Tuesday, March 17, 2009

तीखे होंगे छापामार संघर्ष

एमसीसी के संस्थापक सदस्य व बिहार-बंगाल स्पेशल एरिया कमिटी के तीन बार सचिव रह चुके पूर्व विधायक रामाधार सिंह फिलहाल बंदी मुक्ति संघर्ष समिति के बैनर तले माओवादी राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने पब्लिक एजेंडा से देश में चल रहे नक्सली आंदोलन पर अपनी बेबाक टिप्पणी की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश---
आप शिक्षक से नक्सल राजनीति (दरमिया और बघौरा-दलेलचक समेत आधा दर्जन नरसंहारों के आरोपी रहे) में आये। फिर वहां से आपकी दिलचस्पी खत्म हुई और संसदीय रास्ता अपनाते हुए विधानसभा में पहुंचे। आखिर क्या कारण रहा कि मुख्यधारा की राजनीति को तिलांजलि देते हुए पुन: नक्सली गतिविधियों में शामिल हो गये हैं
मैं शिक्षक के साथ-साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी था। देखा कि क्रांति के नाम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जमींदारों के साथ सांठगांठ करने में लगी है। फिर औरंगाबाद के ग्रामीण इलाके में जमींदारों के खिलाफ एमसीसी (अति चरम वामपंथी संगठन) का बगावती नेतृत्व अपनी ओर आकर्षित किया। इससे प्रभावित होकर मैंने भी बंदूक थाम ली। लेकिन एमसीसी की नरसंहार की राजनीति से मन उब गया और फिर संसदीय रास्ता अख्तियार कर लिया। लेकिन विधासभा के अंदर देखा कि किस तरह से गरीबों के पैसे पर नव जमींदार (विधायक और मंत्री) मटरगस्ती कर रहे हैं। उससे एक बार फिर लगा कि अगर गरीबों के लिए लड़ाई लड़नी है तो नक्सल आंदोलन से अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसी ख्याल से पुन: नक्सल आंदोलन को गति देने में लगा हूं।
पिछले चार वर्षों में दर्जनों कुख्यात माओवादी या तो गिरफ्तार कर लिये गये या फिर पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। इसका माओवादी पार्टी पर क्या असर दिख रहा है?
देखिये, फर्जी मुठभेड़ में नक्सलियों के मारे जाने से माओवादियों की ताकत घटने वाली नहीं है। क्योंकि पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने वाले नक्सली अपने जमात में शहीद कहे जाते हैं। रही बात गिरफ्तारी की, तो नक्सलियों ने मुखबिरों के खिलाफ कार्रवाई (मौत के घाट) की शुरुआत कर दी है।
तो इसके क्या मायने निकाले जायें?
माओवाद एक विज्ञान है जिसका सिद्धांत कहता है कि दुश्मन से निपटने के लिए एक कदम आगे बढ़ना चाहिए जबकि दुश्मन की ताकत को भांपते हुए दो कदम पीछे भी हटना चाहिए। इसी सिद्धांत को मानते हुए नक्सलियों ने आन्ध्र के पड़ोसी राज्यों मसलन उड़ीसा, छातीश्गढ़, केरल और तमिलनाडू में अपना फैलाव शुरू कर दिया है ताकि पुलिसिया दमन होने पर जनता को इसका खामियाजा नहीं भुगतना पड़े वहीं दूसरी ओर आधार इलाके से सुरक्षित छापामार लड़ाई को तेज किया जा सके।
आन्ध्र प्रदेश के राज्य सचिव ने हाल ही में किसी केंद्रीय कमिटी के नेता पर मनमानी का आरोप लगाते हुए केरल पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसका पार्टी पर कैसा प्रभाव पड़ेगा?
पार्टी छोड़ने वाले से माओवादी राजनीति पर कोई खास असर तो नहीं पड़ेगा। लेकिन जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय नेतृत्व को चाहिए कि वे माओवादी दर्शन से जनता को शिक्षित करे।
भाकपा (माओवादी) बंदूक के सहारे stta सत्त्ाा पर कब्जा करने बात करता है जबकि दंडकारण्य स्पेशल कमिटी ने छतीश्गढ़ सरकार से shantivarta शांतिवात्त्र्ाा का प्रस्ताव रखा है। क्या माओवादी पार्टी कमजोर हो गयी है इस कारण सरकार से शांतिवात्त्र्ाा की अपील की है या इसके कुछ आैर मायने हैं।
यह नक्सलियों की कमजोरी नहीं है। बिल्क छत्त्ाीसगढ़ में बदले हालात का नतीजा है। वहां पर भाजपा सरकार आदिवासियों से आदिवासियों को लड़वाने की फिराक में है। इसीलिये नक्सलियों ने संघर्ष का अपना तरीका बदलते हुए सरकार से शांतिवात्त्र्ाा की शत्त्र्ा (प्रतिबंध हटाने) रखी है ताकि माओवादी राजनीति को जनसंगठन के माध्यम से जनता के बीच ले जाया जा सके।
बिहार-झारखंड के नक्सल प्रभावित सीमाई इलाकों में अफीम की खेती घड़ल्ले से हो रही है। क्या नक्सली नशाखोर समाज निर्माण में लगे हुए हैं?
यह आरोप सरासर गलत है। रूस आैर चीन में भी कई इलाके नशाखोरों की चपेट में थे जहां आंदोलन चल रहे थे। जिसे लाल फाैज ने कुशलता के साथ बिना एक बूंद खून बहे ही खत्म कर दिया था। यहां भी जरूरत है उस तरह के आंदोलन छेड़ने की। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दलालों की ही संख्या बढेगी। इसकी रोकथाम के लिए पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है। गया आैर चतरा के कई इलाकों में नक्सलियों ने अफीम उगाने वाले किसानों के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है।
फिर भी अफीम उगाने वाले किसानों की संख्या क्यों बढ़ती जा रही है?
जोनल कमांडरों में राजनैतिक चेतना का अभाव है। यही कारण है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में अवैध धंधे फल-फूल रहे हैं। इसकी रोकथाम के लिए पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है।
अचानक नक्सलियों ने जमीन आंदोलन से अपना ध्यान हटा दिया है? क्या माओवादी पार्टी अपने पुराने सिद्धांतों से हट गयी है?
ऐसी कोई बात नहीं है, अपने पुराने सिद्धंातों पर पार्टी आज भी कायम है।
नक्सलियों के नाम पर झारखंड में आधा दर्जन नक्सली समूह तैयार हो गये हैं जो आये दिन आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते फिर रहे हैं। क्या ऐसे गिरोहों की माकपा (माओवादी) से सांठगांठ है।
नहीं, विकृत मानसिकता के क्रांति विरोधी लोग ही नक्सलवाद के आदर्श सिद्धांतों के खिलाफ हैं जिसका खामियाजा भाकपा (माओवादी) को भुगतना पड़ रहा है जबकि सच्चाई यह है कि माओवादियों ने अबतक चार दर्जन से अधिक टीपीसी समेत अन्य आपराधिक गिरोह के सदस्यों मार गिराया है।
भाकपा (माओवादी) की आगे की रणनीति होगी?
माओवादियों की रणनीति किसी से छुपी हुई नहीं है। फिर भी छत्त्ाीसगढ, महाराष्ट्र, उड़ीसा आैर आन्ध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में सक्रिय नक्सली संगठन भाकपा माले (जनशिक्त) से विलय के लिए वार्ता चल रही है। अगर परििस्थति ने साथ दिया तो जल्द ही भाकपा (माओवादी) में जनशिक्त का विलय हो जायेगा। अगर यह संभव हुआ तो देश मंेंं छापामार लड़ाई आैर तीखी होगी।
आसन्न लोकसभा चुनाव में नक्सलियों की कैसी रणनीति होगी?
क्रांति का रास्ता साफ है। अब आर-पार की लड़ाई शुरू हो गयी है जिसमें एक जगह संसदीय रास्ते हैं तो दूसरे रास्ते की लड़ाई माओवादी दिखा रहे हैं। इस बार के चुनाव में पार्टी जनता के बीच जायेगी और नेताओं के ढपोरशंखी घोषणाओं और उनके दागदार चेहरे को बेनकाम करेगी।

माओवादियों का बदला नेता!

"आप मजदूर हैं और आपकी मेहनत के सहारे ही देश आगे बढ़ता है। आपके खून-पसीने को मलाई में बदलकर मालिक-सरकार जमकर मौज उड़ाते हैं और आप अंधेरे में रहते हैं। इसलिये एक वर्ग की सरकार में बगैर हिस्सेदारी के भी रणनीति के तौर पर कैसे लाभ उठाया जाये, इसे समझना होगा। नहीं तो हम सभी मारे जाएंगे।'
नक्सलियों के सबसे बड़े नेता गणपति का यह बयान मुंबई हमले के बाद आया है। एक ओर सरकार देशी-विदेशी आतंकियों से निपटने के लिए फेडरल एजेंसी बनाने की पहल कर रही है वहीं दूसरी ओर गणपति ने यह बयान देकर नक्सली जमातों के साथ ही प्रशासनिक खेमे में भूचाल ला दिया है। बंदूक के सहारे सत्ता हथियाने की वकालत करने वाले गणपति को आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ गयी कि उन्होंने सरकार में हिस्सेदारी के बगैर ही लाभ उठाने की समझौतावादी लाइन को अख्तियार करने की बात कह डाली। गणपति की मानें तो आजादी के बाद देश का बड़ा हिस्सा विकास की रोशनी से कोसों दूर रहा है। इसलिए संसदीय राजनीति के अंतरविरोधों और जनता के आक्रोश को गोलबंद कर ही उसका लाभ उठाया जा सकता है।
इधर नक्सली जमातों से लेकर प्रशासनिक महकमों तक में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल रही है कि नक्सली प्रमुख मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति लंबे समय से बीमार चल रहे हैं। इस वजह से संगठन के कामों में वे विशेष रूचि नहीं ले रहे हैं। परिणामत: संगठन की जिम्मेदारी आन्ध्रप्रदेश - उड़ीसा स्पेशल एरिया कमिटी के सचिव सब्यसाची पांडा को मिल गयी है। हालांकि इसकी पुष्टि न तो नक्सली खेमा कर रहा है और ही केंद्रीय खुफिया ब्यूरो को इस बात की सही जानकारी है। एमसीसी खेमे से आने वाले 40 वर्षीय पांडा के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने वर्ष 1996 में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। 2006 में कोटापुर जेलब्रेक को अंजाम देने वाले पांडा ने तब 774 पुलिस रायफलें लूटकर माओवादी खेमे में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। नयागढ़ जेलब्रेक में भी रणनीति के तौर पर उनकी भूमिका मानी जाती है। आन्ध्रा पुलिस ने उन पर १० लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा है। राजनीतिक परिवार से आने वाले पांडा के पिता और भाई पहले माकपा के सदस्य थे लेकिन कुछ वर्ष पहले ही उन लोगों ने बीजू जनता दल का दामन थाम लिया।
छनकर आ रही खबरों के मुताबिक इन दिनों भाकपा (माओवादी) के अंदर संघर्ष के तरीकों को लेकर गहरी बहस छिड़ी हुई है और वे नये सिरे से भारतीय उपमहाद्वीप को परिभाषित करने में लगे हुए हैं। विदित हो कि आजादी के बाद से लेकर अबतक माओवादी इस देश को अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक देश मानते रहे हैं। लेकिन माओवादियों की कर्नाटक इकाई देश की अर्द्धसामंती चेहरे कोे सिरे से खारिज कर दिया है जबकि इसी सामंतवाद की बुनियाद पर साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के गांवों में जन्मा नक्सलवाद धुर विप्लवी वामपंथी माओवादी विचारकों चारु मजूमदार और कानू सान्याल समेत दर्जनभर कम्युनिस्टों के जेहन से निकलकर साहित्यकार महाश्वेता देवी की "हजार चौरासी की मां' के कथानक तक विस्तृत हो गया है। कभी कानून-व्यवस्था की समस्या बन चुना नक्सलवाद अब घोषित तौर पर सामाजिक -आर्थिक प्रक्रिया में बदलाव का हामी हो गया है और उसका घटिया संस्करण सबके सामने है। शायद तभी गणपति का सूर भी बदला नजर आ रहा है।
माओवादी राजनीति में एक ही साथ कई समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। मसलन कभी दक्षिण एशिया में माओवादी आंदोलन को हवा देने वाला नक्सलियों का अगुवा नेपाल संसदीय रास्ता अख्तियार कर लिया है और दुनिया के माओवादियों के बीच यह संदेश दे रहा है कि वर्तमान समय में बंदूक के सहारे सत्ता हथियाने का रास्ता बंद हो चुका है। सूत्रों का कहना है कि माओवादियों की एक बड़ी जमात नेपाल के प्रचंड लाइन का मौखिक समर्थन कर रहा है। ऐसे में माओवादियों के बीच इस बात की बहस चल पड़ी है कि जब चीन में ही माओत्सेतुग्ड अप्रसांगिक हो गये तो फिर विविधताओं से भरे भारत में बंदूक के सहारे सत्ता कैसे हासिल की जा सकती है? वैसे ही लोग इस बात की वकालत कर रहे हैं कि जरूरत है अतीत की विरासत, वर्तमान के अनुभव और भविष्य की आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर ही नयी विचारधारा और परिर्वतन की रणनीति बनाने की।
नौंवे दशक में अचानक उत्तर भारत में दलित और पिछड़े संसदीय नेताओं का राजनीति में उभार होना भी नक्सलियोंं के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। यही कारण है वोट बहिष्कार को तिलांजलि देते हुए नक्सल समर्थक लोग अब जमकर मतदान में हिस्सा ले रहे हैं। बिहार, झारखंड, उड़ीसा समेत नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों के गांवों से बड़े जोतदारों और जमींदारों का पलायन हो चुका है। यानी उन लोगों ने नक्सलियों की हुकूमत स्वीकार कर ली है।
केंद्रीय नेतृत्व इन सारी बातों पर आत्ममंथन ही कर रहा था कि अचानक छत्तीसगढ़ राज्य इकाई की दंडकारण्य कमिटी ने सरकार से शांति वार्ता का प्रस्ताव रख डाला। मजे की बात यह है कि इसबात की जानकारी केंद्रीय नेतृत्व तक को नहीं है। यही नहीं, आन्ध्र प्रदेश इकाई के राज्य सचिव और केंद्रीय कमिटी के सदस्य सांबासिवुदू ने आत्मसमर्पण करके नेतृत्व की कुशलता पर ही सवाल उठाया है। खबर है कि माओवादियों के शीर्ष नेतृत्व से उनकी अनबन चल रही थी। ये वही माओवादी हैं जिन्होंने अक्तूबर, 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू पर हमले की योजना बनायी थी। इन्होंने 1993 में महमूदनगर जिले से भूमिगत माओवादी राजनीति की शुरुआत की थी। तब से वह लगातार माओवादी राजनीति को फैलाने में लगे रहे। उनके आत्मसमर्पण से माओवादियों के अंदर चल रहे अंतरविरोध खुलकर सामने आ गया है। यह तो बानगी मात्र है। सच्चाई तो यह है बीते चार वर्षों में आन्ध्र से लेकर बिहार तक दर्जनों हार्डकोर माओवादियों ने आत्मसमर्थन किया है। आखिर क्या कारण है कि एक जज्बे के साथ नक्सली बनने वाले हार्डकोर कैडर आत्मसमर्पण करने पर मजबूर हो रहे हैं? इसका मंथन माओवादियों की केंद्रीय कमिटी ने जब शुरू की तो विवाद गहरा गया। जबकि कई ऐसे भी हैं जो नेतृत्व को अनदेखा करते हुए रॉबिनहुड बनने के चक्कर में गिरफ्तार हो चुके हैं। नक्सलियों की लगातार हो रही गिरफ्तारी पर केंद्रीय नेतृत्व भी सकते में है और गंभीर आत्मचिंतन में लगा हुआ है। खबर है कि बीते साल बिहार और झारखंड के सीमाई इलाकों के घने जंगलों में आयोजित केंद्रीय कमिटी की बैठक में जब दो धारी संघर्ष (टू लाइन स्ट्रगल) शुरू हुआ तो पार्टी सकते में आ गयी और आनन-फानन में कई ऐसे फैसले ले लिये जिसे अगर सार्वजनिक कर दिया जाये तो नक्सल आंदोलन में भूचाल आये बिना नहीं रहेगा। बताया जाता है कि भारतीय समाज का विश्लेषण कर रहे माओवादियों की सर्वोच्च संस्था अब पीपुल्स गुरिल्ला लिबरेशन आर्मी हो गयी है जबकि इसके पहले पार्टी सर्वोच्च संस्था हुआ करती थी। बदले विश्व परिदृश्य में संयुक्त मोर्चा के महत्व को भी नक्सलियों ने समझा है। जबकि इसके पहले नक्सलियों की जमात संयुक्त मोर्चा को सिरे से खारिज करती थी। बंदूक के सहारे समतामूलक समाज निर्माण करने के हिमायती माओवादियों ने अपने 40 वर्षों के संघर्ष में पहली बार संयुक्त मोर्चा में गांधीवादियों से लेकर लोकतंत्रप्रेमियांें के साथ मोर्चा बनाने का निर्णय लिया है ताकि छोटे स्तर के नक्सली वाम भटकाव की ओर अग्रसर नहीं हों।
यही नहीं, पश्चिम बंगाल के गांवों से 1967 में सही किसानों के हाथों में जमीन और किसान कमिटी के हाथों में हुकूमत के हिमायती नक्सलियों ने आधार इलाका बनाने की बात भी फिलहाल स्थगित कर दी है और वे छापामार जोन बनाने पर जोर दे रहे हैं ताकि सरकार से संघर्ष तीखा होने की स्थिति में पुलिस के दमन से आधार इलाके की जनता को बचाया जा सके । इसका परिणाम भी सामने दिखने लगा है। बात चाहे महाराष्ट्र के गढचिरौली जिले में 15 पुलिसकर्मियों को पत्थर से कूच-कूचकर हत्या करने की हो या झारखंड के राहे पुलिस पिकेट के पांच जवानों को चाकू गोदकर मारने की। बिहार के नवादा स्थित कौआकोल में तो नक्सलियों ने हद ही कर दी जहां पीएलजीए की गुरिल्ला आर्मी की महिला दस्ता ने 15 पुलिसकर्मियों के हथियार छिनने के बाद हत्या कर दी। आगे नक्सलियों का कहर कहां बरपेगा, यह कहना मुश्किल है। विदित हो कि पिछले साल केंद्रीय कमिटी के सदस्य और मारक दस्ते का मास्टरमाइंड प्रमोद मिश्र की जब धनबाद में गिरफ्तारी हुई तब इस बात का खुलासा भी हुआ था कि नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदल दी है और अब वे भारतीय सेना से लड़ाई करने के पक्ष में आ गये हैं। बात दीगर है कि अबतक सेना को नक्सली इलाकोें में नहीं उतारा गया है।
आर्थिक सुधारवाद के इस जमाने में नक्सलियों का मानना है कि दलाल पूंजीपतियों के सहयोग से साम्राज्यवादी पूंजी गांवों तक अपनी पैठ बना रही है। इससे निपटने और इसके खतरों से जनता को अवगत कराने के लिए गांधीवादियों से लेकर अन्य समाजवादियों से सांठगांठ कर रही है।

