याकांड में पूर्व सांसद आनंद मोहन व उनकी पत्नी लवली आनंद, पूर्व विधायक अरुण कुमार व अखलाक अहमद, पूर्व विधायक राजन तिवारी तथा जदयू विधायक मुन्ना शुक्ला को फांसी व अन्य सजाएं सुनाई गयीं, वहीं दोहरे हत्याकांड के आरोपी लोजपा सांसद सूरजभान, डा. रमेश चन्द्रा अपहरण कांड में जदयू से निलंबित विधायक सुनील पांडेय, पूर्व मंत्री आदित्य सिंह, सपा विधायक रामदेव यादव समेत दर्जनभर नेताओं को निचली अदालत में सजा मुकर्रर हुई हैं।
हत्या के जुर्म में दाउदनगर अनुमंडल कारा में बंद गोह के जदयू विधायक प्रो.रणविजय कुमार, अतरी के पूर्व विधायक राजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री सुरेंद्र प्रसाद यादव, बनियापुर के जदयू विधायक धूमल सिंह, लोजपा विधायक रामा सिंह, डेहरी के विधायक प्रदीप जोशी, भाजपा विधायक नित्यानंद राय, राजद विधायक बब्लू देव समेत विभिन्न दलों के दो दर्जन विधायकों पर कानून की तलवार लटक रही है। {H$Z हाल के दिनों में जिस तरीके से जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह को दोहरे हत्याकांड से उबारने के लिए नियमों को ताक पर रखा गया उससे सरकार के इरादों पर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगे हैं। कहा जाता है कि इस हत्याकांड की सुनवाई के दौरान जब में प्रभुनाथ ने अपने बाहुबल का इस्तेमाल किया तो इस मामले को भागलपुर की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार भी लगाई। मामले की सुनवाई भागलपुर में शुरू हुई लेकिन वहां भी सरकारी हस्तक्षेप के मामले उजागर हुए। अंत में पटना सिविल कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई जहां से वे बाइज्जत बरी हो गये। हालांकि उक्त सांसद के एक अन्य मामले की सुनवाई पटना सिविल कोर्ट में चल रही है। पर इस बात की चर्चा है कि क्या इस बार भी गवाहों को सरकारी हथकंडों का इस्तेमाल कर प्रभावित किया जाएगा? इस बाबत पूर्व विधि मंत्री व राजद नेता शकील अहमद खान कहते हैंे कि सरकार राजनीतिक द्वेष से काम कर रही है। प्रभुनाथ सिंह प्रकरण में सारे नियमों को ताक पर रखा गया है और अनुभवहीन (10 वर्ष से कम अनुभव) एपीपी से बहस करवायी गयी। गवाहों को भी डराया-धमकाया गया। जबकि विपक्षी दलों के नेताओं को फटाफट सजा करवा दी जा रही है। शकील अहमद के आरोप कितने सच हैं इसका जवाब तो अपराध अनुसंधान में लगे पुलिस अधिकारी ही दे सकते हैं।ंकि यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें प्रभुनाथ सिंह बाइज्जत बरी हुए हैं। पुलिस सूत्रों की मानें तो इनका राजनीतिक सफर ही हत्या जैसे संगीन आरोपों से शुरू हुआ है। 1977 में जब वे पहली बार विधायक बने थे उस समय भी वे मशरख के कांग्रेसी विधायक रामदेव सिंह की हत्या के आरोपी थी। तब से लेकर अबतक इन पर तीन दर्जन से अधिक हत्या, लूट एवं अन्य अपराधों के आरोप लगे। फिर भी राजनीतिक पहुंच की बदौलत प्रभुनाथ बराबर कानूनी शिकंजे से बचते रहे।
टाल क्षेत्र के कुख्यात जदयू विधायक अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार के आपराधिक किस्से चर्चित रहे हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार अकेले मोकामा में ही उनपर हत्या, लूट व बलात्कार के दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं। तीन साल में पटना के कोतवाली थाने में ही पत्रकार को जान से मारने, जमीन हड़पने व रंगदारी के चार मामले दर्ज हुए हैं। बावजूद इसके अनंत singh पर हाथ डालने में पुलिस के पसीने छूट रहे हैं। इस बाबत राज्य पुलिस प्रवक्ता-सह-सहायक पुलिस महानिदेशक अनिल सिन्हा बताते हैं कि कानून अपना काम कर रहा है। समय आने पर अनंत सिंह भी कानून के शिकंजे में होंगे।
सूबे के देहाती इलाकों की कौन कहे, राजधानी पटना भी पूरी तरह से अपराधमुक्त नहीं हो पाया है। तीसरी वर्षगांठ के जश्न में डूबी सरकार को अपराधियों ने कड़ी चुनौती देते हुए 19 नवंबर को सुल्तानगंज थाने से महज 50 गज की दूरी पर दिनदहाड़े कांग्रेसी नेता यदुनंदन यादव को गोलियों से भून दिया। वहीं लुटेरों ने एनएमसीएच के पास पुलिस की मौजूदगी में ही एक दवा दुकान में जमकर लूटपाट की। इसके तीन दिन पहले राजधानी में ही बाटा शू कंपनी के कार्यकारी प्रबंधक को गोलियों से भून दिया गया।
स्पीडी ट्रायल के आंकड़ों के खेल में मशगूल नीतीश सरकार के तीन वर्ष के शासनकाल में ही करीब 2103 डकैतियां हुईं। 8474 निर्दोष नागरिक गोलियों के शिकार हुए। जिला मुख्यालयों समेत अन्य जगहों पर दिनदहाड़े लूट की 5034 व चोरी की 35693 घटनाएं हुईं। स्कूली छात्रों समेत 6487 लोग अपहृत हुए। सामंती जुर्म के लिए सदा से कुख्यात बिहार में नीतीश शासनकाल के दौरान 3005 मासूमों एवं अबलाओं की अस्मत लूटी गई। लूट व छिनतई की 3552 व बैंक लूट व डकैती की 66 घटनाएं हुईं। आजादी के बाद बैंक लूट की अबतक की सबसे बड़ी घटना राजधानी के कंकड़बाग इलाके में हुई जहां घोड़े पर सवार लुटेरों ने 50 लाख रुपये लूट लिये। राजेन्द्र नगर व पटना जंक्शन के बीच चलती ट्रेन में दिनदहाड़े पूर्व डीआईजी की हत्या गोली मारकर कर दी गयी। बोरिंग रोड में सेवानिवृत आइएएस को गोलियों से भून दिया गया। पाटलिपुत्रा इलाके में प्रो. पापिया घोष हत्याकांड की गूंज देशभर में सुनी गयी। प्रदेश में तीन दर्जन से अधिक मानवाधिकार उल्लंघन के मामले भी प्रकाश में आए। phir भी अपराधों का यह आंकड़ा लालू-राबड़ी शासनकाल से काफी कम है
पाक साफ कोई नही ना लालू ना नीतिश
डीजीपी डीपी ओझा बताते हैं कि हमाम में सारे राजनीतिक दल नंगे हैं। इनका दावा है कि बिना राजनीतिक संरक्षण के अपराध हो ही नहीं सकते। पेश है बिहार की कानून-व्यवस्था पर संवाददाता श्याम सुन्दर के साथ हुई बातचीत के अंश
क्या सूबे में अपराधियों का मनोबल टूटा है?
हां, यह सही है कि प्रदेश में भयमुक्त समाज निर्माण की दिशा में सरकार के प्रयास दिखने शुरू हो गये हैं। फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं आए हैं। अपराधियों पर अंकुश लगाने में पुलिस बहुत हद तक सफल हुई है।
क्या पुलिस सत्ता के दबाव में भी काम करती है?
जब तक प्रशासनिक व पुलिस संगठन स्वायत्त नहीं होंगे तबतक राजनेताओं का हस्तक्षेप जारी रहेगा। जब मैं डीजीपी था, उस समय भी मैंने कहा था कि हमाम में सारे दल नंगे हैं। आज भी इस वाक्य पर मैं कायम हूं। अगर पुलिस का दबाव नहीं होता तो ऊं चे रसूख वाले सारे अपराधी, चाहे वे विधायक अथवा सांसद ही क्यों नहीं हों, नहीं बचते।
क्या सूबे में अभी भी सत्ता संरक्षित अपराधियों का बोलबाला है?
सीधे तौर पर तो नहीं कहा जा सकता। फिर भी पाक साफ न तो लालू प्रसाद हैं और न ही नीतीश कुमार व रामविलास पासवान। एक ओर जहां लालू को मो. शहाबुद्दीन जैसे बाहुबली सांसद की जरूरत है तो वहीं नीतीश कुमार को प्रभुनाथ सिंह एवं मोकामा विधायक अनंत सिंह की वहीं रामविलास पासवान को भी सूरजभान व मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबली नेताओं की दरकार है। राष्ट्रवाद का राग अलापने वाली भाजपा भी कम नहीं है। उसे भी नित्यानंद राय सरीखे लोग चाहिए। इन लोगों के रहते भयमुक्त समाज की कल्पना बेमानी है।
इसके जनता की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है?
जब राजनीति में अपराधियों का वर्चस्व बढ़ता है तब जनता असहाय हो जाती है। ऐसी स्थिति में जनता व सूबे की बेहतरी युवा ही सोच सकते हैं। युवाओं में अंगड़ाई शुरू हो गयी है। दो पीढ़ी आते-आते युवाओं की यही अंगड़ाई तूफान बनकर आएगी। नौजवान जागेगा, तो बदलाव अपने-आप आ जाएगा।
कैसा बदलाव आएगा?
