Tuesday, June 30, 2009

भ्रांति में फंसी क्रांति

माओवादियों के तेवर और क्रांति के वाम भटकाव के कारण हिंसक संघर्ष की घटनाओं ने सामाजिक-राजनीतिक तनाव को चरम पर ला दिया है।
"लालकिले की धरती को लाल बनाके छोड़ेंगे, पूरे हिंदुस्तान को नक्सलाइट बनाके छोड़ेंगे।'

लालकिले के सामने 15 अगस्त 2001 को जब प्रधानमंत्री देश को संबोधित करने वाले थे, उसके कुछ ही मिनट पहले ही इस नारे की गूंज सुनी गयी थी। नारा लगाने वाले अति वामपंथी छात्र संगठन डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन (डीएसयू) के सदस्य थे। इन छात्रों में से 15 को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया था। उस समय इस नारे के निहितार्थ को समझना आम लोगों के लिए थोड़ा कठिन था, लेकिन आज जब पश्चिम बंगाल का लालगढ़ इलाका माओवादियों की गर्जना से दहल रहा है, अब इस नारे की हकीकत समझ में आ रही है। हालांकि माओवादियों के लिए लालगढ़ पड़ाव है, ठहराव नहीं। ठहराव की खोज में माओवादी देश के 45 फीसदी भू-भाग पर पहुंच चुके हैं। 30 फीसदी जमीन माओवादियों के कब्जे में बतायी जाती है, जहां उनकी अपनी हुकूमत चलती है। नक्सलबाड़ी विद्रोह के समय से ही चीनी कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग को अपना आदर्श मानने वाले नक्सलियों की भाषा ही बंदूक मानी जाती है। लेकिन अचानक माओवादियों की जमात 15वीं लोकसभा चुनाव अभियान के समय से कुछ ज्यादा ही हिंसक हो गयी है। दरअसल बिहार के मैदानी इलाके आंध्र प्रदेश में नक्सलियों के रॉबिनहुड स्टाइल का जनता ने विरोध किया है। माओवादियों को करारा झटका तब लगा जब पांच लाख के इनामी जोनल कमांडर कामेश्र्वर बैठा और दिनकर यादव ने संसदीय रास्ता अख्तियार कर लिया। दूसरी ओर, आंध्र प्रदेश के राज्य सचिव ने इसी वर्ष मार्च में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
सरकार को नक्सलियों के नये हिंसक तेवर का आभास तो 14 अप्रैल को ही हो जाना चाहिए था, जब माओवादियों ने बिहार के कैमूर पहाड़ी पर बीएसएफ के एक अस्थायी कैंप पर रॉकेट लांचर हमला किया था। दिल्ली में बैठी सरकार तब से लेकर अब तक रणनीति बनाने में जुटी हुई है तो दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्से नक्सलियों के हिंसक तेवर से थर्रा रहे हैं। 10 जून को संसद में गृहमंत्री पी चिदंबरम नक्सलियों से निबटने के लिए विशेष योजना बनाने की घोषणा कर रहे थे, तो बिहार-झारखंड-उत्तरी ओड़िशा स्पेशल एरिया कमेटी की गुरिल्ला आर्मी झारखंड के पश्र्चिमी सिंहभूम स्थित सारूगढ़ा घाटी (सारंडा के जंगल) में बारूदी सुरंग विस्फोट कर एक इंस्पेक्टर समेत 11 जवानों को मौत की नींद सुला रही थी। सरकार कुछ समझ पाती, इसके पहले ही 12 जून को माओवादियों ने बोकारो के पास नवाडीह में अर्द्धसैनिक बलों पर हमला बोल दिया, जिसमें 11 जवान मारे गये। 18 जून को जब पुलिस के आला अधिकारी लालगढ़ को माओवादियों के कब्जे से मुक्त कराने के लिए अभियान छेड़ने की योजना बना रहे थे, माओवादी ओड़िशा के कोरापुट जिले के पालुर गांव के पास बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के नौ जवानों को उड़ा रहे थे। यह सिर्फ बानगी है। सच्चाई इससे भी भयावह है। खुद सरकार का मानना है कि 28 में से कम से कम 16 राज्यों के 210 जिले नक्सल प्रभावित हैं। सामाजिक कार्यकर्ता भी माओवादियों के इस तेवर से सकते में हैं। वहीं माओवादी पत्रिका "जन ज्वार के' संपादक त्रिवेणी सिंह ने "द पब्लिक एजेंडा' को बताया, "सामंतवाद से बड़ा दुश्मन बुर्जुवा पूंजीपति है, जिसकी रक्षा के लिए पुलिस और फौज है। माओवादियों को लग रहा है कि वर्तमान शोषण आधारित व्यवस्था को टिकाये रखने के लिए ही फौज और पुलिस है, इसलिए अर्द्धसैनिक बलों पर हमले तेज हो गये हैं।'
देश के ज्यादातर हिस्सों में किसी न किसी रूप में माओवादियों की मौजूदगी देखी जा सकती है। रेड कोरिडोर की पुरानी पड़ चुकी माओवादियों की योजना पर भाकपा (माओवादी) की नौवीं कांग्रेस में ही यह तय हो चुका था कि मुक्त क्षेत्र (लिबरेटेड जोन) बनाकर सरकार को चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके बाद नक्सली गुरिल्ला आधार पर क्षेत्र विस्तार में जुट गये। कभी ओड़िशा में सीआरपीएफ के जवान शहीद हो रहे हैं तो कभी महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों में माओवादी वारदातें हो रही हैं। फिलहाल सरकार नक्सलवादियों की आग को बुझाने के लिए बंदूक सहारा बना रही है। लेकिन सरकार को अपने पुराने अनुभवों से सीखने की जरूरत है। बंदूक का जवाब बंदूक से देने का ही नतीजा है कि दोनों (अर्द्धसैनिक बल और नक्सली) ओर से आक्रामकता और शत्रुता बढ़ती चली गयी।
भाकपा (माओवादी) के प्रवक्ता आजाद की मानें तो, "संसदीय रास्ते से समाज के गरीब तबके का विकास अगर संभव होता तो 60 साल के लोकतांत्रिक इतिहास में विकास की रोशनी से सुदूर ग्रामीण इलाका जगमगा उठता, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।' ग्रामीण विकास की योजनाएं सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ रही हैं। चाहे शिक्षित और संपन्न राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु हो या फिर बीमारू राज्यों में शुमार बिहार, झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश समेत अन्य राज्य, जमीनी स्तर के विकास का हाल हर जगह यही है। खुफिया सूत्रों की मानें तो हाल के दिनों में माओवादियों का फैलाव हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में भी हुआ है। लंबे समय से वाम सोच द्वारा शासित, पश्चिम बंगाल में भी आदिवासियों समेत अन्य पिछड़ी जमातों की समस्या दिनोंदिन विकराल होती जा रही है। परिणामत: रॉबिनहुड स्टाइल होने के बावजूद माओवादियों का समर्थन दिनोंदिन बढ़ता चला जा रहा है।
सन्‌ 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी और फांसी देवा में बंदूक उठाने वाले लोग चाहते थे कि जमींदारों और बड़े किसानों की सरप्लस (सीलिंग) भूमि गरीबों के बीच बांट दी जाये। पश्चिम बंगाल और केरल में इस दिशा में कुछ काम भी हुआ। लेकिन अन्य राज्यों में सरकारें नीतियां ही बनाती रह गयीं। लोग भुखमरी के शिकार होते रहे। उपेक्षा और विक्षोभ से उपजा आक्रोश अब इस कदर उद्वेलित हो गया है कि चाकू से गोदकर और पत्थरों से कूच-कूच कर पुलिस के जवानों की हत्याएं की जा रही हैं। पिछले महीने बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र में ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं। इस बाबत नक्सलियों के जो भी तर्क हों, लेकिन इस कार्रवाई को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता।
समय के साथ नक्सलबाड़ी से उठा तूफान पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया, लेकिन आज उसी के नाम पर राजनीति करने वालों की एक धारा जनसंघर्षों के माध्यम से संसदीय रास्ते पर चल रही है, तो दूसरी धारा, जिसका बड़ा हिस्सा (भाकपा (माओवादी) का शिकार है,) क्रांति के वैचारिक भटकाव के रास्ते पर आगे बढ़ रही है। इतिहास गवाह है कि राजनीति को प्रभावित किये बिना कोई भी आंदोलन ज्यादा दिन तक नहीं टिक सका है। नेपाल इसका ताजा उदाहरण है। हालांकि इसके पहले ही मिजो और नगा विद्रोहियों ने इसे समझा और बंदूक की राजनीति छोड़ दी। समाजवादी देश रूस और माओवादी चीन ने भी समय की गति के साथ अपने आपको बदला है। ऐसी स्थिति में क्या भारत की माओवादी ताकतें दुनिया के अन्य देशों से सबक लेंगी या यों ही क्रांति के वाम भटकाव में जान लेने और देने का क्रूर खेल चलता रहेगा।
हाल में घटी नक्सली घटनाएं

  • 19 जून, 2009 --उड़ीसा के कोरापुट जिले के पालुर गांव के समीप हुए बारूदी सुरंग में सीआरपीएफ के नौ जवान मारे गये।
  • 10 जून, २००९-- झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम से गोइलकेरा थानाक्षेत्र के सारूगढ़ा घाटी (सारंडा के जंगल) में माओवादियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट किया, जिसमें थानाप्रभारी, सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर समेत 11 जवान शहीद हो गये। दूसरी ओर, छत्तीसगढ के बीजापुर स्थित गंगालूर इलाके के कोरचूली इलाके में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ का असिस्टेंड कमांडेंट रामपाल सिंह मारे गये जबकि 5 जवान शहीद हो गये। इसके एक दिन बाद यानी 11 जून को माओवादियों ने इसी प्रदेश के दूसरे हिस्से में विस्फोट करके 11 जवानों को मौत की नींद सुला दिया।
  • 25 मई, 2009----महाराष्ट्र के गढ़चिरौली इलाके में भाकपा (माओवादी) ने एक बारूदी सुरंग में 15 से अधिक अधिकारियों और पुलिसकर्मियों को मौत की नींद सुला दिया।
  • 11 मई, २००९--- छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में घात लगाये नक्सलियों ने पुलिस बल के 15 जवान को गोलियों से भून दिया।
  • 12 अप्रैल, 2009 को ओड़िशा के कोटापुर जिले के नाल्को बॉक्साइड कंपनी पर हमला कर 7 सीआइएसएफ के जवानों को मौत की नींद सुला दी।
  • 11 अप्रैल, 2009 को खूंटी जिले के अड़की थाना क्षेत्र के जरको गांव में सुबह पांच बजे से दोपहर के एक बजे मुठभेड़ में 5 जवान मारे गये।
  • 27 मार्च, 2009 को चतरा में नामांकन करने जा रहे निर्दलीय प्रत्याशी इंदरसिंह नामधारी और कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थकों को नक्सलियोंं जमकर धुनाई की और चुनाव बहिष्कार की धमकी दी।
    15वीं लोकसभा चुनाव के दौरान पूरा देश नक्सली हिंसा से त्रस्त रहा। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अबतक सबसे अधिक हिंसा इसी चुनाव में हुई, जहां नक्सलियों ने 49 अर्द्धसैनिक बल के जवानों को गोलियों से भून दिया।
     