Wednesday, March 4, 2009

कम नहीं आंकिये बसपा को

हालांकि उत्तर प्रदेश को छोड़कर कहीं भी बहुजन समाज पार्टी की सरकार नहीं है और न किसी दूसरे राज्यों में वह सरकार बनाने की ही स्थिति में है। बावजूद इसके आगामी आम चुनाव में बसपा राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक दबदबा बनाने में कामयाब हो सकता है। कुछ महीने पूर्व हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों को देखते हुए बड़े दलों मसलन भाजपा और कांग्रेस इसे नकार कर नहीं चल सकते।
बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को देखते हुए कांग्रेस और भाजपा समेत वाम दलों ने भी इसे बतौर सत्ता प्रेम दलितों को पटाने में लगी है। हालांकि ऊ परी तौर पर दोनों दल यह दिखाने की फिराक में हैं कि फिलहाल बसपा से डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन इन दलों के अंदर झांकने पर तस्वीर कुछ दूसरी उभरकर आ रही है। इसका गवाह केंद्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली ही है जहां कभी बसपा ने दो सीटों (8.5 फीसदी) से खाता खोला था वहां बीते विधानसभा चुनाव में उसे14 फीसदी वोट मिले। कमोवेश यही हाल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में दिखा जहां पिछले विधासनभा चुनाव में अपना वोट बैंक बढ़ाने में कामयाब रहा। एक ओर बसपा ने जहां मध्य प्रदेश में दो सीटों की बढ़ोतरी करते हुए वर्तमान विधानसभा में सात विधायकों को भेजने में सफल रहा वहीं छत्तीसगढ़ में वोट प्रतिशत 6.00 कर लिया। हाथी की मस्त चाल से राजों-रजवाड़ों का गढ़ राजस्थान भी अछूता नहीं रहा। यहां सत्ता की बागडोर भले ही कांग्रेस पार्टी ने संभाली हो लेकिन बसपा ने 4 अतिरिक्त सीटें जीतकर अपना 6 फीसदी वोट बढ़ा लिया। कभी "वोट से लेंगे पीएम-सीएम और मंडल से लेंगे एसपी-डीएम' का राग अलापने वाली बसपा इन दिनों न सिर्फ उत्तर भारत में बल्कि अखिल भारतीय राजनैतिक वजूद बचाने में कामयाब हुई है। विदित हो कि कांशीराम ने जब अपनी नौकरी छोड़कर बामसेफ और डी-फोर के रास्ते बसपा बनाया था उसी समय उन्होंने नया हिन्दुस्तान का सपना भी देखा था उस समय उनका स्पष्ट विचार था कि दलितों और पिछड़ों का भला तब तक नहीं होने वाला जबतक सत्ता पर उनका (दलितों और पिछड़ों) कब्जा नहीं होगा।
वैसे तो बहुत लोगों को यह भ्रम है कि बसपा दलितों की पार्टी है। लेकिन इसके गिरेबां में झांकने पर यह स्पष्ट होता है कि यह दलितों की पार्टी नहीं, बल्कि भारतीय संविधान पर खरा उतरने वाली एकमात्र पार्टी है जिसके संस्थापक कांशीराम ने 1987 में ही हरियाणा विधानसभा में पिछड़ों को आरक्षण देने की वकालत की थी। तब मंडल कमीशन की रिपोर्ट केंद्रीय सचिवालय में धूल खा रही थी। उसी समय कांशीराम ने आजादी के बाद के हुक्मरानों पर तरस के साथ ही आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि आखिर क्या कारण रहा कि इतने दिनों के बाद भी अनुसूचित जाति, जनजाति के साथ ही पिछड़ों को न तो सामाजिक मान्यता ही मिली और न ही कोई अधिकार ही दिये गये।
यही नहीं, सीएसडीएस की ओर से जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार 1999 में 13 फीसदी गैर-यादवों के वोट बसपा को मिली। कहने का तात्पर्य यह कि कांशीराम ने बसपा में दलितों के साथ ही पिछड़ों और मुसलमानों को भी जोड़ने का प्रयास किया। एक कदम आगे बढ़ते हुए वर्ष 2007 में पार्टी सुप्रीमो मायावती ने बसपा में सवर्णों में ब्राहणों के साथ ही वैश्यों को जोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया और सोशल इंजीनियर बन गयी। कमाल करते हुए मायावती ने प्रदेश में 30 फीसदी वोट और 206 सीटें पाकर अपने दम पर सरकार बना ली। अगर सबक ुछ ठीकठाक रहा तो आगामी लोकसभा चुनाव में वह 40-50 सीट आसानी से जीत सकती है। अगर ऐसा हुआ तो बिना बसपा के सहयोग के केंद्र की सरकार चलाना मुश्किल होगी। फिर गठबंधन की राजनीति उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि देश की बड़ी वामपंथी पार्टी सीपीएम पहले ही मायावती के पक्ष में खड़ा हो चुकी है। वहीं सांप्रदायिकता के नाम पर भाजपा विरोध अभी भी वामपंथियों का जारी है। फिर दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में जिस तरीके से हाथी मस्तानी चाल चली है उसका भी संकेत सकारात्मक ही है।

Tuesday, March 3, 2009

...और ओबामा ने बाजी मार ली

...और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के अंतिम वाकयुुद्ध में 46 वर्षीय डेमोक्रेट्‌स उम्मीदवार बराक ओबामा ने बाजी मार ली। अंतिम बहस के बाद न्यूयार्क टाइम्स व सीबीएस की ओर से कराये गये जनमत सर्वेक्षण में बराक अपने प्रतिद्वंदी 76 वर्षीय रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैक्केन से 14 फीसदी मतों से आगे चल रहे थे। जबकि 22 अक्टूबर को वॉल स्ट्रीट जनरल व एनबीसी न्यूज की ओर से कराये गये सर्वेक्षण में भी ओबामा 52 फीसदी मतदाताओं के पसंदीदा बन गये हैं वहीं मैक्केन के समर्थकों का आंकड़ा 42 फीसदी है। दो हफ्ते पहले की गयी रायशुमारी के नतीजों में ओबामा को 4 फीसदी की बढ़त मिल गयी है। फिर भी, इन सर्वेक्षणों का अंतिम प्रतिफल 4 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव के लिए होने वाले मतदान के बाद ही आएगा, जिसका दुनिया बेसब्री से इंतजार कर रही है।
16 अक्टूबर को न्यूयार्क के लंबे-चौड़े भू-भाग में फैले होपस्ट्रा विश्वविद्यालय परिसर के बहस हॉल में दोनों प्रत्याशियों ने आमने-सामने एक-दूसरे पर तीखे प्रहार किये। शब्दवाणों की झड़ी से एक ओर जहां रिपब्लिकन उम्मीदवार मैक्केन बार-बार झल्लाये वहीं डेमोक्रेट्‌स प्रत्याशी व्यक्तिगत हमला झेलने के बावजूद गंभीर बने रहे और शालीनता के साथ मुद्दों को उठाते रहे।
वैसे तो चुनावी माहौल में ओछी राजनीति कोई नई बात नहीं है। एशिया, अफ्रीका समेत दुनिया के अधिकांश देश इस रोग से संक्रमित हैं। लेकिन इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियान में प्रत्याशियों की बयानबाजी ने सारी सीमाओं को लांघ दिया। डेमोक्रेट्‌स उम्मीदवार आतंकी बताए गये तो डेमोक्रेट समर्थकों ने रिपब्लिक उम्मीदवार को हिंसक बताया और कहा कि मैक्केन युद्ध की मानसिकता से ग्रस्त हैं।
अमेरिकी चुनावी इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब पूरे चुनावी अभियान से एकतरफा मुद्दे गायब दिख रहे हैं। आर्थिक सुनामी की मार झेल रहे अमेरिका समेत तीसरी दुनिया के देश व्यक्तिगत बयानबाजी व ओछी राजनीति से हतप्रभ हैं। हद तो यह कि आर्थिक नीतियों पर चर्चा करने की बजाय पूरे चुनावी अभियान में रिपब्लिकन उम्मीदवार मैक्केन हताशा भरी राजनीति करते दिख रहे हैं। चुनावी सर्वेक्षणों के परिणामों से हताश हो चुके मैक्केन ने बिना साक्ष्य जुटाए ही यह प्रचारित करने का भरसक प्रयास किया कि बराक ओबामा का संबंध आतंकवादियों से रहा है। उन्होंने कहा कि बराक सातवें दशक में वियतनाम युद्ध के समय आतंकी संगठन "वेदर अंडरग्राउंड' के संस्थापक सदस्यों में से एक विलियम एयर्स (उस दौरान बम विस्फोटों में नाम आया था) के साथ रहे हैं। रिपब्लिकन उप राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार सारा पेलेन ने भी इस बात का जोर-जोर से प्रचार किया कि बराक का संबंध आतंकवादियों से रहा है।
हालांकि इतने तीखे आरोप के बावजूद बराक शालीनता के साथ चुनावी अभियान में डटे हुए हैं। रिपब्लिकन पार्टी के व्यक्तिगत हमले से आहत बराक ने सफाई देते हुए मतदाताओं से कहा कि इन दिनोें विलियम एयर्स शिकागो के एक महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने मैक्केेन व सारा के इस आरोप को तथ्यहीन बताया और कहा कि आज से 40 साल पहले, जिस वक्त के आरोप हम पर लग रहे हैं उस समय हमारी उम्र मात्र आठ साल की थी। क्या आठ साल का मासूम बालक आतंकवादियों से संबंध रख सकता है? उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर वाकई एयर्स आतंकवादी होते तो पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन के पूर्व राजदूतों व उनके नजदीकी सहयोगियों से उस बोर्ड को आर्थिक मदद नहीं मिलती, जिसमें आज से 10 साल पहले मैं और एयर्स दोनों शामिल थे। फिर भी, बराक ने इस आरोप का जवाब एक इलेक्ट्रॅानिक विज्ञापन के माध्यम से दिया है। इस विज्ञापन में दिखाया गया है कि जब वॉल स्ट्रीट ढह रहा था, उस वक्त मैक्केन बहुत ही लापरवाह थे। मतदाताओं को इसमें बताया जा रहा है कि अमेरिका की गिरती अर्थव्यवस्था व 750 हजार बेरोजगार अमेरिकियों का ध्यान हटाने के लिए ही ओबामा पर व्यक्तिगत प्रहार किये गये हैं। हालांकि अमेरिकी जनता चुनाव पूर्व हुए सर्वेक्षणों में मैक्केन के इस बेतुका आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है।
अपने तूफानी चुनावी अभियान के अंतिम चरण में ओबामा ने सरकार की नीतियों पर प्रहार करते हुए कहा- अगर किसी भी हालत में मैक्केन जीत जाते हैं तो वे भी जॉर्ज बुश की ही तरह अमेरिका का कबाड़ा निकाल देंगे। व्यंग्यात्मक लहजे में ओबामा ने कहा कि मैं अमेरिकी जनता की बेहतरी के लिए कुछ दिन और व्यक्तिगत हमले बर्दाश्त कर ले रहा हूं, लेकिन नहीं चाहता कि अमेरिकी जनता अगले चार साल तक नाकामयाब आर्थिक नीतियों के भरोसे चले। इतना सुनते ही मैक्केन गुस्से में आ गये और डेमोक्रेट्‌स प्रत्याशी को चेताते हुए कहा-"सीनेटर ओबामा, आप संभलकर बात करें, मैं जॉर्ज बुश नहीं हूं।' इतना सुनते ही तपाक से बराक बोले-"बुश की नीतियों को अगर मैं आपकी नीति मानता हूं तो इसमें गलत क्या है? क्योंकि विश्वव्यापी आर्थिक संकट के बावजूद आप अभी भी बुश की आर्थिक नीतियों जो टैक्स, ऊर्जा, खर्च आदि से संबंधित है, का समर्थन कर रहे हैं। मैक्केन का कहना है कि ओबामा वर्गयुद्ध की नीति पर चल रहे हैं।
बीते दिनों जिस तरह से पूरा भारतीय संसद राहुल गांधी के उस भाषण पर ठहर सा गया था जिसमें उन्होंने उड़ीसा के किसी गांव की लीलावती-कलावती की चर्चा की गयी थी। ठीक उसी तरह से ओबामा ने अंतिम बहस में "द प्लंबर' की रोचक गाथा सुनायी। मानों पूरी बहस ही "जो' नामक एक ऐसे प्लंबर पर आकर टिक गई जो ओहियो में ओबामा से मिला था और इनके टैक्स प्रस्ताव से बर्बाद होने का अंदेशा जताया था। मैक्केन ने उसी "जो' को मध्यवर्गीय अमेरिकी प्रतिनिधि का चेहरा मानते हुए कोई ग्यारह बार नाम लिया। शुरू में तो यह रोचक लगा लेकिन बाद में उसका उल्लेख उबाऊ होने लगा। कुछ भी हो लेकिन इन दिनों भारतीय कलावती-लीलावती की ही तरह अमेरिका में "जो' द प्लंबर भी मशहूर हो चुका है।
अंतिम बहस के दौरान दोनों नेताओंं ने जोर-शोर से हिस्सा लिया। एक ओर रिपब्लिकन उम्मीदवार ने जहां अनुभव के अस्र चलाये वहीं डेमोक्रेट प्रत्याशी ने धैर्य से आर्थिक सुनामी का तांडव झेल रही जनता के साथ ही अपने समर्थकों का भी ढांढस बंधाया।
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विशेषज्ञों का आकलन
न्यूयॉर्क में बहस से एक दिन पहले के रुझान :
ओबामा: 49.9 फीसदी- (इलेक्टोरल कॉलेज के 313 वोटों की बढ़त )
मैक्केन: 42 फीसदी-सिर्फ 158 पर रूक गए।
15 अक्टूबर, तीसरी व निर्णायक बहस (स्थान-न्यूयॉर्क के लांग आईलैंड स्थित हाफ्स्डा विश्वविद्यालय के परिसर में)
विषय-वित्तीय संकट
जॉन मैक्केन
पहले 30 मिनट
· जबरदस्त हावी रहे। धाराप्रवाह बोले। चुन-चुन कर आरोप मढ़े।
दूसरे 30 मिनट
· पहले तो हावी होने का भरोसा खुद पर भारी पड़ने लगा। फिर गड़बड़ा गए। आरोप लगाने लगे।
तीसरे 20 मिनट
· एकदम दिशा खो बैठे। निजी प्रहार करने करने। माखौल उड़ाने लगे।
बराक ओबामा
पहले 30 मिनट
· शुरुआत गड़बड़ा गई। शायद भौंचक रह गए कि मैक्केन ऐसा कर सकते हैं। ये, देखिए..मेरी बात तो सुनिए..जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगे।
दूसरे 40 मिनट
· तेजी से संभले। गलती न हो जाए, इसलिए शांत थे। सिर्फ मुद्दों पर ही बोले।
तीसरे 20 मिनट
· संयमित और अविचलित रहे। खूब अच्छा बोले।
बहस के बाद रुझान:
· ओबामा-53 फीसदी
·

Sunday, March 1, 2009

छूटे घुमते उपद्रवी

हिंदू भावनाओं को उभारकर सत्तासीन होने की बेचैनी भाजपा के लिए नयी बात नहीं है। यह बेचैनी दक्षिणी राज्य कर्नाटक में भी दिखनी शुरू हो गयी है। लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचाने को व्याकुल भगवा ब्रिगेड ने इसकी जिम्मेवारी नवोदित चरमपंथी संगठन श्रीराम सेना को दी है। कमोबेश यही काम बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना, मनसे समेत अन्य दूसरे हिंदूवादी संगठन भी करते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व श्रीराम सेना ने पहले मेंगलूर के बालमत्ता रोड स्थित एक पब में आतंक मचाया और दर्जनभर हिंदू लड़कियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। फिर कुछ दिनों के बाद केरल के सीपीएम विधायक सी.एच.के. कुन्हांभू की बेटी को सिर्फ इसलिए घंटों बंधक बनाये रखा क्योंकि वह अपने एक अल्पसंख्यक दोस्त (मुस्लिम) के साथ बस में यात्रा कर रही थी। इससे सेना की वहशी मानसिकता ही छलकती है। ये दोनों उदाहरण तो बानगी मात्र हैं। श्रीराम सेना का आतंक सूबे के छोटे कस्बों और गांवों तक पहुंच गया है। आश्चर्य तो यह कि तथाकथित राष्ट्रवादियों ने प्यार पर ही पहरा लगा दिया है।
एटीएस से मिली जानकारी के अनुसार हिंदू राष्ट्र की कल्पना को साकार करने के लिए सेना ने 1,132 आत्मघाती दस्ते तैयार कर रखे हैं जिनका काम सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काना और हिंदू आतंकवाद को हवा देना है। सेना प्रमुख प्रमोद मुतालिक का संबंध अभिवन भारत नामक संगठन के साथ ही मालेगांव विस्फोट के आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत दर्जनों चरमपंथियों से भी है, जिनकी योजना 2025 तक देश को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की है। संस्कृति के इन ठेकेदारों ने पब के बहाने गंगा-यमुनी संस्कृति के साथ-साथ महिलाओं की आजादी और आधुनिकता का भी विरोध किया है। ये कैसे "रामभक्त' हैं जो पश्चिमी संस्कृति से मुक्ति के नाम पर कहीं महिलाओं पर हमला करते हैं तो कहीं मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काते हैं जबकि आम धारणा है कि स्वयं भगवान राम शाप से मुक्ति के लिए अहिल्याबाई के पास पैदल पहुंचे थे। श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं ने अपनी कार्रवाईयों से साबित कर दिया है कि तालिबानीकरण सिर्फ किसी जाति या संप्रदाय तक ही सीमित नहीं है। भारतीय जनता पार्टी गुजरात के बाद कर्नाटक को हिंदुत्व का दूसरा प्रयोगशाला बना देना चाहती है। इसी के मद्देनजर उसकी तैयारी भी चल रही है। वैसे तो इसकी सुगबुगाहट 2005 में ही शुरू हो गयी थी जब सूबे के विभिन्न हिस्सों में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए थे और गो-हत्या रोकने को लेकर सत्ता संरक्षित बवाल करवाया गया था। लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भगवा ब्रिगेड को यह भरोसा है कि कर्नाटक और आंध्रप्रदेश की सीटें ही केंद्र में भाजपा को सत्ता दिला सकती है। इसी विश्वास के साथ वेंकैया नायडू ने अपनी विजय संकल्प यात्रा के दौरान कहा, "दक्षिण के 132 सीटें केंद्रीय सत्ता की कुंजी है जिसे हर हाल में हासिल करना है।' लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं, "हमारे राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के दिमाग में संघ और भाजपा का अजीब डर बैठ गया है और तथ्यों की पुष्टि के बिना ही आरोप शुरू कर देते हैं।'
दरअसल श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुतालिक का भाजपा की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से गहरा संबंध रहा है। संघ के सूत्रों का कहना है कि मुतालिक 1975 से 2004 तक आरएसएस का सक्रिय सदस्य था। संघ के पदाधिकारियों ने उसकी कतर्व्यनिष्ठा को देखते हुए 2004 में दक्षिण भारत (कर्नाटक) में बजरंग दल का संयोजक बनाया। गत विधानसभा चुनाव में उसने भाजपा का जमकर सहयोग किया। 28 अगस्त, 2005 में वह शिव सेना से जुड़ा। सितंबर, 2008 में राष्ट्र रक्षक सेना के साथ ही श्रीराम सेना का भी गठन किया। वैसे तो आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने इस बात से इंकार किया है कि प्रमोद मुतालिक का संघ से कोई संबंध है और श्रीराम सेना उसका जेबी संगठन है। लेकिन इस बात का जवाब मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा समेत भाजपा के शीर्ष नेताओं के पास है कि आखिर किस तरह वह प्रदेश के 11 जिलों की पुलिस की नजर में वांछित होने के बावजूद खुलेआम कानून को चुनौती देता फिर रहा है। यही नहीं, सूबे के विभिन्न जिलों में मुतालिक पर 45 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। देश में भगवा ब्रिगेड की हरकतों के बारे में गृहमंत्री पी.चिदंबरम कहते हैं, "श्रीराम सेना देश के लिए खतरा है और केंद्र सरकार इस संगठन की गतिविधियों पर नजर रखे हुए है।'