यह एक बड़ा सवाल है। बदलाव वोट से आएगा या बंदूक से, फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह तय है कि तीन साल पहले नेपाली माओवादी नेता प्रचंड ने पशुपतिनाथ से तिरुपतिनाथ का जो नारा दिया था, उसका असर देश में भी दिखने लगा है।

Tuesday, November 11, 2008

...कहां गया हेलीकॉप्टर

रेड कोरिडोर बनाने का सपना देख रहे नक्सलियों ने पूरी तरह से छत्त्ाीसगढ़ को अपने कब्जे में ले रखा है। प्रदेश के बड़े इलाके में सुरक्षाकर्मी जाने से कतराते हैं। तभी तो बस्तर के आकाश से डेढ़ महीने पहले गायब हुआ रैन एयर (रैन बैक्सी गु्रप से संबद्ध) हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ने में सुरक्षा बल पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहा है। उसमें पायलट, सहायक पायलट, एक-एक इंजीनियर व तकनीिश्ायन सवार थे।
छत्त्ाीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ अबतक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ रखा है। इसमें सीआरपीएफ, सीएएफ, एसटीएफ के साथ ही एसपीओ को मिलाकर 12,600 जवान लगाये गये हैं। उसकी टोह में राज्य सरकार ने किराये पर पांच हेलीकॉप्टर ले रखा है। पुलिस व वायु सेना के जवान हेलीकॉप्टरों से अबतक 150 किलोमीटर की उड़ानें भर चुके हैं। इस अभियान में चार एयर बस भी लगाये गये हैं। 30 थाना क्षेत्रों में रेड अलर्ट घोषित किया गया है। फिर भी अबतक नतीजा सिफर ही रहा है। इस बाबत पुलिस प्रमुख विश्व रंजन का कहना है कि बारिश व खराब माैसम की वजह से विजिविलिटी (नजर आने वाली दूरी) 20 फीट से अधिक नहीं है। इसी वजह से हेलीकॉप्टर ढूंढ़ने में सफलता नहीं मिल पा रही है।
हैदराबाद से जगदलपुर आ रहा रैन एयर हेलीकॉप्टर बेल-430 तीन अगस्त को 4.30 बजे उड़ान भरा था। बताया जाता है कि 16 नाटिकल माइल्स (60 किलोमीटर) उड़ान भरने के बाद उसका वायुयान मार्ग नियंत्रण (एटीसी) से संपर्क भंग हो गया। इसे जगदलपुर से इंर्धन लेकर छत्त्ाीसगढ़ के गृहमंत्री रामविचार नेताम को लेने अंबिकापुर जाना था।
इस अभियान में लगे सुरक्षाकर्मियों को आशंका है कि हेलीकॉप्टर आंध्रप्रदेश-छत्त्ाीसगढ़ की सीमा पर या इससे लगे बस्तर के जंगलों में नक्सलियों के पास पहुंच गया है। शायद इसीलिए तलाशी की जद्दोजहद उसी इलाके में चल रही है। यह इलाका जंगलों-पहाड़ों से घिरा है आैर संयोग से नक्सलियों की गिरफ्त में है। हालांकि रिमोट सेंसिंग उपकरण ने संभावित जिन दो स्थलों को चिह्नित किया है उनमें से एक पर नक्सलियों के स्मारक मिले हैं जबकि दूसरी जगह पर ट्रैक्टर व पुलिस की जेसीबी। पुलिस महानिदेशक का कहना है कि हेलीकॉप्टर उड़ान भ्ारने के समय से ही नार्मल फ्लाइट पाथ यानी खम्मम, भद्राचलम आैर कोंटा होकर उड़ा ही नहीं। पायलट ने जंगलों, पहाड़ों वाला सीधा रास्ता अपनाया। उधर, मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है आैर हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ने में दुनिया की सबसे उच्च्ास्तरीय तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया है।
18,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में छेड़े गये अभियान की सफलता सिर्फ इतनी ही है कि यह क्षेत्र सिकुड़कर 8,000 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इस दाैरान नक्सलियों के साथ सुरक्षाकर्मियों का छह-सात बार मुठभेड़ हो चुकी है। दर्जनभर पुलिसकर्मियों ने शहादत भी दी है। 5 सितंबर को सुबह करीब 10.30 बजे छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में नक्सलियों के साथ पुलिस की मुठभेड़ हुई जिसमें तीन सीआरपीएफ व दो जिला पुलिस के जवान शहीद हो गये। इसका नेतृत्व बलरामपुर एसपी स्वयं कर रहे थे। पुलिस को इस बात की जानकारी मिली थी कि झारखंड सीमा से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर सामरी इलाके में नक्सलियों का कैंप चल रहा है उसमें करीब सौ नक्सली मौजूद हैं।
दूसरी ओर, गायब हुआ हेलीकॉप्टर नक्सलियों के कब्जे में ही है, ऐसा दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता। फिर भी हेलीकॉप्टर समेत गायब पायलट व अन्य चार लोगों को ढूंढ़ने की विनती उनके परिजनों ने नक्सलियों से की है। हेलीकॉप्टर में पायलट बीपी सिंह, सहायक पायलट कैप्टन आरके गाैर, इंजीनियर संतोष सिंह व तकनीिश्ायन अिश्वनी कुमार सवार थे।
उनके परिजनों ने नक्सलियों से मार्मिक अपील करते हुए निवेदन किया है कि उन लोगों से चार परिवारों का रोजी-रोटी जुड़ा हुआ है। इसलिए इंसानियत का ख्याल रखते हुए इस असमंजस की िस्थति से उबारने का प्रयास किया जाय। परिजनों का कहना है कि पुलिस दुर्गम जंगली इलाकोंं में नक्सलियों के डर से जाने से कतरा रही है।
नक्सलियों के खिलाफ अबतक का सबसे बड़ा अभियान
क्षेत्रफल-18,000 वर्ग किलोमीटर
जवान-12,600
कुल उड़ानें-100 घंटे
इस्तेमाल हेलीकॉप्टर-पांच (एयर फोर्स समेत)
इस्तेमाल एयर बस-चार
थाने अलर्ट-30

पहले बाढ़, अब सुखाड़/प्रकृति की दोहरी मार

एक ओर बाढ़ तो दूसरी ओर सुखाड़। बिहार के लोग कोसी की विभीषिका से अभी जूझ ही रहे थे कि राज्य का अधिकांश इलाका सूखे की चपेट में आ गया। लाखों हेक्टेयर में लगी धान की फसल सूख रही है। खरीफ फसल भी बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। सूबे में यह स्थिति सितंबर महीने में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश होने की वजह से उत्पन्न हुई है।
प्रदेश में 15 वृहद व 78 मध्यम नहर सिंचाई योजनाएं हैं। इनमें औरंगाबाद में 12, भागलपुर में 31, डेहरी में 4 व पटना जिले में 30 मध्यम योजनाएं हैं। अगर इन योजनाओं को ही सुचारू तरीके से चलाया जाए तो बहुत हद तक प्रदेश को सूखे से बचाया जा सकता था लेकिन इनका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। मौसम की बेरुखी सेे पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। हालांकि नीतीश सरकार के अस्तित्व में आते ही सूबे की तकदीर बदलने के लिए एक सार्थक प्रयास की शुरुआत की गयी थी लेकिन कोसी इलाके की बाढ़ व शेष इलाके में सुखाड़ ने सरकार के सारे प्रयासों को विफल कर दिया है। सूखे के कहर से प्रदेश के अधिकांश किसान त्राहिमाम कर रहे हैं।
बात चाहे सोन उच्चस्तरीय नहर के किनारे बसे औरंगाबाद जिले के ओबरा, दाउदनगर, अरवल व पटना के देहाती इलाके की हो या फिर उत्तरी कोयल सिंचाई परियोजना से सिंचित होने वाले औरंगाबाद, रफीगंज, नबीनगर, मदनपुर, बारूण (2 पंचायत), गुरूआ, गुरारू व टिकारी की। हर जगह पानी के लिए हाहाकर मचा हुआ है। "चावल का कटोरा' कहा जाने वाले कैमूर, भभुआ, भोजपुर व बक्सर के इलाके भी इससे अछूते नहीं रहे। धान की लहलहाती फसलें अंतिम पटवन के अभाव में मर रही हैं। कमोबेश यही स्थिति उत्तरी बिहार की गंडक परियोजना से लाभांवित होने वाले पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी व समस्तीपुर जिलों की भी है।
हालात ऐसे हैं कि जहानाबाद जिले के कुर्था,करपी, कांको, मखदुमपुर, कैमूर जिले के अधौरा, अरवल जिले के बैदराबाद, कलेर के निचले इलाके, जहानाबाद से सटे औरंगाबाद जिले के देवकुंड के साथ ही गोह के दक्षिणी इलाके, हमीदनगर पुनपुन बराज परियोजना के आसपास बसे गांव के साथ ही बक्सर जिले के चौसा इलाके के दर्जनों गांवों में पानी के लिए हिंसक झपड़ें तक हो चुकी हैं। किसानों के गुस्से का शिकार सासाराम में दो दिवसीय दौरे पर आईं केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार को होना पड़ा। आलमगंज की सभा में किसानों ने करमचट सिंचाई परियोजना को लेकर जमकर हंगामा किया।
गोह प्रखंड की झिकटिया पंचायत के पूर्व मुखिया नंदलाल सिंह बताते हैं कि अंतिम पटवन नहीं होने की वजह से धान की लहलहाती फसल मारी गयी। उन्होंने बताया कि गोह व रफीगंज इलाके में उत्तरी कोयल व टिकारी माइनर के आसपास के दर्जनों गांवों में भीषण सुखाड़ हो गया है। अगर दशहरा तक बारिश नहीं हुई तो इस इलाके में रबी फसल की भी बुवाई नहीं हो सकेगी, क्योंकि खेतों में दरारें पड़ गयी हैं। बारिश नहीं होने की वजह से धान के उत्पादन में कितना अंतर आएगा, इस संबंध में जब हमने कृषि निदेशक बी. राजेन्द्र सेजानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी स्पष्ट कहने से इंकार कर दिया।
पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह का कहना है कि शुरू में अच्छी बारिश हुई जिससे धान की अच्छी उपज होने की उम्मीद थी लेकिन सितंबर के शुरू से ही बारिश ने धोखा दे दिया। वहीं दोषपूर्ण जल बंटवारे की वजह से सोन नहर से सिंचित होने वाले इलाकोें में भी सिर्फ एक पटवन के लिए धान की फसल मारी गयी।