Wednesday, June 24, 2009

ब़ढती ताकत, घटती विचारधारा

पिछले कुछ वर्षों में झारखंड में नक्सलियों की ताकत और खौफ तो खूब ब़ढे हैं लेकिन उनकी वैचारिक प्रतिबधता लगभग खत्म हो चली है।
मलवे में तब्दील हो चुका लातेहार जिले के चियाकी रेलवे स्टेशन पर विरानगी छायी हुई है। यहां बुकिंग कलर्क के अलावा रेलवे के किन्ही अन्य कर्मचारियों का कोई अता-पता नहीं जबकि नक्सली घटना के तीन महीने से अधिक होने को है। भाकपा (माओवादी) से जु़डे नक्सिलयों ने 22 मार्च को इसलिए स्टेशन को डायनामाइट लगाकर उ़डा दिया था कि उनके दो दिवसीय बंदी के फरमान के बावजूद इस स्टेशन से होकर ट्रेनों की आवाजाही बंद नहीं हुई थी। ऐसी बात नहीं है कि माओवादियों का फरमान सिर्फ़ चियाकी रेलवे स्टेशन पर ही दिखा, बल्कि कुछ दिनों के बाद नक्सलियो ने हेहग़डा स्टेशन के समीप रांची-मुगलसराय पैसेंजर ट्रेन को छह घंटों तक बंधक बनाये रखा। घटना दिन में हुई, इसके बावजूद रेलवे के आला अधिकारी और सरकारी मशीनरी मूकदर्शक बनी रही और वे टेलीविजन व अखबारों से ही सूचना हासिल करते रहे। कमोबेश ऐसे ही हालात प्रदेश के अधिकांश इलाकों में है, जहां नक्सलियों की इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं डोलता। एक सूचना के मुताबिक, माओवादियों ने 22 और 23 जून को एक बार फिर दो दिनों की बंदी का ऐलान किया है।
बात चाहे पश्चिम बंगाल और ओरिशा से सटे जमशेदपुर इलाके की करें या फिर छत्तीसगढ़ से लगे गुमला और ग़ढवा जिलो की, हर जगह स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है। राज्य के पश्चिम इलाके यानि पलामू प्रमंडल की स्थिति तो और भी गंभीर है। पलामू प्रमंडल में ग़ढवा, लातेहार, पलामू और चतरा जिलो आते हैं। यहां तो एक तरह से नक्सलियों का ही "राज' कायम हो गया है। माओवादियो के भय से शाम होते ही कुडू होते हुए मेदिनीपुर (डालटेनगंज) जाने वाली स़डक बंद हो जाती है। चंदवा से चतरा जाने में तो आम लोगों के अलावा पुलिस अधिकारियों के भी पांव फूलने लगते हैं। शाम के बाद बरही से चौपारण और हजारीबाग से इटखोरी होते हुए चतरा जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। पारसनाथ से गिरीडीह जाने वाले रास्ते में भी माओवादियों का वर्चस्व है। डुमरी की भी यही कहानी है। चाइबासा भी कोई अलग नहीं है। अगर कहें की पलामू प्रमंडल देश का दूसरा बस्तर बनते जा रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जंगलों और पहा़डों से घिरे इस इलाके के अधिकांश भू-भाग नक्सलियों के कब्जे में चला गया है। जिला मुख्यालय में तो पुलिस अधिकारी दिख भी जाते हैं, लेकिन अधिकतर सुदूर इलाकों और प्रखंड मुख्यालयों में नक्सलियों का ही हुकुमत चलता है। नक्सलियों ने जिस तरीके से इस इलाके को अपनी गिरफ्त में लिया है, उससे आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कहीं यह इलाका दूसरा नक्सलबा़डी न बन जाये। जमीनी हालात तो यही बता रहे हैं कि भारी संख्या में अर्द्धसैनिक बलों की मौजूदगी के बिना पुलिस अधिकारी गांवों में घुसने से भी डरते हैं। नक्सलियों के फैलाव पर मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के प्रदेश सचिव शशिभूषण कहते हैं, "सामाजिक व्यवस्था शोषण पर आधारित है। फिर पलामू और चतरा के सामंती किस्से देश भर में चर्चित रहे हैं। इसकी रोकथाम के लिए सरकार ने कोई सामाजिक प्रयास नहीं किया। जिसकी वजह से भोले-भाले ग्रामीणों का विश्वास जीतने में माओवादी आगे निकल गये।'
उधर नक्सलबा़डी की परंपरा को आत्मसात करने वाली माओवादियों की जमात प्रदेश में कुकूरमुते की तरह उग रहे हैं। 70 के दशक नक्सल्वादिओं के जो आदर्श थे, वे समय की गति के साथ-साथ गुम होते चले गये। जमींदारों की जमीनों के खिलाफ गोलबंद हुए अतिवादी कम्युनिस्ट पार्टी व्यक्तिकत हिंसा और लूट-खसोट पर उतारू होती चली गयीं। 90 के दशक के बाद चली आर्थिक उदारीकरण और बाजारवाद की हवा में नक्सली भी बहने लगे। कमोबेश सारे सामंती दुर्गंध नक्सली गलियारे में पहुंच गये। लातेहार जिला स्थित ब़ढिनया गांव के शंकर मुंडा कहते हैं, "शुरू में माओवादियों के आदर्श ने आदिवासियों को आकिर्षत किया, लेकिन बाद में वे कुकुरमुते की तरह उग आये और अब नक्सली संगठनों के कारण लोगों का जीना हराम हो गया है।' ग्रामीणों को डर एक ओर से नहीं, बल्कि तीन ओर से है। एक ओर जहां पुलिस अधिकारी नक्सलियो को संरक्षण देने के आरोप में ग्रामीणों को प्रतारित करते हैं तो दूसरी ओर, माओवादियो का दोनों ध़डा उन्हें जबर्दस्ती अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहा है।
इन परिस्थितियों बीच क्रांति का सब्जबाग दिखाने वाले नक्सिलयों का आंतरिक कलह भी अब खुलकर सामने आने लगा है। इसके परिणामतस्वरूप आठ साल के झारखंड में आधा दर्जन नक्सली संगठनों का उदय हो गया। एमसीसी के जमाने में पोलित ब्यूरो से नाराज चल रहे केंद्रीय कमेटी के सदस्य भरत ने एक अलग पार्टी ही बना डाली। नाम रखा तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टीपीसी)। ग़ढवा, चतरा और पलामू में यह संगठन सिक्रय है और माओवादियों के आर्थिक स्रोत पर कब्जा जमाने की फिराक में है। अपने आक्रमक तेवर के साथ पीएलएफआइ (पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया) ने उन इलाकों में भाकपा (माओवादी) समर्थकों पर हमले तेज कर दिया है जहां के लोगों ने उसकी अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया है। कभी इनामी माओवादी रहे दिनेश गोप भी एक अलग संगठन चला रहा है। नाम रखा है, जेएलटी (झारखंड लिबरेशन टाइगर)। खूंटी, गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा इलाके में यह संगठन सिक्रय माओवादियों का कहना है इस तरह के अधिकतर संगठन अपने कारनामों से सच्चे नक्सलियों को बदनाम करने पर तूले हुए हैं।
हालात इस कदर बेकाबू होते जा रहा हैं कि माओवादियों ने अपनी करतूतों से दिन और रात का फासला खत्म कर दिया है। जब, जिसे चाहा, उसकी हत्या कर दी। मात्र आठ साल में ही प्रदेश में एक सांसद, दो विधायक, एक एसपी व दो डीएसपी मारे जा चुके हैं, जबकि 400 से अधिक पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवान नक्सली हिंसा के शिकार हुए हैं। जनवाद की बात करने वाली माओवादी जमात ने अबतक एक हजार से अधिक आम लोगों को पुलिस मुखबिर बताकर तो कहीं सामंती सोच के नाम पर गोलियों से भून डाला। खुफिया सूत्रों का कहना है कि सूबे के करीब 130 पुलिस थाने माओवादियों के ही रहमोकरम पर चल रहे हैं। इस बाबत राज्य पुलिस प्रवक्ता एसएन प्रधान ने "द पब्लिक एजेंडा' को बताया, "आज तक यही तय नहीं हो पाया है कि आख़िर माओवादी चाहते क्या हैं? कभी वे निरीह ग्रामीणों की हत्या करते हैं तो कभी छुपकर पुलिसकिर्मयों पर वार करते हैं, क्या इससे क्रांति आ जायेगी?' अधिकारीयों के तर्क अपनी जगह है लेकिन इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि माओवादियों की राजनीतिक लाइन और संघर्ष के तरीकों में आये भटकाव के बावजूद सूबे के करीब 8 हजार नौजवान हथियार बंद होकर सरकार को चुनौती देते फिर रहे हैं।
लाख टके का सवाल है की प्रतिवर्ष पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर करीब एक हजार करो़ड रुपये खर्च होने के बावजूद राज्य मशीनरी माओवादियों के फैलाव को रोकने में क्यों नहीं सफल हो पा रही है? क्यों सियासतदान संगीनों के साये में जीने को मजबूर हैं? क्यों प्राकृतिक संपन्नता के बावजूद ग्रामीणों को पीने का पानी तक मयस्सर नहीं है? जिस दिन इसका जवाब सियासतदानों की फौज खोज लेगी, संभव है उसी दिन माओवादियों की चाल पर लगाम लग जायेगा। फिलहाल कागजी योजनाएं बनाने में मशगूल सरकार इसके समाधान की और आगे ब़ढती नजर नहीं आ रही है।

Tuesday, June 23, 2009

uत्तरी बिहार में तेजी से फैले पैर

नक्सलबादी से उठा तूफान 40 वर्षों में बिहार के अधिकांश हिस्से में पसर गया है। फिर भी, आज उनके पास न तो वो वैचारिक तेज है और न ही कोई स्पष्ट सामाजिक एजेंडा।
कहने के लिए तो बिहार में "सुशासन की सरकार'' है लेकिन फिर भी बिहार कराह रहा है। लोकतंत्र की धरती, महात्मा बुद्ध और महावीर की कर्म और ज्ञानस्थली, बिहार में नक्सलियों का खूनी खेल लगातार जारी है। कुख्यात "जहानाबाद जेल ब्रेक कांड' के बाद पुलिस मशीनरी ने सूबे से नक्सली संगठनों को खत्म करने के लिए दावे तो अनेक किए, लेकिन सच्चाई यह है कि बिहार में नक्सली संगठन लगातार मजबूत होते जा रहे हैं। कभी थाने लूट लिये जाते हैं, तो कहीं रॉकेट लांचर से अर्धसैनिक बलों पर हमले हो रहे हैं। पुलिस आधुनिकीकरण की सारी योजनाएं माओवादियों के सामने कागजी शेर साबित हो रही हैं जबकि खुफिया तंत्र भी माओवादी रणनीति के आगे पंगु साबित हो रहा है।
सत्तर के दशक में मुशहरी (मुजफ्फरपुर, जहां राज्य की पहली नक्सलवादी घटना घटी थी), भोजपुर, औरंगाबाद और जहानाबाद की धरती नक्सलियों के खूनी खेल से लाल हुआ करती थी। वर्षों तक मध्य बिहार और भोजपुर में चल रहे इस खूनी खेल से उत्तरी बिहार का अधिकांश हिस्सा अनजान रहा। तब तर्क दिये जाते थे कि मध्य बिहार और भोजपुर की धरती नक्सलियों के लिए इसलिए उर्वर साबित हो रही है कि इन इलाकों में वर्षों तक जमींदारों व सामंतों के जुल्म चलते रहे थे। लेकिन आज हालात बदल गये हैं। एमसीसी और पीपुल्स वार के विलय के बनी भाकपा (माओवादी) के गठन होते ही तेजी से सूबे के अन्य हिस्से में नक्सलियों का फैलाव हुआ। देखते ही देखते पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, वैशाली और हाजीपुर जिले के ग्रामीण इलाके नक्सली आतंक के चपेट में आ गये। तीन महीने पहले ही माओवादियों ने वैशाली में पुलिस जवानों से चार रायफल लूट लिये। इस इलाके में माओवादियों ने बैंक लूट की घटना को भी अंजाम दिया है। नवादा और औरंगाबाद में पिछले चार महीने में ही दो दर्जन पुलिसकर्मी नक्सली हमले में मारे गये हैं।
माओवादियों का कहना है कि सूबे की 21 हजार एकड़ जमीन या तो नक्सलियों की वजह से विवादित हो गयी हैं या फिर उनके कब्जे में है। इन जमीनों पर माओवादी समर्थक खेती कर रहे हैं जबकि सैकड़ों एकड़ जमीन नक्सलियों की वजह से बंजर होने की स्थिति में है। वर्षों पहले नक्सलियों ने उन जमीनों पर लाल झंडा गाड़कर उसे जमींदारों से छीन लिया था।
कभी जातीय गोलबंदी में विश्वास करने वाली नक्सलपंथियों के फैलाव का एक बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि अब वे प्रशासनिक भ्रष्टाचार और व्यवस्था की खामियों की चर्चा करके गरीब ग्रामीणों के बीच पहुंच रहे हैं। पूर्वी-उत्तरी बिहार के भागलपुर और खगड़िया के कुछ इलाके माओवादियों की गिरफ्त में आ चुके हैं। "बिहार का लेलिनग्राड' कहलाने वाले बेगूसराय जिले में भी इन दिनों माओवादी गतिविधियां देखी जा रही हैं। इस बाबत आर्थिक विश्लेषक शैवाल गुप्ता कहते हैं, "प्रदेश में भूदान की जमीन भी दबंगों ने कब्जा लिया, फिर गरीबों के पास जीने का कोई सहारा नहीं रहा, इसलिए वे माओवादियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।'
इन सब घटनाओं के बीच तीन वर्षों में माओवादियों को भी गहरा झटका लगा है। भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य प्रमोद मिश्र समेत करीब छः सौ हार्डकोर नक्सली गिरफ्तार किए जा चुके हैं। बावजदू इसके नक्सली तेवर कम होते नहीं दिख रहा। अब तो वे मोबाइल टॉवर को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रहे हैं। जनवरी से अबतक चार दर्जन से अधिक टॉवरों को डायनामाइट से उड़ाया गया है। नक्सलियों की हिंसक गतिविधियों पर लगाम क्यों नहीं लगा पा रही है सरकार, इस बाबत आईजी ऑपरेशन एसके भारद्वाज कहते हैं, "सरकार नक्सलियों के खिलाफ व्यापक अभियान छेड़े हुए है। सैकड़ों हार्डकोर माओवादी गिरफ्तार किये गये हैं।'
हालांकि बिहार की भौगोलिक स्थितिया नक्सलियों के अनुकूल नहीं है। इसलिए वे यहां झारखंड और छातीसगढ़ जैसे गुरिल्ला युद्ध चलाने में सक्षम नहीं हो पाते। इसके अलावा उत्तरी-पूर्वी बिहार के कुछ इलाके मसलन कोसी प्रमंडल के जिलों में आज भी सामाजिक सामंजस्य बना हुआ है और लोग वर्ग भेद जैसी बातों पर यकीन नहीं करते। वे वर्तमान व्यवस्था से खिन्न जरूर हैं लेकिन इसे बदलने के लिए जो दावे नक्सली करते आ रहे हैं उनके प्रति वे आश्वस्त नहीं हैं। बावजूद इसके नक्सली संगठन आज बिहार के हर इलाके में अपनी उपिस्थति दर्ज करा रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि बिहार सरकार नक्सली संगठनों से निपटने में आज भी असक्षम है।
प्रमुख नक्सली हमले
Ø 30 अगस्त, 2008---पश्चिम चंपारण के बुरूडीह में बारूदी सुरंग विस्फोट में 12 जवानों की हत्या कर दी गयी।
Ø फरवरी, 2009--- महीने में नवादा के कौलाकोल इलाके में नक्सलियों की महिला दस्ता ने थानाप्रभारी समेत 12 जवानों को कब्जा में करने के बाद पहले चाकू से प्रहार किया इसके बाद उनकी ही बंदूकों से गोलियों बरसानी शुरू कर दी और सारे हथियार लूट लिये।
Ø 21 अगस्त, 2008---गया जिले के रानीगंज में माओवादियों ने 6 पुलिसकर्मी की हत्या कर दी। इसमें दो माओवादी समेत एक आम नागरिक मारा गया।