Saturday, February 28, 2009

सामने आया सिब्ते रजी का हिटलरी चेहरा

एक ओर नया जनादेश की मांग को लेकर प्रदेश में संपूर्ण विपक्ष आंदोलनरत है तो दूसरी ओर राज्यपाल सूबे में कानून का राज स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
देश के इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब गठन के सिर्फ आठ साल में ही किसी राज्य को राष्ट्रपति शासन देखना पड़ा है। 15 नवंबर, 2000 को देश के नक्शे पर 28वें राज्य के रूप में गठित झारखंड ने इतने कम समय में छह मुख्यमंत्रियों को देखा है। सभी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए तरह-तरह के सियासी नुस्खे आजमाये। सातवें की तलाश में एक बार फिर राजनीतिक तिकड़म का दौर जारी है। रांची से लेकर दिल्ली तक हर रोज सियासतदानों की राजनीतिक खिचड़ी पक रही है, लेकिन मामला कुछ बनता नजर नहीं आ रहा।
आदिवासी अस्मिता के नाम पर जब इस राज्य का गठन हो रहा था तब किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि सियासतदानों की बहुरंगी राजनीति प्रदेश को बदहाली के कगार पर खड़ा कर देगी। लोगों की उम्मीद थी कि खादी के रास्ते नक्सलवाद अपने-आप खत्म हो जायेगा। कानून का राज आयेगा। प्राकृतिक संपदाओं से संपन्न इस प्रदेश में उद्योगों का जाल बिछेगा। लेकिन अफसोस, शुरू से ही झारखंड दिल्ली के सियासतदानों का शिकार बनता रहा। सरकार बनाने और गिराने के खेल से राज्य के योजना मद की राशि समय रहते खर्च नहीं हो पायी तो दूसरी ओर गैर योजना मद का खर्च लगातार बढ़ता चला गया। राजनीतिक अस्थिरता की वजह से एक ओर जहां अधिकारी निरंकुश होते गये, वहीं सियासतदान लूट-खसोट में लगे रहे।
केंद्रीय मंत्रिमंडल से बेदखल झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने वैसे तो तिकड़म भिड़ाकर 27 अगस्त को दूसरी बार सूबे की बागडोर तो थाम ली, लेकिन तमाड़ विधानसभा उपचुनाव में हुई हार से उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। राजनीतिक अनिश्चितता प्रदेश को राष्ट्रपति शासन (निलंबित विधानसभा) की ओर धकेल दिया। राज्याल के हाथों में सूबे की कमान कब तक रहेगी, इसकी भविष्यवाणी तो नहीं की जा सकती। फिर भी राज्यपाल ने विपक्षियों की मांगों (विधानसभा भंग) को दरकिनार करके जता दिया है कि केेंद्रीय हुक्मरानों के आदेश के बिना झारखंड का पत्ता भी नहीं हिल सकता। उनकी केंद्रीय वफादारी और हिटलरी चेहरा तब झलकी जब 12 फरवरी को भाजपा की ओर से आयोजित शांतिपूर्वक "घेरा डालो डेरा डालो' आंदोलन के समय अभूतपूर्व दृश्य उत्पन्न हो गया। घेरेबंदी को तोड़ते हुए हजारों कार्यकर्ता राजभवन की ओर कूच कर गये। इससे बौखलायी पुलिस ने जमकर लाठियां बरसायी। पत्रकारों तक को नहीं बख्शा गया। आधा दर्जन पत्रकार भी घायल हो गये। किसी का सिर फूटा तो किसी का हाथ-पैर टूटा। सैंकड़ों गंभीर रूप से घायल हुए। हद तो तब हो गयी जब पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास पर लाठियां बरसनी शुरू हुईं। प्रशासन की इस कार्रवाई पर सूबे में राजनीतिक माहौल गरमाने लगा है। भाजपा ने राज्यपाल पर राजनीतिक प्रहार तेज कर दिये हैं। पुलिस की इस बर्बरतापूर्ण कार्रवाई पर यशवंत सिन्हा ने "द पब्लिक एजेंडा' से कहा," सड़कों पर बिखरा खून का एक-एक कतरा राष्ट्रपति शासन की कील साबित होगा। जनता सबकुछ देख रही है। सरकार बनते ही एक-एक लाठी का बदला सिब्ते रजी से ले लेंगे।' ऐसी बात नहीं है कि सिर्फ भाजपा की ओर से ही नया जनादेश की मांग की जा रही है। बल्कि 18 फरवरी को भाकपा माले ने भी राजभवन के सामने जोरदार प्रदर्शन करने का एलान किया है। झारखंड विकास मोर्चा भी विधानसभा भंग करने की मांग को लेकर आंदोलित है। विपक्षियों को अंदेशा है कि केंद्र सरकार के दबाव में राज्यपाल विधानसभा को बहाल कर सकते हैं।
महीने भर पहले जब राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने सूबे की कमान संभाली थी तब राज्यवासियों को लगा था कि थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन कानून का राज जरूर स्थापित होगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। न तो उग्रवादियों व अपराधियों पर पुलिसिया हनक दिख रही और न ही भ्रष्टाचारियों ने सिकन ही महसूस किया है। और तो और वर्षों से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे अधिकारियों ने केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम तक को बरगला दिया और चतरा और पलामू में चल रहे पायलट प्रोजेक्ट समेत कई योजनाओं के गलत आंकड़े पेश किये। इससे खिन्न राज्यपाल के सलाहकार जी.कृष्णन नेे कहा, "विकास आयुक्त का गृह जिला गोड्डा ही विकास से कोसों दूर है।'
हालांकि इस बीच राज्यपाल ने कई अहम फैसले लिये हैं। मसलन वर्षों से एक ही स्थान पर जमे मोबाइल दारोगाओं का तबादला कर सिब्ते रजी ने यह जता दिया कि कानून के आगे सब बौने हैं। विदित हो कि दर्जनभर मोबाइल दारोगाओं की तूती सचिवालय तक में बोलती थी। कई दारोगाओं ने अकूत संपत्ति बटोरी है। अपनी पहली ही बैठक उन्होंने लापरवाह कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी। राजस्व वसूली का लक्ष्य भी दोगुना कर दिया है। यही नहीं, भ्रष्टाचार की गंगोत्री में गोता लगा रहे सियासतदानों ने दो साल तक झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की काली करतूतों को छिपाये रखा। 26 अप्रैल, 2006 को डिप्टी कलेक्टरांें के लिए आयोजित सीमित प्रतियोगिता परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली की शिकायतें मिली थीं। तत्कालीन निगरानी डीआइजी अमित खरे ने आरोप लगाया था कि कई केंद्रों पर गड़बड़ियां हुईं हैं। कोषागार में तीन दिनों बाद उत्तर पुस्तिकाएं जमा करने की शिकायतें मिली थीं। फिर भी मधु कोड़ा और शिबू सोरेन ने इस दिशा में कार्रवाई नहीं की। राज्यपाल ने इसकी निगरानी जांच के आदेश देकर मेधावी छात्रों के बीच उम्मीद की किरण जगायी है।
सियासतदानों ने जिले और प्रखंडों की कमान उन अधिकारियों को सौंपी जिन्होंने सियासतदानों की काली करतूतों में हाथ बंटाया। वैसे सारे अधिकारी किनारे कर दिये गये या फिर छुट्टी पर चले गये जो निष्ठावान थे। इन अधिकारियों में से एक हैं आइएएस अधिकारी पूजा सिंघल पुरवार। देश ने उन्हें नरेगा एक्सेलेंस अवार्ड से नवाजा जबकि झारखंड सरकार ने एक महीने में ही सात बार तबादला करके यह जता दिया कि कर्तव्यपरायणता की दरकार इस प्रदेश को नहीं है। फिलहाल वे सेकेंड्ररी स्कूल की निदेशक हैं। पूजा सिंघल अकेली ऐसी अधिकारी नहीं हैं जिन्हें सही रास्ते पर चलने की कीमत चुकानी पड़ी है। सत्ता के सौदागरों ने नितिन कुलकर्णी को आधी रात में ही तबादला करा दिया। हालांकि तबादले राष्ट्रपति शासन में भी हो रहे हैं, लेकिन अब तबादला उद्योग का रूप नहीं ले रहा है। जी. कृष्णन, सुनीला बसंत और टीपी सिन्हा जैसे अपने मनमिजाज के अधिकारियों को सलाहकार बनाकर राज्यपाल ने यह संदेश दिया है कि वे कर्मठ और अच्छे अफसरों के कायल हैं। फिर भी राज्यपाल की अपनी सीमाएं होती हैं। उसी दायरे में रहकर कानून का राज स्थापित करने की जिम्मेवारी सिब्ते रजी को मिली है।
पर अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। मसलन राजनेताओं और अभियंताओं के मेल से ठेकेदारों द्वारा लूट-खसोट पर लगाम कसना। अभियंताओं का एक तबका ऐसा भी है जो सरकार के तौर-तरीकों का विरोध करता रहा है। यह सवाल बराबर उठता रहा है कि एक ही अभियंता को चार-चार विभागों की जिम्मेदारी क्यों सौंप दी जाती है। यानी वह खुद ही अपने कामों का मूल्यांकन कर सकता है, जांच कर सकता है और पैसे का भुगतान भी कर सकता है। देश के इतिहास में ऐसी जिम्मेदारी शायद ही दूसरे राज्यों में देखने को मिले। ऐसे ही अभियंताओं में शामिल हैं जल संसाधन विभाग में नारायण खां, दुमका के अधीक्षण अभियंता सिद्धिनाथ शर्मा, ग्रामीण विशेष विभाग के कार्यपालक अभियंता ब्रजमोहन कुमार आदि। कमोबेश ऐसी स्थिति दूसरे विभागों में भी है।
राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में नक्सलियों से निपटने की एक बड़ी चुनौती राज्यपाल के समक्ष है। राष्ट्रपति शासन के बावजूद माओवादियों ने चतरा, पलामू समेत पांच जिलों में एक सप्ताह तक नाकेबंदी करके यह जता दिया है कि उनकी गतिविधियों में कोई कमी नहीं आयी है। रांची के दौरे पर आये केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने नक्सली गतिविधियों पर चिंता जताते हुए कोबरा फोर्स की स्थापना पर जोर दिया था। उन्होंने राज्यपाल को भरोसा दिलाया कि सीआरपीएफ का ग्रुप सेंटर नामकुम में बनाया जायेगा। लेकिन इस भरोसे पर केंद्र सरकार खरी उतरे, अभी से ही यह सवाल उठने लगा है।
बॉक्स
राष्ट्रपति शासन के फैसले
20-21 जनवरी---रिम्सकर्मियों और अराजपत्रित कर्मचारियों की हड़ताल खत्म कराने का अफसरों को निर्देश
पहले रिम्स की हड़ताल खत्म हुई फिर अराजपत्रित कर्मचारियों की हड़ताल भी समाप्त
निगरानी विभाग को चुस्त-दुरुस्त करने का निर्देश,एमजी राव आइजी बनाये गये जबकि कई अधिकारी बदले गये।
25 जनवरी---आयुष डॉक्टरों की नियुक्ति की जांच का आदेश, तीन दिनों में ही जांच रिपोर्ट सौंपी गयी। अब कार्रवाई की तैयारी चल रही है।
29 जनवरी---मोबाइल दारोगा को 24 घंटे में बदलने का निर्देश।
30 जनवरी---सभी मोबाइल दारोगा बदले गये।
एक फरवरी---परिवहन विभाग के सभी अधिकारी बदले गये
तीन फरवरी---रांची नगर निगम की हड़ताल समाप्त
शिबू सोरने की सरकार के फैसले
29 अगस्त---हड़िया बेचनेवाली महिलाओं को सूचीबद्ध करने का जिला उपायुक्तों को निर्देश
15 नवंबर---एक लाख लोगों को नौकरी देने की घोषणा, थानेदार, बीडीओ को महीने में एक बार जनता दरबार लगाने का निर्देश, आदिवासियों की लूटी जमीन को भू-माफियाओं से मुक्ति दिलवाने का आश्वासन।
मौलाना आजाद विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए जमीन उपलब्ध कराने का आश्वासन।
7 नवंबर---मंत्रिमंडल ने लिये अहम फैसले। पलामू, गढ़वा,चतरा और लातेहार जिले सूखाग्रस्त घोषित, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं।
22 दिसंबर---उग्रवाद से निपटने के लिए सर्वदलीय समिति बनाने की घोषणा।
चिह्नित थानों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात करने पर बल, 61 नये थानों का सृजन और पुलिस आधुनिकीकरण योजना पर काम करने का आश्वासन।

Wednesday, February 4, 2009

मतभेद नहीं, मनभेद बरकरार

सतही तौर पर भाजपा की प्रदेश इकाई एक छतरी के नीचे काम कर रही है लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि पार्टी कार्यकर्ता गुटबंदी के शिकार हैं। केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में आपसी विवाद भले ही थम गया हो लेकिन मनभेद अभी भी बरकरार है। कयास लगाया जा रहा है कि समय रहते मनभेदों को पाटा नहीं गया तो लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर प्रतिकुल असर पड़ सकता है। संगठन में गुटबंदी अभी से ही दिखनी शुरू हो गयी है। पार्टी की ओर से आयोजित विजय संकल्प सम्मेलन में गुटबंदी के साथ ही मनभेद भी उभरकर सामने आ गये। मंच से वे सारे नेता गायब रहे जो प्रदेश अध्यक्ष राधामोहन सिंह और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी से खफा चल रहे हैं।
सम्मेलन की सफलता के लिए प्रदेश को तीन हिस्सों (मोतिहारी, भागलपुर और गया) में बांटा गया था। स्पेशल कोर गु्रप की बैठक में तय हुआ था कि सभी जगहों पर प्रदेश के पार्टी पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। सम्मेलन को बड़े नेताओं के साथ ही स्थानीय नेता (मंत्री और विधायक) भी संबोधित करना था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले मोतिहारी की सभा में प्रदेश प्रवक्ता विनोद नारायण झा, विजय मिश्र समेत आधा दर्जन नेताओं को बोलने नहीं दिया गया। मोदी से खफा चल रहे चन्द्रमोहन राय को बुलाया नहीं गया। असंतुष्ट गुट के नेता अश्विनी चौबे, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल आदि नेता भी नहीं पहुंचे। इसके कई मायने निकाले गये। सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन अफवाह यह भी उड़ी कि कार्यक्रम में शिरकत नहीं करने वाले अधिकांश नेता मोदी से अभी खफा ही चल रहे हैं। भागलपुर की सभा में प्रेम पटेल और पार्टी कोषाध्यक्ष को बोलने का मौका नहीं मिला।
गया की सभा भी विवादों में रही। मगध और कैमूर के 13 जिलों के कार्यकर्ताओं की हौसला अफजाई के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में अतिपिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष रामेश्वर प्रसाद चौरसिया, वरिष्ठ नेत्री सुखदा पांडेय, रामाधार सिंह समेत दर्जनभर स्थानीय नेताओं को बोलने नहीं दिया गया। इस बाबत पार्टी उपाध्यक्ष रामेश्वर चौरिसया कहते हैं,
"स्थानीय नेताओं को तरजीह नहीं देने से पार्टी में गलत परंपरा की शुरुआत हुई है। इसका असर देर-सबेर कार्यकर्ताओं पर भी दिखेगा।' भाजपा के दिग्गज नेता डा.सीपी ठाकुर की गैरमौजूदगी भी प्रदेश नेतृत्व को खटका। हालांकि पार्टी की एकजुटता के लिए संघ पृष्ठभूमि से आये क्षेत्रीय संगठन प्रभारी ह्दयनाथ सिंह तीनों सभाओं में उपस्थित रहे। पार्टी सूत्रों का कहना है मोदी के खिलाफ बागी तेवर लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर से तीखे हो सकते हैं।
आंतरिक विवाद इस कदर गहरा गया है कि स्पेशल कोर गु्रप की बैठक (27 जनवरी) में भी चुनाव अभियान समिति को अंतिम रूप नहीं दिया गया। प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं,"चुनाव की घोषणा होते ही अभियान समिति में सदस्यों का चयन कर लिया जाएगा।' हालांकि गांव से विजय संकल्प अभियान की शुरुआत का निर्णय लिया गया। भाजपा की अनुषंगी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्‌, भारतीय जनता युवा मोर्चा, भाजपा महिला मोर्चा और भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा भी प्रदेश नेतृत्व के उपेक्षापूर्ण रवैये से खफा चल रहा है। बताया जाता है कि पार्टी के 35 विधायक प्रदेश नेतृत्व से खफा चल रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद वे कभी भी मोदी के खिलाफ बगावत कर सकते हैं।
मौजूदा विवाद मंत्रिमंडल पुनर्गठन के बाद से शुरू हुआ। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल से भाजपा कोटे के दो मंत्रियों (चन्द्रमोहन राय और जनार्दन सिंह सिग्रीवाल) की छुट्टी कर दी। मोदी गुट के अधिकांश विधायकों को मलाईदार विभाग दिये गये जबकि जो मंत्री सुशील मोदी के गुडबुक में नहीं थे उन्हें मुख्यमंत्री ने महत्वहीन विभाग थमा दिया। इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। पहले से ही जदयू नेताओं के आगे बौने दिख रहे भाजपा कार्यकर्ताओं व प्रदेश के दर्जनभर नेताओं ने मोदी व प्रदेश अध्यक्ष राधामोहन सिंह के खिलाफ बगावत कर दी। मामला दिल्ली दरबार में पहुंचा। मामले को सुलझाने के लिए बिहार प्रभारी कलराज मिश्र की अध्यक्षता में स्पेशल कोर ग्रुप की बैठक हुई। उसमें मोदी से नाराज चल रहे वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे ने कहा, "आप (सुशील कुमार मोदी) चुप रहिए! आपको बोलने का कोई हक नहीं है। जिस सरकार में अपनी ही बहू-बेटियों की इज्जत नहीं बचे, लगातार कार्यकर्ता अपमानित होते रहे, उसमें मंत्री बने रहने का क्या फायदा? कुछ कीजिये (कलराज मिश्र जी)। नहीं तो प्रदेश नेतृत्व बिखर सकता है।'
यह पहला मौका नहीं था जब मोदी के खिलाफ विद्रोही तेवर उग्र हुए हों। विवाद चाहे खाद्य और उपभोक्ता संरक्षण मंत्री नरेन्द्र सिंह बनाम भाजपा विधायक फाल्गुनी यादव के बीच का हो या पूर्व मंत्री व भाजपा विधायक जर्नादन सिंह सिग्रीवाल बनाम जदयू विधायक राम प्रवेश राय का या फिर नगर विकास मंत्री भोला सिंह बनाम राम प्रवेश राय की, सभी मामलों में मोदी और प्रदेश अध्यक्ष ही घेरे में रहे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि विवाद दिनोंदिन गहराता जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष भी इससे इंकार नहीं करते हैं। उनका कहना है,"मतभेद सुलझा लिये गये हैं। आपसी मनभेदों को टटोला जा रहा है। समय रहते इस पर भी काबू पा लिया जाएगा।'
एनडीए की सरकार (भाजपा-जदयू गठबंधन) होने के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व चिंतित दिख रहा है। दिल्ली में बैठे नेताओं को चिंता है कि सरकार बनते ही मोदी के खिलाफ एकबारगी इतने तीखे क्यों होते जा रहे हैं? चिंता का दूसरा कारण यह है कि सरकार में शामिल होने के बावजूद भाजपा का जनाधार क्यों घटता जा रहा है? नाम नहीं छापने की शर्त पर एक नेता ने बताया कि मोदी सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। पार्टी की चिंता उन्हें नहीं रही। लाख टके का सवाल है कि आने वाले दिनों में क्या मोदी केंद्रीय नेतृत्व को यह विश्वास दिला पायेंगे कि प्रदेश भाजपा एकजुट है?
दूसरी ओर, लोकसभा में सीटों के बंटवारे में भी विवाद उभरने के आसार अभी से ही दिखने शुरू हो गये हैं। एक ओर जहां जदयू भागलपुर, किशनगंज, मोतिहारी, छपरा और नवादा लोकसीट को भाजपा के लिए कमजोर मान रहा है वहीं भाजपा इन सीटों पर अपनी दावेदारी पेश कर गठबंधन धर्म को संकट में डाल दिया है। मोतिहारी सीट पर प्रदेश अध्यक्ष राधामोहन सिंह अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। पटना साहिब लोकसभा सीट से सिने अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा, पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, डा. उत्पलकांत समेत आधा दर्जन नेताओं के नाम पर विचार किये जाने की चर्चा जोरों पर है। सिन्हा ने सूरत (गुजरात) में कहा है कि अगर पटना साहिब से टिकट नहीं मिला तो वह जोगी (संन्यासी) बन जाएंगे। कमोबेश ऐसी स्थिति अधिकांश सीटों पर दिख रही है।