नीतीश सरकार जुलाई महीने में ही कर रही थी कि अतिवृष्टि की वजह से राजधानी पटना डूबा है। अगर उन दिनों वाकई सरकार का यह बयान सही था तो फिर सितंबर आते ही आखिर कैसे अधिकांश सिंचाई योजनाओं में पानी की किल्लत हो गयी? किसानों का कहना है कि अगस्त के अंतिम दिनों से ही तीखी धूप होने की वजह से खेतों में पानी की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। सितंबर के अंत तक इसने भयावह रूप ले लिया। राज्य सिंचाई कोषांग के निदेशक दिनेश कुमार चौधरी ने बताया कि अंतिम पटवन के अभाव में धान की फसलों को मरने नहीं दिया जाएगा। पानी के लिए मचे हाहाकार को देखते हुए ही सरकार उत्तर प्रदेश की रिहन्द सागर व मध्य प्रदेश की बांध सागर परियोजनाओं से प्रतिदिन 14275 क्यूसेक पानी खरीद रही है। यही पानी पश्चिमी सोन नहर में 9798 क्यूसेक व पूर्वी सोन नहर में 4477 क्यूसेक प्रतिदिन छोड़ा जा रहा है। जबकि गंडक परियोजना के मुख्य कैनाल में प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक व पूर्वी कैनाल में 5700 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। इससे उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में सिंचाई हो रही है।
सरकार के यह दावे अगर सही हैं तो फिर आखिर किन परिस्थितियों में सरकार ने सूबे के सभी हिस्सों के किसानों को अनुदान पर डीजल देने का ऐलान किया है। प्रधान सचिव विजय शंकर का कहना है कि 20 सितंबर को ही पानी के लिए मचे हाहाकार के मद्देनजर सरकार ने 63 करोड़, 16 लाख, 50 हजार रुपये जारी किये हैं। हालांकि जमीनी सच्चाई यह है कि घोषणा के 15 दिनों के बाद भी अबतक जिलाधिकारी को कोई आदेश नहीं मिले हैं। सवाल यह है कि इस अनुदान का लाभ किसानों को कब मिलेगा? नाम नहीं छापने की शर्त पर एक जिलाधिकारी ने बताया कि घोषणाएं पटना में हुई हैं। घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में महीनों लग सकते हैं।
प्रदेश में लघु सिंचाई योजनाएं भी कागजों पर ही दिखती हैं। अकेले बक्सर जिले में ही लगभग 120 पंपिंग सेट हैं लेकिन उनमें से अधिकांश बंद पड़े हैं। 15 पंपिंग सेट ठीक हालत में हैं भी तो खपत के अनुसार बिजली की आपूर्ति नहीं होने की वजह से ये पंप क्षमता के अनुसार पानी नहीं दे पा रहे हैं। स्थानीय बसपा विधायक हृदय नारायण सिंह बताते हैं कि पिछली राजद सरकार ने इलाके में सिंचाई की समस्या को दूर करने के लिए गंगा-चौसा पंप लाइन का निर्माण करवाया था लेकिन तीखी धूप के बावजूद सरकार जिले में औसत बिजली की आपूर्ति 32 के बजाय 15 मेगावाट कर रही है। इस वजह से सौ क्यूसेक पानी की क्षमता वाली यह परियोजना भी किसानों का साथ नहीं दे रही है। अधौरा प्रखंड में कर्मनाशा नदी पर बना पंप हाउस भी जंग खा रहा है। इससे लाभान्वित होेने वाले हजारों एकड़ जमीन में लगी फसल जल रही है। इधर 30 सितंबर को हुई बारिश से किसानों के चेहरे खिले दिख रहे हैं।
स्थिति की नजाकत इसी से समझी जा सकती है कि पानी बंटवारे को लेकर सूबे में पहली बार दो राज्यों के बीच विवाद खड़ा हो गया। औरंगाबाद के भाजपा विधायक रामाधार सिंह ने प्रदेश की 26 हजार हेक्टेयर जमीन में लगी धान की फसल को बचाने के लिए झारखंड प्रदेश के कुटकू बांध के समीप उत्तरी कोयल के मुख्य द्वार को ही काट दिया। इस संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में हुए समझौते के अनुसार बिहार को 2500 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए था लेकिन समझौते का उल्लंघन करते हुए झारखंड सरकार मात्र 1700 क्यूसेक पानी छोड़ रही थी जबकि उत्तरी कोयल को बिहार के एक लाख हेक्टेयर में सिंचाई करनी है।
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पानी से बिजली पर छिड़ी जंग
सूखे की चपेट में आए किसानों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए पक्ष-विपक्ष के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। पानी की किल्लत का ठीकरा विपक्षी नेताओं ने बिजली विभाग पर फोड़ना शुरू कर दिया है। राजद नेता व पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि अतिवृष्टि के बावजूद सितंबर महीने में ही सारे नदी-नाले सूख गये। जिन इलाकांें के किसान पंपिंग सेट से खेतों में सिंचाई करते थे वहां बिजली नहीं देकर सरकार दूसरे राज्यों को बेच रही है। उनका कहना है कि वैसे तो अधिकांश बिहार पहले से ही अंधेरे में डूबा हुआ है लेकिन जहां बिजली है वहां भी सरकार देने में सक्षम नहीं है। केंद्रीय पुल की बिजली में से 300 मेगावाट प्रतिदिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत अन्य दूसरे राज्यों को बेची जा रही है। दूसरी ओर, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह का कहना है कि केन्द्र सरकार बिहार के कोटे के अनुसार भी बिजली नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि औसतन बिजली का आवंटन सूबे में करीब 1400 मेगावाट है जबकि यहां मिल रही है मात्र एक हजार मेगावाट। पक्ष-विपक्ष के आरोप के बीच सच्चाई चाहे जो भी हो इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सूबे के अधिकांश इलाकों में औसतन बिजली प्रतिदिन पांच से छह घंटे ही मिल रही है।
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वृहद सिंचाई योजनाएं लाभांवित जिले
सोन उच्चस्तरीय नहर------भोजपुर, रोहतास, पटना, जहानाबाद, गया, औरंगाबाद
बदुआ जलाशय योजना----भागलपुर, मुंगेर
चंदन जलाशय योजना---भागलपुर
मोरहर सिंचाई योजना---गया
किउल जलाशय योजना---मुंगेर
कोसी योजना----पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, किशनगंज, सुपौल, अररिया
कुहिरा बांध-----कैमूर
मुसाखांड सिंचाई योजना---कैमूर
गंडक योजना-पूर्वी व पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर
लिलाजन सिंचाई योजना---गया
सकरी सिंचाई योजना---गया, नवादा
उदेरास्थान सिंचाई योजना---जहानाबाद, गया, नवादा
अपर मोरहर सिंचाई योजना--गया, नवादा
कमला, बलान, त्रिशुला सिंचाई योजना---मधुबनी

क्यों जल रहा है बिहार?

नालंदा के जगदीश प्रसाद का परिवार स्तब्ध, माैन आइर शोकसंतप्त है। ये वही जगदीश हैं, जिनकी इकलाैती संतान पवन उर्फ दीपू (24) को बेवजह आैर असमय नफरत की राजनीति की बलि वेदी पर चढ़ा दिया गया। जगदीश आैर उनके ही जैसे लाखों परिवारों को पता नहीं कि पेट की आग बुझाने के लिए दूसरे राज्यों की खाक छानने को कब गुनाह का दर्जा दिया गया। लेकिन, महाराष्ट्र में भड़की आग की लपट जिस तरह बिहार पहुंची, उसने यह बता दिया कि सिसायतदानों के मन में क्या है। पवन जैसे मासूमों की लाश की चाबी ही सत्त्ाा के द्वार खोलती है। हाल के वर्षों में सबसे सफल प्रयोग भाजपा की राम लहर थी, जिसने अन्य दलों को भी नकारात्मक राजनीति की दिशा दिखाई।
महाराष्ट्र से लेकर बिहार आैर यूपी तक राजनेताओं को इस उबलते मुद्दे के बीच इंतजार रहेगा, तो बस आम चुनाव का। इस पूरे प्रकरण की जिस तरह राजनीतिक साैदेबाज़ी होती दिखी, उसने यह संकेत दे दिया है कि बिहार आैर महाराष्ट्र में होनेवाले आम चुनाव में बाहरी-भीतरी का मुद्दा काफी अहम भूमिका अदा करेगा।
बिहार में राजद के लिए अभी एक चुनाैती यह है कि वह सत्त्ाा में नहीं। उसे चुनाव सिर्फ मुद्दों के आधार पर लड़ना है। चूंकि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजग सरकार है, इसलिए वह राज ठाकरे का ठीकरा राजग के बहाने नीतीश पर फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यद्यपि, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद सीधे ताैर पर अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना नहीं साध रहे, लेकिन उनकी पार्टी के श्याम रजक सरीखे नेता वार का एक भी माैका चूक नहीं रहे।
यही वजह है कि जब राज की गिरफ्तारी हुई, तो श्याम रजक ने कहा-"ऐसे लोगों के खिलाफ मारपीट का नहीं बल्कि देशद्राेह का भी मुकदमा चलना चाहिए।' वहीं दूसरी ओर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने भी कांग्रेस पर निशाना साधने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया। पार्टी प्रवक्ता विजय कुमार चौधरी ने कहा-" राज को गिरफ्तार करने में महाराष्ट्र सरकार ने देरी कर दी वरना बिहार के युवकों की पिटाई नहीं होती।'
नेतृत्वविहीन छात्रों का उग्र प्रदर्शन आगामी लोकसभा चुनाव में कुछ नया गुल खिलाएगा, यह अभी कहना मुिश्कल है। लेकिन जिस तरह पहली बार छात्रों की गोलबंदी हुई है, उससे 1974 के आंदोलन की उपज रेल मंत्री लालू प्रसाद से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत अन्य नेताओं के सामने एक चुनाैती खड़ी हो गयी है।