Wednesday, May 27, 2009

अकेली औरते, सामूहिक पहल

बिहार की कई विधवा और परित्यक्त महिलाओं ने समाज और धर्म की रूढ़ियों को तोड़ते हुए सुहागिन बनने का निर्णय लेकर एक मिसाल कायम की है।
अठारह साल की उम्र में विधवा हो चुकी विभा अपने परिजनों के साथ ही समाज के ठेकेदारों से पूछती है, "आखिर सफेद कपड़ों में पूरी जिंदगी कैसे कटेगी? कब तक कुलक्षणी होने का लांछन लगता रहेगा?' लेकिन समाज के पास इसका कोई जवाब नहीं है। विभा, पटना जिले के मदारपुर (पुनपुन) गांव की रहने वाली हैं। 15 वर्ष की आयु में उसकी शादी हुई थी और मात्र तीन साल के बाद ही वह विधवा हो गयी। उसके पति को अपराधियों ने गोलियों से भून दिया था। भरी जवानी में विधवा होने का दर्द क्या होता है, यह कोई विभा से पूछे। आगे की जिंदगी उसके सामने डरावने सवाल की तरह खड़ी थी और विभा के पास कोई जवाब नहीं था। ससुराल के साथ-साथ मैके से भी आये दिन ताने सुनने पड़ रहे थे। ऐसी विकट परििस्थतयों का सामना करने के लिए उसने पुनर्विवाह का निर्णय ले लिया। हालांकि उसके इस क्रांतिकारी फैसले से परिवार में कोहराम मचा हुआ है। कमोवेश ऐसी ही पीड़ा गया जिले के बाराचट्टी गांव की कमला की है। नक्सलियों ने कुछ वर्ष पहले उसके पति को पुलिस का मुखबिर बताकर गोली मार दी थी तो दूसरी ओर, पुलिस मुठभेड़ में मारे गये नक्सली लालमोहन यादव उर्फ नटवर की पत्नी हेमलता (काल्पनिक नाम), समस्तीपुर की पूजा, मुजफ्फरपुर की अर्चना, नालंदा जिले की सुनीता, बेगूसराय की रमावती आदि की कहानी भी एक जैसी है। समाज में विधवाओं की लंबी सूची है जो पति की गैरमौजूदगी कुंठित जिंदगी जी रही हैं और इस सामाजिक अभिशाप से मुक्ति चाहती है.
महिला सशिक्तकरण के नाम पर भले ही देश में हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हों, लेकिन विधवा और परित्यक्ता महिलाओं का कल्याण और सशिक्तकरण शायद सरकारी दायरे से बाहर ही है। अकेली जिंदगी गुजार रहीं विधवा और परित्यक्तता महिलाओं की घुटनभरी जिंदगी की दास्तान किसी से छिपी हुई नहीं है। घर के भीतर कुलक्षणी, तो बाहर उन्हें अपशकून माना जाता है। सामाजिक ताने-बाने और पारिवारिक मर्यादा का ऐसा ढोंग सामाजिक और धार्मिक ठेकेदारों ने रच रखा है कि उससे आजीज आकर विधवाओं ने रूढ़िवादी परंपराओं को तिलांजलि देते हुए सधवा (सुहागन) बनने की मुहिम ही छेड़ दी है। विचारों की शान पर विधवाओं की आवाज कितनी तेज होती है और कितनी दूर तक पहुंचती है, इस बारे में तत्काल कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजधानी पटना में विधवा और परित्यक्ता महिलाओं ने विधवा पुनर्विवाह की वकालत करके सामाजिक तौर पर एक नया विवाद तो छेड़ ही दिया है।
इतिहास बताता है कि लोकतंत्र की जननी रहा बिहार राष्ट्रीय स्तर पर हमेशा क्रांतिकारी प्रतीक खड़ा करता रहा है और देश की सामाजिक-राजनीतिक हलचलों में अहम भूमिका निभाते आ रहा है। बात चाहे अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की हो या फिर आजाद भारत में इंदिरा गांधी की तानाशाही और सामंती जुर्म के खिलाफ बगावत की हो, बिहार ने सदा ही अग्रणी भूमिका निभायी है। एक बार फिर सामाजिक ठेकेदारों और रूढ़िवादी परंपराओं को चुनौती देते हुए कनाडाई मूल की राजस्थानी महिला डॉ. जिन्नी श्रीवास्तव की पहल और मुस्लिम महिला अख्तरी बेगम के आह्वान पर बिहार की करीब 225 विधवाओं ने सधवा बनने की सामूहिक इच्छा व्यक्त करके सबको चौका दिया है। एकल नारी संघर्ष समिति के बैनर तले एकजुट हुई एकल महिलाओं ने एक स्वर में समाज के दकियानूसी चेहरे को उतार फेंकने का संकल्प लिया है। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित बेगम कहती हैं, " बात चाहे हिन्दू की हो या फिर मुिस्लम की, एकल महिलाओं की जिंदगी एक जैसी है। दोनों समुदाय की महिलाएं पति की गैरमौजूदगी में नारकीय जिंदगी जी रही हैं। इससे निजात पाने का एक ही तरीका है और वह है, आर्थिक आत्मनिर्भरता।'
बीते महीने पटना के पंचायत भवन में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के सामने जब इन महिलाओं ने माथे में सिंदूर, कलाई में चुड़ी-लहठी, और नाखूनों पर नेल पालिश लगायी तो इसका मतलब साफ था कि वे विधवा के पहनावे-ओढ़ावे की बंदिशों को मानने से इंकार कर रही हैं। विधवा होने के बावजूद संकेत में ही इन महिलाओं ने समाज के ठेकेदारों को अपनी मंशा जता दीं। इनमें से अधिकांश की आयु 15 से 40 वर्ष के बीच है। एक सुर में सभी ने कहा कि हम लोग समाज और परिवार को कलंकित करने नहीं, बिल्क खुद के जीवन को संवारने आये हैं। लगातार तीन दिनों तक पटना में इसे लेकर गहरा विचार-मंथन होता रहा। अधिकांश विधवाएं अपने इरादों पर पूरी तरह से अडिग दिखीं। आखिर हो भी क्यों नहीं? वर्षों की घुटनभरी जिंदगी, कई तरह के सामाजिक और पारिवारिक लांछन! फिर भी मौन स्वीकारोक्ति। और तो और, जलालत भरी जिंदगी जीने के बावजूद न तो परिवार के किसी सदस्य का कोई साया और न ही बच्चों की शिक्षा-चिकित्सा की कोई गारंटी। इससे भी नहीं बन पाया तो सुदूर देहाती इलाकों में कभी किसी महिला को डायन, तो कहीं-कहीं चुड़ैल बताकर मार डालने तक की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बावजूद इसके तथाकथित सभ्य समाज मौन बना रहता है। ऐसी महिलाओं पर चरित्रहीनता का आरोप तो सरेआम लगते रहे हैं। रोज-रोज के ताने सुनते हुए बदहवास हो चुकी ऐसी विधवाओं में से एक है, पटना जिले के म्सौर्धि आईडी की रहने वाली पिंकी। तो अन्य हैं नालंदा जिले की सुनीता और लड़कनिया टोला (कटिहार) की सुमन सिंह। हजारों महिलाओं की दर्दभरी दास्तान के साथ ही इन महिलाओं की जिंदगी भी दुखभरी है। पिंकी के पति कुछ वर्ष पहले अपराधियों के गोलियों के शिकार हो गये, तो सुमन सिंह का दाम्पत्य जीवन टूटने के कगार पर है। कारण यह है कि सुमन का पति नशेड़ी है। उसे न तो बच्चों की फिक्र है और ही पत्नी की। सुनीता के पति पिछले छह सालों से लापता हैं, जिसके कारण सुनीता के कंधे पर अपने बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी आ गयी है। लेकिन लाचार सुनीता इस जिम्मेदारी की बोझ को कैसे उठाये ? उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा। इन महिलाओं के सामने एक जैसी समस्याएं है। पारिवारिक दायित्वों के अलावा एक बड़ी जिम्मेदारी यह भी कि बाल-बच्चों की शिक्षा-चिकित्सा कैसे हो। चौखट से बाहर आते ही तथाकथित सभ्य समाज के ठेकेदार चिल्ला उठते हैं कि बिना मरद (मर्द) के बाहर कैसे जाओगी? इज्जत बची रहेगी तो किसी न किसी तरह गुजारा हो ही जाएगा। यह है सभ्य समाज का साफ-सुथरा चेहरा, जहां महिलाओं पर चाैखट से बाहर आते ही चरित्रहीनता का आरोप मढ़ दिया जाता है।
ये तो बानगी है, पूरी तस्वीर इससे भी ज्यादा भयावह है। जहानाबाद की किरण और सरस्वती, हरिहरपुर (भोजपुर) की लक्ष्मी समेत न जाने कितनी ऐसी महिलाएं हैं जो गुमनाम जिंदगी जीने को विवश हैं। नक्सल पचरम लहराने वाले बिहार में वैसे भी कभी जातीय सेना तो कभी नक्सली हिंसा के शिकार हजारों महिलाओं अपने सीने में पति खोने का दर्द समेटे हुई हैं। एकल महिलाओं की दुर्दशा से चिंतित राजस्थान से बिहार पहुंचीं सामाजिक कार्यकर्ता डा. जिन्नी श्रीवास्तव बताती हैं, "समाज में एकल जिंदगी जी रही महिलाओं को अबला न समझा जाये। महिलाएं शुरू से ही सबल रही हैं और अगर उन्हें समाज और परिवार की बंदिशों से मुक्त कर दिया जाये, तो आज भी वे सबल ही हैं।'
सवाल उठता है कि आखिर विधवा और परित्यक्ता महिलाओं के साथ समाज में ऐसे दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों हो रहा है? इस बाबत मानवाधिकार कार्यकर्ता और बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जिस्टस एसएन झा बताते हैं कि जब तक महिलाएं अपने पैरों पर खुद खड़ी नहीं होंगी तबतक इनके प्रति समाज का दकिनयानूसी व्यवहारों में कोई खास कमी नहीं होगी।
आंकड़ों पर गौर करें तो देश भर में विधवा महिलाओं की संख्या जहां आठ फीसद है वहीं विदुर पुरुष मात्र 2.5 फीसदी हैं। जबकि 67 फीसद महिलाएं ससुराल में रहती हैं। इनमें से अधिकतर ससुराल वालों की प्रताड़ना से परेशान हैं। ऐसी परििस्थतियों में विधवा पुनर्विवाह के इस अभियान का महत्व काफी बढ़ जाता है। लेकिन यह अभियान तब ही अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल होगा जब इसमें अशिक्षित और गरीब महिलाओं के साथ-साथ शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न महिलाएं भी हिस्सा लेंगी।

सात फेरों से वंचित मांएं

पहाड़िया जनजाति की हजारों लड़कियां बिना विवाह के मां बनने को विवश हैं और विवाह की रस्म का इंतजार कर रही हैं।
बामू पहाड़िया की उम्र करीब 50 वर्ष है। इनके छह बच्चे हैं। वर्षों पहले अमड़ापाड़ा ब्लॉक के बाघापाड़ा गांव में भोज खाने गये बामू पहाड़िया अपने साथ एक लड़की को लेते आये थे। दोनों बताैर पति-पत्नी हरिणडूबा गांव में रहने लगे। बामू मां बनती गयी पर सुहागन नहीं बन पायी है। कमोबेश यही कहानी है शिबू पहाड़िया के परिवार की। इनका एक बच्चा गोद में आैर दूसरा की छाती से चिपका हुुआ। तीसरे आैर चाैथे बच्चे की उम्र कोई आठ आैर दस साल। जबकि पांचवें ने अपना घर बसा लिया है। न मां सुहागन बनी आैर न ही बहू।
पाकुड़ जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दक्षिण-पिश्चम पहाड़ पर बसे हरिणडूबा गांव में ऐसी अन ब्याही 40 से अधिक मां बन चुकी युवतियां हैं जबकि उनकी शादी की रस्म अदायगी तक नहीं हो पायी है। अधिकांश लड़कियां (महिलाएं) बिना विवाह के ही अधेड़ हो चुकी हैं। हरिणडूबा गांव में पहाड़िया जनजाति के 60 परिवार रहते हैं। इन्हीं में से एक है शिबू पहाड़िया का परिवार। बाप-बेटे (दोनांें) अपना घर बसा चुके हैं। दोनों को आशा है कि एक दिन जब घर की माली हालत सुधरेगी तभी मंडप सजेगा। एक ही मंडप में सास आैर बहू दोनों माथे पर सिंदूर लगायेंगी। चूड़ियां पहनेंगी। गांव में भोज का आयोजन होगा। ग्राम प्रधान की माैजूदगी में रस्म अदायगी के बाद सुहागन बनने का सपना पूरा होगा।
बिना सुहाग के ही पहाड़िया जनजाति की सैकड़ों लड़कियों के मां बनने की कहानी दिलचस्प है। समाज ने इसे "हरण विवाह' नाम दिया है। इलाके में लगने वाले हाट आैर मेले में जब लोग यानी लड़के-लड़कियां जाते हैं, तो वहीं अपनी क्षेत्रीय भाषा में साथ-साथ रहने की बातें करते हैं। जब बातचीत पक्की हो जाती है, तब लड़की का हाथ पकड़कर तेजी से लड़का हाट से बाहर निकलता है आैर सीधे अपने गांव की ओर रवाना होता है। गांव वाले किसी अनजान लड़की को देखकर गंाव प्रधान को खबर करते हैं। उसी समय पंचायत बैठती है आैर साथ रहने की इजाजत मिल जाती है। फिर लड़की मां भी बनती है आैर समाज में वे बताैर पति-पत्नी रहने लगते हैं।
यह कहानी सिर्फ हरिणडूबा गांव की ही नहीं है। संथालपरगना प्रमंडल के अधिकांश पहाड़िया जनजाति के सुदूर गांवों में गरीबी का दंश झेल रही सैकड़ों लड़कियां काफी कम उम्र में बिन ब्याही मां बन रही हैं। ऐसी ही हजारों महिलाओं में से 125 महिलाएं कुछ महीने पहले सुहागन बनीं। पाकुड़ जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दक्षिण-पिश्र्चम िस्थत अमड़ापाड़ा प्रखंड के पकलो-सिंगारसी गांव में जब सुहागन बनने के लिए महिलाओं का जमावड़ा लगा, तो सभ्य समाज आैर धर्म के ठेकेदार किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आये। वहीं स्थानीय प्रशासन भी सकते में था। सुहागन बनने पहुंची महिलाओं में से किसी के चार बच्चे हैं, तो कोई दो बच्चों की मां है। दो दर्जन ऐसी भी युवतियां पहुंचीं, जिनकी उम्र करीब 15 की रही होगी आैर गोद में अपने नवजात शिशु को लेकर अिग्न के सात फेरे लगा रही थीं। दर्जनों ऐसी भी महिलाएं थीं, जो अपनी बहू आैर बेटी के साथ मंडप में सिंदूर दान की रस्म अदायगी के लिए बैठी थीं।
इस इलाके में आगे भी इस तरह की सामूहिक विवाह के आयोजन की तैयारी चल रही है। जून तक करीब 250 बिन ब्याही मांओं की सिंदूर दान की रस्म अदायगी होने की संभावना है। आखिर इस समुदाय की लड़कियां बिन ब्याही मां क्यों बनती हैं। इस बाबत पूर्व सैनिक आैर सामाजिक कार्यकर्ता विश्र्वनाथ भगत बताते हैं, "गरीबी की वजह से भोज देने के लिए पैसे नहीं रहने आैर फिर शिक्षा का अभाव आैर खुला समाज होने की वजह से वे (लड़कियां) घर बसाने को तैयार हो जाती हैं। परंपरागत शादी (जिसमें लड़की के घर बारात जाती है) का प्रचलन धीरे-धीरे गरीबी की ही वजह से सुदूर इलाके से खत्म होता जा रहा है।'
जंगलों आैर पहाड़ों के बीच रहने वाली इस जनजाति की माली हालात किसी से छुपी नहीं है। पहाड़ों पर िस्थत झीलों आैर तालाबों का पानी पीना आैर जंगली कंदमूल खाकर जीवनयापन करना ही इनकी नियति हो गयी है। हालांकि, बाजारवाद का असर भी कहीं-कहीं देखने को मिलता है, जहां इस समुदाय के युवक जंगली लकड़ियों को स्थानीय हाट में मामूली पैसे पर बेचते हैं आैर जरूरी सामानों की खरीद-बिक्री करते हैं।
अंग्रेजों ने पहा़िडया समुदाय की वीरता को देखते हुए 1782 में पहाड़िया सैनिक दल का गठन किया, मिजाज से स्वाभिमानी पहाड़िया जनजाति ने कभी अंग्रेजों की अधीनता नहीं स्वीकारी। इससे आजीज आकर ब्रिटिश सरकार ने 1833 में पहाड़िया समुदाय को 1338 वर्गमील की सीमा में कैद कर दिया। इस क्षेत्र को "दामिन-इ-कोह' क्षेत्र घोषित किया गया। इस इलाके में 26 दामिन बाजार स्थापित किये गये तो आजाद भारत की सरकार ने इनकी संस्कृति के साथ ही गरीबी को देखते हुए 1954 में विशिष्ठ पहाड़िया कल्याण विभाग का गठन किया। पहाड़ों पर स्कूल बनाये गये। कहीं-कहीं चिकित्सा की भी व्यवस्था की गयी। आदिवासियों की अिस्मता के नाम पर बंटा बिहार आैर नवोदित झारखंड की सरकार अपने आठ साल के कार्यकाल के बावजूद इनकी नियति सुधारने में नाकाम साबित हुई है। हालांकि, नक्सलियों से मुकाबले के लिए अर्जुन मंडा की सरकार ने ब्रिटिश सरकार की तर्ज पर पहाड़िया बटालियन बनाने की रूपरेखा तैयार की थी, लेकिन बाद की सरकारों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। यही नहीं, वर्ष 2002 की जनगणना के अनुसार पहाड़िया जनजाति के करीब एक लाख 70 हजार, 309 की आबादी को आबाद करने के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये विश्र्व बैंक के साथ ही केंद्र सरकार से सहायता के रूप में मिलते हैं। हालांकि स्थानीय लोग सरकार के इस आंकड़े को झूठा मानते हैं। इस जनजाति के लोगों का कहना है कि संथाल परगना प्रमंडल में ही 57 गांवों का न तो सर्वे हो पाया है आैर न ही मतदाता सूची में ही नाम दर्ज कराया गया है। सच्चाई चाहे जो भी हो। बावजूद इसके, पहाड़िया समाज बदहाल बना हुआ हैै। संथाल परगना प्रमंडल के बोरियो, अमरापाड़ा आैर लिट्टीपाड़ा समेत अन्य कई इलाके के ग्रामीण 8 किलोमीटर की दूरी तय कर पीने का पानी लाने को विवश हंै। जंगलों आैर पहाड़ों पर बिषैले सांप-बिच्छू का खतरा भी बराबर मंडराता रहता है। कई इलाके मलेरिया जोन घोषित किये गये हंै। बावजूद इसके इलाके में जन स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है। स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता आैर पहाड़िया समुदाय के शिवचरण मालतो बताते हैं, "गरीबी आैर अशिक्षा का फायदा रांची आैर दुमका में बैठे अधिकारी उठा रहे हैं।' आदिवासी कल्याण आयुक्त डॉ नितिन मदन कुलकर्णी बताते हैं कि सरकार की ओर से उनकी दशा सुधारने के लिए सार्थक प्रयास किये जा रहे हैं। कई सारी योजनाएं उनके कल्याण आैर विकास के लिये चलायी जा रही हैं।
वैसे तो सारे पहाड़िया समुदाय की िस्थति कमोबेस एक जैसी ही है, फिर भी माल पहाड़िया के बीच शिक्षा का विकास हुआ है। वहीं साैरिया आैर कुमारभाग पहाड़िया समुदाय अब भी पहाड़ों पर ही डेरा डाले हुए है। कभी राज परिवार रहे आैर गुरिल्ला युद्ध में निपुण रहे इस समुदाय की आर्थिक िस्थति इतनी बदतर कैसे हो गयी, इस बाबत सामाजिक कार्यकर्ता दयामणि बारला बताती हैं, "प्रकृति पर निर्भर रहने वाले इस समुदाय के पास आजादी के पहले तक जंगलों पर पूरा अधिकार था, लेकिन आजादी के बाद वनों आैर पहाड़ों पर माफिया का राज स्थापित होने लगा जो बदस्तूर जारी है। फिर आैद्योगीकरण की वजह से प्रदूषण का प्रभाव पड़ा आैर अनावृिष्ट आैर अतिवृिष्ट की वजह से सारा कुछ बर्बाद हो गया। परिणामत: यह समाज धीरे-धीरे गरीबी की दलदल में फंसता चला गया।' एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बिन ब्याही मांओं को इस समाज में भी मान्यता नहीं मिली है। फिर भी गरीबी की वजह से वे ऐसा कर रहे हैं, जिसे किसी भी परििस्थति में जायज नहीं ठहराया जा सकता।'