Tuesday, December 30, 2008

पहले बाढ़, अब सुखाड़




एक ओर बाढ़ तो दूसरी ओर सुखाड़। बिहार के लोग कोसी की विभीषिका से अभी जूझ ही रहे थे कि राज्य का अधिकांश इलाका सूखे की चपेट में आ गया। लाखों हेक्टेयर में लगी धान की फसल सूख रही है। खरीफ फसल भी बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। सूबे में यह स्थिति सितंबर महीने में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश होने की वजह से उत्पन्न हुई है।
प्रदेश में 15 वृहद व 78 मध्यम नहर सिंचाई योजनाएं हैं। इनमें औरंगाबाद में 12, भागलपुर में 31, डेहरी में 4 व पटना जिले में 30 मध्यम योजनाएं हैं। अगर इन योजनाओं को ही सुचारू तरीके से चलाया जाए तो बहुत हद तक प्रदेश को सूखे से बचाया जा सकता था लेकिन इनका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। मौसम की बेरुखी सेे पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। हालांकि नीतीश सरकार के अस्तित्व में आते ही सूबे की तकदीर बदलने के लिए एक सार्थक प्रयास की शुरुआत की गयी थी लेकिन कोसी इलाके की बाढ़ व शेष इलाके में सुखाड़ ने सरकार के सारे प्रयासों को विफल कर दिया है। सूखे के कहर से प्रदेश के अधिकांश किसान त्राहिमाम कर रहे हैं।
बात चाहे सोन उच्चस्तरीय नहर के किनारे बसे औरंगाबाद जिले के ओबरा, दाउदनगर, अरवल व पटना के देहाती इलाके की हो या फिर उत्तरी कोयल सिंचाई परियोजना से सिंचित होने वाले औरंगाबाद, रफीगंज, नबीनगर, मदनपुर, बारूण (2 पंचायत), गुरूआ, गुरारू व टिकारी की। हर जगह पानी के लिए हाहाकर मचा हुआ है। "चावल का कटोरा' कहा जाने वाले कैमूर, भभुआ, भोजपुर व बक्सर के इलाके भी इससे अछूते नहीं रहे। धान की लहलहाती फसलें अंतिम पटवन के अभाव में मर रही हैं। कमोबेश यही स्थिति उत्तरी बिहार की गंडक परियोजना से लाभांवित होने वाले पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी व समस्तीपुर जिलों की भी है।
हालात ऐसे हैं कि जहानाबाद जिले के कुर्था,करपी, कांको, मखदुमपुर, कैमूर जिले के अधौरा, अरवल जिले के बैदराबाद, कलेर के निचले इलाके, जहानाबाद से सटे औरंगाबाद जिले के देवकुंड के साथ ही गोह के दक्षिणी इलाके, हमीदनगर पुनपुन बराज परियोजना के आसपास बसे गांव के साथ ही बक्सर जिले के चौसा इलाके के दर्जनों गांवों में पानी के लिए हिंसक झपड़ें तक हो चुकी हैं। किसानों के गुस्से का शिकार सासाराम में दो दिवसीय दौरे पर आईं केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार को होना पड़ा। आलमगंज की सभा में किसानों ने करमचट सिंचाई परियोजना को लेकर जमकर हंगामा किया।
गोह प्रखंड की झिकटिया पंचायत के पूर्व मुखिया नंदलाल सिंह बताते हैं कि अंतिम पटवन नहीं होने की वजह से धान की लहलहाती फसल मारी गयी। उन्होंने बताया कि गोह व रफीगंज इलाके में उत्तरी कोयल व टिकारी माइनर के आसपास के दर्जनों गांवों में भीषण सुखाड़ हो गया है। अगर दशहरा तक बारिश नहीं हुई तो इस इलाके में रबी फसल की भी बुवाई नहीं हो सकेगी, क्योंकि खेतों में दरारें पड़ गयी हैं। बारिश नहीं होने की वजह से धान के उत्पादन में कितना अंतर आएगा, इस संबंध में जब हमने कृषि निदेशक बी. राजेन्द्र सेजानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी स्पष्ट कहने से इंकार कर दिया।
पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह का कहना है कि शुरू में अच्छी बारिश हुई जिससे धान की अच्छी उपज होने की उम्मीद थी लेकिन सितंबर के शुरू से ही बारिश ने धोखा दे दिया। वहीं दोषपूर्ण जल बंटवारे की वजह से सोन नहर से सिंचित होने वाले इलाकोें में भी सिर्फ एक पटवन के लिए धान की फसल मारी गयी।
नीतीश सरकार जुलाई महीने में ही कर रही थी कि अतिवृष्टि की वजह से राजधानी पटना डूबा है। अगर उन दिनों वाकई सरकार का यह बयान सही था तो फिर सितंबर आते ही आखिर कैसे अधिकांश सिंचाई योजनाओं में पानी की किल्लत हो गयी? किसानों का कहना है कि अगस्त के अंतिम दिनों से ही तीखी धूप होने की वजह से खेतों में पानी की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। सितंबर के अंत तक इसने भयावह रूप ले लिया। राज्य सिंचाई कोषांग के निदेशक दिनेश कुमार चौधरी ने बताया कि अंतिम पटवन के अभाव में धान की फसलों को मरने नहीं दिया जाएगा। पानी के लिए मचे हाहाकार को देखते हुए ही सरकार उत्तर प्रदेश की रिहन्द सागर व मध्य प्रदेश की बांध सागर परियोजनाओं से प्रतिदिन 14275 क्यूसेक पानी खरीद रही है। यही पानी पश्चिमी सोन नहर में 9798 क्यूसेक व पूर्वी सोन नहर में 4477 क्यूसेक प्रतिदिन छोड़ा जा रहा है। जबकि गंडक परियोजना के मुख्य कैनाल में प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक व पूर्वी कैनाल में 5700 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। इससे उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में सिंचाई हो रही है।
सरकार के यह दावे अगर सही हैं तो फिर आखिर किन परिस्थितियों में सरकार ने सूबे के सभी हिस्सों के किसानों को अनुदान पर डीजल देने का ऐलान किया है। प्रधान सचिव विजय शंकर का कहना है कि 20 सितंबर को ही पानी के लिए मचे हाहाकार के मद्देनजर सरकार ने 63 करोड़, 16 लाख, 50 हजार रुपये जारी किये हैं। हालांकि जमीनी सच्चाई यह है कि घोषणा के 15 दिनों के बाद भी अबतक जिलाधिकारी को कोई आदेश नहीं मिले हैं। सवाल यह है कि इस अनुदान का लाभ किसानों को कब मिलेगा? नाम नहीं छापने की शर्त पर एक जिलाधिकारी ने बताया कि घोषणाएं पटना में हुई हैं। घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में महीनों लग सकते हैं।
प्रदेश में लघु सिंचाई योजनाएं भी कागजों पर ही दिखती हैं। अकेले बक्सर जिले में ही लगभग 120 पंपिंग सेट हैं लेकिन उनमें से अधिकांश बंद पड़े हैं। 15 पंपिंग सेट ठीक हालत में हैं भी तो खपत के अनुसार बिजली की आपूर्ति नहीं होने की वजह से ये पंप क्षमता के अनुसार पानी नहीं दे पा रहे हैं। स्थानीय बसपा विधायक हृदय नारायण सिंह बताते हैं कि पिछली राजद सरकार ने इलाके में सिंचाई की समस्या को दूर करने के लिए गंगा-चौसा पंप लाइन का निर्माण करवाया था लेकिन तीखी धूप के बावजूद सरकार जिले में औसत बिजली की आपूर्ति 32 के बजाय 15 मेगावाट कर रही है। इस वजह से सौ क्यूसेक पानी की क्षमता वाली यह परियोजना भी किसानों का साथ नहीं दे रही है। अधौरा प्रखंड में कर्मनाशा नदी पर बना पंप हाउस भी जंग खा रहा है। इससे लाभान्वित होेने वाले हजारों एकड़ जमीन में लगी फसल जल रही है। इधर 30 सितंबर को हुई बारिश से किसानों के चेहरे खिले दिख रहे हैं।
स्थिति की नजाकत इसी से समझी जा सकती है कि पानी बंटवारे को लेकर सूबे में पहली बार दो राज्यों के बीच विवाद खड़ा हो गया। औरंगाबाद के भाजपा विधायक रामाधार सिंह ने प्रदेश की 26 हजार हेक्टेयर जमीन में लगी धान की फसल को बचाने के लिए झारखंड प्रदेश के कुटकू बांध के समीप उत्तरी कोयल के मुख्य द्वार को ही काट दिया। इस संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में हुए समझौते के अनुसार बिहार को 2500 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए था लेकिन समझौते का उल्लंघन करते हुए झारखंड सरकार मात्र 1700 क्यूसेक पानी छोड़ रही थी जबकि उत्तरी कोयल को बिहार के एक लाख हेक्टेयर में सिंचाई करनी है।
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पानी से बिजली पर छिड़ी जंग
सूखे की चपेट में आए किसानों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए पक्ष-विपक्ष के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। पानी की किल्लत का ठीकरा विपक्षी नेताओं ने बिजली विभाग पर फोड़ना शुरू कर दिया है। राजद नेता व पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि अतिवृष्टि के बावजूद सितंबर महीने में ही सारे नदी-नाले सूख गये। जिन इलाकांें के किसान पंपिंग सेट से खेतों में सिंचाई करते थे वहां बिजली नहीं देकर सरकार दूसरे राज्यों को बेच रही है। उनका कहना है कि वैसे तो अधिकांश बिहार पहले से ही अंधेरे में डूबा हुआ है लेकिन जहां बिजली है वहां भी सरकार देने में सक्षम नहीं है। केंद्रीय पुल की बिजली में से 300 मेगावाट प्रतिदिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत अन्य दूसरे राज्यों को बेची जा रही है। दूसरी ओर, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह का कहना है कि केन्द्र सरकार बिहार के कोटे के अनुसार भी बिजली नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि औसतन बिजली का आवंटन सूबे में करीब 1400 मेगावाट है जबकि यहां मिल रही है मात्र एक हजार मेगावाट। पक्ष-विपक्ष के आरोप के बीच सच्चाई चाहे जो भी हो इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सूबे के अधिकांश इलाकों में औसतन बिजली प्रतिदिन पांच से छह घंटे ही मिल रही है।
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वृहद सिंचाई योजनाएं लाभांवित जिले
सोन उच्चस्तरीय नहर------भोजपुर, रोहतास, पटना, जहानाबाद, गया, औरंगाबाद
बदुआ जलाशय योजना----भागलपुर, मुंगेर
चंदन जलाशय योजना---भागलपुर
मोरहर सिंचाई योजना---गया
किउल जलाशय योजना---मुंगेर
कोसी योजना----पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, किशनगंज, सुपौल, अररिया
कुहिरा बांध-----कैमूर
मुसाखांड सिंचाई योजना---कैमूर
गंडक योजना-पूर्वी व पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर
लिलाजन सिंचाई योजना---गया
सकरी सिंचाई योजना---गया, नवादा
उदेरास्थान सिंचाई योजना---जहानाबाद, गया, नवादा
अपर मोरहर सिंचाई योजना--गया, नवादा
कमला, बलान, त्रिशुला सिंचाई योजना---मधुबनी

क्यों जल रहा है बिहार?

नालंदा के गदीश प्रसाद का परिवार स्तब्ध, माैन आैर शोकसंतप्त है। ये वही जगदीश हैं, जिनकी इकलाैती संतान पवन उर्फ दीपू (24) को बेवजह आैर असमय नफरत की राजनीति की बलि वेदी पर चढ़ा दिया गया। जगदीश आैर उनके ही जैसे लाखों परिवारों को पता नहीं कि पेट की आग बुझाने के लिए दूसरे राज्यों की खाक छानने को कब गुनाह का दर्जा दिया गया। लेकिन, महाराष्ट्र में भड़की आग की लपट जिस तरह बिहार पहुंची, उसने यह बता दिया कि सिसायतदानों के मन में क्या है। पवन जैसे मासूमों की लाश की चाबी ही सत्त्ाा के द्वार खोलती है। हाल के वर्षों में सबसे सफल प्रयोग भाजपा की राम लहर थी, जिसने अन्य दलों को भी नकारात्मक राजनीति की दिशा दिखाई।
महाराष्ट्र से लेकर बिहार आैर यूपी तक राजनेताओं को इस उबलते मुद्दे के बीच इंतजार रहेगा, तो बस आम चुनाव का। इस पूरे प्रकरण की जिस तरह राजनीतिक साैदेबाज़ी होती दिखी, उसने यह संकेत दे दिया है कि बिहार आैर महाराष्ट्र में होनेवाले आम चुनाव में बाहरी-भीतरी का मुद्दा काफी अहम भूमिका अदा करेगा।
बिहार में राजद के लिए अभी एक चुनाैती यह है कि वह सत्त्ाा में नहीं। उसे चुनाव सिर्फ मुद्दों के आधार पर लड़ना है। चूंकि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजग सरकार है, इसलिए वह राज ठाकरे का ठीकरा राजग के बहाने नीतीश पर फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यद्यपि, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद सीधे ताैर पर अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना नहीं साध रहे, लेकिन उनकी पार्टी के श्याम रजक सरीखे नेता वार का एक भी माैका चूक नहीं रहे।
यही वजह है कि जब राज की गिरफ्तारी हुई, तो श्याम रजक ने कहा-"ऐसे लोगों के खिलाफ मारपीट का नहीं बल्कि देशद्राेह का भी मुकदमा चलना चाहिए।' वहीं दूसरी ओर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने भी कांग्रेस पर निशाना साधने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया। पार्टी प्रवक्ता विजय कुमार चौधरी ने कहा-" राज को गिरफ्तार करने में महाराष्ट्र सरकार ने देरी कर दी वरना बिहार के युवकों की पिटाई नहीं होती।'
नेतृत्वविहीन छात्रों का उग्र प्रदर्शन आगामी लोकसभा चुनाव में कुछ नया गुल खिलाएगा, यह अभी कहना मुिश्कल है। लेकिन जिस तरह पहली बार छात्रों की गोलबंदी हुई है, उससे 1974 के आंदोलन की उपज रेल मंत्री लालू प्रसाद से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत अन्य नेताओं के सामने एक चुनाैती खड़ी हो गयी है।
राज्य प्रशासन छात्रों के उग्र तेवर भांप चुका था, लेकिन इसे राजनीतिक मजबूरी ही कहेंगे, जिसके चलते हिंसा का जवाब कठोरता से नहीं दिया गया। यह उसी तरह का मामला है, जैसा राज ठाकरे के साथ आज तक महाराष्ट्र में होता आया है। फरवरी 2008 में राज ठाकरे के भड़काऊ भाषणों से वैमनस्यता फैली थी, जिसके शिकार बिहार आैर यूपी के कई मासूम हुए थे। उस समय भी महाराष्ट्र सरकार की थू-थू हुई थी, लेकिन मराठी जनमानस की उपेक्षा से जो राजनीतिक नुकसान हो सकता है, उसकी शायद विलासराव देशमुख को अच्छी तरह से समझ है। यही वजह रही होगी कि उनकी सरकार ने उस समय राज पर इतना हल्का मुकदमा ठोंका कि उन्हें जेल से बाहर आने में सिर्फ दो घंटे आैर 15 हजार के मुचलके ज़ाया करने पड़े। अगस्त 2008 में भी एमएनएस कार्यकर्ताओं ने मराठी में दुकानों के नाम लिखने की हिदायत दी आैर तय समय से पहले ही व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर हमले बोल दिये। लाखों की संपित्त्ा का नुकसान हुआ। इस मामले में राज्य सरकार ने सिर्फ एक मामूली किस्म की जांच का आदेश दे दिया। जब व्यापारी हाइकोर्ट गये, तो वहां से सरकार को कड़े कदम उठाने के निर्देश मिले, पर अचरज की बात यह है कि कुछ ही दिनों के बाद कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार ने एक शपथपत्र दायर कर यह बताया कि मनसे नेताओं का कोई कुसूर नहीं है। कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ। गिरफ्तारी आैर रिहाई के नाटक के बीच, जो कुछ हुआ उसे देश भर के करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा। आम आदमी के मन में एक आम धारणा यह ज़रूर बनी कि सत्य जितना जिखता है, उतना स्पष्ट नहीं होता। वैसे बिहार में भी उग्र आंदोलन के ज़रिए, जिस प्रकार एक-दूसरे पर निशाना साधा जा रहा है, वह समस्या के समाधान से ़़ज्यादा सियासी फायदा झपटने की तरकीब नज़र आ रहा है।
दूसरी ओर मुद्दे के चुनाव तक जिंदा रहने के भी कई प्रमाण मिल रहे हैं। मसलन, 23 अक्टूबर को हुई छात्रों की आपात बैठक में महाराष्ट्र के सारे उत्पादों के बहिष्कार का निर्णय लिया गया। छात्रों ने सभी दलों के नेताओं को कड़ी चेतावनी दी कि अगर इस बार नेता चुप रहते हैं तो वे आगामी लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे। छात्रों ने जिस तरह से रेलवे को क्षति पहुंंचायी है उसे देख राजद प्रमुख व रेल मंत्री लालू प्रसाद खासे दबाव में दिख रहे हैं। उन्होंने भी दबी जबान ही सही, पर इस प्रतिहिंसा का सारा दोष राज्य सरकार पर मढ़ दिया है। लेकिन प्रदेश के राजग नेता इसे आक्रोश की अभिव्यिक्त मान रहे हैं। क्योंकि इसके पहले भी चार बार हिन्दी भाषियों के नाम पर बिहारी छात्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के शिकार बने हैं। लाख टके का सवाल यह है कि आखिर हिन्दीभाषी के नाम पर बिहारियों को ही निशाना क्यों बनाया जाता है? आैर, अगर यूपी भी हिंदीभाषी प्रदेश है, तो वहां के नेता इस बर्बरता पर माैन क्यों रहे। जाहिर सी बात है, मायावती आैर मुलायम की महत्वाकांक्षा अब यूपी से बाहर निकल कर केंद्र तक पहुंच गयी है। ऐसी िस्थति में किसी एक प्रदेश की राजनीति के लिए मुद्दों को हथियाने की तीर गलत निशाने पर भी लग सकती है। यही वजह है कि आज बिहार अपने जख़्म खुद सी रहा है। कब तक सीना पड़ेगा, यह अनििश्र्चत है।