राज्य प्रशासन छात्रों के उग्र तेवर भांप चुका था, लेकिन इसे राजनीतिक मजबूरी ही कहेंगे, जिसके चलते हिंसा का जवाब कठोरता से नहीं दिया गया। यह उसी तरह का मामला है, जैसा राज ठाकरे के साथ आज तक महाराष्ट्र में होता आया है। फरवरी 2008 में राज ठाकरे के भड़काऊ भाषणों से वैमनस्यता फैली थी, जिसके शिकार बिहार आैर यूपी के कई मासूम हुए थे। उस समय भी महाराष्ट्र सरकार की थू-थू हुई थी, लेकिन मराठी जनमानस की उपेक्षा से जो राजनीतिक नुकसान हो सकता है, उसकी शायद विलासराव देशमुख को अच्छी तरह से समझ है। यही वजह रही होगी कि उनकी सरकार ने उस समय राज पर इतना हल्का मुकदमा ठोंका कि उन्हें जेल से बाहर आने में सिर्फ दो घंटे आैर 15 हजार के मुचलके ज़ाया करने पड़े। अगस्त 2008 में भी एमएनएस कार्यकर्ताओं ने मराठी में दुकानों के नाम लिखने की हिदायत दी आैर तय समय से पहले ही व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर हमले बोल दिये। लाखों की संपित्त्ा का नुकसान हुआ। इस मामले में राज्य सरकार ने सिर्फ एक मामूली किस्म की जांच का आदेश दे दिया। जब व्यापारी हाइकोर्ट गये, तो वहां से सरकार को कड़े कदम उठाने के निर्देश मिले, पर अचरज की बात यह है कि कुछ ही दिनों के बाद कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार ने एक शपथपत्र दायर कर यह बताया कि मनसे नेताओं का कोई कुसूर नहीं है। कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ। गिरफ्तारी आैर रिहाई के नाटक के बीच, जो कुछ हुआ उसे देश भर के करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा। आम आदमी के मन में एक आम धारणा यह ज़रूर बनी कि सत्य जितना जिखता है, उतना स्पष्ट नहीं होता। वैसे बिहार में भी उग्र आंदोलन के ज़रिए, जिस प्रकार एक-दूसरे पर निशाना साधा जा रहा है, वह समस्या के समाधान से ़़ज्यादा सियासी फायदा झपटने की तरकीब नज़र आ रहा है।
दूसरी ओर मुद्दे के चुनाव तक जिंदा रहने के भी कई प्रमाण मिल रहे हैं। मसलन, 23 अक्टूबर को हुई छात्रों की आपात बैठक में महाराष्ट्र के सारे उत्पादों के बहिष्कार का निर्णय लिया गया। छात्रों ने सभी दलों के नेताओं को कड़ी चेतावनी दी कि अगर इस बार नेता चुप रहते हैं तो वे आगामी लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे। छात्रों ने जिस तरह से रेलवे को क्षति पहुंंचायी है उसे देख राजद प्रमुख व रेल मंत्री लालू प्रसाद खासे दबाव में दिख रहे हैं। उन्होंने भी दबी जबान ही सही, पर इस प्रतिहिंसा का सारा दोष राज्य सरकार पर मढ़ दिया है। लेकिन प्रदेश के राजग नेता इसे आक्रोश की अभिव्यिक्त मान रहे हैं। क्योंकि इसके पहले भी चार बार हिन्दी भाषियों के नाम पर बिहारी छात्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के शिकार बने हैं। लाख टके का सवाल यह है कि आखिर हिन्दीभाषी के नाम पर बिहारियों को ही निशाना क्यों बनाया जाता है? आैर, अगर यूपी भी हिंदीभाषी प्रदेश है, तो वहां के नेता इस बर्बरता पर माैन क्यों रहे। जाहिर सी बात है, मायावती आैर मुलायम की महत्वाकांक्षा अब यूपी से बाहर निकल कर केंद्र तक पहुंच गयी है। ऐसी िस्थति में किसी एक प्रदेश की राजनीति के लिए मुद्दों को हथियाने की तीर गलत निशाने पर भी लग सकती है। यही वजह है कि आज बिहार अपने जख़्म खुद सी रहा है। कब तक सीना पड़ेगा, यह अनििश्र्चत है।

Monday, October 6, 2008

इन्हें पहचानिए!

अगर आपसे कोई पूछे कि देश में पहले "कसाई (मुसलमान) फिर ईसाई'... का नारा किसने दिया तो इसका जवाब होगा देश में सक्रिय हिन्दूवादी संगठनों ने। फिर आपसे कोई पूछे कि "कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे' का नारा किसने दिया तब भी कहेंगे-हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे कि शांतिदूत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या किसने की तो जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। उड़ीसा में वर्ष 1992 में ईसाई ग्राहम स्टेन्स व उनके बच्चों की हत्या किसने की तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। गांधी के गुजरात को साम्प्रदायिकता की आग में किसने झोंका-तब भी जवाब होगा-राज्य प्रायोजित हिन्दूवादी संगठनों ने। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में विवादित ढांचा बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि को विध्वंस किसने किया, तब भी जवाब होगा-अतिवादी हिन्दूत्ववादी संगठनों ने। फिर अगर कोई पूछे कि उड़ीसा के कंधमाल में 23 अगस्त को हिन्दूवादी नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या किसने की तो जवाब होगा-पता नहीं, लेकिन इस हत्या की जिम्मेवारी भाकपा (माओवादी) से जुड़े नक्सलियों ने ली है। फिर भी इसकी सही जानकारी पुलिसिया अनुसंधान के बाद ही पता चल सकेगा। तो फिर अगर आपसे कोई पूछे कि लक्ष्मणानंद को शहीद कौन कह रहा है तो जवाब होगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल सरीखे हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे के स्वामी की हत्या के बाद उड़ीसा, कर्नाटक, केरल समेत देश के अन्य भागों में साम्प्रदायिकता का ताना-बाना कौन बुन रहा है? आखिर किसके उकसावे पर एकतरफा ईसाईयों का कत्लेआम शुरू है। शायद तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। तो फिर सवाल उठता है कि इन मुट्ठीभर हिन्दूवादी संगठनों की आड़ में आखिर कबतक हिन्दुस्तान बदनाम होता रहेगा? कबतक मानवता तार-तार होती रहेगी? हिन्दुस्तानियों के खून के प्यासे आखिर कबतक अपने ही भाई-बहनों का कत्लेआम कर अपनी प्यास बुझाते रहेंगे? इस अंतहीन सिलसिला का अंत आखिर कब होगा? इसका जवाब कहां और किसके पास है? इस मुल्क में आखिर कबतक कभी मुसलमानों का तो कभी ईसाईयों का कत्लेआम होते रहेगा? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आखिर कबतक धर्मांतरण का झूठा स्वांग रचा जाता रहेगा? सत्ता के सौदागरों के हाथों तबतक देश कलंकित होते रहेगा?
उड़ीसा, कर्नाटक, झारखंड समेत देश के अन्य हिस्सों में धर्मांतरित दलित हिन्दुओं, आदिवासियों का दुनाह तो सिर्फ यही है न, कि वे अपने स्वाभिमान के लिए धर्मांतरण का सहारा लिया। इसका फायदा भी समाज में दिखा। लाखों वर्षों से "मनु स्मृति' की चक्की में पीसते आ रहे दलितों व आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार हुआ। प्रगतिशील व सभ्य समाज की अवधारणा अगर इस देश में कहीं से आई है तो वह ब्रिटेन की देन है और इसके लिए अंग्रेजों को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। सचमुच उन्होंने ही सामंती दासता के जकड़न में फंसे भारतीयों को जीने की कला सीखाई।
इतिहास गवाह है। इसी देश में हिन्दू सम्राट चक्रवर्ती अशोक जब कंधमाल के आसपास के इलाकों में बेइन्तहां कत्लेआम बरपाने के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया था तब तो हिन्दूओं को कोई खतरा ही नहीं हुआ। एक हजार वर्षों तक मुसलमानों की हुकूमत से हिन्दूओं को कोई खास खतरा नहीं हुआ। डचों, फ्रांसीसियों व अंग्रेजों से भारतीयों को कोई खतरा नहीं हुआ तो फिर आज के जमाने में किससे हिन्दुस्तानियों को खतरा महसूस हो रहा है। आखिर समाज के पिछड़े, दलित इलाके के लोगों ने अपने स्वाभिमान व सुख-सुविधा के लिए धर्म-परिवर्तन कर ही लिया तो हिन्दुओं पर कौन सा पहाड़ टूट गया? दरिंदों को समझना चाहिए कि आज धर्म के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में बहाये जा रहे खून भी हिन्दुस्तानियों का ही है। आखिर धर्म व जाति के नाम पर नफरत कौन फैला रहा है? आखिर दलितोंे को क्या, कभी किसी मनुवादियों से स्वाभिमान से जीने देना पसन्द किया? शायद नहीं। खुले समाज में आखिर कौन महिलाओं को बच्चा पैदा करने वाली मशीन समझता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आखिर कौन लगाम लगाना चाहता है? गाय को माता मानने वाले लोग क्यों भूल रहे हैं कि देश की केन्द्रीय राजधानी दिल्ली समेत अन्य शहरों में हजारों विदेशी नस्ल की गायें आवारा कुत्तों की तरह रोज सड़कों पर घूमती रहती हैं। जिस देश में हर महीने में देवियों की पूजा होती हैं उसी देश में आए दिन क्यों मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं घटती हैं? आश्चर्य तो यह कि बजरंग के संस्थापक व सांसद विनय कटियार पर वर्ष 1992 में ही एक हिन्दू कन्या के साथ बलात्कार का आरोप लग चुका है। फिर भी यह संगठन हिन्दुओं का ठेकेदार बना हुआ है। याद रहे कि दुष्कर्मियों का न कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। उनके शिकार हिन्दू कन्याएं भी होती हैं और अन्य दूसरे समुदाय की कन्याएं भीं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में जितने भी दुष्कर्म की घटनाएं हुई हैं उनमें से अधिकांश घटनाओं को लंपट हिन्दू लड़कों ने अंजाम दिया है और शिकार भी हिन्दू कन्याओं को ही होना पड़ा है। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर समाज की इन कुरीतियों की ओर बजरंग दल का ध्यान क्यों नहीं जाता?