Friday, May 22, 2009

अकेली औरतें सामुहिक पहल

अठारह साल की उम्र में विधवा हो चुकी विभा अपने परिजनों के साथ ही समाज के ठेकेदारों से पूछती है, "आखिर सफेद कपड़ों में पूरी जिंदगी कैसे कटेगी? कब तक कुलक्षणी होने का लांछन लगता रहेगा ?' लेकिन समाज के पास इसका कोई जवाब नहीं है। विभा, पटना जिले के मदारपुर (पुनपुन) गांव की रहने वाली हैं। 15 वर्ष की आयु में उसकी शादी हुई थी और मात्र तीन साल के बाद ही वह विधवा हो गयी। उसके पति को अपराधियों ने गोलियों से भून दिया था। भरी जवानी में विधवा होने का दर्द क्या होता है, यह कोई विभा से पूछे। आगे की जिंदगी उसके सामने डरावने सवाल की तरह खड़ी थी और विभा के पास कोई जवाब नहीं था। ससुराल के साथ-साथ मैके से भी आये दिन ताने सुनने पड़ रहे थे। ऐसी विकट परिस्थितयों का सामना करने के लिए उसने पुनर्विवाह का निर्णय ले लिया। हालांकि उसके इस क्रांतिकारी फैसले से परिवार में कोहराम मचा हुआ है। कमोवेश ऐसी ही पीड़ा गया जिले के बाराचट्टी गांव की कमला की है। नक्सलियों ने कुछ वर्ष पहले उसके पति को पुलिस का मुखबिर बताकर गोली मार दी थी तो दूसरी ओर, पुलिस मुठभेड़ में मारे गये नक्सली लालमोहन यादव उर्फ नटवर की पत्नी हेमलता (काल्पनिक नाम), समस्तीपुर की पूजा, मुजफ्फरपुर की अर्चना, नालंदा जिले की सुनीता, बेगूसराय की रमावती आदि की कहानी भी एक जैसी है। समाज में विधवाओं की लंबी सूची है जो पति की गैरमौजूदगी में कुंठित जिंदगी जी रही हैं और इस सामाजिक अभिशाप से मुक्ति चाहती हैं।
महिला सशक्तिकरण के नाम पर भले ही देश में हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हों, लेकिन विधवा और परित्यक्ता महिलाओं का कल्याण और सशक्तिकरण शायद सरकारी दायरे से बाहर ही हैं। अकेली जिंदगी गुजार रहीं विधवा और परित्यक्तता महिलाओं की घुटनभरी जिंदगी की दास्तान किसी से छिपी हुई नहीं है। घर के भीतर कुलक्षणी, तो बाहर उन्हें अपशकून माना जाता है। सामाजिक ताने-बाने और पारिवारिक मर्यादा का ऐसा ढोंग सामाजिक और धार्मिक ठेकेदारों ने रच रखा है कि उससे आजीज आकर विधवाओं ने रूढ़िवादी परंपराओं को तिलांजलि देते हुए सधवा (सुहागन) बनने की मुहिम ही छेड़ दी है। विचारों की शान पर विधवाओं की आवाज कितनी तेज होती है और कितनी दूर तक पहुंचती है, इस बारे में तत्काल कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजधानी पटना में विधवा और परित्यक्ता महिलाओं ने विधवा पुनर्विवाह की वकालत करके सामाजिक तौर पर एक नया विवाद तो छेड़ ही दिया है।
इतिहास बताता है कि लोकतंत्र की जननी रहा बिहार राष्ट्रीय स्तर पर हमेशा क्रांतिकारी प्रतीक खड़ा करता रहा है और देश की सामाजिक-राजनीतिक हलचलों में अहम भूमिका निभाते आ रहा है । बात चाहे अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की हो या फिर आजाद भारत में इंदिरा गांधी की तानाशाही और सामंती जुर्म के खिलाफ बगावत की हो, बिहार ने सदा ही अग्रणी भूमिका निभायी है। एक बार फिर सामाजिक ठेकेदारों और रूढ़िवादी परंपराओं को चुनौती देते हुए कनाडाई मूल की राजस्थानी महिला डॉ. जिन्नी श्रीवास्तव की पहल और मुस्लिम महिला अख्तरी बेगम के आह्वान पर बिहार की करीब 225 विधवाओं ने सधवा बनने की सामूहिक इच्छा व्यक्त करके सबको चौंका दिया है। एकल नारी संघर्ष समिति के बैनर तले एकजुट हुई एकल महिलाओं ने एक स्वर में समाज के दकियानूसी चेहरे को उतार फेंकने का संकल्प लिया है। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित बेगम कहती हैं, " बात चाहे हिन्दू की हो या फिर मुस्लिम की, एकल महिलाओं की जिंदगी एक जैसी है। दोनों समुदाय की महिलाएं पति की गैरमौजूदगी में नारकीय जिंदगी जी रही हैं। इससे निजात पाने का एक ही तरीका है और वह है ,आर्थिक आत्मनिर्भरता।'
बीते महीने पटना के पंचायत भवन में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के सामने जब इन महिलाओं ने माथे में सिंदूर, कलाई में चुड़ी-लहठी, और नाखूनों पर नेल पालिश लगायी तो इसका मतलब साफ था कि वे विधवा के पहनावे-ओढ़ावे की बंदिशों को मानने से इंकार कर रही हैं। विधवा होने के बावजूद संकेत में ही इन महिलाओं ने समाज के ठेकेदारों को अपनी मंशा जता दीं। इनमें से अधिकांश की आयु 15 से 40 वर्ष के बीच है । एक सुर में सभी ने कहा कि हम लोग समाज और परिवार को कलंकित करने नहीं, बल्कि खुद के जीवन को संवारने आये हैं। लगातार तीन दिनों तक पटना में इसे लेकर गहरा विचार-मंथन होता रहा। अधिकांश विधवाएं अपने इरादों पर पूरी तरह से अडिग दिखीं। आखिर हो भी क्यों नहीं ? वर्षों की घुटनभरी जिंदगी, कई तरह के सामाजिक और पारिवारिक लांछन ! फिर भी मौन स्वीकारोक्ति । और तो और, जलालत भरी जिंदगी जीने के बावजूद न तो परिवार के किसी सदस्य का कोई साया और न ही बच्चों की शिक्षा-चिकित्सा की कोई गारंटी । इससे भी नहीं बन पाया तो सुदूर देहाती इलाकों में कभी किसी महिला को डायन, तो कहीं-कहीं चुड़ैल बताकर मार डालने तक की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बावजूद इसके तथाकथित सभ्य समाज मौन बना रहता है। ऐसी महिलाओं पर चरित्रहीनता का आरोप तो सरेआम लगते रहे हैं । रोज-रोज के ताने सुनते हुए बदहवास हो चुकी ऐसी विधवाओं में से एकहै, पटना जिले के मसौढी की रहने वाली पिंकी । तो अन्य हैं नालंदा जिले की सुनीता और लड़कनिया टोला (कटिहार) की सुमन सिंह। हजारों महिलाओं की दर्दभरी दास्तान के साथ ही इन महिलाओं की जिंदगी भी दुखभरी है। पिंकी के पति कुछ वर्ष पहले अपराधियों के गोलियों के शिकार हो गये, तो सुमन सिंह का दाम्पत्य जीवन टूटने के कगार पर है। कारण यह है कि सुमन का पति नशेड़ी है। उसे न तो बच्चों की फिक्र है और ही पत्नी की । सुनीता के पति पिछले छह सालों से लापता हैं, जिसके कारण सुनीता के कंधे पर अपने बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी आ गयी है। लेकिन लाचार सुनीता इस जिम्मेदारी की बोझ को कैसे उठाये ? उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा। इन महिलाओं के सामने एक जैसी समस्याएं हैं। पारिवारिक दायित्वों के अलावा एक बड़ी जिम्मेदारी यह भी कि बाल-बच्चों की शिक्षा-चिकित्सा कैसे हो। चौखट से बाहर आते ही तथाकथित सभ्य समाज के ठेकेदार चिल्ला उठते हैं कि बिना मरद (मर्द) के बाहर कैसे जाओगी ? इज्जत बची रहेगी तो किसी न किसी तरह गुजारा हो ही जाएगा। यह है सभ्य समाज का साफ-सुथरा चेहरा, जहां महिलाओं पर चौखट से बाहर आते ही चरित्रहीनता का आरोप मढ़ दिया जाता है।
ये तो बानगी है, पूरी तस्वीर इससे भी ज्यादा भयावह है। जहानाबाद की किरण और सरस्वती, हरिहरपुर (भोजपुर) की लक्ष्मी समेत न जाने कितनी ऐसी महिलाएं हैं जो गुमनाम जिंदगी जीने को विवश हैं। नक्सल पचरम लहराने वाले बिहार मेें वैसे भी कभी जातीय सेना तो कभी नक्सली हिंसा के शिकार हजारों महिलाओं अपने सीने में पति खोने का दर्द समेटे हुई हैं। एकल महिलाओं की दुर्दशा से चिंतित राजस्थान से बिहार पहुंचीं सामाजिक कार्यकर्ता डा. जिन्नी श्रीवास्तव बताती हैं, "समाज में एकल जिंदगी जी रही महिलाओं को अबला न समझा जाये। महिलाएं शुरू से ही सबल रही हैं और अगर उन्हें समाज और परिवार की बंदिशों से मुक्त कर दिया जाये, तो आज भी वे सबल ही हैं।'
सवाल उठता है कि आखिर विधवा और परित्यक्ता महिलाओं के साथ समाज में ऐसे दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों हो रहा है ? इस बाबत मानवाधिकार कार्यकर्ता और बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एसएन झा बताते हैं कि जब तक महिलाएं अपने पैरों पर खुद खड़ी नहीं होंगी तबतक इनके प्रति समाज का दकिनयानूसी व्यवहारों में कोई खास कमी नहीं होगी।
आंकड़ों पर गौर करें तो देश भर में विधवा महिलाओं की संख्या जहां आठ फीसद है वहीं विदुर पुरुष मात्र 2.5 फीसदी हैं। जबकि 67 फीसद महिलाएं ससुराल में रहती हैं । इनमें से अधिकतर ससुराल वालों की प्रताड़ना से परेशान हैं। ऐसी परिस्थितियों में विधवा पुनर्विवाह के इस अभियान का महत्व काफी बढ़ जाता है। लेकिन यह अभियान तब ही अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल होगा जब इसमें अशिक्षित और गरीब महिलाओं के साथ-साथ शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न महिलाएं भी हिस्सा लेंगी।