ऐसे ही नहीं बना चीन नंबर वन


बीजिंग ओलंपिक में चीन ऐसे ही नहीं बन गया दुनिया का बेताज बादशाह। इसके लिए उसने एड़ी-चोटी एक कर दी। पानी की तरह पैसे बहाया। खिलाड़ियों का मनोेबल बराबर ऊं च्चा रखा वहीं आम लोगों में इसके प्रति जज्बा भर दिया आैर राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़कर देखा। तभी आज से 20 साल पहले सोल ओलंपिक में मात्र 20 मेडल लेने वाला चीन, इस बार दुनिया में सबसे अधिक मेडल लेने में कामयाब रहा। उसने कुल 51 स्वर्ण पदक लिये। लाख टके का सवाल यह है कि आखिर 20 वर्षों के भीतर चीन में ऐसा क्या बदलाव आया जिससे वह करिश्माई साबित हुआ। इसके लिए उसकी तैयारियों व समर्पण के साथ ही अन्य पहलुओं पर भी गाैर करना होगा।
चीन में 44,000 खेल विद्यालय हैं जहां 3, 72, 290 विद्यार्थियों को खेल का प्रशिक्षण दिया गया। इसी में से बीजिंग ओलंपिक के लिए खिलाड़ियों का चयन हुआ। वे पेशेवर खिलाड़ी तो बने ही, सरकर ने उन्हें वेतन भी देना शुरू कर दिया। इससे उनमें हाैसला अफजाई हुआ आैर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर दिखाया। इन खिलाड़ियों को कड़ी आैर उच्चस्तर के प्रशिक्षण के लिए 25,000 पूर्णकालीन प्रशिक्षक मुहैया कराये गये। इसके बाद राष्ट्रीय स्पद्धर्ाओं के लिए 15,925 राष्ट्रीय खिलाड़ियों को चुना गया आैर अंत में अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन के आधार पर 3,222 एलीट एथलीटों को चुना गया जबकि अन्य खिलाड़ियों को ओलंपिक में भाग लेने की इजाजत नहीं मिली।
ऐसी बात नहीं है कि बीजिंग ओलंपिक की तैयारियां सिर्फ सरकारी स्तर तक ही सीमित रहा। बिल्क आम लोगों ने भी इसका भरपूर समर्थन किया। सरकारी इलीट सिस्टम के साथ ही मास स्पोर्ट्‌स सिस्टम चलाया गया। इसमें देश में अधिकांश बुिद्धजीवियों ने हिस्सा लिया। इस मद में भी कई अरब यूनान (चीनी मुद्रा) खर्च किये गये।
बीजिंग ओलंपिक पर चीनी सरकार द्वारा अपनाये गये उपाय-----
मैदान---------8,50,000
स्टेडियम------------6,20,000
स्पोर्ट्‌स मीट्‌स----------40,000 (हर साल)
खेल विद्यालय----------44,000
प्रशिक्षित खिलाड़ी---3,72,290
पेशेवर खिलाड़ी--------46,758
प्रशिक्षक---------------25,000
राष्ट्रीय खिलाड़ी----------15,924
अंतराष्ट्रीय खिलाड़ी-----3,222

ऑखों के सामने नाचती रही मौत

अंतर्राष्ट्रीय जल मार्ग के रास्ते अमेिरका के हुस्टन बंदरगाह से मुंबई के िलए रवाना हुए जहाज को सोमालिया के िनकट जल दस्युओं ने 15 िसतंबर को अपने कब्जे में ले िलया। लगातार दो महीनों तक जल दस्युओं के कब्जे में रहे लोगों के मन से भय अभी तक दूर नहीं हो पाया है।
"ये बहुत बुरा अनुभव था। हमें मानिसक प्रता़डना दी गयी। आंखों के सामने बराबर मौत नाचती रहती थी। फिर भी भगवान का शुिक्रया और परिवारजनों का प्यार और दुआओं ने आपलोगों के सामने खींच लाया। अपने पूरे दल के साथ देशवािसयों के बीच जो खुशी हो रही है उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता।' यह कहना है सोमािनया में जल दस्युओं के कब्जे से मुक्त हुए जापानी मालवाहक जहाज स्टोल्ट वेलर (फ्लीटिशप मैनेजमेंट कंपनी, हांगकांग) के कैप्टन प्रभात गोयल का। श्री गोयल ने कहा-"हमें मानिसक तौर पर प्रताि़डत किया गया। लेिकन अंत में हम सुरिक्षत लौटने पर खुश हैं। मैं मििश्रत भावनाओं के साथ वापस पहुंचा हूं और मीिडया का धन्यवाद करना चाहता हूं। मुझे अपनी पत्नी पर गर्व है। अपह्त लोगों का कहना है िक अपहर्ता गोलीबारी किया करते थे तािक लोगों में दहशत व्याप्त रहे। यही बात चालक दल के सदस्य राजिंदर मलिक ने भी कही। मिलक कहते हैं-"अपराधी बराबर मानिसक प्रता़डना देते रहते थे। लगातार दो महीनों तक पानी व खाना के लिए वे तरसते रहे।'
वहीं पटना (िबहार) के रहने वाले चालक दल के सदस्य संतोष कुमार बताते हैं "वे दो महीने दहशत भरे थे। आंखों के सामने मौत नाचती रहती थी। कब, िकसकी मौत हो जाये, कहना मुश्िकल हो रहा था। भोजन भी खत्म होता जा रहा था। जहाज में ईंधन की भी कमी थी। एक-एक पल िबताना मुश्िकल हो रहा था। भगवान न करे िकसी दुश्मन को भी वैसे दिन देखने को िमले। परिवार से भी संपर्क टूट गया था। हमलोगों ने जिंदगी की आस ही छो़ड दी थी। मौत से जीतकर परिवार के बीच आने की जो खुशी हो रही है, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता'।
वे बताते हैं िक संतोष की मानें तो फ्लीटिशप कंपनी का यह जहाज 24 अगस्त को अमेिरका के हुस्टन बंदरगाह से रवाना हुआ था, उसे 19 िसतंबर को मुंबई पहुंचना था। 22-23 दिन बीत चुके थे। चालक दल के सभी सदस्य लंच की तैयारी में ही थे। स्वदेश पहुंचने की खुशी समुद्र की लहरों की तरह तरंगें मार रही थीं। अभी जहाज सोमालिया के िनकट पहुंचा ही था कि 15 िसतंबर को दोपहर करीब डे़ढ बजे अचानक जल दस्युओं ने हमला बोल िदया। दो स्पीड वोट पर सवार हिथयारबंद हमलावरों ने जहाज को अपने कब्जे में लेकर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। लोग माजरे को समझ पाते, उसके पहले ही हमलावरों ने कैप्टन प्रभात कुमार गोयल समेत तीन सदस्यों को अपने कब्जे में ले िलया और धमकाते हुए इशारों में ही सोमालिया चलने को कहा। हालांिक वे नहीं जानते थे कि सोमालिया िकधर है? और न ही वे अंग्रेजी जानते थे। आपस में ही कुछ बातें करते थे। फिर क्या था? डरे-सहमे कैप्टन ने जहाज का रुख सोमालिया की ओर कर िदया। रास्ते भर अपह्र्ता गुस्साये स्वर में चालक दल के अन्य सदस्यों को धमकाते रहते। जब पूरी तरह से हमलोग उसके कब्जे में आ गये तब भी बराबर जगह बदलते रहे, शायद उन्हें भी डर था िक कहीं भारतीय नौसेना या अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना उन पर हमला न कर दे। अंत में सुरक्षित ठिकाना समझकर हमलावरों ने आइल (सोमालिया) नामक स्थान पर सभी को िटकाये रखा। इस दौरान लगातार फिरौती के िलए दबाव बनाया जाता रहा। कैप्टन व चीफ इंजीिनयर के माध्यम से यागामारू टैंकर (मालवाहक जहाज का मािलक) के साथ ही फ्लीटिशप मैनेजमेंट कंपनी पर दबाव ब़ढता जा रहा था। शुरू में 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर फिरौती की मांग की गयी जबकि िदल्ली में अखबारों से जानकारी मिली कि 2.5 मििलयन डॉलर पर कंपनी ने हमलोगों को छु़डाया। इस दौरान कई बार अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना भी जहाज के नजदीक आती रही फिर भी मामला सुलझने की बजाय उलझता ही जा रहा था। भारतीय नौसेना का भी जहाज दूर में िदखाई देता था।
कैसे बीते वे िदन? इस पर उन्होंने कहा कि हमलावरों ने मानिसक प्रता़डना जरूर दी, कई बार ऐसी भी नौबत आई जब लगा िक अब जीना मुश्िकल है। वे इशारों-इशारों में ही गला काट लेने, गोिलयों से उ़डा देने आदि की धमिकयां देते रहे। 5 नवंबर को अपरािधयों ने कैप्टन गोयल, सेकेंड अफसर व चीफ इंजीिनयर को धमकाते हुए व्हील हाउस ले गये। थो़डी देर बाद ही गोिलयों की आवाज सुनी गयी। इससे सारे लोग सहम गये और िकसी अनहोनी की आशंका से भयभीत हो गये। इस दौरान सिफर् दाल व मछली खाकर अपनी जिंदगी गुजारी, क्योंिक खाना पहले ही खत्म हो चुका था, जो बचा था उसी में से शुरू के एक सप्ताह तक हमलावरों ने भी खाया।

मजबूत होते नक्सली

िसयासतदानों के भाषणों में नक्सलवाद को उखा़ड फेंकने के दावे तो कई बार किये गये पर यह उख़डने की बजाय तेजी से पसरता गया। िहन्दुस्तान के मानिचत्र पर 15 नवंबर,2000 को 28वें राज्य के रूप में झारखंड का उदय हुआ। झारखंड अब पूरे आठ साल का हो चुका है। इन आठ सालों में कई क्षेत्रों में बहुत कुछ बदला, लेकिन नहीं बदल सका तो वर्षों से चला आ रहा नक्सली आंदोलन का स्वरूप। उम्मीद तो यही की जा रही थी िक राज्य की िसयासतदान झारखंड में अपना नया रंग िदखाएंगे और खद्दर (खादी) के रास्ते नक्सलवाद धीरे-धीरे दम तो़ड देगा। लेिकन उम्मीद के उलट िपछले आठ सालों में मुख्यमंत्रियों के चार चेहरे बदले। लेकिन अफसोस की ये चारों मुख्यमंत्री झारखंड के नक्सली चेहरे को बदलने में नाकामयाब ही रहे। इन आठ सालोें में ही ऐसे हालात उत्पन्न हो गये िक नक्सिलयों की हिंसक तेवर से राजधानी रांची भी थर्राने लगी।
वैसे तो संयुक्त िबहार के झारखंड वाला िहस्सा पहले से ही नक्सलियों की िगरफ्त में रहा है लेकिन जिस तेजी से िपछले आठ सालों में नक्सलियों ने अपना दबदबा कायम िकया है। वह सरकार के िलए एक क़डी चुनौती बन गयी है। नवंबर, 2000 में प्रदेश के 18 िजलों में से 9 ही नक्सलियों की िगरफ्त मेंं थे, जहां उनकी अपनी अदालतें लगती थीं और नक्सिलयों की लाल सेना कानून को धत्त्ाा बताते हुए अपना फैसला सुनाया करती थी। तब नक्सिलयों का ध़डा भी बंटा हुआ था लेिकन नवंबर, 2004 में एमसीसी और पीपुल्सवार का िवलय हुआ और नयी माओवादी संगठन भाकपा (माओवादी) ब़डी ताकत के साथ उभरा। देखते ही देखते संपूर्ण झारखंड नक्सिलयों की आगोश में समा गया। आज हालात ऐसे हैं िक राज्य पुिलस के अलावा केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद 24 में से 22 िजले नक्सलियों की िगरफ्त में आ गये हैं। इनमें से 16 िजलों में उनकी अपनी हुकूमत चल रही है। झारखंड का "चतरा' इलाका छत्त्ाीसग़ढ का "बस्तर' सािबत हो रहा है जहां के सुदूर इलाकों में दिन के उजाले में भी पुिलस जाने से कतराने लगी है। वहीं 120 से अिधक थाने नक्सलियों के ही रहमोकरम पर सुरिक्षत चल रहे हैं। मात्र आठ वर्षों में ही एक सांसद, दो विधायक, एक एसपी व दो डीएसपी समेत करीब 400 पुिलस व सुरक्षाबल नक्सलियों की गोलियों के िशकार हुए हैं। वहीं 900 आम नागरिक भी नक्सली हिंसा में मारे गये हैं। हालांिक नक्सिलयों के तांडव को रोकने के लिए सरकार ने भी दबिश बनाने की कोिशश की है। इस दौरान दर्जनों हार्डकोर नक्सली हिरासत में िलए गये हैं। फिर भी िजस तरीके से नक्सलियों का हिंसक तेवर िसयासतदानों को थर्रा रहा है उसके मुकाबले पुलिसिया दबिश बरसात में पानी के बुलबुले की तरह ही सािबत हो रही है।
आश्चर्य तो यह िक सरकार की सारी लोक-लुभावन घोषणाओें व योजनाओं को धत्त्ाा बताते हुए तेजी से मिहलाओं का भी नक्सिलयों के प्रित आकर्षण ब़ढा है। आिखर क्या कारण है िक इतने अल्प समय में ही ग्रामीण मिहलाएं व किशोर व्यवस्था को चुनौती देते फिर रहे हैं और अपनी आवाज हिंसक तेवर के साथ सुनाने को उतावले हैं। इस बाबत सामाजिक िवश्लेषक प्रो.रामदयाल मुंडा बताते हैं िक आठ साल बीतने के बावजूद सत्त्ाा की हुकूमत असली आदिवािसयों के हाथों में नहीं पहुंची है। चारों आेर लूट-खसोट मची हुई है। जबतक प्रदेश की हुकूमत साम्राज्यवादी पूंजी के इर्द-िगर्द मंडराती रहेगी, नक्सलवाद का वीभत्स चेहरा सामने आता जाएगा। प्रशासिनक उपेक्षाओं और पूंजीपितयों, ठेकेदारों और उद्योगपितयों के शोषण ने झारखंड के आिदवासी अंचलों में प्रितिक्रया के रूप में नक्सलवाद को सिक्रय होने का अवसर जुटाया है।
नक्सली िवद्रोह को सामाजिक-आिर्थक समस्या मानने वाले मुख्यमंत्री िशबू सोरेन एक ओर नक्सलियों को बातचीत के िलए खुला आमंत्रण देते फिर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर झारखंड एवेन्यू, नारी मुिक्त संघ, क्रांितकारी किसान समिित व क्रांितकारी सांस्कृितक संघ जैसे लोकतांत्रिक अिधकारों की आवाज बुलंद करने वाले संगठनों को प्रितबंिधत करके कुछ दूसरा संदेश दे रहे हैं। पीयूसीएल के महासचिव शिशभूषण पाठक बताते हैं िक शुरू से ही शोिषतों, गरीबों की आवाज बंदूक के बल पर दबाया गया परिणामस्वरूप यहां के ग्रामीण भी हिथयार से लैस होते गये और अपनी आवाज बंदूक से सुना रहे हैं।
नक्सलियों के शिकार पुिलस व आम नागरिक (आंक़डों में)
वर्ष पुलिस आम नागरिक
2001---56
---------107
2002----69--------77
2003----20---------93
2004----45------106
2005----30------79
2006-----45-----93
2007------11-----175
2008(अक्तूबर तक)---34---124
क्षितग्रस्त सरकारी भवन
वर्ष
2002-----04
2003-----06
2004-----14
2005-----06
2006-----15
2007-----12
2008(अक्तूबर)----10
9 जुलाई,2008---झारखंड के बुरूहातू गांव में माओवािदयों ने पूर्व मंत्री व िवधायक रमेश सिंह मुंडा को गोली मार कर हत्या कर दी।
15 अप्रैल, 2008---माओवादी बंदी के दौरान झारखंड के चांिडल में दो आम लोगों की हत्या
26 अप्रैल, 2008---झारखंड के दुमका के िशकारीपा़डा इलाके मेें एक एएसआई, 3 पुलिसकर्मी मारे गये, 6 घायल।
8 अप्रैल,2008---माओवादी व शांितसेना के बीच आपसी झ़डप में शांितसेना के आठ लोग मारे गये। इसमें सेना प्रमुख भादो सिंह शामिल है।
एक अप्रैल, 2008---हजारीबाग के िबष्णुगढ इलाके में मुठभे़ड में 9 सीआरपीएफ मारे गये, 11 घायल वहीं दूसरी ओर, खूंटी िजले में 4 ग्रामीणों की हत्या माओवािदयों ने कर दी।
9 फरवरी, 2008---िगरीडीह के घने जंगलों में माओवािदयों ने परितांड थाने को उ़डा िदया वहीं सौ से अधिक पुलिसकर्मी दो दिनाें तक माओवादियों से िघरे रहे।
30 अगस्त, 2008---झारखंड के घाटिशला क्षेत्र में बारूदी सुरंग िवस्फोट में एक इंस्पेक्टर समेत 12 पुिलसकर्मी मारे गये।
(िशबू को सत्त्ाा संभालते ही माओवादियों ने िवस्फोट कर एक ब़डी चुनौती दी है। गौरतलब है कि माओवादियों ने यूपीए सरकार के न्यूक्लीयर डील के िवरोध मंें िहंसक वारदातों को अंजाम देने की पहले ही चेतावनी दे रखी है।)