वेलेंटाइन डे के नाम पर प्यार का इजहार करने वाली जोड़ियों पर बजरंग दल क्यों कहर बरपाता है? इस मौके की ताक में मुस्लिम व ईसाई ही नहीं, देश की लाखों-करोड़ों हिन्दू युवतियां रहती हैं। इस मौके पर मुंबई, दिल्ली से लेकर अन्य शहरों में प्यार कर इजहार कर रहने वाली हिन्दू किशोरियों को भी बजरंग दल ने नहीं छोड़ा? हिन्दूवादी संगठन आखिर कौन सी भारतीय संस्कृति की बात करती है? क्या इसके कार्यकर्ता भूल रहे हैं कि सूर्य पुत्र कर्ण का जन्म कुंवारी कन्या कुन्ती ने दी थी। जगत जननी सीता ने अपना ब्याह स्वयंवर में रचाया था। अपने को क्षत्रीय कहलाने वाले राम व लक्ष्मण ने रावण की बहन सूर्पनखा का नाक इसलिए काट लिया था कि वह अपनी जवानी का इजहार उनके सामने कर रही थी। यही हिन्दू संस्कृति है जिसने भरी सभा में अपने ही परिवार की एक सदस्या द्रोपदी का चीरहरण कर तब सभ्य समाज को शर्मसार कर दिया था। क्या यह बात किसी से छुपी हुई है कि इन्द्र के दरबार में अप्सराओंं से आंख लड़ाने की इजाजत सिर्फ और सिर्फ इन्द्र को ही थी। क्या प्यार भी बंदूक के बल से हो सकता है? उपद्रवी हिन्दुओं! अभी भी समय है। चेतो। इतिहास से सीख लो। नहीं तो सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था। उस समय अशोक के धुआंधार धर्म प्रचार की वजह से बौद्ध धर्म का परचम पूरे दुनिया में लहराया था। आज तुम्हारे ही कुकर्मों का परिणाम है कि यहां के आदिवासी व दलित धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। बंदूक की भाषा न तो कभी सभ्य समाज समझा है और न ही आगे भी समझने वाला है। इसलिए संभालो अपने-आप को। बचाओ, भारत की अस्मिता और नये सिरे से गढ़ो भारत की तकदीर। बनाओ स्वामी विवेकानंद का भारत, जिसमें न कहीं ऊ ंच-नीच का भेदभाव रहे और न ही छुआछूत की भावना समाज में रहे। न ही कोई शोषक हो और न हो कोई शासक।
कम नहीं है बजरंग दल
बजरंग दल एक बार फिर अपनी स्थापना के 25वें वर्षगांठ पर यह संगठन चर्चा में है। बजरंग दल ने देश में हालात ऐसे उत्पन्न कर दिये हैं कि देश की धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक बार फिर इस पर प्रतिबंध की मांग करने लगी हैं। बताते चलें कि इसके पहले भी इस संगठन पर दो बार प्रतिबंध लग चुके हैं। बजरंग दल के पूर्व संयोजक और भाजपा के सांसद विनय कटियार बताते हैं कि बजरंग दल की स्थापना विहिप के युवा दल के रूप में की गई थी लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि आप पर 13 वर्षीय एक लड़की के साथ दुुष्कर्म का आरोप भी लगा है। क्या वह लड़की गैर-हिन्दू थी? या फिर गैर-हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार जायज है
बजरंग दल नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं, ""उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पिछले 40 वर्षों से वहां के वनवासियों के बीच काम कर रहे थे। उनकी हत्या के कारण वनवासियों में रोष उत्पन्न हुआ और फिर जो कुछ हुआ, वह उस रोष की प्रतिक्रिया थी। भारत सरकार और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल इसे हमारे सिर मढ़ने का प्रयास कर रहें हैं। मेरा यह मानना है कि कर्नाटक और उड़ीसा की घटनाओं में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद कहीं शामिल नहीं है।'' दूसरी ओर ईसाई नेता फ़ादर डोमेनिक इमैनुअल का आरोप है-""देश में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे बजरंग दल का हाथ है।'' बजरंग दल के संयोजक चाहे हिंसा के आरोपों को ख़ारिज करें लेकिन अपने संगठन की हिन्दू राष्ट्र स्थापना की मंशा को ज़रूर स्वीकार करते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहेगा। फिर भी, इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि इसी वर्ष अगस्त में कानपुर में बम बनाते हुए दो लोग मारे गए थे। पुलिस का कहना है कि इनका संबंध बजरंग दल से है। वर्ष 2006 में नांदेड में बम बनाते बजरंग दल के दो तथाकथित सदस्य मारे गए थे। बजरंग दल के अमानवीय हरकत व हिंसक तेवर पर आरएसएस के सदस्य रह चुके और अब संगठन पर पैनी निगाह रखने वाले डीएल गोयल कहते हैं-"अकेले बजरंग दल ही क्यों? अन्य कई हिन्दूवादी संगठन भी हैं जो संविधान को नहीं मानते और इन पर अंकुश लगाना जरूरी है।' उनका यह भी कहना है कि विश्व हिन्दू परिषद ने आज तक जो कुछ भी किया वह भारतीय संविधान के हिसाब से गलत है। उन्होंने बजरंग दल प्रमुख के एक बयान का हवाला देते हुए कहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र बनाना है। लेकिन सवाल उठता है कि देश तो हिन्दू राष्ट्र नहीं है। तो इसका मतलब है कि माओवादियों की तरह से वह भी एक अलग संविधान बनान चाहते हैं। इसलिए ही ये संगठन भारतीय संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं।'' मुंबई के सामाजिक कार्यकर्ता जावेद आनंद कहते हैं-"नांदेड में बम बना रहे कार्यकर्ता बजरंग दल के ही थे। इसके पक्के सबूत महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के पास मौजूद है। उनका कहना है कि 5-6 अप्रैल, 2006 में नांदेड में एक सेवानिवृत अभियंता के घर में बम विस्फोट हुआ, उस समय वहां छह लोग उपस्थित थे। इसके बाद पुलिस ने अनुसंधान रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले रिपोर्ट जारी किये। पुलिस का कहना है कि वर्ष 2003-04 में परभणी, जालना और पूर्णा की मस्जिदों में हुए धमाकों में बजरंग दल से जुड़े दर्जनों कार्यकर्ता शामिल थे। इन लोगों ने पूना में बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था। मात्र एक घटना से ही स्पष्ट है कि ये लोग बम बनाने व उसे फोड़ने में लगे हुए हैं। सूत्रों का कहना है कि लोकतांत्रिक देश में उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि अगर एक कार्यकर्ता दूसरे समुदाय के चार सौ से कम लोगों को मारा तो वह "हिजरा' कहा जाएगा। तो भी सवाल उठता है कि सिमी व बजरंग दल में क्या अंतर है? और अगर वाकई सरकार धर्म निरपेक्ष है तो सिमी समेत अन्य कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के साथ ही बजरंग दल समेत दूसरे चरम कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाने जाने की जरूरत है। इधर, राजद नेता व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव कहते हैं-"जबतक ठोकर नहीं लगती आदमी बढ़ता जाता है, कहीं कोई स्पीड ब्रेकर नहीं है। सरकार के पास इन लोगों की सूची है। इन्हें जेल में बंद कर दीजिए।'
हालांकि सिमी के साथ बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात पर इसके नेता भड़क उठते हैं। दल के नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं कि सिमी से जुड़े लोग कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का झंडा फहराते हैं। इसके लोग बम बलास्ट करते हैं। इस संगठन पर आइएसआइ व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से संबंध का आरोप है वहीं जावेद आनंद कहते हैं कि अगर अनलॉफ़ुल एक्टीविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट 1967 के प्रावधानों के अनुसार सिमी पर प्रतिबंध लगता है तो बजरंग दल पर इससे दस गुना ज्यादा प्रतिबंध लगना चाहिए।
प्रकाश शर्मा बताते हैं-"हम भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे। भारत के हिन्दू राष्ट्र बनने पर ही देश सुखी होगा। हिन्दू अपमानित महसूस कर रहा है। हिन्दू मारा जा रहा है और उसके बाद हिन्दुओं को ही कटघरे में खड़ा भी किया जा रहा है।'

इन्हें पहचानिए!

अगर आपसे कोई पूछे कि देश में पहले "कसाई (मुसलमान) फिर ईसाई'... का नारा किसने दिया तो इसका जवाब होगा देश में सक्रिय हिन्दूवादी संगठनों ने। फिर आपसे कोई पूछे कि "कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे' का नारा किसने दिया तब भी कहेंगे-हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे कि शांतिदूत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या किसने की तो जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। उड़ीसा में वर्ष 1992 में ईसाई ग्राहम स्टेन्स व उनके बच्चों की हत्या किसने की तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। गांधी के गुजरात को साम्प्रदायिकता की आग में किसने झोंका-तब भी जवाब होगा-राज्य प्रायोजित हिन्दूवादी संगठनों ने। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में विवादित ढांचा बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि को विध्वंस किसने किया, तब भी जवाब होगा-अतिवादी हिन्दूत्ववादी संगठनों ने। फिर अगर कोई पूछे कि उड़ीसा के कंधमाल में 23 अगस्त को हिन्दूवादी नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या किसने की तो जवाब होगा-पता नहीं, लेकिन इस हत्या की जिम्मेवारी भाकपा (माओवादी) से जुड़े नक्सलियों ने ली है। फिर भी इसकी सही जानकारी पुलिसिया अनुसंधान के बाद ही पता चल सकेगा। तो फिर अगर आपसे कोई पूछे कि लक्ष्मणानंद को शहीद कौन कह रहा है तो जवाब होगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल सरीखे हिन्दूवादी संगठनों ने। अगर कोई पूछे के स्वामी की हत्या के बाद उड़ीसा, कर्नाटक, केरल समेत देश के अन्य भागों में साम्प्रदायिकता का ताना-बाना कौन बुन रहा है? आखिर किसके उकसावे पर एकतरफा ईसाईयों का कत्लेआम शुरू है। शायद तब भी जवाब होगा-हिन्दूवादी संगठनों ने। तो फिर सवाल उठता है कि इन मुट्ठीभर हिन्दूवादी संगठनों की आड़ में आखिर कबतक हिन्दुस्तान बदनाम होता रहेगा? कबतक मानवता तार-तार होती रहेगी? हिन्दुस्तानियों के खून के प्यासे आखिर कबतक अपने ही भाई-बहनों का कत्लेआम कर अपनी प्यास बुझाते रहेंगे? इस अंतहीन सिलसिला का अंत आखिर कब होगा? इसका जवाब कहां और किसके पास है? इस मुल्क में आखिर कबतक कभी मुसलमानों का तो कभी ईसाईयों का कत्लेआम होते रहेगा? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आखिर कबतक धर्मांतरण का झूठा स्वांग रचा जाता रहेगा? सत्ता के सौदागरों के हाथों तबतक देश कलंकित होते रहेगा?