Thursday, April 30, 2009

तिकड़ी नेताओं की अिग्नपरीक्षा

सियासत आैर गंगा नदी का पुराना रिश्ता रहा है। कभी बिहार की कुर्सी पर विराजमान होने को लालायित सियासतदान मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने के लिए गंगा में फेंकवाने की धमकी विधायकों को दिया करते थे। लेकिन पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव में उल्टा हो रहा है। परिसीमन के बाद बदली हुई परििस्थति में दियारा इलाके के मतदाता सियासी चाल चलने वाले नेताओं को धमकाते फिर रहे हैं। संयोग से सूबे के चाैथे चरण में होने वाले पाटलिपुत्र, पटना साहिब आैर नालंदा लोकसभा सीटेंे गंगा के दियारा को छूता हुआ आगे बढ़ते हंै। इन तीनों सीटों पर देश की निगाहें टिकी हुई हैं। वह इसलिए कि पाटलिपुत्र सीट से रेल मंत्री आैर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इन्हें कड़ी चुनाैती दे रहे हैं जदयू के प्रत्याशी डॉ. रंजन प्रसाद यादव। कभी लालू के जिगरी दोस्त रहे रंजन यादव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकास रथ पर सवार होकर सियासी बैतरणी पार करने की फिराक में हैं। छह विधानसभा क्षेत्रों से मिलकर बना यह क्षेत्र यादव बहुल माना जाता है। इसमें दानापुर, जहां भाजपा का कब्जा है, के अलावा फुलवारीशरीफ, बिक्रम, मनेर, पालीगंज आैर मसाैढ़ी विधानसभा क्षेत्र को शामिल किया गया है। फुलवारीशरीफ राजद प्रवक्ता श्याम रजक का क्षेत्र है तो बिक्रम आैर दानापुर से पूर्व सांसद रामकृपाल यादव बराबर बढ़त बनाते रहे हैं। लालू प्रसाद को भरोसा है कि भले ही दानापुर सीट भाजपा के खाते में चला गयी हो, लेकिन यहां िस्थत अपनी खटाल से राजनीति करने का फायदा उन्हें मिल सकता है। लालू के साथ ही राबड़ी देवी भी अपने पटना प्रवास के दाैरान अधिकांश समय गाैशाला में ही बीताती हैं। बावजूद इसके लालू का रास्ता आसान नहीं दिख रहा है। इसी साल होली के दिन इस सीट से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव देने वाले पूर्व राज्यसभा सदस्य आैर स्थानीय नेता विजय सिंह यादव एन माैके पर पलट गये आैर कांग्रेस से अपनी किस्मत आजमाने के लिए मैदान में कूद गये। दियारा इलाके में इनकी अच्छी पकड़ बतायी जा रही है। वैसे मुिस्लम मतदाताओं पर भी इन्हें भरोसा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रथम चरण में ही "माय' (मुिस्लम-यादव) समीकरण में दरार आ गयी है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। फिर राजद सुप्रीमो का कांग्रेस के खिलाफ हताशा-भरे बयान एक ही साथ बहुत कुछ कह जाते हंै। कभी किंगमेकर की भूमिका में रहे लालू प्रसाद को इस सीट पर कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है।
एक ओर जहां पाटलिपुत्र सीट पर तीन यादवों की भिड़ंत है वहीं दूसरी ओर पटना साहिब लोकसभा इलाका दो कायस्थों का अखाड़ा बन गया है। बिहारी बाबू के नाम से चर्चित सिने अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, तो अचानक छोटे पर्दे के स्टार अभिनेता शेखर सुमन कांग्रेस पार्टी के टिकट पर मैदान में हैं। इस क्षेत्र के शहरी इलाकों में कायस्थों के अलावा बड़ी आबादी मुसलमानों की है। थोड़े-बहुत सिख मतदाता भी हैं। शेखर सुमन को कांग्रेस कैडर के अलावा मुसलमानों के साथ ही स्वजातीय वोट बैंक पर भरोसा है । हालांकि बिहारी बाबू नीतीश कुमार की विकास-छवि, सुशासन के नारों आैर भाजपा के साथ ही अतिपिछड़ा आैर महादलितों पर भरोसा कर रहे हैं जबकि ग्रामीण इलाके मसलन बख्तियारपुर, फतुहा, दीघा विधानसभा सीटों के मतदाताओं की बदाैलत राजद उम्मीदवार विजय साहू भी सफलता की उम्मीद पाले हुए हैं। राजद सुप्रीमो को मुसलमान मतदाताओं पर भी भरोसा बना हुआ है। राजद खेमे को उम्मीद है कि दो कायस्थों की लड़ाई का फायदा राजद उम्मीदवार विजय साहू को मिल सकता है। लेकिन यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि उन्हें इस समीकरण से लाभ हुआ या फायदा। वैसे सवर्णों की राजनीतिक सोच अब वोटकटवा की नहीं रही है। इस सीट पर वाम मोर्चा भी अपनी किस्मत आजमा रहा है , लेकिन उसका प्रभाव झुग्गी-झोपड़ियों तक ही सीमित दिख रहा है।
कुर्मी बहुल नालंदा सीट पर नीतीश कुमार के साथ ही उनकी सरकार की अिग्नपरीक्षा है। विकास का नारा देते फिर रहे नीतीश कुमार के इस परंपरागत सीट पर तीन कुर्मियों की जोर-आजमाइश से मुकालबा दिलचस्प हो गया है। इसी का फायदा जातीय राजनीति से दूर रहने वाले शशि यादव को मिलने के कयास लगाये जा रहे हैं। यहां 17 लाख मतदाताओं में से 3.75 लाख कुर्मी, 2.75 लाख यादव, 1.25 लाख कुशवाहा आैर 1.65 लाख मुिस्लम मतदाता हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां नीतीश कुमार ने एक लाख से अधिक मतों से लोजपा प्रत्याशी डॉ. पुष्परंजन को हराया था। इस सीट पर तीन कुर्मियों के बीच कड़ा मुकाबला दिख रहा है। वर्ष 2006 में जदयू के टिकट पर उपचुनाव जीते रामस्वरूप प्रसाद कांग्रेस से भाग्य आजमा रहे हैं तो पूर्व विधायक सतीश प्रसाद लोजपा से मैदान में हैं। लव-कुश सम्मेलन की सफलता से सूबे की राजनीति में धाक जमाने वाले सतीश कुमार का भी वही वोट बैंक है जो नीतीश कुमार का है। वहीं जदयू ने नये चेहरे काैशलेंद्र कुमार को मैदान में उतारकर सारे गिला-शिकवा को खत्म करने की कोशिश की है। वहीं वाम मोर्चा से शशि यादव मैदान में डटी हैं। पारंपरिक चुनाव प्रचार अभियान में जुटी शशि आैर भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने अपनी पूरी ताकत इस इलाके में झोंक दी है। वहीं बसपा की हाथी पर सवार होकर देवकुमार राय क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते फिर रहे हैं।
 

बंदूक नहीं, बैलेट से मिलेगी मुिक्त : रंजन यादव

केश्वर यादव उर्फ दिनकर यादव उर्फ रंजन यादव नक्सल आंदोलन का जाना-पहचाना चेहरा है। कभ्ाी झारखंड आैर छत्त्ाीसगढ पुलिस के लिए सिरदर्द बना रंजन यादव चतरा लोकसभाा सीट से पंद्रहवें लोकसभा चुनाव में,"सत्त्ाा बंदूक की नली से निकलती है' के नारे को तिलांजलि देेते हुए संसदीय रास्ते को मुिक्त का मार्ग चुना है। लातेहार जेल से भाकपा (माले) लिबरेशन के झंडे तले चुनावी समर में अपनी किस्मत आजमा रहे रंजन यादव को जनता पर पूरा भरोसा है आैर उन्हें उम्मीद है कि 16 मई को सारे महारथी चित हो जायेंगे। जेल में उनसे द पब्लिक एजेंडा की ओर से श्याम सुंदर ने एक्सक्लुसिव बातचीत की । प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश ः
15 वर्षों तक बंदूक की राजनीति करने के बाद आखिर आपने जेल से चुनाव लड़ने का फैसला कैसे किया?
बहुत दिनों से मन में विचार चल रहा था । 15 वर्षों के लंबे संघर्ष से जो अनुभव मिला उसके अनुसार, अभी जनता बंदूकके सहारे सत्त्ाा हथियाने को तैयार नहीं हुई है। इसलिए हमने सोचा कि जब लड़ाई जनता के लिए ही लड़ी जा रही है तब फिर क्यों नहीं जनता की भावनाओं का कद्र करते हुए संसदीय रास्ते को ही अपना लिया जाये ताकि सही मायने में गरीबों को उनका हक-हुकूक मिल सके।
आपके पुराने साथियों यानी नक्सलियों ने इस फैसले का विरोध नहीं किया ?
चाैतरफा विरोध हुआ। उन्होंने (नक्सलियों ने ) माैत का फरमान जारी किया। कई इलाकों मसलन मनिका, पीपरा, हेहेगड़ा आदि में चुनाव बहिष्कार के साथ ही नक्सलियों ने हिंसक तेवर अख्तियार किया। दूसरी ओर, सामंती तत्वों की छाती पर सांप लोटने लगे कि कैसे गरीब का बेटा भारतीय संसद की शोभा बढ़ायेगा। बावजूद इसके हमें जनता का व्यापक समर्थन मिला।
हिंसक राजनीति से संसदीय राजनीति अपनाने के पीछे क्या कारण रहे ?
हिंसा आैर अहिंसा को परिभाषित करना बहुत मुिश्कल है। जब इलाके में जमींदारों का जुल्म था तब जनता की गोलबंदी सामंतों के खिलाफ हुइर् । परिणामस्वरूप 90 फीसदी जमींदार नक्सलियों की गोली के शिकार हुए । इसे मैं हिंसा नहीं मानता । बिहार आैर झारखंड में होने वाले गैंगवार आैर माफिया राज हिंसा नहीं है, क्या ? फिर क्यों , सरकार गरीबों की लड़ाई को हिंसक लड़ाई मानती है? बीते वर्षों में गुजरात में हुए सांप्रदायिक हिंसा (जो अभी भी विवाद में है) के साैदागरों को सियासत करने की खुली छूट मिलती है, तब कोई सवाल क्यों नहीं खड़ा किया जाता ?
भाकपा (माले) लिबरेशन से दोस्ती के पीछे का क्या राज है ?
इसके पीछे कोई राज नहीं, बिल्क मुझे अभी भी विश्वास है कि लाल झंडा ही सामंती व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ सकती है। इसलिए मैंने दो साल पहले जेल में ही माले की सदस्यता ग्रहण की थी।
क्या आपको लगता है कि लातेहार, पलामू में सामंतवाद का खात्मा हो गया ?
पलामू समेत झारखंड के कई इलाकों में सामंती धाक बचा हुआ है। सामंती धाक को खत्म करने के लिए लाल झंडा संघर्षरत है।
संसदीय व्यवस्था में आने की प्रेरणा आपको किनसे आैर कैसे मिली ?
श्री श्रीरविशंकर जी महाराज। लातेहार जेल में उनसे हमारी मुलाकात हुई। उन्होंने मुख्य मार्ग की राजनीति करने को प्रेरित किया। सच तो यह है कि रविशंकर जी भले ही देशव्यापी भाजपा को मदद करते हैं लेकिन हमें उनसे पूरी मदद मिली है।
महंगी चुनाव व्यवस्था में पैसे का इंतजाम आपने कहां से किया ?
जन समर्थन आैर चंदा के पैसे ही चुनाव जीताने के लिए काफी है। मैं बाहुबलियों की तरह धनबल के प्रदर्शन का शाैक नहीं रखता, इसलिए कार्यकर्ताओं के बीच कभी पैसे की कमी नहीं हुई।

ग्रामीणों पर पुलिसिया कहर

झारखंड का लातेहार जिला नक्सलियों के आतंक से हमेशा सुर्खियों में रहा है। एक बार फिर यह जिला सुर्खियों में है। लेकिन इस बार दो कारणों से चर्चा में आया है। पहला यह कि छत्त्ाीसगढ़ राज्य कमेटी का सदस्य आैर उत्त्ारी सरगुजा स्पेशल एरिया कमेटी का प्रभारी कामेश्वर यादव उर्फ रंजन यादव बंदूक की वोट बहिष्कार के नारे को तिलांजली देते हुए संसदीय रास्ते को अख्तियार कर लिया है। जिले के मंडल कारा से चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं आैर दूसरा कारण यह कि जिस चतरा लोकसभा सीट से रंजन चुनावी मैदान में डटे हैं वह पूरा इलाका प्रथम चरण के चुनाव के दो दिन पहले से ही हिंसक वारदातों का अखाड़ा बना रहा। एक ओर जहां सीआरपीएफ के 14वीं बटालियन पर यह आरोप लगा कि नक्सलियों की बारुदी सुरंग विस्फोट के बाद हुए दोनों ओर से (नक्सली-सीआरपीएफ) अंधाधुंध फायरिंग में मारे गये अपने दो साथियों के खून देखकर खाैफलाये जवानों ने बढ़निया गांव के सुमरा टोला के पांच निर्दोष लोगों, जिसमें 50 वर्षीय सुपाय बोदरा (सीएमपीडीआइ, रांची का कर्मचारी), इनके इकलाैते बेटे आैर संत पॉल कॉलेज, रांची का विद्यार्थी संजय बोदरा (20 वर्ष), पड़ोसी सुपाय बोदरा (जो राजा मेदिनीराय इंटर कॉलेज, बरवाडीह) आैर 8वीं कक्षा का छात्र रहा मसी बोदरा (दोनों सगे भाई) के साथ ही अपने खपड़ैल घर की मरम्मत कर रहे 50 वर्षीय पिताय मुंडू को गोलियों से भून दिया वहीं माओवादियों के कड़े तेवर से 10 दिनों तक संपूर्ण झारखंड अस्त-व्यस्त रहा। माओवादियों ने निर्दोष ग्रामीणों के मारे जाने के विरोध में बताैर मुआवजा 10 लाख रुपये आैर पीड़ित परिवार को नाैकरी की मांग को लेकर बंद का फरमान जारी किया। बंद के दाैरान चतरा लोकसभा क्ष्ोत्र के हेहेगड़ा रेलवे स्टेशन के समीप माओवादियों ने बरवाडीह-मुगलसराय पैसेंजर ट्रेन को चार घंटों तक बंधक बनाये रखा। फिर भी प्रशासनिक अधिकारियों ने हिम्मत नहीं जुटा सकी कि नक्सलियों की गिरफ्त में फंसे पैसेंजर को निकालने की पहल की जाये। दूसरी घटन्ाा इसी क्षेत्र के लादूप में हुई जहां सीआरपीएफ की बस को माओवादियों ने सुरंग विस्फोट कर उड़ा दिया। पड़ोस का पलामू लोकसभा सीट से भी बिहार आैर पूर्वी उत्त्ार प्रदेश का कुख्यात माओवादी आैर पांच लाख का इनामी कामेश्वर बैठा झारखंड मुिक्त मोर्चा के टिकट पर चुनावी समर में कूदा है। हालांकि बैठा इसके पहले भी संसदीय राजनीति में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। दो बड़े माओवादियों का चुनावी समर में कूदना नक्सलियों के बंदूक की राजनीति पर प्रश्नचिह्न लगाता है। आखिर क्या वजह है कि एक-एक कर माओवादी संसदीय रास्ते की ओर रूख कर रहे हैं। इसके पहले एमसीसी के नेता रामाधार सिंह बिहार के गुरुआ से चुनाव लड़कर नक्सली राजनीति को चुनाैती दे चुके हैं।
इधर बढनिया कांड के विरोध को लेकर प्रशासनिक बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुरू में अधिकारियों ने मारे गये लोगों को नक्सली करार दिया। लेकिन जनदबाव बढने लगा तब प्रक्षेत्रीय पुलिस महानिदेशक (आइजी) रेजी डुंगडुंग ने 23 अप्रैल को ग्रामीणों के मारे जाने की बात स्वीकारी। हालांकि, गृह सचिव जेबी तुबिद ने पूरे मामले पर "द पिब्लक एजेंडा' से कहा कि जबतक जांच रिपोर्ट नहीं आ जाती तब तक कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। वहीं राज्य पुलिस प्रवक्ता एसएन प्रधान का कहना है कि काैन लोग मारे गये हैं, इस संबंध में गृह सचिव ही कुछ बोल सकते हैं। बयानबाजी में फंस चुका यह मामला कई मायनों में पेचीदा बन चुका है। इस मामले में पुलिस के इरादे शुरू से ही विवादित रहे। मसलन पोस्टमार्टमर की वीडियोग्राफी तक नहीं करायी गयी। इस बात की खबर ग्रामीणों को बरवाडीह में किसी फोटाग्राफर से मिली।
पूरे मामले को करीब से देख रहे ग्रामीण महिला फुलमनी बोदरा आैर जग्गा कंडुलना (जिसने पुलिसिया दबिश में पांचों ग्रामीणों को सड़क की ओर दाैड़ते हुए देखा था) की मानें तो बाैखलाये जवानों की मंशा को भांपते हुए पांचों की खोजबीन शुरू की तो भयावह तस्वीर सामने आयी। इसे संयोग ही कहेंगे कि जंगल के रास्ते हुंटार कोलियरी होते हुए बरवाडीह पहुंचे ग्रामीणों की किसी फोटोग्राफर से मुलाकात हो गयी। इधर, घर लाैटने का इंतजार कर रही मृतक सुपाय बोदरा की तीनों बेटियां आैर 80 वर्षीय बूढ़ी मां के साथ ही पूरी तरह से विक्षिप्त उनकी पत्नी को अभी भी भरोसा नहीं हो रहा है कि सीपीएमडीआइ के काम कर रहे कर्मी आैर उसके भाई को जवानों ने क्यों निशाना बनाया। वहीं नउरी बोदरा का पूरा परिवार ही उजड़ गया। गोलियों के शिकार इनके दोनों बेटे भी बने।
पुलिस ने नाटकीय तरीके से मामले को रफा-दफा करने के लिए पहले ग्रामीणों को नक्सली बताया। लेकिन, जब इस बात का खुलासा हो गया कि मारे गये सारे लोग ग्रामीण हैं आैर नक्सलियों से मृतकों का कोई लेना-देना नहीं आैर खुद नक्सली भी इस गांव में जाने की जुर्रत नहीं करते, तब पसोपेश में फंसा पुलिस महकमा नित्य नये बयान देने लगा। नक्सलियों के तेवर भी तभी गर्म हुए जब एक साथ पांच लोगों की हत्याएं हो गयीं। जबकि, दो महीने पहले ही खूंटी जिले के मूरहू में सीआरपीएफ के जवानों ने महुआ चुन रहे 12 वर्षीय एक बच्चे को इसलिये गोली मार दी थी, क्योंकि उसने यह बताने से इनकार कर दिया था कि इस इलाके में नक्सली भी आते हैं। वहीं अड़की इलाके में भी कुछ दिन पहले एक किसान की अद्धसर्ैनिक बलों ने नक्सली बताकर हत्या कर दी थी। राज्य में लगातार खाैफनाक होता जा रहा पुलिस का चेहरा इस राज्य को किस हाल में छोड़ेगा, फिलहाल कहना मुिश्कल है।
इधर, भाकपा माओवादी के पूर्वी रिजनल ब्यूरो के अनिमेष ने अपने ही संगठन के अभय को कड़ी फटकार लगायी है आैर कहा है कि अभय ने बिना केंद्रीय कमेटी की इजाजत के ही कई दिनों तक लगातार बंद का ऐलान कर दिया, जिससे जनता को भारी परेशानी उठानी पड़ी। दूसरी ओर, बिहार, झारखंड, छत्त्ाीसगढ़ के प्रवक्ता गोपाल ने सिर्फ एक दिन ही बंदी का समर्थन किया था। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बढ़निया कांड को लेकर माओवादियों के साथ ही प्रशासन का आंतरिक ढांचा चरमरा गया है।