छत्त्ाीसग़ढ में रमन प्रभाव

प्रदेश में न नक्सिलयों की चली और न ही कांग्रेसियों की बल्कि स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा दूसरी बार सत्ता में लौटी है। 90 विधानसभा सीटों में से 50 सीटें भाजपा को मिली हैं। कांग्रेस की झोली में 37 सीटें गयी हैं। वैसे तो भाजपा को वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भी 50 सीटें हासिल हुई थीं और 39.26 फीसदी मत प्राप्त हुआ था वहीं इस बार उसका वोट बैंक ब़ढकर 40.36 फीसदी हो गया है। जबकि कांग्रेसी वोट बैंक में भी दो फीसदी की ब़ढोतरी हुई है। hलकी प्रदेश में सबसे अिधक मतों से जीतने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ही रहे। मारवाही िवधानसभा सीट वे हैिट्रक बनाते हुए 42092 मतों से विजयी घोिषत हुए हैं। वहीं प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपनी उपस्िथित दर्ज कराने में सफल रही है। उसने दो सीटों पर अपना कब्जा जमाया है।
"चावल बाबा' के नाम से प्रिसद्ध हो चुके डा. रमन सिंह की राजनीति "चावल' के इर्द-िगर्द ही उफनती रही। "राम-कृष्ण हरे-हरे, कमल छाप घरे-घरे' के नारे लगाते हुए रमन मंत्रीमंडल ने गरीबों के लिए तीन रुपये के िहसाब से प्रितमाह 35 िकलोग्राम चावल देने का वायदा ही नहीं िकया बल्िक उसे पूरा भी किया। वहीं सरकार ने िकसानों के लिए अपनी पूरी झोली खोल दी और ब्याज दर 14 फीसदी से घटाकर तीन फीसदी कर दिया। इसका उसे फायदा भी हुआ। इसकेे अलावा महंगाई,गरीबों के साथ न्याय, गांवों के विकास व रोजगार के साथ ही नक्सलवाद का मुद्दा भी प्रभावी रहा। हालांिक कांग्रेस ने तीन रुपये के बदले दो रुपये चावल देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र ने किया लेकिन भाजपा ने एक रुपये किलो चावल देने का गुगली फेंककर कांग्रेस को घेर लिया। वहीं रमन सिंह का सौम्य छवि भी कांग्रेस के िलए भारी प़डा। बतौर मुख्यमंत्री वे चुनावी सभाओं में गये जिसके सामने अजीत जोगी टिक नहीं सके। यही नहीं आपसी कलह की वजह से कांग्रेस न तो भ्रष्टाचार का मुद्दा सकी और न ही सत्त्ाा विरोधी लहर (एंटी इनकंबेन्सी ) का ही लाभ ले सकी। अनमने ढंग से ही सही लेिकन नक्सिलयों के मुद्दे पर मौन रहने वाली कांग्रेस पार्टी को नक्सल प्रभािवत क्षेत्रों में भी करारा झटका लगा और बस्तर, बीजापुर समेत अन्य क्षेत्रों में उसे मुंह की खानी प़डी। वहीं भाजपा के लिए सलवा जुडूम अिभयान रंग लाया। जहां उसे मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिला। िवश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस ने मतदाताओं के सामने बेहतर िवकल्प पेश नहीं किया परिणामत: भाजपा को फायदा हुआ।
राज्य के इितहास मेें पहली बार बुलेट (नक्सली धमकी) पर बैलेट (लोकतंत्र) भारी रहा। सूबे के नक्सल प्रभािवत बस्तर, सरगुजा, बीजापुर व नारायणपुर समेत अन्य इलाकों में मतदाताओं ने भाजपा को जीताकर एक संदेश भी िदया है िक सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ जो सलवा जुडूम अभियान चलाया था वह जनता के हितों की रक्षा के लिए ही था। इन इलाकाें में 61 फीसदी मतदान इस बात का गवाह है कि आने वाले िदनों में इस इलाके में लोकतंत्र का ही बयार बहेगा। सारे पूर्वानुमान को तो़डते हुए नक्सल प्रभािवत इलाकों में भाजपा की भारी जीत सूबे में ही नहीं, देशव्यापी राजनीितक प्रेक्षकों के सामने एक सवाल ख़डा कर दिया है। नक्सली प्रजातंत्र के िवरोधी तो रहे ही हैं। वे भाजपा को एक सांप्रदाियक पार्टी भी मानते रहे हैं। बावजूद इसके इस क्षेत्र में नक्सिलयों की ब़ढी गतिविधियों व वारदातों के बाद भी आिदवासी बहुल बस्तर के लोगों ने भाजपा को अपना िवश्वास देकर सबको चौंका दिया है। गौरतलब है िक चुनाव के पूर्व मानवािधकार संगठनों के यह दावा किया था िक नक्सली आतंक व सलवा जुडूम के कारण दिक्षणी बस्तर के ही 200 से अिधक गांव खाली हो गये हैं जबिक मतदान के बाद इस बात का खुलासा हुआ है िक पूरे बस्तर संभाग में 55 मतदान केन्द्रों पर ही नक्सलियों की धमकी का असर दिखा।
इस चुनाव में सरकार के खिलाफ माहौल नजर नहीं आया। फिर भी सरकार में शािमल कई िदग्गजों को हार का मुंह देखना प़डा। केन्द्रीय नेतृत्व लोकसभा चुनाव को देखते हुए अभी से ही आत्ममंथन में जुट गयी है। एक ओर जहां सत्त्ााधारियों में िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय, स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर, कृिष मंत्री मेघाराम साहू, आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत, सत्यानन्द राठिया चुनाव हार गये वहीं प्रदेश में नक्सलियों के घोर िवरोधी रहे कांग्रेसी नेता महेन्द्र सिंह कर्मा, कांग्रेस िवधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल, प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा को भी हार का मुंह देखना प़डा। राज्य के चुनावी इितहास में यह पहला मौका है जबिक चुनाव ल़डने वाले सभी प्रमुख दलों के प्रदेश अध्यक्षों को िशकस्त का सामना करना प़डा।
फिर भी भाजपा का यह जनादेश कांटों भरा ताज है। आने वाले दिनों में अपने चुनावी वायदे पर सरकार को खरा उतरना होगा तभी यह िवश्वास स्थायी जनाधार में तब्दील हो सकता है। सूबे के परिणाम ने स्पष्ट िकया है ब़डे चुनावी मुद्दे न ही राज्यों पर हावी होता है और ही राज्यों के मुद्दे लोकसभा चुनाव में ज्यादा कारगर सािबत हो सकते हैं।
िदग्गज हारे
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष िवष्णुदेव साय
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू
एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष नोबेल वर्मा
िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय
नेता प्रितपक्ष महेन्द्र सिंह कर्मा
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा
कांग्रेस विधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल
स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर
कृिष मंत्री मेघाराम साहू
आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत
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िदग्गज जीते
राजनांदगाव से मुख्यमंत्री रमन सिंह विजयी
मरवाही से पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी विजयी
कोटा से कांग्रेस की डा. रेणु जोगी विजयी
रामविचार नेमात (गृहमंत्री)
बृजमोहन अग्रवाल (रायपुर दक्षिण), राजस्व मंत्री
अमर अग्रवाल (बिलासपुर), नगरीय प्रशासन मंत्री
राजेश मूणत (रायपुर पश्िचम) पीडब्लूडी मंत्री
दुर्ग से भाजपा के हेमचंद यादव
िबलासपुर िसटी से भाजपा के अमर अग्रवाल
कांकेर से भाजपा की सुिमत्रा मरकोले
दंतेवा़डा से भाजपा के भीमा मांडवी ने
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संकट में माओवादी राजनीति

रोल्पा में नेपाली सरकार की नहीं, आज भी माओवादियों की सत्ता है। इस जिले में न तो सरकार की नीतियां लागू हैं और न ही सरकारी कायदे कानून। कमोवेश यही स्थिति रुकुम, डोल्पा, जाजरकोट, चितवन, दैलेख, उदयपुर, सिन्धुली समेत पश्चिमांचल से लेकर पूर्वांचल तक के 60 जिलों की है। लगातार 10 वर्षों तक राजशाही को चुनौती देने वाले नेपाली छापामार इन दिनों पूरी तरह से बेरोजगार हो चुके हैं। इनकी बेरोजगारी पार्टी को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया है। एक ओर प्रचंड गठबंधन धर्म निभाने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर उन्हें पार्टी के आंतरिक संघर्ष से भी दो-चार होना पड़ रहा है।
पार्टी के तीन बड़े नेताओं पुष्प कमल दहल "प्रचंड', बाबूराम भट्टाराई औैर रामबहादुर थापा उर्फ बादल के सरकार में शामिल होने के बाद पोलित ब्यूरो में बचे हुए लोग चाहते हैं कि पार्टी का नेतृत्व उनके हाथों में सौंप दिया जाए। इस दौर में गुरिल्ला आर्मी की ओर से कृष्णबहादुर महरा और मोहन वैद्य उर्फ किरन सबसे आगे चल रहे हैं। ये दोनोंं नेता कट्टर माओवादी व हार्डकोर सदस्य माने जाते हैं। सूत्रों का कहना है कि गुरिल्ला कैम्पों में रह रहे लगभग 20 हजार महिला-पुरुष छापामारों पर दोनों नेताओं का काफी असर है। इनके समर्थकों का मानना है कि प्रचंड "जनयुद्ध' से अपना ध्यान पूरी तरह से हटा लिये हैं और "संसदीय राजनीति' के कुचक्र में फंसते चले जा रहे हैं। नेपाली मीडिया का भी कहना है कि प्रचंड इन दिनों गहरे राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। यह संकट सरकार में शामिल सहयोगी दलों से भी है और अपनी पार्टी से भी। पार्टी के आंतरिक विद्रोहियों का कहना है कि प्रचंड पूरी तरह से संशोधनवादी लाइन अख्तियार करते जा रहे हैं। (मार्क्सवादियों की भाषा में कम्युनिस्टों के लिए संशोधनवाद एक गाली है।) आश्चर्य तो यह कि कभी नेपाली माओवादी पार्टी 1974 के बाद के चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को संशोधनवादी घोषित की थी। लेकिन बदले माहौल में प्रचंड ही संशोधनवादी करार दिये जा रहे हैं। प्रचंड विरोधी खेमे के तेवर को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में अगर प्रचंड गुरिल्ला आर्मी और माओवादियों द्वारा जब्त किये गये भू-माफियाओं की संपत्तियों पर जल्द कोई कारगर निर्णय नहीं लिए, तो हो सकता है कि प्रचंड स्वयं सशस्त्र संघर्ष करने वाले माओवादी पार्टी से ही अलग-थलग नहीं पड़ जाएं। इसके संकेत भी दिखने लगे हैं। सरकार चलाने में मशगूल दिख रहे प्रचंड अब तक न तो शिविरों में रह रहे छापामार लड़ाकों के लिए कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाए हैं और न ही समान भूमि वितरण के बारे में उनकी कोई सोच दिख रही है। प्रचंड के विरोधियों का कहना है कि सरकार के पास विकास की स्पष्ट कोई नीति नहीं दिख रही है और न ही वह बाहरी निवेशकों को आकर्षित करने में सफल रहे हैं। देश में जमींदारों की संख्या सैैंकड़ों में हैं जिनके पास खेती योग्य 65 फीसद भूमि हैं। इन खेतिहर जमीनों पर माओवादियों का अवैध कब्जा अभी भी बरकरार है। देशवासी घोर बिजली संकट झेल रहा है। 70 फीसद आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है। 85 फीसद लोग आज भी गांवों में रह रही है। देशवासी पीने के पानी और सफाई व रोजी-रोजगार की बुनियादी सुविधाओं का नामोनिशान नहीं है।
कुछ दिनों पहले ही पार्टी की केन्द्रीय कमिटी की बैठक में "जनवादी लोकतंत्र' और पार्टी के नाम पर प्रचंड लाइन का 11 में से 8 सदस्यों ने जमकर विरोध किया। बावजूद इसके इन विरोधों का प्रचंड पर कोई असर नहीं दिख रहा है। इस बाबत उन्होंने कहा कि जब वर्ष 2005 में पार्टी भूमिगत संघर्ष छोड़कर राजशाही के खात्मे के लिए सड़कों पर निकली थी तब भी कुछ इसी तरह के कयास लगाये जा रहे थे कि पार्टी अब टूटी, तब टूटी। लेकिन जब उस समय ऐसे विरोध का कोई असर नहीं हुआ तब अब क्या होगा। प्रचंड चाहे जो भी कहें लेकिन इस सच्चाई से कौन इनकार कर सकता है कि जो युवा बंदूक के सहारे व्यवस्था परिर्वतन करने का सपना देखकर "जनयुद्ध' में शामिल हुए थे। जिन लोगों ने "जनयुद्ध' में अपनी पूरी ताकत झोंकी थी और करीब 13 हजार लोगों की शहादतों का लाभ आखिर संसदीय राजनीति करने वाले कैसे उठा सकते हैं। किरन समेत अन्य विरोधियों को मिल सकता है।
हाल ही में प्रचंड में नेपालगंज के एक सभा में कहा, "सरकार चलाने से आसान है बंदूक के सहारे क्रांति करना।' वैसे तो इस बयान से प्रचंड एक ही साथ कई निशाने साधने की कोशिश में थे लेकिन पार्टी के अंदर इस बात से एक बार फिर भूचाल आ गया है। इसी सभा में उन्होंने आगे कहा,"जब पार्टी सत्ता में होती है, ऐसे मतभेद आते ही रहते हैं। प्रचंड ने कहा कि मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बता चुका हूं कि माओवादियों को सिर्फ देश की चिंता है और वे लोकतांत्रिक मूल्यों का आदर करते हैं।' फिर भी पार्टी के अंदर उठे राजनीतिक भूचाल जब शांत होता नहीं दिखा तो उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में अपने इस्तीफे की धमकी भी दे डाली। अब तक नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड ऐसी चार बार धमकियां दे चुके हैं।
एक ओर प्रचंड संसदीय रास्ते से क्रांति का राग अलापने में लगे हैं वहीं कट्टरपंथियों के आगे उनकी बेबसी भी साफ झलक रही है। जब वे नेपालगंज में जनता को सत्ता चलाने के गुर सिखला रहे थे। उसके कुछ दिनों के बाद काठमांडू में कम्युनिस्ट युवा लीग के दर्जनभर समर्थकों ने "हिमालयन टाइम्स' के दफ्तर में धावा बोलकर संपादक समेत अन्य मीडियकर्मियों को मारा-पीटा। इसका नेपाल में खासा विरोध हुआ। बावजूद इसके प्रचंड राजनीतिक बयान देकर इस मामले में माओवादियोंे का हाथ होने से इंकार करते रहे। लेकिन जब मीडिय समेत अन्य नेपाली समुदाय का दबाव काफी बढ़ गया तो उन्हें दबाव में आकर इस घटना की जांच की घोषणा करनी पड़ी। यह तो एक उदाहरण मात्र है। नेपाल के सुदूर इलाकों में संघर्ष के दिनों की तरह ही अभी भी माओवादी बेलगाम होकर हिंसक वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
दक्षिणी तराई क्षेत्र समेत कई ऐसे इलाके हैं जहां इन दिनों घोर अशांति छाई हुई है। यहां माओवादियों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि कानून-व्यवस्था की स्थापना के लिए गुरिल्ला सेना के उप कमांडर रह चुके जनार्दन शर्मा के नेतृत्व में एक सप्ताह पहले ही जनतांत्रिक तराई मुक्ति मोर्चा के बीच पांच सूत्री एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर हुआ है। आंतरिक सूत्रों का कहना है कि प्रचंड माओवादियों के वैसे सारे कैडरों से गुप्त बाचचीत की फिराक में हैं जो हथियार छोड़ना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में माओवादियों का आतंरिक संकट किस करवट मोड़ लेगा फिलहाल कहना मुश्किल है।
नवंबर महीने में ही पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसमें भी दोहरा संघर्ष (टू लाइन स्ट्रगल) उभरकर सामने आया। इसके पहले भी केन्द्रीय कमिटी की बैठक में प्रचंड 11 में से 8 सदस्यों ने प्रचंड लाइन का विरोध किया था। इस बाबत मोहन वैद्य का कहना है कि जनवादी लोकतंत्र (साम्यवाद) के लिए ही करीब 13 हजार माओवादियों ने अपने प्राणों को न्योक्षावर किया है। न की मिश्रित अर्थव्यवस्था के लिए। जिसके प्रचंड हिमायती हैं।
अब सवाल उठता है कि शिविरों में रह रहे छापामारों पर इस बयान का असर किस रूप में पड़ता है। क्योंकि छापामारों को प्रचंड ने चीनी कम्युनिस्ट नेता माओत्सेतुऽग के नारे को सिखलाया था,"सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।' इस नारे को शिविरों में रह रहे हजारों लड़ाके अभी भी नहीं भूले हैं। नाम नहीं छापने की शर्त्त पर एक माओवादी छापामार ने बताया कि सोवियत नेता लेनिन ने यह भी कहा था कि नेताआें पर बराबर दुश्मन की निगाह रखना चाहिए। शायद कुछ हद तक माओवादियों की गुरिल्ला आर्मी प्रचंड पर पैनी निगाहें रख रही है।
इधर नेपाली माओवादी पार्टी की हर गतिविधियों पर भारतीय माओवादियों की भी पैनी निगाहें हैं। भारतीय माओवादी अभी भी प्रचंड लाइन के विरोधी हैं और सशस्त्र विद्रोह छेड़े हुए हैं। यही नहीं सूत्रों का कहना है कि नेपाली माओवादी के दूसरे गुट (हार्डकोर) से भारतीय माओवादियों का संपर्क लगातार बढ़ते जा रहा है। फिर भी प्रचंड लाइन पर भारतीय माओवादी दो खेमों में दिख रहे हैं। बिहार-बंगाल स्पेशल एरिया कमिटी के सचिव रहे माओवादी राजनीति के समर्थक व बंदी मुक्ति संग्राम समिति के अध्यक्ष पूर्व विधायक रामाधार सिंह कहते हैं कि दुनिया में प्रचंडवाद स्वीकार्य नहीं हो सकता। क्योंकि कभी सर्वहारा क्रांति का राग अलापने वाले प्रचंड इन दिनों संसदीय राग अलापने लगे हैं। वहीं नाम नहीं छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ भारतीय माओवादी बताता है कि संघर्ष की भी एक सीमा होती है। जनता के सामने राजशाही का खात्मा असली मुद्दा था। अब जबकि राजशाही खत्म हो चुकी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि शायद दूसरे चरण में वहां भी माओत्सेतुऽग की तरह सांस्कृतिक क्रांति की ओर प्रचंड बढ़े।