उड़ीसा, कर्नाटक, झारखंड समेत देश के अन्य हिस्सों में धर्मांतरित दलित हिन्दुओं, आदिवासियों का दुनाह तो सिर्फ यही है न, कि वे अपने स्वाभिमान के लिए धर्मांतरण का सहारा लिया। इसका फायदा भी समाज में दिखा। लाखों वर्षों से "मनु स्मृति' की चक्की में पीसते आ रहे दलितों व आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार हुआ। प्रगतिशील व सभ्य समाज की अवधारणा अगर इस देश में कहीं से आई है तो वह ब्रिटेन की देन है और इसके लिए अंग्रेजों को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। सचमुच उन्होंने ही सामंती दासता के जकड़न में फंसे भारतीयों को जीने की कला सीखाई।
इतिहास गवाह है। इसी देश में हिन्दू सम्राट चक्रवर्ती अशोक जब कंधमाल के आसपास के इलाकों में बेइन्तहां कत्लेआम बरपाने के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया था तब तो हिन्दूओं को कोई खतरा ही नहीं हुआ। एक हजार वर्षों तक मुसलमानों की हुकूमत से हिन्दूओं को कोई खास खतरा नहीं हुआ। डचों, फ्रांसीसियों व अंग्रेजों से भारतीयों को कोई खतरा नहीं हुआ तो फिर आज के जमाने में किससे हिन्दुस्तानियों को खतरा महसूस हो रहा है। आखिर समाज के पिछड़े, दलित इलाके के लोगों ने अपने स्वाभिमान व सुख-सुविधा के लिए धर्म-परिवर्तन कर ही लिया तो हिन्दुओं पर कौन सा पहाड़ टूट गया? दरिंदों को समझना चाहिए कि आज धर्म के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में बहाये जा रहे खून भी हिन्दुस्तानियों का ही है। आखिर धर्म व जाति के नाम पर नफरत कौन फैला रहा है? आखिर दलितोंे को क्या, कभी किसी मनुवादियों से स्वाभिमान से जीने देना पसन्द किया? शायद नहीं। खुले समाज में आखिर कौन महिलाओं को बच्चा पैदा करने वाली मशीन समझता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आखिर कौन लगाम लगाना चाहता है? गाय को माता मानने वाले लोग क्यों भूल रहे हैं कि देश की केन्द्रीय राजधानी दिल्ली समेत अन्य शहरों में हजारों विदेशी नस्ल की गायें आवारा कुत्तों की तरह रोज सड़कों पर घूमती रहती हैं। जिस देश में हर महीने में देवियों की पूजा होती हैं उसी देश में आए दिन क्यों मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं घटती हैं? आश्चर्य तो यह कि बजरंग के संस्थापक व सांसद विनय कटियार पर वर्ष 1992 में ही एक हिन्दू कन्या के साथ बलात्कार का आरोप लग चुका है। फिर भी यह संगठन हिन्दुओं का ठेकेदार बना हुआ है। याद रहे कि दुष्कर्मियों का न कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। उनके शिकार हिन्दू कन्याएं भी होती हैं और अन्य दूसरे समुदाय की कन्याएं भीं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में जितने भी दुष्कर्म की घटनाएं हुई हैं उनमें से अधिकांश घटनाओं को लंपट हिन्दू लड़कों ने अंजाम दिया है और शिकार भी हिन्दू कन्याओं को ही होना पड़ा है। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर समाज की इन कुरीतियों की ओर बजरंग दल का ध्यान क्यों नहीं जाता?
वेलेंटाइन डे के नाम पर प्यार का इजहार करने वाली जोड़ियों पर बजरंग दल क्यों कहर बरपाता है? इस मौके की ताक में मुस्लिम व ईसाई ही नहीं, देश की लाखों-करोड़ों हिन्दू युवतियां रहती हैं। इस मौके पर मुंबई, दिल्ली से लेकर अन्य शहरों में प्यार कर इजहार कर रहने वाली हिन्दू किशोरियों को भी बजरंग दल ने नहीं छोड़ा? हिन्दूवादी संगठन आखिर कौन सी भारतीय संस्कृति की बात करती है? क्या इसके कार्यकर्ता भूल रहे हैं कि सूर्य पुत्र कर्ण का जन्म कुंवारी कन्या कुन्ती ने दी थी। जगत जननी सीता ने अपना ब्याह स्वयंवर में रचाया था। अपने को क्षत्रीय कहलाने वाले राम व लक्ष्मण ने रावण की बहन सूर्पनखा का नाक इसलिए काट लिया था कि वह अपनी जवानी का इजहार उनके सामने कर रही थी। यही हिन्दू संस्कृति है जिसने भरी सभा में अपने ही परिवार की एक सदस्या द्रोपदी का चीरहरण कर तब सभ्य समाज को शर्मसार कर दिया था। क्या यह बात किसी से छुपी हुई है कि इन्द्र के दरबार में अप्सराओंं से आंख लड़ाने की इजाजत सिर्फ और सिर्फ इन्द्र को ही थी। क्या प्यार भी बंदूक के बल से हो सकता है? उपद्रवी हिन्दुओं! अभी भी समय है। चेतो। इतिहास से सीख लो। नहीं तो सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था। उस समय अशोक के धुआंधार धर्म प्रचार की वजह से बौद्ध धर्म का परचम पूरे दुनिया में लहराया था। आज तुम्हारे ही कुकर्मों का परिणाम है कि यहां के आदिवासी व दलित धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। बंदूक की भाषा न तो कभी सभ्य समाज समझा है और न ही आगे भी समझने वाला है। इसलिए संभालो अपने-आप को। बचाओ, भारत की अस्मिता और नये सिरे से गढ़ो भारत की तकदीर। बनाओ स्वामी विवेकानंद का भारत, जिसमें न कहीं ऊ ंच-नीच का भेदभाव रहे और न ही छुआछूत की भावना समाज में रहे। न ही कोई शोषक हो और न हो कोई शासक।
कम नहीं है बजरंग दल
बजरंग दल एक बार फिर अपनी स्थापना के 25वें वर्षगांठ पर यह संगठन चर्चा में है। बजरंग दल ने देश में हालात ऐसे उत्पन्न कर दिये हैं कि देश की धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक बार फिर इस पर प्रतिबंध की मांग करने लगी हैं। बताते चलें कि इसके पहले भी इस संगठन पर दो बार प्रतिबंध लग चुके हैं। बजरंग दल के पूर्व संयोजक और भाजपा के सांसद विनय कटियार बताते हैं कि बजरंग दल की स्थापना विहिप के युवा दल के रूप में की गई थी लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि आप पर 13 वर्षीय एक लड़की के साथ दुुष्कर्म का आरोप भी लगा है। क्या वह लड़की गैर-हिन्दू थी? या फिर गैर-हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार जायज है। ़
बजरंग दल नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं, ""उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पिछले 40 वर्षों से वहां के वनवासियों के बीच काम कर रहे थे। उनकी हत्या के कारण वनवासियों में रोष उत्पन्न हुआ और फिर जो कुछ हुआ, वह उस रोष की प्रतिक्रिया थी। भारत सरकार और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल इसे हमारे सिर मढ़ने का प्रयास कर रहें हैं। मेरा यह मानना है कि कर्नाटक और उड़ीसा की घटनाओं में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद कहीं शामिल नहीं है।'' दूसरी ओर ईसाई नेता फ़ादर डोमेनिक इमैनुअल का आरोप है-""देश में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे बजरंग दल का हाथ है।'' बजरंग दल के संयोजक चाहे हिंसा के आरोपों को ख़ारिज करें लेकिन अपने संगठन की हिन्दू राष्ट्र स्थापना की मंशा को ज़रूर स्वीकार करते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहेगा। फिर भी, इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि इसी वर्ष अगस्त में कानपुर में बम बनाते हुए दो लोग मारे गए थे। पुलिस का कहना है कि इनका संबंध बजरंग दल से है। वर्ष 2006 में नांदेड में बम बनाते बजरंग दल के दो तथाकथित सदस्य मारे गए थे। बजरंग दल के अमानवीय हरकत व हिंसक तेवर पर आरएसएस के सदस्य रह चुके और अब संगठन पर पैनी निगाह रखने वाले डीएल गोयल कहते हैं-"अकेले बजरंग दल ही क्यों? अन्य कई हिन्दूवादी संगठन भी हैं जो संविधान को नहीं मानते और इन पर अंकुश लगाना जरूरी है।' उनका यह भी कहना है कि विश्व हिन्दू परिषद ने आज तक जो कुछ भी किया वह भारतीय संविधान के हिसाब से गलत है। उन्होंने बजरंग दल प्रमुख के एक बयान का हवाला देते हुए कहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र बनाना है। लेकिन सवाल उठता है कि देश तो हिन्दू राष्ट्र नहीं है। तो इसका मतलब है कि माओवादियों की तरह से वह भी एक अलग संविधान बनान चाहते हैं। इसलिए ही ये संगठन भारतीय संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं।'' मुंबई के सामाजिक कार्यकर्ता जावेद आनंद कहते हैं-"नांदेड में बम बना रहे कार्यकर्ता बजरंग दल के ही थे। इसके पक्के सबूत महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के पास मौजूद है। उनका कहना है कि 5-6 अप्रैल, 2006 में नांदेड में एक सेवानिवृत अभियंता के घर में बम विस्फोट हुआ, उस समय वहां छह लोग उपस्थित थे। इसके बाद पुलिस ने अनुसंधान रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले रिपोर्ट जारी किये। पुलिस का कहना है कि वर्ष 2003-04 में परभणी, जालना और पूर्णा की मस्जिदों में हुए धमाकों में बजरंग दल से जुड़े दर्जनों कार्यकर्ता शामिल थे। इन लोगों ने पूना में बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था। मात्र एक घटना से ही स्पष्ट है कि ये लोग बम बनाने व उसे फोड़ने में लगे हुए हैं। सूत्रों का कहना है कि लोकतांत्रिक देश में उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि अगर एक कार्यकर्ता दूसरे समुदाय के चार सौ से कम लोगों को मारा तो वह "हिजरा' कहा जाएगा। तो भी सवाल उठता है कि सिमी व बजरंग दल में क्या अंतर है? और अगर वाकई सरकार धर्म निरपेक्ष है तो सिमी समेत अन्य कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के साथ ही बजरंग दल समेत दूसरे चरम कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाने जाने की जरूरत है। इधर, राजद नेता व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव कहते हैं-"जबतक ठोकर नहीं लगती आदमी बढ़ता जाता है, कहीं कोई स्पीड ब्रेकर नहीं है। सरकार के पास इन लोगों की सूची है। इन्हें जेल में बंद कर दीजिए।'