Sunday, April 12, 2009

माओवादियों का अर्थशास्त्र

विश्वव्यापी छायी मंदी ने जहां लोगों को जीना मुहाल कर दिया है वहीं देश में सक्रिय माओवादी विद्रोहियों का अर्थतंत्र इस मंदी से कोसों दूर है। न तो यहां छंटनी का खौफ है और न ही खर्चों में कटौती ही हो रही है। भाकपा (माओवादी) की गुरिल्ला आर्मी संगठन को आर्थिक मजबूती देने के लिए बतौर कमीशन लेवी वसूली में लगी हुई है। वैसे तो आज के समय में देश के अधिकांश हिस्से नक्सलियों की धधक से खौफजदा हैं फिर भी पशुपतिनाथ से तिरूपतिनाथ तक लाल गलियाना बनाने का सपना देख रहे नक्सलियों ने करीब १०५०० वर्ग लोमीटर क्षेत्र में अपनी हुकूमत स्थापित कर ली है जहां सरकार की नहीं, नक्सलियों की तूती बोलती है। बिहार, झारखंड, उड़ीसा और छतीसगढ़ के दर्जनों जिलों में वे अपनी जनवादी सरकार स्थापित करने का दावा कर रहे हैं। उन इलाकों में पहले सरकारी हुक्मरान जाने से कतराते थे। इस वजह से नक्सल इलाकों में वर्षों तक लोक निर्माण कार्य ठप रहा। लेकिन अब नक्सली मांद में सरकारी नुमाइंदे बेधड़क आवाजाही कर रहे हैं और सरकारी योजनाओं को अमलीजामा पहना रहे है। उन इलाकों में पुलिस भी सक्रिय दिख रही है। इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं। एक ओर जहां सरकार इसे नक्सलियों का घटता जनाधार मान रही है वहीं सूत्रों का कहना है कि नक्सली खेमा एक सोची-समझी रणनीति के तहत ही लोक निर्माण के कामों को करने की इजाजत दे रहा है ताकि उनका बजट सरप्लस हो सके। नक्सल आंदोलन से सहानुभूति रखने वाले लोगों का कहना है कि आधार इलाका तैयार करने की बात करने वाले नक्सली अब छापामार जोन बनाने में लगे हैं ताकि पुलिसिया दबिश का प्रभाव गुरिल्ला आर्मी पर नहीं पड़े। इंस्टिट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज़ एंड अनालिसिस के पीवी रमना का कहना है कि प्रत्येक वर्ष माओवादी विभिन्न स्रोतों से 1500 करोड़ रुपये राजस्व की उगाही कर रहे हैं।
नक्सली दस्तावेजों से मिली जानकारी के अनुसार बिहार समेत देश के दस राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकों में खोले गये इंर्ट चिमनी भठ्ठा से प्रतिवर्ष 25हजार रुपये लिये जा रहे हैं। खनन विभाग के अनुसार सिर्फ में ही आैसतन 760 इंर्ट भठ्ठे हैं। इस हिसाब से नक्सलियों के खाते में सूबे के चिमनी भठ्ठे से ही एक करोड़ 90हजार रुपये जमा हो रहे हैं। बालू घाटों से भी प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की वसूली हो रही है। पेट्रोल पंप से पहले वे आमदनी के अनुसार पैसे वसूला करते थे लेकिन अब नक्सलियों की गुरिल्ला आर्मी हाइवे के पेट्रोल पंपों से प्रतिवर्ष 30 हजार और ग्रामीण इलाकों के पंपों से 15 हजार रुपये की वसूली कर रही है। देहाती इलाकों में बन रहे मोबाइल टावर भी नक्सलियों की कमाई का अच्छा जरिया साबित हो रहा है। बीते महीने नक्सलियो ने बिहार के गया और औरंगाबाद के साथ ही झारखंड के देहाती इलाकों में स्थापित तीन दर्जन टावरों को इसलिए उड़ा दिया था ताकि वे समय पर लेवी दे दिया करें। लोक निर्माण के कामों में कमीशनखोरी की बात से भले ही प्रशासनिक अधिकारी इंकार करते रहें लेकिन सच्चाई यह है कि बिना नक्सलियों को लेवी दिये एक भी काम संपन्न नहीं हो रहा है। लेवी की रकम 5 से 20 फीसदी और किसी-किसी में 30 फीसदी तक निर्धारित है। जिन ठेकेदारों ने लेवी देने से इंकार किया उनकी योजनाएं तो खटाई में मिली ही वे भी नक्सलियों की गोली के शिकार हुए। जंगल तो नक्सलियों के लिए महफूज है ही। खुफिया सूत्रों का कहना है कि नक्सलियों के रहमोकरम पर ही वन विभाग के कर्मचारी और अधिकारी सुरक्षित हैं। जंगलों में लड़की से लेकर कत्था तस्करों की चांदी बिना नक्सलियों की सहमति के संभव ही नहीं है। इससे भी प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की आमदनी हो रही है। उड़ीसा के मयूरभंज जिले में कार्यरत एक अधिकारी का कहना है कि अकेले बांस के फूल से ही करोड़ों रुपये की उगाही नक्सली कर रहे हैं जबकि छतीसगढ़ और झारखंड में केंदू पत्ता ठेकेदार अच्छी कमाई का जरिया साबित हो रहे है।
वैसे तो हाल के वर्षों में जमीन आंदोलन से नक्सलियों ने अपना ध्यान खींच लिया है फिर भी उनका दावा है कि बिहार-झारखंड के करीब 17 हजार एकड़ जमीन पर जनवादी खेती हो रही है। इस जमीन की उपज का एक-चौथाई हिस्सा नक्सलियों के खजाने में जा रहा है। बिहार-झारखंड की सीमाई इलाकों में धान और गेहूं के बदले गांजा, भांग और अफीम की खेती इस बात का गवाह है कि समतामूलक समाज निर्माण की बात करने वाले माओवादी पैसे की उगाही के लिए किस तरह के तरकीब अपना रहे हैं। हालांकि सीधे-सीधे इसकी खेती के लिए माओवादियों को दोषी नहीं माना जा सकता फिर भी एक सवाल तो उठता ही है कि आखिर उन्हीं इलाकों में अफीम की खेती क्यों फल-फूल रही है,जो कभी माओवादियों का आधार क्षेत्र था। मजे की बात तो यह है कि इसकी खेती करने वालों में से अधिकांश नक्सलियों के हार्डनाइनर रहे हैं। चतरा में कार्यरत लाल दस्ता का सदस्य उमेश कहता है कि सरकार ने रोजगार के सारे साधन छीन लिये परिणामत: नक्सली समर्थक भी पेट की भूख मिटाने के लिए गलत धंधों में लिप्त हो गये हैं। अपने दस्तावेजों में नशा विरोधी अभियान की बात करने वाले नक्सलियों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि आखिर अधिकांश नक्सल प्रभावित गांवों में ही क्यों अवैध शराब (महुआ) तैयार हो रहा है? वर्ग विहीन समाज निर्माण की बात करने वाले नक्सलियों के पास क्या इस बात का जवाब है कि वह किस तरीके का समाज स्थापित करना चाहते हैं?
पूर्व खुफिया ब्यूरो और फिलहाल छतीसगढ़ में कार्यरत एक अधिकारी का कहना है कि सिर्फ जबरन वसूली से ही नक्सलियों को प्रति वर्ष 1500 करोड़ रुपये की आमदनी हो रही है। वैसे तो aउओधोगिक आैद्योगिक घराने नक्सलियों को लेवी देने की बात से इंकार करते हैं लेकिन सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। आन्ध्र के एक पेपर मिल कंपनी पिछले पांच वर्षों से प्रतिवर्ष 5 करोड़ रुपये दे रही है तो वहीं की रेयॉन कंपनी प्रतिवर्ष 10 लाख रुपये नक्सलियों को पहुंचा रही है। झारखंड में जब बुंडू का उपचुनाव हो रहा था तब इस बात की अफवाह थी कि झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने माओवादियों को खुश करने के लिए करोड़ों रुपये दिये हैं। हालात ऐसे हो गये हैं कि जिन परियोजनाओं में नक्सलियों की कोई रूचि नहीं है वैसी स्कीम सरकार के लाख प्रयास के बावजूद अधर में लटक जा रहा है। बात चाहे झारखंड के नेटरहाट िस्थत फील्ड फायरिंग रेंज की हो या बंगाल के सिंगूर आैर नंदीग्राम की। जिसमें मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा था कि विस्थापन विरोधी मोर्चा की आड़ में माओवादी इस आंदोलन को हवा दे रहे हैं। उड़ीसा का पोस्को (साउथ कोरिया की इस्पात उद्योग) समेत दर्जनों ऐसी परियोजनाएं हैं जिनका विरोध माओवादियों ने पर्दे के पीछे से किया आैर वे परियोजनाएं खटाई में पड़ गयीं। हाल ही में आन्ध्र प्रदेश का हार्डकोर माओवादी अन्ना शंकर की गिरफ्तारी जब बोकारो में हुई तब इस की पुिष्ट भी हो गयी कि किस तरह से नक्सलियों की जमात देश के विभिन्न भागों में विस्थापन विरोधी आंदोलन को हवा देते फिर रहे हैं।
समता आैर न्याय के तर्क आैर तकाजे के साथ जिन लोगों ने बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक स्थान से 1967 में बंदूक उठायी थी उन लोगों की हमदर्दी गरीबों के प्रति झलकती थी आैर वे सीलिंग की फालतू जमीन को भूमिहीनों के बीच बांटने के हिमायती थे। आज भी नक्सलियों की जमात भूमिहीनों को जमीन दिये जाने की वकालत तो करती है लेकिन उनका अधिकांश जोर लेवी वसूली पर जान पड़ता है। हालांकि इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसकी सही जानकारी तो नक्सलियों के पास भी नहीं है फिर भी, द पिब्लक एजेंडा की तहकीकात से जानकारी मिली की कि नक्सली आंदोलन को गति आैर पैसे की कमी को दूर करने के लिए एमसीसी आैर पीपुल्स वार गु्रप अपने-अपने आधार इलाकों में जमींदारों की तिजोरियां लूटा करते थे। फिर भी आर्थिक संकट खत्म नहीं हो रहा था तब तत्कालीन एमसीसी की केंद्रीय कमिटी ने लेवी वसूली का प्रस्ताव पास किया। आठवें दशक में कूप (जले लकड़ी से बनी कोयला) आैर खैर के कारोबारियों से मामूली रकम की वसूली की जाने लगी। एमसीसी के बिहार-बंगाल स्पेशल एरिया कमिटी के सचिव आैर पूर्व विधायक रामाधार सिंह बताते हैं,"बाद के दिनों में सिंचाई परियोजनाओं से लेकर लोक निर्माण के कामों में भी लेवी लेने का प्रावधान पास हुआ, जो बढ़ता ही गया।' बीते महीने जब उत्त्ार प्रदेश के सोनभद्र इलाके में हार्डकोर महिला माओवादी बबिता की गिरफ्तारी हुई तब इस बात का खुलासा हुआ कि माओवादियों की आक्रमक ताकत हथियार बटोरने आैर धन उगाही में लगी हुई है।
कंपनियों से लेवी वसूली की सूची बाद में दी जाएगी।
 