Wednesday, December 10, 2008

chhatishgarg में रमन प्रभाव

प्रदेश में न नक्सिलयों की चली और न ही कांग्रेिसयों की बल्िक स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा दूसरी बार सत्त्ाा में लौटी है। 90 विधानसभा सीटों में से 50 सीटें भाजपा को मिली हैं। कांग्रेस की झोली में 37 सीटें गयी हैं। वैसे तो भाजपा को वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भी 50 सीटें हािसल हुई थीं और 39.26 फीसदी मत प्राप्त हुआ था वहीं इस बार उसका वोट बैंक ब़ढकर 40.36 फीसदी हो गया है। जबकि कांग्रेसी वोट बैंक में भी दो फीसदी की ब़ढोतरी हुई है। हालांिक प्रदेश में सबसे अिधक मतों से जीतने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ही रहे। मारवाही िवधानसभा सीट वे हैिट्रक बनाते हुए 42092 मतों से विजयी घोिषत हुए हैं। वहीं प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपनी उपस्िथित दर्ज कराने में सफल रही है। उसने दो सीटों पर अपना कब्जा जमाया है।
"चावल बाबा' के नाम से प्रिसद्ध हो चुके डा. रमन सिंह की राजनीति "चावल' के इर्द-िगर्द ही उफनती रही। "राम-कृष्ण हरे-हरे, कमल छाप घरे-घरे' के नारे लगाते हुए रमन मंत्रीमंडल ने गरीबों के लिए तीन रुपये के िहसाब से प्रितमाह 35 िकलोग्राम चावल देने का वायदा ही नहीं िकया बल्िक उसे पूरा भी किया। वहीं सरकार ने िकसानों के लिए अपनी पूरी झोली खोल दी और ब्याज दर 14 फीसदी से घटाकर तीन फीसदी कर दिया। इसका उसे फायदा भी हुआ। इसकेे अलावा महंगाई,गरीबों के साथ न्याय, गांवों के विकास व रोजगार के साथ ही नक्सलवाद का मुद्दा भी प्रभावी रहा। हालांिक कांग्रेस ने तीन रुपये के बदले दो रुपये चावल देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र ने किया लेकिन भाजपा ने एक रुपये किलो चावल देने का गुगली फेंककर कांग्रेस को घेर लिया। वहीं रमन सिंह का सौम्य छवि भी कांग्रेस के िलए भारी प़डा। बतौर मुख्यमंत्री वे चुनावी सभाओं में गये जिसके सामने अजीत जोगी टिक नहीं सके। यही नहीं आपसी कलह की वजह से कांग्रेस न तो भ्रष्टाचार का मुद्दा सकी और न ही सत्त्ाा विरोधी लहर (एंटी इनकंबेन्सी ) का ही लाभ ले सकी। अनमने ढंग से ही सही लेिकन नक्सिलयों के मुद्दे पर मौन रहने वाली कांग्रेस पार्टी को नक्सल प्रभािवत क्षेत्रों में भी करारा झटका लगा और बस्तर, बीजापुर समेत अन्य क्षेत्रों में उसे मुंह की खानी प़डी। वहीं भाजपा के लिए सलवा जुडूम अिभयान रंग लाया। जहां उसे मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिला। िवश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस ने मतदाताओं के सामने बेहतर िवकल्प पेश नहीं किया परिणामत: भाजपा को फायदा हुआ।
राज्य के इितहास मेें पहली बार बुलेट (नक्सली धमकी) पर बैलेट (लोकतंत्र) भारी रहा। सूबे के नक्सल प्रभािवत बस्तर, सरगुजा, बीजापुर व नारायणपुर समेत अन्य इलाकों में मतदाताओं ने भाजपा को जीताकर एक संदेश भी िदया है िक सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ जो सलवा जुडूम अभियान चलाया था वह जनता के हितों की रक्षा के लिए ही था। इन इलाकाें में 61 फीसदी मतदान इस बात का गवाह है कि आने वाले िदनों में इस इलाके में लोकतंत्र का ही बयार बहेगा। सारे पूर्वानुमान को तो़डते हुए नक्सल प्रभािवत इलाकों में भाजपा की भारी जीत सूबे में ही नहीं, देशव्यापी राजनीितक प्रेक्षकों के सामने एक सवाल ख़डा कर दिया है। नक्सली प्रजातंत्र के िवरोधी तो रहे ही हैं। वे भाजपा को एक सांप्रदाियक पार्टी भी मानते रहे हैं। बावजूद इसके इस क्षेत्र में नक्सिलयों की ब़ढी गतिविधियों व वारदातों के बाद भी आदवासी बहुल बस्तर के लोगों ने भाजपा को अपना िवश्वास देकर सबको चौंका दिया है। गौरतलब है िक चुनाव के पूर्व मानवािधकार संगठनों के यह दावा किया था िक नक्सली आतंक व सलवा जुडूम के कारण दिक्षणी बस्तर के ही 200 से अिधक गांव खाली हो गये हैं जबिक मतदान के बाद इस बात का खुलासा हुआ है िक पूरे बस्तर संभाग में 55 मतदान केन्द्रों पर ही नक्सलियों की धमकी का असर दिखा।
इस चुनाव में सरकार के खिलाफ माहौल नजर नहीं आया। फिर भी सरकार में शािमल कई िदग्गजों को हार का मुंह देखना प़डा। केन्द्रीय नेतृत्व लोकसभा चुनाव को देखते हुए अभी से ही आत्ममंथन में जुट गयी है। एक ओर जहां सत्त्ााधारियों में िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय, स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर, कृिष मंत्री मेघाराम साहू, आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत, सत्यानन्द राठिया चुनाव हार गये वहीं प्रदेश में नक्सलियों के घोर िवरोधी रहे कांग्रेसी नेता महेन्द्र सिंह कर्मा, कांग्रेस िवधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल, प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा को भी हार का मुंह देखना प़डा। राज्य के चुनावी इितहास में यह पहला मौका है जबिक चुनाव ल़डने वाले सभी प्रमुख दलों के प्रदेश अध्यक्षों को िशकस्त का सामना करना प़डा।
फिर भी भाजपा का यह जनादेश कांटों भरा ताज है। आने वाले दिनों में अपने चुनावी वायदे पर सरकार को खरा उतरना होगा तभी यह िवश्वास स्थायी जनाधार में तब्दील हो सकता है। सूबे के परिणाम ने स्पष्ट िकया है ब़डे चुनावी मुद्दे न ही राज्यों पर हावी होता है और ही राज्यों के मुद्दे लोकसभा चुनाव में ज्यादा कारगर सािबत हो सकते हैं।
िदग्गज हारे
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष िवष्णुदेव साय
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू
एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष नोबेल वर्मा
िवधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय
नेता प्रितपक्ष महेन्द्र सिंह कर्मा
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा
कांग्रेस विधायक दल के उपनेता भूपेश बघेल
स्कूल िशक्षा मंत्री अजय चन्द्राकर
कृिष मंत्री मेघाराम साहू
आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणोशराम भगत
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िदग्गज जीते
राजनांदगाव से मुख्यमंत्री रमन सिंह विजयी
मरवाही से पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी विजयी
कोटा से कांग्रेस की डा. रेणु जोगी विजयी
रामविचार नेमात (गृहमंत्री)
बृजमोहन अग्रवाल (रायपुर दक्षिण), राजस्व मंत्री
अमर अग्रवाल (बिलासपुर), नगरीय प्रशासन मंत्री
राजेश मूणत (रायपुर पश्िचम) पीडब्लूडी मंत्री
दुर्ग से भाजपा के हेमचंद यादव
िबलासपुर िसटी से भाजपा के अमर अग्रवाल
कांकेर से भाजपा की सुिमत्रा मरकोले
दंतेवा़डा से भाजपा के भीमा मांडवी
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Sunday, November 30, 2008

सुशासन की हकीकत

सूबे में जबतक सुशासन नहीं आएगा, यहां के हालात नहीं सुधर सकते। आप हमें तीन महीने का समय दीजिए, मेरी सरकार बनते ही भयमुक्त समाज का निर्माण होगा जिसमें न तो दोषियों को बचाया जाएगा और न ही निर्दोषों को फंसाया ही जाएगा।'
ये वायदे वर्ष 2005 के चुनावी सभाओं में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करते फिर रहे थे। लालू-राबड़ी शासनकाल में लगातार बिगड़ती जा रही कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने में नीतीश सरकार ने बहुत हद तक सफलता भी पाई है। देशभर में सबसे अधिक अपराधियों (26125) को सजा इसी राज्य में हुए। संगीन अपराध के जुर्म में 80 अपराधियों को निचली अदालत से फांसी की सजा हुई। जबकि 5616 को उम्रकैद तथा 1598 अपराधियों को 10 वर्ष से अधिक का कारावास की सजा सुनाई गयी है। 10 वर्ष से कम सजायाफ्ता अपराधियों की संख्या 18831 है। के बाद पहली बार बाहुबलियों पर शिकंजा कसा गया। हत्या के जुर्म में पूर्णिया के राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, सीवान के सांसद मो.शहाबुद्दीन, जिलाधिकारी जी.कृष्णैय्या हत्याकांड में पूर्व सांसद आनंद मोहन व उनकी पत्नी लवली आनंद, पूर्व विधायक अरुण कुमार व अखलाक अहमद, पूर्व विधायक राजन तिवारी तथा जदयू विधायक मुन्ना शुक्ला को फांसी व अन्य सजाएं सुनाई गयीं, वहीं दोहरे हत्याकांड के आरोपी लोजपा सांसद सूरजभान, डा. रमेश चन्द्रा अपहरण कांड में जदयू से निलंबित विधायक सुनील पांडेय, पूर्व मंत्री आदित्य सिंह, सपा विधायक रामदेव यादव समेत दर्जनभर नेताओं को निचली अदालत में सजा मुकर्रर हुई हैं।
हत्या के जुर्म में दाउदनगर अनुमंडल कारा में बंद गोह के जदयू विधायक प्रो.रणविजय कुमार, अतरी के पूर्व विधायक राजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री सुरेंद्र प्रसाद यादव, बनियापुर के जदयू विधायक धूमल सिंह, लोजपा विधायक रामा सिंह, डेहरी के विधायक प्रदीप जोशी, भाजपा विधायक नित्यानंद राय, राजद विधायक बब्लू देव समेत विभिन्न दलों के दो दर्जन विधायकों पर कानून की तलवार लटक रही है। {H$Z हाल के दिनों में जिस तरीके से जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह को दोहरे हत्याकांड से उबारने के लिए नियमों को ताक पर रखा गया उससे सरकार के इरादों पर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगे हैं। कहा जाता है कि इस हत्याकांड की सुनवाई के दौरान जब में प्रभुनाथ ने अपने बाहुबल का इस्तेमाल किया तो इस मामले को भागलपुर की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार भी लगाई। मामले की सुनवाई भागलपुर में शुरू हुई लेकिन वहां भी सरकारी हस्तक्षेप के मामले उजागर हुए। अंत में पटना सिविल कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई जहां से वे बाइज्जत बरी हो गये। हालांकि उक्त सांसद के एक अन्य मामले की सुनवाई पटना सिविल कोर्ट में चल रही है। पर इस बात की चर्चा है कि क्या इस बार भी गवाहों को सरकारी हथकंडों का इस्तेमाल कर प्रभावित किया जाएगा? इस बाबत पूर्व विधि मंत्री व राजद नेता शकील अहमद खान कहते हैंे कि सरकार राजनीतिक द्वेष से काम कर रही है। प्रभुनाथ सिंह प्रकरण में सारे नियमों को ताक पर रखा गया है और अनुभवहीन (10 वर्ष से कम अनुभव) एपीपी से बहस करवायी गयी। गवाहों को भी डराया-धमकाया गया। जबकि विपक्षी दलों के नेताओं को फटाफट सजा करवा दी जा रही है। शकील अहमद के आरोप कितने सच हैं इसका जवाब तो अपराध अनुसंधान में लगे पुलिस अधिकारी ही दे सकते हैं।ंकि यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें प्रभुनाथ सिंह बाइज्जत बरी हुए हैं। पुलिस सूत्रों की मानें तो इनका राजनीतिक सफर ही हत्या जैसे संगीन आरोपों से शुरू हुआ है। 1977 में जब वे पहली बार विधायक बने थे उस समय भी वे मशरख के कांग्रेसी विधायक रामदेव सिंह की हत्या के आरोपी थी। तब से लेकर अबतक इन पर तीन दर्जन से अधिक हत्या, लूट एवं अन्य अपराधों के आरोप लगे। फिर भी राजनीतिक पहुंच की बदौलत प्रभुनाथ बराबर कानूनी शिकंजे से बचते रहे।
टाल क्षेत्र के कुख्यात जदयू विधायक अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार के आपराधिक किस्से चर्चित रहे हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार अकेले मोकामा में ही उनपर हत्या, लूट व बलात्कार के दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं। तीन साल में पटना के कोतवाली थाने में ही पत्रकार को जान से मारने, जमीन हड़पने व रंगदारी के चार मामले दर्ज हुए हैं। बावजूद इसके अनंत singh पर हाथ डालने में पुलिस के पसीने छूट रहे हैं। इस बाबत राज्य पुलिस प्रवक्ता-सह-सहायक पुलिस महानिदेशक अनिल सिन्हा बताते हैं कि कानून अपना काम कर रहा है। समय आने पर अनंत सिंह भी कानून के शिकंजे में होंगे।
सूबे के देहाती इलाकों की कौन कहे, राजधानी पटना भी पूरी तरह से अपराधमुक्त नहीं हो पाया है। तीसरी वर्षगांठ के जश्न में डूबी सरकार को अपराधियों ने कड़ी चुनौती देते हुए 19 नवंबर को सुल्तानगंज थाने से महज 50 गज की दूरी पर दिनदहाड़े कांग्रेसी नेता यदुनंदन यादव को गोलियों से भून दिया। वहीं लुटेरों ने एनएमसीएच के पास पुलिस की मौजूदगी में ही एक दवा दुकान में जमकर लूटपाट की। इसके तीन दिन पहले राजधानी में ही बाटा शू कंपनी के कार्यकारी प्रबंधक को गोलियों से भून दिया गया।
स्पीडी ट्रायल के आंकड़ों के खेल में मशगूल नीतीश सरकार के तीन वर्ष के शासनकाल में ही करीब 2103 डकैतियां हुईं। 8474 निर्दोष नागरिक गोलियों के शिकार हुए। जिला मुख्यालयों समेत अन्य जगहों पर दिनदहाड़े लूट की 5034 व चोरी की 35693 घटनाएं हुईं। स्कूली छात्रों समेत 6487 लोग अपहृत हुए। सामंती जुर्म के लिए सदा से कुख्यात बिहार में नीतीश शासनकाल के दौरान 3005 मासूमों एवं अबलाओं की अस्मत लूटी गई। लूट व छिनतई की 3552 व बैंक लूट व डकैती की 66 घटनाएं हुईं। आजादी के बाद बैंक लूट की अबतक की सबसे बड़ी घटना राजधानी के कंकड़बाग इलाके में हुई जहां घोड़े पर सवार लुटेरों ने 50 लाख रुपये लूट लिये। राजेन्द्र नगर व पटना जंक्शन के बीच चलती ट्रेन में दिनदहाड़े पूर्व डीआईजी की हत्या गोली मारकर कर दी गयी। बोरिंग रोड में सेवानिवृत आइएएस को गोलियों से भून दिया गया। पाटलिपुत्रा इलाके में प्रो. पापिया घोष हत्याकांड की गूंज देशभर में सुनी गयी। प्रदेश में तीन दर्जन से अधिक मानवाधिकार उल्लंघन के मामले भी प्रकाश में आए। phir भी अपराधों का यह आंकड़ा लालू-राबड़ी शासनकाल से काफी कम है
पाक साफ कोई नही ना लालू ना नीतिश
डीजीपी डीपी ओझा बताते हैं कि हमाम में सारे राजनीतिक दल नंगे हैं। इनका दावा है कि बिना राजनीतिक संरक्षण के अपराध हो ही नहीं सकते। पेश है बिहार की कानून-व्यवस्था पर संवाददाता श्याम सुन्दर के साथ हुई बातचीत के अंश
क्या सूबे में अपराधियों का मनोबल टूटा है?
हां, यह सही है कि प्रदेश में भयमुक्त समाज निर्माण की दिशा में सरकार के प्रयास दिखने शुरू हो गये हैं। फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं आए हैं। अपराधियों पर अंकुश लगाने में पुलिस बहुत हद तक सफल हुई है।
क्या पुलिस सत्ता के दबाव में भी काम करती है?
जब तक प्रशासनिक व पुलिस संगठन स्वायत्त नहीं होंगे तबतक राजनेताओं का हस्तक्षेप जारी रहेगा। जब मैं डीजीपी था, उस समय भी मैंने कहा था कि हमाम में सारे दल नंगे हैं। आज भी इस वाक्य पर मैं कायम हूं। अगर पुलिस का दबाव नहीं होता तो ऊं चे रसूख वाले सारे अपराधी, चाहे वे विधायक अथवा सांसद ही क्यों नहीं हों, नहीं बचते।
क्या सूबे में अभी भी सत्ता संरक्षित अपराधियों का बोलबाला है?
सीधे तौर पर तो नहीं कहा जा सकता। फिर भी पाक साफ न तो लालू प्रसाद हैं और न ही नीतीश कुमार व रामविलास पासवान। एक ओर जहां लालू को मो. शहाबुद्दीन जैसे बाहुबली सांसद की जरूरत है तो वहीं नीतीश कुमार को प्रभुनाथ सिंह एवं मोकामा विधायक अनंत सिंह की वहीं रामविलास पासवान को भी सूरजभान व मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबली नेताओं की दरकार है। राष्ट्रवाद का राग अलापने वाली भाजपा भी कम नहीं है। उसे भी नित्यानंद राय सरीखे लोग चाहिए। इन लोगों के रहते भयमुक्त समाज की कल्पना बेमानी है।
इसके जनता की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है?
जब राजनीति में अपराधियों का वर्चस्व बढ़ता है तब जनता असहाय हो जाती है। ऐसी स्थिति में जनता व सूबे की बेहतरी युवा ही सोच सकते हैं। युवाओं में अंगड़ाई शुरू हो गयी है। दो पीढ़ी आते-आते युवाओं की यही अंगड़ाई तूफान बनकर आएगी। नौजवान जागेगा, तो बदलाव अपने-आप आ जाएगा।
कैसा बदलाव आएगा?
यह एक बड़ा सवाल है। बदलाव वोट से आएगा या बंदूक से, फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह तय है कि तीन साल पहले नेपाली माओवादी नेता प्रचंड ने पशुपतिनाथ से तिरुपतिनाथ का जो नारा दिया था, उसका असर देश में भी दिखने लगा है।