हालांकि सिमी के साथ बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात पर इसके नेता भड़क उठते हैं। दल के नेता प्रकाश शर्मा कहते हैं कि सिमी से जुड़े लोग कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का झंडा फहराते हैं। इसके लोग बम बलास्ट करते हैं। इस संगठन पर आइएसआइ व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से संबंध का आरोप है वहीं जावेद आनंद कहते हैं कि अगर अनलॉफ़ुल एक्टीविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट 1967 के प्रावधानों के अनुसार सिमी पर प्रतिबंध लगता है तो बजरंग दल पर इससे दस गुना ज्यादा प्रतिबंध लगना चाहिए।
प्रकाश शर्मा बताते हैं-"हम भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे। भारत के हिन्दू राष्ट्र बनने पर ही देश सुखी होगा। हिन्दू अपमानित महसूस कर रहा है। हिन्दू मारा जा रहा है और उसके बाद हिन्दुओं को ही कटघरे में खड़ा भी किया जा रहा है।'

Monday, September 29, 2008

सशंकित उद्यमी : पूंजी निवेश की धीमी रफ्तार
भूषण स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ हुई बदसलूकी ने राज्य के औद्योगिक विकास की संभावनाओं पर नये सिरे से सवाल खड़े कर दिये हैं। अब उद्योगपति सरकारी मंशा को भांपने में लगे हैं।
पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशिया के रासायनिक कंपनी सलीम गु्रप के खिलाफ महासंग्राम, इसी राज्य में टाटा के लिए गहरी समस्या बन चुका सिंगूूूूूूूूूूूूूूूूर, उड़ीसा में पोस्को के खिलाफ अवाम का प्रदर्शन और अब झारखंड में एक स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी...। अगली पंक्ति में कौन होगा फिलहाल कहना मुश्किल है। अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे राज्यों में आधारभूत संरचनाएं झारखंड के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं। झारखंड गठन के बाद से राज्य औद्योगिक विकास के लिए सिर्फ तैयारियों में ही जुटा है। इस स्थिति में औद्योगिक समूह के कर्मचारियों के साथ पुलिस और प्रशासन की उपस्थिति में दुर्व्यहार इसके रास्ते में रोड़े अटका रही है। बीते दिनों जमशेदुपर के पोटका प्रखंड के ग्रामीणों ने पुलिस-प्रशासन की मौजूदगी में भूषण स्टील कंपनी के लिए काम कर रहे द सर्वेयर एंड एलायड इंजीनियरिंग कंपनी के कर्मचारियों के साथ जिस तरह का सलूक किया उससे सरकार की मंशा साफ हो जाती है।
देसी-विदेशी कंपनियों के लिए देश में कोई प्रोजेक्ट शुरू करना एवरेस्ट की चढ़ाई के समान है। हर जगह मुद्दा जमीन अधिग्रहण का है। कई कंपनियां ने तो अपनी परियोजनाओं से हाथ भी खींच लिया है। आखिर इसके लिए जिम्मेवार कौन है? और गलतियां किससे हो रही हैं...। कंपनियों से या फिर अदूरदर्शी सरकारों से? या फिर उद्योग स्थापना के नाम पर सिर्फ सस्ते दर पर जमीन लेने की एक नई प्रथा चल पड़ी है, जिसमें लोग उद्योग लगाते तो नहीं अलबत्ता इसी बहाने पानी के भाव जमीन हासिल कर लेते हैं।
रांची से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पोटका प्रखंड। इसी प्रखंड के सरमंदा व रोलाडीह गांव में भूषण स्टील कंपनी के लिए काम करने गये द सर्वेयर एंड एलायड इंजीनियरिंग कंपनी के तीन कर्मचारियों, युसूफ अहमद, सहदेव सिंह व शीतल कुमार भारद्वाज को पहले ग्रामीणों ने बंधक बनाया। उसके बाद स्थानीय झामुमो विधायक अमूल्य सरदार के समर्थकों ने उन्हें जूते का हार पहनाकर करीब चार किलोमीटर तक तपती धूप मेंं घुमाया। नंगे पाव दहशत में घूम रहे कर्मचारियों के पैरों में छाले पड़ गये। वहीं एक-दूसरे के गालों पर थप्पड़ भी मारे गये। फिर कभी इस इलाके में नहीं आने की कसम खिलवायी। तब जाकर सर्वेयरों की जान बख्शी गयी।
इधर, घटना के विरोध में निवेशक बौखला गये। राजधानी रांची में विरोध प्रदर्शन का दौर शुरू हुआ। मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। तब जाकर मामला शांत हुआ। हालांकि अभी भी निवेशकों में भय व्याप्त है। घटना के विरोध में भूषण स्टील कंपनी समेत अन्य नये उद्यमियों ने फिलहाल काम ठप कर दिया है।
यह पहला मौका नहीं है जब उद्योगपतियों को इस तरह की बेइज्जती का सामना करना पड़ा हो। इसके पहले भी सूबे की ओर आकर्षित होने वाले निवेशकों को सरकार की ओर से परेशानियां उठानी पड़ी हैं। यही कारण है कि खनिज संपदाओं से भरपूर होने के बावजूद सूबे में अबतक बड़े निवेशकों में से एक कोहिनूर स्टील कंपनी (चांडिल) को ही धरातल पर उतारने में सरकार कामयाब हो पाई है। हालांकि गत वर्ष इस कंपनी के कर्मचारियों को भी केंदरा के समीप पीटा गया था।
भूषण स्टील कंपनी व सरकार के बीच वर्ष 2006 में ही एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुआ था। दोनों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि कंपनी के लिए 70 फीसदी जमीन का इंतजाम सरकार करेगी। अन्य जमीन कंपनी स्वयं ही किसानों से खरीदेगी। इसी जमीन अधिग्रहण के सिलसिले में सर्वेक्षकों की टीम वहां गयी थी। कंपनी का इरादा सूबे में 10,500 करोड़ रुपये निवेश करने की है। इनमें तीन स्टील प्लांट व एक मेगा पावर प्लांट होंगे। कंपनी को अपने स्टील प्लांट के लिए 3,400 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करना है। लेकिन अब तक मात्र सौ एकड़ जमीन का ही अधिग्रहण हो पाया है। कंपनी ने वर्ष 2010 तक उत्पादन का लक्ष्य भी रखा है। ऐसी स्थिति में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या कंपनी अपने निर्धारित समय से अपना लक्ष्य पूरा कर पाएगी? उद्योग मंत्री सुधीर महतो बताते हैं कि प्रदेश में उद्यमियों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी। उनका कहना है कि भूषण कंपनी के सर्वेक्षकों को पहले स्थानीय प्रशासन को सूचना देनी चाहिए थी। तब मौके पर जाना चाहिए था। लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि दो थानों की पुलिस व प्रशासन की मौजूदगी में ही सारी वारदातें क्यों हुई? वह कहते हैं कि यह सारा नाटक सरकार को बदनाम करने की साजिश है। हालांकि इस मामले में सौ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है लेकिन अबतक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इस बाबत पूछने पर स्थानीय विधायक का कहना है कि भूषण कंपनी के कर्मचारियों के साथ सिर्फ धक्का-मुक्की हुई है।
लाख टके का सवाल यह है कि आखिर खनिज संपदाओं से भरपूर होने के बावजूद सूबे की ओर उद्यमी क्यों नहीं आकर्षित हो रहे हैं? जबकि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ही पिछली मधु कोड़ा सरकार ने नयी पुनर्वास नीति की घोषणा भी की थी। जिसमें एक बात पर जोर दिया गया था कि निवेशक सीधे किसानों के पास जाकर जमीन का मोल-भाव करेंगे और उन्हें उचित मुआवजा देंगे। नीति के अनुसार रोजगार में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं कंपनियां ही स्थानीय गांवों के विकास की चिंता भी करेंगी। किसान भी स्वेच्छा से ही जमीन देंगेे। लेकिन हाल के दिनों में भूषण स्टील कंपनी व उसके दो दिनों केे बाद ही जूपीटर स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ जो सलूक किया गया, उससे साफ हो जाता है कि सरकार की नीति व नीयत में कितनी खोट है। भूषण कंपनी के निदेशक एचसी वर्मा बताते हैं कि कंपनी के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी राजनीतिक संरक्षण में हुआ है। यह वही कंपनी है जिसका स्टील प्लांट चंडीगढ़, डेराबस्ती, कोलकाता व उड़ीसा में स्थापित हो चुके हैं।
एक समय ऐसा भी था जब दुनिया के उद्योगपति संयुक्त बिहार के दक्षिणी हिस्से यानी आज के झारखंड में निवेश करने को लालायित रहते थे। आजादी के पहले से ही दुनिया भर के कोयला, लोहा, बाक्साइड, अबरख, लाह समेत अन्य उद्योगों से जुड़े हुए निवेशकों ने यहां पूंजी लगायी लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि पुराने निवेशक भी यहां से कहीं दूसरी जगह स्थानांतरित होना चाहते हैं।
फिलहाल उद्यमी सरकार के मूड भांपने में लगे हैं। सूबे में 50 परियोजनाएं सरकार की नीतियों का इंतजार कर रही हैं। कोई 93 उद्यमी सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर करने के बावजूद आनन-फानन में पूंजी फंसाने की फिराक में नहीं हैं। इनमें टाटा, अर्सेलर-मित्तल, जेएसडब्ल्यू, जिंदल, एस्सार स्टील कंपनी आदि हैं।
वैसे तो सरकार का दावा है कि प्रदेश के निर्माण के साथ ही निवेशकों की लंबी लाइन लग चुकी है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चांडिल स्थित कोहिनूर स्टील कंपनी ने ही सहमति-पत्र के अनुसार 300 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश किया है। इनका सहमति-पत्र पर समझौता 35,000 करोड़ रुपये का हुआ है। अन्य निवेशकों का काम सिर्फ कागजों पर ही चल रहा है। वहीं समझौते के अनुसार सरकार विभिन्न परियोजनाओं के लिए 109225.7 एकड़ देने का समझौता कर चुकी है। अब सवाल यह है कि सरकार किसानों की इस जमीन को उद्योगपतियों के लिए कैसे मुहैया कराएगी?