तीखे होंगे छापामार संघर्ष

एमसीसी के संस्थापक सदस्य व बिहार-बंगाल स्पेशल एरिया कमिटी के तीन-तीन बार सचिव रह चुके पूर्व विधायक रामाधार सिंह फिलहाल बंदी मुिक्त संघर्ष समिति के बैनर तले माओवादी राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने द पिब्लक एजेंडा से देश में चल रहे नक्सली आंदोलन पर अपनी बेबाक टिप्पणी की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश---
आप शिक्षक से नक्सल राजनीति (दरमिया आैर बघाैरा-दलेलचक नरसंहार समेत आधा दर्जन नरसंहारों के आरोपी रहे) में आये। फिर वहां से आपकी दिलचस्पी खत्म हुई आैर संसदीय रास्ता अपनाते हुए विधानसभा में पहुंचे। आखिर क्या कारण रहा कि मुख्यधारा की राजनीति को तिलांजलि देते हुए पुन: नक्सली गतिविधियों में शामिल हो गये हैं।
मैं शिक्षक के साथ-साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी था। देखा कि क्रांति के नाम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जमींदारों के साथ सांठगांठ करने में लगी है। फिर आैरंगाबाद के इलाके में जमींदारों के खिलाफ एमसीसी (अति चरम वामपंथी संगठन) का बगावती नेतृत्व अपनी ओर आकर्षित किया। इससे प्रभावित होकर मैंने भी बंदूक थाम ली। लेकिन एमसीसी की नरसंहार की राजनीति से मन उब गया आैर फिर संसदीय रास्ता अख्तियार कर लिया। लेकिन विधासभा के अंदर देखा कि किस तरह से गरीबों के पैसे पर नव जमींदार (विधायक आैर मंत्री) मटरगस्ती कर रहे हैं। उससे एक बार फिर लगा कि अगर गरीबों के लिए लड़ाई लड़नी है तो नक्सल आंदोलन से अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसी ख्याल से पुन: नक्सल आंदोलन को गति देने में लगा हूं।
पिछले चार वर्षों में दर्जनों कुख्यात माओवादी या तो गिरफ्तार कर लिये गये या फिर पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। इसका माओवादी पार्टी पर क्या असर दिख रहा है?
देखिये, फर्जी मुठभेड़ में नक्सलियों के मारे जाने से माओवादियों की ताकत बढ़ने वाली नहीं है। क्योंकि पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने वाले नक्सली अपने जमात में शहीद कहे जाते हैं। रही बात गिरफ्तारी की, तो नक्सलियों ने मुखबिरों के खिलाफ कार्रवाई (माैत के घाट) की शुरुआत कर दी है।
तो इसके क्या मायने निकाले जायें?
माओवाद एक विज्ञान है जिसका सिद्धांत कहता है कि दुश्मन से निपटने के लिए एक कदम आगे बढ़ना चाहिए जबकि दुश्मन की ताकत को भांपते हुए दो कदम पीछे भ्ाी हटना चाहिए। इसी सिद्धांत को मानते हुए नक्सलियों ने आन्ध्र के पड़ोसी राज्यों मसलन उड़ीसा, छत्त्ाीसगढ़, केरल आैर तमिलनाडू में अपना फैलाव शुरू कर दिया है ताकि पुलिसिया दमन होने पर जनता को इसका खामियाजा नहीं भुगतना पड़े वहीं दूसरी ओर आधार इलाके से सुरक्षित छापामार लड़ाई को तेज किया जा सके।
आन्ध्र प्रदेश के राज्य सचिव ने हाल ही में किसी केंद्रीय कमिटी के नेता पर मनमानी का आरोप लगाते हुए केरल पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसका पार्टी पर कैसा प्रभाव पड़ेगा?
पार्टी छोड़ने वाले से माओवादी राजनीति पर कोई खास असर तो नहीं पड़ेगा। लेकिन जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी िस्थ्ाति में केंद्रीय नेतृत्व को चाहिए कि वे माओवादी दर्शन से जनता को शिक्षित करे।
भाकपा (माओवादी) बंदूक के सहारे सत्त्ाा पर कब्जा करने बात करता है जबकि दंडकारण्य स्पेशल कमिटी ने छत्त्ाीसगढ़ सरकार से शांतिवात्त्र्ाा का प्रस्ताव रखा है। क्या माओवादी पार्टी कमजोर हो गयी है इस कारण सरकार से शांतिवात्त्र्ाा की अपील की है या इसके कुछ आैर मायने हैं।
यह नक्सलियों की कमजोरी नहीं है। बिल्क छत्त्ाीसगढ़ में बदले हालात का नतीजा है। वहां पर भाजपा सरकार आदिवासियों से आदिवासियों को लड़वाने की फिराक में है। इसीलिये नक्सलियों ने संघर्ष का अपना तरीका बदलते हुए सरकार से शांतिवात्त्र्ाा की शत्त्र्ा (प्रतिबंध हटाने) रखी है ताकि माओवादी राजनीति को जनसंगठन के माध्यम से जनता के बीच ले जाया जा सके।
बिहार-झारखंड के नक्सल प्रभावित सीमाई इलाकों में अफीम की खेती घड़ल्ले से हो रही है। क्या नक्सली नशाखोर समाज निर्माण में लगे हुए हैं?
यह आरोप सरासर गलत है। रूस आैर चीन में भी कई इलाके नशाखोरों की चपेट में थे जहां आंदोलन चल रहे थे। जिसे लाल फाैज ने कुशलता के साथ बिना एक बूंद खून बहे ही खत्म कर दिया था। यहां भी जरूरत है उस तरह के आंदोलन छेड़ने की। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दलालों की ही संख्या बढेगी। इसकी रोकथाम के लिए पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है। गया आैर चतरा के कई इलाकों में नक्सलियों ने अफीम उगाने वाले किसानों के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है।
फिर भी अफीम उगाने वाले किसानों की संख्या क्यों बढ़ती जा रही है?
जोनल कमांडरों में राजनैतिक चेतना का अभाव है। यही कारण है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में अवैध धंधे फल-फूल रहे हैं। इसकी रोकथाम के लिए पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है।
अचानक नक्सलियों ने जमीन आंदोलन से अपना ध्यान हटा दिया है? क्या माओवादी पार्टी अपने पुराने सिद्धांतों से हट गयी है?
ऐसी कोई बात नहीं है, अपने पुराने सिद्धंातों पर पार्टी आज भी कायम है।
नक्सलियों के नाम पर झारखंड में आधा दर्जन नक्सली समूह तैयार हो गये हैं जो आये दिन आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते फिर रहे हैं। क्या ऐसे गिरोहों की माकपा (माओवादी) से सांठगांठ है।
नहीं, विकृत मानसिकता के क्रांति विरोधी लोग ही नक्सलवाद के आदर्श सिद्धांतों के खिलाफ हैं जिसका खामियाजा भाकपा (माओवादी) को भुगतना पड़ रहा है जबकि सच्चाई यह है कि माओवादियों ने अबतक चार दर्जन से अधिक टीपीसी समेत अन्य आपराधिक गिरोह के सदस्यों मार गिराया है।
भाकपा (माओवादी) की आगे की रणनीति होगी?
माओवादियों की रणनीति किसी से छुपी हुई नहीं है। फिर भी छत्त्ाीसगढ, महाराष्ट्र, उड़ीसा आैर आन्ध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में सक्रिय नक्सली संगठन भाकपा माले (जनशिक्त) से विलय के लिए वार्ता चल रही है। अगर परििस्थति ने साथ दिया तो जल्द ही भाकपा (माओवादी) में जनशिक्त का विलय हो जायेगा। अगर यह संभव हुआ तो देश मंेंं छापामार लड़ाई आैर तीखी होगी।
आसन्न लोकसभा चुनाव में नक्सलियों की कैसी रणनीति होगी?
क्रांति का रास्ता साफ है। अब आर-पार की लड़ाई शुरू हो गयी है जिसमें एक जगह संसदीय रास्ते हैं तो दूसरे रास्ते की लड़ाई माओवादी दिखा रहे हैं। इस बार के चुनाव में पार्टी जनता के बीच जायेगी आैर नेताओं के ढपोरशंखी घोषणाओं आैर उनके दागदार चेहरे को बेनकाम करेगी।
 

तार-तार होती दोस्तियां

अवसरवादी राजनीति का नायाब उदाहरण बन गया है झारखंड। सियासतदानों ने चुनावी रण-घोषणा के साथ ही गठबंधन की सिद्धांतविहीन राजनीति शुरू कर दी है। पूरी तरह से नक्सलियों की चपेट में होने के बावजूद चुनावी सभाओं में नक्सलवाद का मुद्दा गायब है। न तो चुनावी अभियानों में बिजली, पानी मुद्दा बन रहा है आैर न ही सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसी आधारभूत सुविधाओं की बातें उठ रही हैं। आश्चर्य तो यह कि लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने तक झारखंडी नेता जहां गठबंधन राजनीति की मजबूती की दुहाई देते फिर रहे थे। वहीं प्रथम चरण की अधिसूचना जारी होते ही यूपीए की दोस्ती तार-तार हो गयी। राजद ने लोजपा के साथ चुनावी बैतरनी पार करने का मन बनाया तो झामुमो ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। फिर भी कांग्रेस ने समझाैते को दरकिनार करते हुए हजारीबाग से साैरभ नारायण सिंह को टिकट देकर यह साफ संदेश दिया है कि इस चुनाव में कांग्रेस की कोई मजबूरी नहीं है। बिल्क झामुमो ही अपनी साख बचाने के लिए कांग्रेस के सहारे अपना बेहतर प्रदर्शन कर सकता हैै। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए 6 सीटों पर अपना कब्जा जमाया था वहीं झामुमो की झोली में 4 सीटें आयी थीं।
ऐसी बात नहीं घमासान सिर्फ यूपीए में ही मचा है बल्कि एनडीए भी इससे अछूता नहीं रहा। समझाैते के अनुसार चतरा आैर पलामू सीट जदयू के खाते में चला गया। फिर क्या था? बगावती तेवर तीखे हो गये। हुआ यह कि सूबे की इकलाैती अनुसूचित जाति की सीट पलामू जदयू के खाते मेंं चला गया फिर चतरा लोकसभा सीट से जदयू ने भाजपा के जिला अध्यक्ष अरुण कुमार यादव को अपनी पार्टी में मिलवाया आैर चुनाव चिह्न थमा दिया। इससे बाैखलाये भाजपा विधायक सत्यानंद भोक्ता के नेतृत्व में सैकड़ों कार्यकर्ता प्रदेश कार्यालय पहुंचे आैर प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ जमकर नारेबाजी शुरू की। प्रदेश कार्यालय में ताला जड़ दिये गये। प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास समेत सारे पदाधिकारी बंदी बना लिये गये। सामूहिक इस्तीफे की मांग उठी। समझाैता भंग करने की मांग करते हुए भोक्ता ने "द पिब्लक एजेंडा' से कहा, "जदयू नेतृत्व के हाथों भाजपा को गिरवी रख दिया गया है। पलामू की सीट को जदयू के खाते में डालकर भाजपा ने दलितों के साथ अन्याय किया है।' वहीं प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास का कहना है, "गठबंधन धर्म की अपनी मजबूरी होती है। इसी मजबूरी के तहत दोनों सीटें जदयू को दिया गया है।' जबकि जदयू के प्रदेश अध्यक्ष जलेश्वर महतो ने द पिब्लक एजेंडा से कहा, "भाजपाइयों की इस नाैटंकी से प्रदेश प्रभारी सुषमा स्वराज को अवगत करा दिया गया है। एक-दो दिनों में सारा मामला पटरी पर आ जायेगा।' प्रदेश नेतृत्व चाहे जो भी तर्क दें लेकिन सच्चाई यह कि भाजपा एक ही साथ दोहरे घाटे का दंश झेल रहा है। पहला यह कि अपने कारनामों से खुद ही अरुण कुमार यादव जैसा समर्पित कार्यकर्ता खो दिया दूसरा इंदरसिंह नामधारी जैसा कद्दावर नेता भी चाहे-अनचाहे हाथ से निकल गये।
सूबे में गठबंधन की राजनीति से अपने को अबतक झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांित्रक) ही अलग किये हुए है। शायद यह निर्णय पार्टी सुप्रीमो आैर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने हवा का रुख देखकर ही लिया है। तभी तो उन्होंने तीसरे मोर्चे में भी शामिल होने से साफ ताैर पर इंकार करते हुए कहा कि चुनाव पूर्व गठबंधन दर्द ही पैदा करते हैंजबकि चुनाव बाद हुए गठबंधन आंनददायी होता है। उन्होंने सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा की है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से अपनी राजनीतिक का सफर शुरू करने वाले मरांडी का वही वोट बैंक है, जो भाजपा का है। यह मरांडी की अिग्नपरीक्षा भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा में आंतरिक कलह की वजह से ही पिछले चुनाव में 33.01 फीसदी वोट पाने के बावजूद मात्र एक ही सीट से संतोष करना पड़ा था। बिहार में हुए वाम एकता से उत्साहित कम्युनिस्टों ने यहां भी वही उम्मीद पाल रखी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब मैं खबर लिखने बैठा था। भाकपा माले के महासचिव दीपाकंर भट्टाचार्य कोडरमा में अपनी चुनावी सभा को संबोधित करते हुए वाम बिखराव के लिए सारा दोष सीपीएम आैर सीपीआइ पर दे रहे थे। आरोप-प्रत्यारोप के इस दाैर में एक बार फिर प्रदेश की राजनीति दलदल में फंसी हुई है। फैसला जनता के हाथों में है।