Tuesday, November 11, 2008

...कहां गया हेलीकॉप्टर

रेड कोरिडोर बनाने का सपना देख रहे नक्सलियों ने पूरी तरह से छत्त्ाीसगढ़ को अपने कब्जे में ले रखा है। प्रदेश के बड़े इलाके में सुरक्षाकर्मी जाने से कतराते हैं। तभी तो बस्तर के आकाश से डेढ़ महीने पहले गायब हुआ रैन एयर (रैन बैक्सी गु्रप से संबद्ध) हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ने में सुरक्षा बल पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहा है। उसमें पायलट, सहायक पायलट, एक-एक इंजीनियर व तकनीिश्ायन सवार थे।
छत्त्ाीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ अबतक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ रखा है। इसमें सीआरपीएफ, सीएएफ, एसटीएफ के साथ ही एसपीओ को मिलाकर 12,600 जवान लगाये गये हैं। उसकी टोह में राज्य सरकार ने किराये पर पांच हेलीकॉप्टर ले रखा है। पुलिस व वायु सेना के जवान हेलीकॉप्टरों से अबतक 150 किलोमीटर की उड़ानें भर चुके हैं। इस अभियान में चार एयर बस भी लगाये गये हैं। 30 थाना क्षेत्रों में रेड अलर्ट घोषित किया गया है। फिर भी अबतक नतीजा सिफर ही रहा है। इस बाबत पुलिस प्रमुख विश्व रंजन का कहना है कि बारिश व खराब माैसम की वजह से विजिविलिटी (नजर आने वाली दूरी) 20 फीट से अधिक नहीं है। इसी वजह से हेलीकॉप्टर ढूंढ़ने में सफलता नहीं मिल पा रही है।
हैदराबाद से जगदलपुर आ रहा रैन एयर हेलीकॉप्टर बेल-430 तीन अगस्त को 4.30 बजे उड़ान भरा था। बताया जाता है कि 16 नाटिकल माइल्स (60 किलोमीटर) उड़ान भरने के बाद उसका वायुयान मार्ग नियंत्रण (एटीसी) से संपर्क भंग हो गया। इसे जगदलपुर से इंर्धन लेकर छत्त्ाीसगढ़ के गृहमंत्री रामविचार नेताम को लेने अंबिकापुर जाना था।
इस अभियान में लगे सुरक्षाकर्मियों को आशंका है कि हेलीकॉप्टर आंध्रप्रदेश-छत्त्ाीसगढ़ की सीमा पर या इससे लगे बस्तर के जंगलों में नक्सलियों के पास पहुंच गया है। शायद इसीलिए तलाशी की जद्दोजहद उसी इलाके में चल रही है। यह इलाका जंगलों-पहाड़ों से घिरा है आैर संयोग से नक्सलियों की गिरफ्त में है। हालांकि रिमोट सेंसिंग उपकरण ने संभावित जिन दो स्थलों को चिह्नित किया है उनमें से एक पर नक्सलियों के स्मारक मिले हैं जबकि दूसरी जगह पर ट्रैक्टर व पुलिस की जेसीबी। पुलिस महानिदेशक का कहना है कि हेलीकॉप्टर उड़ान भ्ारने के समय से ही नार्मल फ्लाइट पाथ यानी खम्मम, भद्राचलम आैर कोंटा होकर उड़ा ही नहीं। पायलट ने जंगलों, पहाड़ों वाला सीधा रास्ता अपनाया। उधर, मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है आैर हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ने में दुनिया की सबसे उच्च्ास्तरीय तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया है।
18,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में छेड़े गये अभियान की सफलता सिर्फ इतनी ही है कि यह क्षेत्र सिकुड़कर 8,000 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इस दाैरान नक्सलियों के साथ सुरक्षाकर्मियों का छह-सात बार मुठभेड़ हो चुकी है। दर्जनभर पुलिसकर्मियों ने शहादत भी दी है। 5 सितंबर को सुबह करीब 10.30 बजे छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में नक्सलियों के साथ पुलिस की मुठभेड़ हुई जिसमें तीन सीआरपीएफ व दो जिला पुलिस के जवान शहीद हो गये। इसका नेतृत्व बलरामपुर एसपी स्वयं कर रहे थे। पुलिस को इस बात की जानकारी मिली थी कि झारखंड सीमा से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर सामरी इलाके में नक्सलियों का कैंप चल रहा है उसमें करीब सौ नक्सली मौजूद हैं।
दूसरी ओर, गायब हुआ हेलीकॉप्टर नक्सलियों के कब्जे में ही है, ऐसा दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता। फिर भी हेलीकॉप्टर समेत गायब पायलट व अन्य चार लोगों को ढूंढ़ने की विनती उनके परिजनों ने नक्सलियों से की है। हेलीकॉप्टर में पायलट बीपी सिंह, सहायक पायलट कैप्टन आरके गाैर, इंजीनियर संतोष सिंह व तकनीिश्ायन अिश्वनी कुमार सवार थे।
उनके परिजनों ने नक्सलियों से मार्मिक अपील करते हुए निवेदन किया है कि उन लोगों से चार परिवारों का रोजी-रोटी जुड़ा हुआ है। इसलिए इंसानियत का ख्याल रखते हुए इस असमंजस की िस्थति से उबारने का प्रयास किया जाय। परिजनों का कहना है कि पुलिस दुर्गम जंगली इलाकोंं में नक्सलियों के डर से जाने से कतरा रही है।
नक्सलियों के खिलाफ अबतक का सबसे बड़ा अभियान
क्षेत्रफल-18,000 वर्ग किलोमीटर
जवान-12,600
कुल उड़ानें-100 घंटे
इस्तेमाल हेलीकॉप्टर-पांच (एयर फोर्स समेत)
इस्तेमाल एयर बस-चार
थाने अलर्ट-30

पहले बाढ़, अब सुखाड़/प्रकृति की दोहरी मार

एक ओर बाढ़ तो दूसरी ओर सुखाड़। बिहार के लोग कोसी की विभीषिका से अभी जूझ ही रहे थे कि राज्य का अधिकांश इलाका सूखे की चपेट में आ गया। लाखों हेक्टेयर में लगी धान की फसल सूख रही है। खरीफ फसल भी बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। सूबे में यह स्थिति सितंबर महीने में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश होने की वजह से उत्पन्न हुई है।
प्रदेश में 15 वृहद व 78 मध्यम नहर सिंचाई योजनाएं हैं। इनमें औरंगाबाद में 12, भागलपुर में 31, डेहरी में 4 व पटना जिले में 30 मध्यम योजनाएं हैं। अगर इन योजनाओं को ही सुचारू तरीके से चलाया जाए तो बहुत हद तक प्रदेश को सूखे से बचाया जा सकता था लेकिन इनका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। मौसम की बेरुखी सेे पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। हालांकि नीतीश सरकार के अस्तित्व में आते ही सूबे की तकदीर बदलने के लिए एक सार्थक प्रयास की शुरुआत की गयी थी लेकिन कोसी इलाके की बाढ़ व शेष इलाके में सुखाड़ ने सरकार के सारे प्रयासों को विफल कर दिया है। सूखे के कहर से प्रदेश के अधिकांश किसान त्राहिमाम कर रहे हैं।
बात चाहे सोन उच्चस्तरीय नहर के किनारे बसे औरंगाबाद जिले के ओबरा, दाउदनगर, अरवल व पटना के देहाती इलाके की हो या फिर उत्तरी कोयल सिंचाई परियोजना से सिंचित होने वाले औरंगाबाद, रफीगंज, नबीनगर, मदनपुर, बारूण (2 पंचायत), गुरूआ, गुरारू व टिकारी की। हर जगह पानी के लिए हाहाकर मचा हुआ है। "चावल का कटोरा' कहा जाने वाले कैमूर, भभुआ, भोजपुर व बक्सर के इलाके भी इससे अछूते नहीं रहे। धान की लहलहाती फसलें अंतिम पटवन के अभाव में मर रही हैं। कमोबेश यही स्थिति उत्तरी बिहार की गंडक परियोजना से लाभांवित होने वाले पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी व समस्तीपुर जिलों की भी है।
हालात ऐसे हैं कि जहानाबाद जिले के कुर्था,करपी, कांको, मखदुमपुर, कैमूर जिले के अधौरा, अरवल जिले के बैदराबाद, कलेर के निचले इलाके, जहानाबाद से सटे औरंगाबाद जिले के देवकुंड के साथ ही गोह के दक्षिणी इलाके, हमीदनगर पुनपुन बराज परियोजना के आसपास बसे गांव के साथ ही बक्सर जिले के चौसा इलाके के दर्जनों गांवों में पानी के लिए हिंसक झपड़ें तक हो चुकी हैं। किसानों के गुस्से का शिकार सासाराम में दो दिवसीय दौरे पर आईं केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार को होना पड़ा। आलमगंज की सभा में किसानों ने करमचट सिंचाई परियोजना को लेकर जमकर हंगामा किया।
गोह प्रखंड की झिकटिया पंचायत के पूर्व मुखिया नंदलाल सिंह बताते हैं कि अंतिम पटवन नहीं होने की वजह से धान की लहलहाती फसल मारी गयी। उन्होंने बताया कि गोह व रफीगंज इलाके में उत्तरी कोयल व टिकारी माइनर के आसपास के दर्जनों गांवों में भीषण सुखाड़ हो गया है। अगर दशहरा तक बारिश नहीं हुई तो इस इलाके में रबी फसल की भी बुवाई नहीं हो सकेगी, क्योंकि खेतों में दरारें पड़ गयी हैं। बारिश नहीं होने की वजह से धान के उत्पादन में कितना अंतर आएगा, इस संबंध में जब हमने कृषि निदेशक बी. राजेन्द्र सेजानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी स्पष्ट कहने से इंकार कर दिया।
पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह का कहना है कि शुरू में अच्छी बारिश हुई जिससे धान की अच्छी उपज होने की उम्मीद थी लेकिन सितंबर के शुरू से ही बारिश ने धोखा दे दिया। वहीं दोषपूर्ण जल बंटवारे की वजह से सोन नहर से सिंचित होने वाले इलाकोें में भी सिर्फ एक पटवन के लिए धान की फसल मारी गयी।
नीतीश सरकार जुलाई महीने में ही कर रही थी कि अतिवृष्टि की वजह से राजधानी पटना डूबा है। अगर उन दिनों वाकई सरकार का यह बयान सही था तो फिर सितंबर आते ही आखिर कैसे अधिकांश सिंचाई योजनाओं में पानी की किल्लत हो गयी? किसानों का कहना है कि अगस्त के अंतिम दिनों से ही तीखी धूप होने की वजह से खेतों में पानी की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। सितंबर के अंत तक इसने भयावह रूप ले लिया। राज्य सिंचाई कोषांग के निदेशक दिनेश कुमार चौधरी ने बताया कि अंतिम पटवन के अभाव में धान की फसलों को मरने नहीं दिया जाएगा। पानी के लिए मचे हाहाकार को देखते हुए ही सरकार उत्तर प्रदेश की रिहन्द सागर व मध्य प्रदेश की बांध सागर परियोजनाओं से प्रतिदिन 14275 क्यूसेक पानी खरीद रही है। यही पानी पश्चिमी सोन नहर में 9798 क्यूसेक व पूर्वी सोन नहर में 4477 क्यूसेक प्रतिदिन छोड़ा जा रहा है। जबकि गंडक परियोजना के मुख्य कैनाल में प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक व पूर्वी कैनाल में 5700 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। इससे उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में सिंचाई हो रही है।
सरकार के यह दावे अगर सही हैं तो फिर आखिर किन परिस्थितियों में सरकार ने सूबे के सभी हिस्सों के किसानों को अनुदान पर डीजल देने का ऐलान किया है। प्रधान सचिव विजय शंकर का कहना है कि 20 सितंबर को ही पानी के लिए मचे हाहाकार के मद्देनजर सरकार ने 63 करोड़, 16 लाख, 50 हजार रुपये जारी किये हैं। हालांकि जमीनी सच्चाई यह है कि घोषणा के 15 दिनों के बाद भी अबतक जिलाधिकारी को कोई आदेश नहीं मिले हैं। सवाल यह है कि इस अनुदान का लाभ किसानों को कब मिलेगा? नाम नहीं छापने की शर्त पर एक जिलाधिकारी ने बताया कि घोषणाएं पटना में हुई हैं। घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में महीनों लग सकते हैं।
प्रदेश में लघु सिंचाई योजनाएं भी कागजों पर ही दिखती हैं। अकेले बक्सर जिले में ही लगभग 120 पंपिंग सेट हैं लेकिन उनमें से अधिकांश बंद पड़े हैं। 15 पंपिंग सेट ठीक हालत में हैं भी तो खपत के अनुसार बिजली की आपूर्ति नहीं होने की वजह से ये पंप क्षमता के अनुसार पानी नहीं दे पा रहे हैं। स्थानीय बसपा विधायक हृदय नारायण सिंह बताते हैं कि पिछली राजद सरकार ने इलाके में सिंचाई की समस्या को दूर करने के लिए गंगा-चौसा पंप लाइन का निर्माण करवाया था लेकिन तीखी धूप के बावजूद सरकार जिले में औसत बिजली की आपूर्ति 32 के बजाय 15 मेगावाट कर रही है। इस वजह से सौ क्यूसेक पानी की क्षमता वाली यह परियोजना भी किसानों का साथ नहीं दे रही है। अधौरा प्रखंड में कर्मनाशा नदी पर बना पंप हाउस भी जंग खा रहा है। इससे लाभान्वित होेने वाले हजारों एकड़ जमीन में लगी फसल जल रही है। इधर 30 सितंबर को हुई बारिश से किसानों के चेहरे खिले दिख रहे हैं।
स्थिति की नजाकत इसी से समझी जा सकती है कि पानी बंटवारे को लेकर सूबे में पहली बार दो राज्यों के बीच विवाद खड़ा हो गया। औरंगाबाद के भाजपा विधायक रामाधार सिंह ने प्रदेश की 26 हजार हेक्टेयर जमीन में लगी धान की फसल को बचाने के लिए झारखंड प्रदेश के कुटकू बांध के समीप उत्तरी कोयल के मुख्य द्वार को ही काट दिया। इस संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में हुए समझौते के अनुसार बिहार को 2500 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए था लेकिन समझौते का उल्लंघन करते हुए झारखंड सरकार मात्र 1700 क्यूसेक पानी छोड़ रही थी जबकि उत्तरी कोयल को बिहार के एक लाख हेक्टेयर में सिंचाई करनी है।
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पानी से बिजली पर छिड़ी जंग
सूखे की चपेट में आए किसानों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए पक्ष-विपक्ष के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। पानी की किल्लत का ठीकरा विपक्षी नेताओं ने बिजली विभाग पर फोड़ना शुरू कर दिया है। राजद नेता व पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि अतिवृष्टि के बावजूद सितंबर महीने में ही सारे नदी-नाले सूख गये। जिन इलाकांें के किसान पंपिंग सेट से खेतों में सिंचाई करते थे वहां बिजली नहीं देकर सरकार दूसरे राज्यों को बेच रही है। उनका कहना है कि वैसे तो अधिकांश बिहार पहले से ही अंधेरे में डूबा हुआ है लेकिन जहां बिजली है वहां भी सरकार देने में सक्षम नहीं है। केंद्रीय पुल की बिजली में से 300 मेगावाट प्रतिदिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत अन्य दूसरे राज्यों को बेची जा रही है। दूसरी ओर, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह का कहना है कि केन्द्र सरकार बिहार के कोटे के अनुसार भी बिजली नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि औसतन बिजली का आवंटन सूबे में करीब 1400 मेगावाट है जबकि यहां मिल रही है मात्र एक हजार मेगावाट। पक्ष-विपक्ष के आरोप के बीच सच्चाई चाहे जो भी हो इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सूबे के अधिकांश इलाकों में औसतन बिजली प्रतिदिन पांच से छह घंटे ही मिल रही है।
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वृहद सिंचाई योजनाएं लाभांवित जिले
सोन उच्चस्तरीय नहर------भोजपुर, रोहतास, पटना, जहानाबाद, गया, औरंगाबाद
बदुआ जलाशय योजना----भागलपुर, मुंगेर
चंदन जलाशय योजना---भागलपुर
मोरहर सिंचाई योजना---गया
किउल जलाशय योजना---मुंगेर
कोसी योजना----पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, किशनगंज, सुपौल, अररिया
कुहिरा बांध-----कैमूर
मुसाखांड सिंचाई योजना---कैमूर
गंडक योजना-पूर्वी व पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर
लिलाजन सिंचाई योजना---गया
सकरी सिंचाई योजना---गया, नवादा
उदेरास्थान सिंचाई योजना---जहानाबाद, गया, नवादा
अपर मोरहर सिंचाई योजना--गया, नवादा
कमला, बलान, त्रिशुला सिंचाई योजना---मधुबनी