प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर इस प्रदेश में कोई स्पष्ट औद्योगिक नीति नहीं बनी है। वर्तमान औद्योगिक नीति की समय-सीमा वर्ष 2005 में ही खत्म हो चुकी है। नयी नीति कैसी होगी और कब लागू होगी? फिलहाल सरकार का ध्यान इस ओर नहीं दिख रहा है। नयी पुनर्वास व राहत नीति को अगर छोड़ दिया जाए तो निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की अन्य कोई नीतियां नहीं दिख रही हैं। दूसरी बड़ी समस्या कानून-व्यवस्था की है। सूबे में नक्सलियों का आतंक जिस कदर बढ़ रहा है उससे निवेशकों में भय व्याप्त है। इसके लिए जरूरत है भयमुक्त समाज निर्माण की। लेकिन सरकार दिनों-दिन नक्सलियों के साथ ही भू-माफियाओं व बिचौलियों से घिरती जा रही है।
झारखंड चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष मनोज नरेडी बताते हैं कि प्रदेश के अधिकांश इलाके नक्सलियों की चपेट में हैं। उनके डर से प्रशासन भी सहमी रहती है फिर बाहर से आने वाले निवेशकों की क्या बिसात कि वे नक्सलियों से टक्कर लेकर अपना उद्योग लगाएं? कानून-व्यवस्था की बाबत पूछे जाने पर उन्होंने दावे के साथ कहा कि कुछ जनप्रतिनिधि नक्सलियों के सहयोग से ही विधानसभा पहुंचते हैं। यही कारण है कि सरकार नक्सलियों के सफाये के लिए कोई कारगार नीति नहीं बना पा रही है।
नया राज्य बनते ही सूबे में भू-माफियाओं की सक्रियता भी उद्यमियों के मनोबल को तोड़ रही है। हालात ऐसे हो गये हैं कि बिना बिचौलियों के निवेशक जमीन का अधिग्रहण कर ही नहीं सकते। बिचौलियों के सहयोग से अगर भूषण कंपनी के सर्वेक्षक वहां जाते तो शायद यह घटना नहीं घटती।
बिजली की किल्लत भी देसी-विदेशी उद्योगपतियों को आकर्षित करने में व्यवधान पैदा कर रही है। फिलहाल प्रदेश की बिजली की जरूरत का अधिकांश हिस्सा सेंट्रल पुल से खरीदा जा रहा है। वैसे झारखंड अपने कोटे की पूरी बिजली भी लेने की स्थिति में नहीं है। राज्य के तीन बिजली उत्पादन संयंत्रों से औसतन चार सौ मेगावाट बिजली ही तैयार होती है। जबकि यहां 3600 मेगावाट बिजली क्षमता की जरूरत है। कई अन्य कंपनियां भी प्रदेश में पूंजी लगाना चाहती हैं। समझौते के अनुसार अगर वे सभी यहां निवेश करने लगे तो उस स्थिति में सूबे में करीब 5000 मेगावाट बिजली की जरूरत होगी। इसके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं दिख रही है। कहने के लिए सूबे में तेनुघाट व पतरातु पनबिजली परियोजनाएं काम कर रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि वहां क्षमता से काफी कम बिजली का उत्पादन हो रहा है। सरकार की इच्छाशक्ति सूबे का विकास करने की है तो सरकार को ऊ र्जा संयंत्रों के निर्माण पर जोर देना चाहिए। सिर्फ जिंदल कंपनी ही 15-20 पावर प्लांट लगाने की मंशा जाहिर कर चुकी है। अब यह सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि यहां जिंदल की पावर प्लांट योजना कैसे सफल होगा।
यही नहीं, प्रदेश की राजनीतिक अस्थिरता भी निवेशकों को हतोत्साहित कर रही है। सूबे में मात्र आठ साल में ही पांच मुख्यमंत्री आए और गये। कोई एक साल के लिए बना तो कोई तीन साल के लिए। किसी के एजेंडे में हिन्दुत्व रहा तो किसी को केंद्र सरकार की कृपा से कुर्सी मिली। कोई नक्सलवाद को असली समस्या मानते रहे। किसी मुख्यमंत्री की इच्छा निवेशकों को आकर्षित करने की रही भी तो उनके सामने कानून-व्यवस्था समेत अन्य नीतियों का अभाव दिखा। वैसे तो शिबू सोरेन इसके पहले भी नौ दिनों (2 मार्च से लेकर 10 मार्च, 2005 तक) के लिए प्रदेश की सत्ता संभाल चुके हैं। इस बार वे प्रदेश के छठें मुख्यमंत्री के रूप में सत्तासीन हुए हैं। झारखंडी अस्मिता के लिए सदा संघर्षशील रहे सोरेने के सत्ता में आते ही भूषण स्टील व जूपीटर स्टील कंपनी के कर्मचारियों के साथ हुई बदसलूकी इस बात का गवाह है कि झारखंडी मिट्टी को समझने वाले शिबू सोरेन भी अन्य मुख्यमंत्रियों से अलग नहीं हैं। हालांकि भूषण कंपनी के अधिकारियों के साथ आयोजित बैठक में उन्होंने इस बात का भरोसा दिलाया है कि आगे से निवेशकों के हितों का भरपूर ध्यान रखा जाएगा। अब आगे देखना है कि मुख्यमंत्री की बातों में कितना दम है।
पुनर्वास नीति की विशेषताएं
जिस परिवार की जमीन किसी परियोजना के लिए अधिगृहीत की जाएगी। उस परिवार के सदस्यों को नौकरी में प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रभावित परिवार के सदस्यों को नौकरी में 10 साल की छूट दी जाएगी।
नौकरी के अलावा कंपनी अपने लाभांश का एक फीसदी हिस्सा प्रभावित ग्रामीणों के बीच बांटेगी, जो अधिग्रहण के हिसाब से तय होगा।
आवासीय क्षेत्र के अधिग्रहण की स्थिति में कंपनी ग्रामीण क्षेत्रों में 10 डिसमिल व शहरी क्षेत्रों में 5 डिसमिल की जमीन पर मकान बनाकर देगी।
विस्थापितों के स्थानांतरण के लिए प्रति परिवार 15 हजार रुपये की व्यवस्था कंपनी करेगी।
कंपनी की ओर से प्रभावित परिवारों के समर्थ लोगों को दक्षता विकास व छात्रवृत्ति की सुविधा दी जाएगी।
कुछ बड़े निवेशकों की सूची
बर्नपुर सीमेंट इंडस्ट्रीज, पतरातू-500 करोड़ रुपये
रांची इंटीग्रेटेड स्टील लिमिटेड, सिल्ली-5,452 करोड़ रुपये
जिंदल साउथ वेल्थ स्टील लिमिटेड-3,5000 करोड़ रुपये
जिंदल स्टील व पावर लिमिटेड, सरायकेला-11,500 करोड़ रुपये
मित्तल स्टील लिमिटेड, रांची-40,000 करोड़ रुपये
वीएस डेम्पो एंड कंपनी लिमिटेड, मोहनपुर-1016 करोड़ रुपये
टाटा स्टील लिमिटेड, सरायकेला-42,000 करोड़ रुपये
कल्याणी स्टील लिमिटेड, रांची-1,883 करोड़ रुपये
भूषण स्टील लिमिटेड, जमशेदपुर-6,510 करोड़ रुपये
एचवाई ग्रेड पेलेट्‌स लिमिटेड, चाईबासा-4,285 करोड़ रुपये
हिंडाल्को इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, लातेहार-7,800
बीएमडब्ल्यू इंडस्ट्रीज लिमिटेड, सरायकेला-591 करोड़ रुपये
रूंगटा माइंस, चाईबासा-517 करोड़ रुपये
अनिन्दिता ट्रेडर्स एंड इंवेस्टमेंट लिमिटेड, हजारीबाग-94 करोड़ रुपये
नरबेहराम गैस प्वाइंट लिमिटेड, सरायकेला-200 करोड़ रुपये
गोल स्पंज लिमिटेड, सरायके ला-67 करोड़ रुपये
कोहिनूर स्टील लिमिटेड, सरायकेला-410 करोड़ रुपये