चुनाव बहिष्कार कितना कारगर

लातेहार जिले के पोचरा गांव के लोग संसदीय लोकतंत्र और माओवादी जनवाद बीच चल रहे सत्ता संघर्ष के भंवर में फंसे हैं। उन्हें यह नहीं सूझ रहा कि आखिर क्या किया जाये? लोकतंत्र के चुनावी उत्सव में शामिल हुआ जाये या फिर नक्सलियों की बातों पर यकीन करते हुए वैकल्पिक जनसत्ता के निमार्ण में पूरी ताकत झोंक दी जाये। विदित हो कि माओवादियों ने पूरे गांव को चुनाव बहिष्कार के पोस्टर से पाट दिया है। ऐसी दुविधा सिर्फ पोचरा गांव के मतदाताओं की ही नहीं है बल्कि नक्सल प्रभावित बिहार के 19, झारखंड, छत्तीसगढ, उड़ीसा के अधिकांश लोकसभाई क्षेत्र, महाराष्ट्र के चार, पश्चिम बंगाल के पुरुलिया समेत तीन, पूर्वांचल के चार, उत्तराखंड के दो औरकर्नाटक के एक लोकसभाई क्षेत्रों के मतदाताओं के बीच बनी हुई है। इन क्षेत्रों में नक्सलियों ने संसदीय व्यवस्था के खिलाफ जोरदार प्रचार अभियान चला रखा है। खुफिया सूत्रों के अनुसार देश के 210 जिलों में माओवादियों ने राजनैतिक-सांगठनिक ढांचा तैयार कर लिया है जिमसें 53 जिले अतिसंवेदनशील हैं जबकि आंशिक रूप से प्रभावित 68, औसतन प्रभावित 20 जिले हैं। 70 जिलों मेंे माओवादी गुरिल्ला जोन में बदलने की फिराक में हैं। नक्सली सूत्रों का कहना है कि इन्हीं इलाकों में से 90 लोकसभाई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर चुनाव बहिष्कार की तैयारी है जबकि अन्य इलाकों में सिर्फ चुनाव बहिष्कार के लिए प्रचार अभियान चल रहा है।
पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में माओवादियों ने मतदाताओं की भावनाओं को दरकिनार करते हुए जिस हिंसक तेवर के साथ गया के देहाती इलाके में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष वैकेंया नायडू के हेलीकॉप्टर को जलाकर राख कर दिया था। इमामगंज विधानसभा क्षेत्र के लोजपा प्रत्याशी राजेश कुमार को गोलियों से भून दिया था। दो दर्जन से अधिक चुनाव प्रचार वाहनों में आग लगा दी थी। दो दर्जन से अधिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं से इस्तीफा दिलवाकर संसदीय व्यवस्था के खिलाफ बगावती तेवर दिखाने का संकल्प करवाया था जबकि झारखंड में चार कार्यकर्ताओं के हाथ काट डाले थे। हालांकि बिहार-झारखंड में इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि संसदीय धारा के कई व्यक्तियों से नक्सलियों की गहरी दोस्ती है जिसका फायदा वे मतदान के दौरान लेते रहे हैं। बीते तमाड़ उपचुनाव में ही इस बात की अफवाह थी कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ ही एनोस एक्का की झारखंड पार्टी से नक्सलियों का सांठगांठ है। वहीं बिहार में राजद से माओवादियों की दोस्ती की भी चर्चा गाहे-बगाहे होती रही है।
कमोवेश यही स्थिति झारखंड और छत्तीसगढ़ में दिखा था। उससे सहमे राजनैतिक कार्यकर्ता इस बार देहाती इलाकों में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। कमोवेश यही स्थिति छत्तीसगढ़ के बस्तर, दांतेवारा, कांकेर, बीजापुर समेत आठ जिले, उड़ीसा के कंधमाल, मयूरभांज, आन्ध्रप्रदेश के करीमनगर समेत संपूर्ण दण्कारण्य क्षेत्र, महाराष्ट्र के गढ़चिरौरी समेत अन्य नक्सल प्रभावित देहाती इलाकों की है जहां के ग्रामीणों ने अबतक राजनैतिक दलों के प्रचार वाहन नहीं देखा है। बीते दिनों दांतेवाड़ा इलाके में माओवादियों की गोलियों के शिकार दो भाजपा कार्यकर्ता बन चुके हैं। इन इलाकों की दीवारों पर चुनाव बहिष्कार के पोस्टर चस्पे देखे जा सकते हैं। झारखंड के चतरा, पलामू, खूंटी, जमशेदपुर, गुमला के साथ ही छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा, बस्तर, बिहार के गया, नवादा आदि इलाकों में वहीं तक राजनैतिक दलों का प्रचार वाहन जा रहा है जहां तक सुरक्षा बलों की तैैनाती है। मसलन अधिकांश ग्रामीण इलाकों में चुनावी उत्सव का नामोनिशान नहीं है जबकि देश के अन्य भागों में चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही राजनीतिक सरगर्मी दिनोंदिन तेज होती जा रही है।
हालांकि छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ इलाके से कुछ दूसरी ही खबर आ रही है। बताया जाता है कि इस इलाके को मुगल शासकों से लेकर आज तक किसी ने नहीं बूझा। नक्सलियों के लिए यह इलाका 70 के दशक से ही महफूज रहा है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि इन दिनों माओवादी वहां अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। इस इलाके में अर्द्धसैनिक बल तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है। बात दीगर है कि इसी इलाके से अगस्त, 2008 को एक हेलीकॉप्टर गायब हो गया था। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि गायब हुआ हेलीकॉप्टर नक्सलियों के पास है जबकि नक्सली इससे इंकार करते रहे हैं। उसे खोजने में अर्द्धसैनिक बल नाकाम रहा है।
नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार के मद्देनजर सलवा जुडूम कैंपों को ही मतदान केंद्र में तब्दील किया जा रहा है। इस बाबत नाम नहीं छापने की शर्त पर एक स्थानीय हिन्दी समाचार पत्र के संपादक बताते हैं कि भले ही माओवादियों की हिंसक तेवर से चुनाव आयोग सहमा हो लेकिन सच्चाई यह है कि नक्सलियों की हिंसक कार्रवाई से आम जनता ऊ ब चुकी है। नक्सली सिर्फ हिंसक वारदातों को अंजाम देकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
इधर राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बीच उस वक्त सनसनी फैल गयी जब छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके में 17 मार्च को 5 टन विस्फोटक के साथ हथियारों का जखीरा पकड़ाया। केंद्रीय जांच ब्यूरो के अधिकारियों का कहना है कि यह दांतेवाड़ा इलाके में ले जाया जा रहा था जहां से नक्सली हिंसक वादरातों को अंजाम देने के लिए अपने प्रभाव वाले इलाकों में बांटते।
बात दीगर है कि बंदूक के सहारे चुनाव बहिष्कार की धमकी देने वाले नक्सली इस बार जनवाद की बात कर रहे हैं और हिंसक तेवर से परहेज करने को कहा है। पहली बार नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार के औचित्य को सही ठहराते हुए आठ पन्नों का वैकल्पिक जनसत्ता निर्माण चुनावी घोषणा पत्र जारी किया है और मतदाताओं से चुनाव बहिष्कार की मार्मिक अपील की है। भाकपा (माओवादी) के बिहार-झारखंड- छत्तीसगढ़ स्पेशल एरिया कमिटी के प्रवक्ता गोपाल का कहना है कि मौजूदा सरकार विकास के नाम पर सिर्फ बयानबाजी कर रही है और अराजकता को बढ़ावा दे रही है। उनके अनुसार पांच साल के कुशासन के बाद एक बार फिर संसदीय चुनाव हो रहे हैं। इसके बाद जो सरकार बनेगी उससे लोकतंत्र की मजबूती के नाम पर फायदा भले ही किसी और को होगा लेकिन इस चुनाव में लिया जानेवाला जनादेश अगले पांच साल तक जनता पर जुल्म ढाने, बेरोजगारी और भुखमरी पैदा करने वाली नीतियों की ही पोषक होगी। अपने पर्चे में माओवादियों ने कहा है कि वैश्विक भुखमरी के सूचकांक के अनुसार 118 देशों में भारत का 94वां स्थान है जो पाकिस्तान और इथोपिया से भी नीचे है। गोपाल के अनुसार, "तथाकथित आजादी के 61 वर्षों और भारतीय गणतंत्र के 48 वर्षों के बाद भी देश अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक बना हुआ है। अमीरी-गरीबी के बीच खायी चौड़ी होती जा रही है। देश के विभिन्न भागों में चल रहे राष्ट्रीयता के आंदोलन को बेरहमी से कुचला जा रहा है। भारतीय संसद पूंजीपतियों की पोषक है जिसे साम्राज्यवाद पूरी तरह से अपनी मुट्टी में जकड़ लिया है। इससे बचने का एक मात्र रास्ता वैकल्पिक सत्ता का निर्माण ही है। नक्सलियों ने भारतीय को गणराज्य बनाने के लिए लोकयुद्ध तेज करने और सामंतवाद-साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए वोट नहीं, चोट की जरूरत पर बल दिया है। माओवादियों का मानना है कि बिना पीपुल्स गुरिल्ला लिबरेशन आर्मी में शामिल हुए क्रांतिकारी सरकार का निर्माण संभव ही नहीं है।
हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब नक्सलियों ने संसदीय व्यवस्था को जनवाद के लिए धोखा बताया है। बल्कि आज से करीब 40 साल पहले 14 मार्च, 1968 को ऑल इंडिया कमिटी ऑफ कम्युनिस्ट रिव्यूसनरीज के संयोजक एस रॉय चौधुरी ने चुनाव को छलावा बताते हुए पहली बार इसके बहिष्कार की घोषणा की थी। तब से चुनाव बहिष्कार का यह नारा एक लंबा सफर तय कर चुका है। हर लोकसभा और विधानसभा चुनाव के समय नक्सली संसदीय व्यवस्था के बहिष्कार की घोषणा करते हैं। बावजूद इसके कुछ इलाके के छोड़ अधिकांश क्षेत्रों में मतदाता इस नारे को खारिज ही करते रहे हैं। प्रधानमंत्री भले ही नक्सलियों की हिंसक ताकत को देखते हुए इसे नक्सलवादी वायरस की संज्ञा दें लेकिन सच्चाई यह है कि अब भी देश का आम अवाम माओवादियों की जनवाद की ओर आकर्षित नहीं हो रहा है। हालात ऐसे उत्पन्न हो गये हैं कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में मतदाताओं ने नक्सली फरमान को दरकिनार करते हुए भाजपा के पक्ष में जमकर मतदान किया था। परिणामत: छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बन गयी।
संसदीय व्यवस्था और माओवादियों के बीच चल रहे द्वंद के बीच कभी चुनाव बहिष्कार का मुखर विरोध करने वाला नक्सलियों की जमात में से एक भाकपा (माले) लिबरेशन स्वयं ही संसदीय व्यवस्था का अंग बन गया है और वैकल्पिक जनसत्ता की बात कर रहे भाकपा (माओवादी) को अराजकतावादी घोषित कर दिया है। दूसरी ओर नक्सलबाड़ी मेें संसदीय व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करने वालों में से एक मृत्यु शैय्या पर पड़े कानू सान्याल ने माओवादियों की हर कार्रवाई को आतंकवादी कार्रवाई घोषित कर चुके हैं। रही बात सीपीआइ (एमएल) न्यू डेमोक्रेसी, रेड फ्लैग समेत अन्य नक्सलपंथी समूहों की। तो इनमें से अधिकांश समूहों में अभी जनवादी क्रांति के रास्ते को लेकर भ्रम बना हुआ है। हां इतना जरूर है कि सारे नक्सलपंथी समूह वर्तमान व्यवस्था को खारिज करते हैं। यह तो समय ही बतायेगा कि माओवादियों की बातों पर मतदान किस रूप में भरोसा करता है। वे वैकल्पिक जनसत्ता निर्माण में नक्सलियों के साथ खड़े होते हैं या वर्तमान व्यवस्था को ही सही जनवाद मानते हैं।
 

Tuesday, March 17, 2009

तीखे होंगे छापामार संघर्ष

एमसीसी के संस्थापक सदस्य व बिहार-बंगाल स्पेशल एरिया कमिटी के तीन बार सचिव रह चुके पूर्व विधायक रामाधार सिंह फिलहाल बंदी मुक्ति संघर्ष समिति के बैनर तले माओवादी राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने पब्लिक एजेंडा से देश में चल रहे नक्सली आंदोलन पर अपनी बेबाक टिप्पणी की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश---
आप शिक्षक से नक्सल राजनीति (दरमिया और बघौरा-दलेलचक समेत आधा दर्जन नरसंहारों के आरोपी रहे) में आये। फिर वहां से आपकी दिलचस्पी खत्म हुई और संसदीय रास्ता अपनाते हुए विधानसभा में पहुंचे। आखिर क्या कारण रहा कि मुख्यधारा की राजनीति को तिलांजलि देते हुए पुन: नक्सली गतिविधियों में शामिल हो गये हैं
मैं शिक्षक के साथ-साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी था। देखा कि क्रांति के नाम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जमींदारों के साथ सांठगांठ करने में लगी है। फिर औरंगाबाद के ग्रामीण इलाके में जमींदारों के खिलाफ एमसीसी (अति चरम वामपंथी संगठन) का बगावती नेतृत्व अपनी ओर आकर्षित किया। इससे प्रभावित होकर मैंने भी बंदूक थाम ली। लेकिन एमसीसी की नरसंहार की राजनीति से मन उब गया और फिर संसदीय रास्ता अख्तियार कर लिया। लेकिन विधासभा के अंदर देखा कि किस तरह से गरीबों के पैसे पर नव जमींदार (विधायक और मंत्री) मटरगस्ती कर रहे हैं। उससे एक बार फिर लगा कि अगर गरीबों के लिए लड़ाई लड़नी है तो नक्सल आंदोलन से अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसी ख्याल से पुन: नक्सल आंदोलन को गति देने में लगा हूं।
पिछले चार वर्षों में दर्जनों कुख्यात माओवादी या तो गिरफ्तार कर लिये गये या फिर पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। इसका माओवादी पार्टी पर क्या असर दिख रहा है?
देखिये, फर्जी मुठभेड़ में नक्सलियों के मारे जाने से माओवादियों की ताकत घटने वाली नहीं है। क्योंकि पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने वाले नक्सली अपने जमात में शहीद कहे जाते हैं। रही बात गिरफ्तारी की, तो नक्सलियों ने मुखबिरों के खिलाफ कार्रवाई (मौत के घाट) की शुरुआत कर दी है।
तो इसके क्या मायने निकाले जायें?
माओवाद एक विज्ञान है जिसका सिद्धांत कहता है कि दुश्मन से निपटने के लिए एक कदम आगे बढ़ना चाहिए जबकि दुश्मन की ताकत को भांपते हुए दो कदम पीछे भी हटना चाहिए। इसी सिद्धांत को मानते हुए नक्सलियों ने आन्ध्र के पड़ोसी राज्यों मसलन उड़ीसा, छातीश्गढ़, केरल और तमिलनाडू में अपना फैलाव शुरू कर दिया है ताकि पुलिसिया दमन होने पर जनता को इसका खामियाजा नहीं भुगतना पड़े वहीं दूसरी ओर आधार इलाके से सुरक्षित छापामार लड़ाई को तेज किया जा सके।
आन्ध्र प्रदेश के राज्य सचिव ने हाल ही में किसी केंद्रीय कमिटी के नेता पर मनमानी का आरोप लगाते हुए केरल पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसका पार्टी पर कैसा प्रभाव पड़ेगा?
पार्टी छोड़ने वाले से माओवादी राजनीति पर कोई खास असर तो नहीं पड़ेगा। लेकिन जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय नेतृत्व को चाहिए कि वे माओवादी दर्शन से जनता को शिक्षित करे।
भाकपा (माओवादी) बंदूक के सहारे stta सत्त्ाा पर कब्जा करने बात करता है जबकि दंडकारण्य स्पेशल कमिटी ने छतीश्गढ़ सरकार से shantivarta शांतिवात्त्र्ाा का प्रस्ताव रखा है। क्या माओवादी पार्टी कमजोर हो गयी है इस कारण सरकार से शांतिवात्त्र्ाा की अपील की है या इसके कुछ आैर मायने हैं।
यह नक्सलियों की कमजोरी नहीं है। बिल्क छत्त्ाीसगढ़ में बदले हालात का नतीजा है। वहां पर भाजपा सरकार आदिवासियों से आदिवासियों को लड़वाने की फिराक में है। इसीलिये नक्सलियों ने संघर्ष का अपना तरीका बदलते हुए सरकार से शांतिवात्त्र्ाा की शत्त्र्ा (प्रतिबंध हटाने) रखी है ताकि माओवादी राजनीति को जनसंगठन के माध्यम से जनता के बीच ले जाया जा सके।
बिहार-झारखंड के नक्सल प्रभावित सीमाई इलाकों में अफीम की खेती घड़ल्ले से हो रही है। क्या नक्सली नशाखोर समाज निर्माण में लगे हुए हैं?
यह आरोप सरासर गलत है। रूस आैर चीन में भी कई इलाके नशाखोरों की चपेट में थे जहां आंदोलन चल रहे थे। जिसे लाल फाैज ने कुशलता के साथ बिना एक बूंद खून बहे ही खत्म कर दिया था। यहां भी जरूरत है उस तरह के आंदोलन छेड़ने की। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दलालों की ही संख्या बढेगी। इसकी रोकथाम के लिए पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है। गया आैर चतरा के कई इलाकों में नक्सलियों ने अफीम उगाने वाले किसानों के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है।
फिर भी अफीम उगाने वाले किसानों की संख्या क्यों बढ़ती जा रही है?
जोनल कमांडरों में राजनैतिक चेतना का अभाव है। यही कारण है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में अवैध धंधे फल-फूल रहे हैं। इसकी रोकथाम के लिए पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है।
अचानक नक्सलियों ने जमीन आंदोलन से अपना ध्यान हटा दिया है? क्या माओवादी पार्टी अपने पुराने सिद्धांतों से हट गयी है?
ऐसी कोई बात नहीं है, अपने पुराने सिद्धंातों पर पार्टी आज भी कायम है।
नक्सलियों के नाम पर झारखंड में आधा दर्जन नक्सली समूह तैयार हो गये हैं जो आये दिन आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते फिर रहे हैं। क्या ऐसे गिरोहों की माकपा (माओवादी) से सांठगांठ है।
नहीं, विकृत मानसिकता के क्रांति विरोधी लोग ही नक्सलवाद के आदर्श सिद्धांतों के खिलाफ हैं जिसका खामियाजा भाकपा (माओवादी) को भुगतना पड़ रहा है जबकि सच्चाई यह है कि माओवादियों ने अबतक चार दर्जन से अधिक टीपीसी समेत अन्य आपराधिक गिरोह के सदस्यों मार गिराया है।
भाकपा (माओवादी) की आगे की रणनीति होगी?
माओवादियों की रणनीति किसी से छुपी हुई नहीं है। फिर भी छत्त्ाीसगढ, महाराष्ट्र, उड़ीसा आैर आन्ध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में सक्रिय नक्सली संगठन भाकपा माले (जनशिक्त) से विलय के लिए वार्ता चल रही है। अगर परििस्थति ने साथ दिया तो जल्द ही भाकपा (माओवादी) में जनशिक्त का विलय हो जायेगा। अगर यह संभव हुआ तो देश मंेंं छापामार लड़ाई आैर तीखी होगी।
आसन्न लोकसभा चुनाव में नक्सलियों की कैसी रणनीति होगी?
क्रांति का रास्ता साफ है। अब आर-पार की लड़ाई शुरू हो गयी है जिसमें एक जगह संसदीय रास्ते हैं तो दूसरे रास्ते की लड़ाई माओवादी दिखा रहे हैं। इस बार के चुनाव में पार्टी जनता के बीच जायेगी और नेताओं के ढपोरशंखी घोषणाओं और उनके दागदार चेहरे को बेनकाम करेगी।

माओवादियों का बदला नेता!

"आप मजदूर हैं और आपकी मेहनत के सहारे ही देश आगे बढ़ता है। आपके खून-पसीने को मलाई में बदलकर मालिक-सरकार जमकर मौज उड़ाते हैं और आप अंधेरे में रहते हैं। इसलिये एक वर्ग की सरकार में बगैर हिस्सेदारी के भी रणनीति के तौर पर कैसे लाभ उठाया जाये, इसे समझना होगा। नहीं तो हम सभी मारे जाएंगे।'
नक्सलियों के सबसे बड़े नेता गणपति का यह बयान मुंबई हमले के बाद आया है। एक ओर सरकार देशी-विदेशी आतंकियों से निपटने के लिए फेडरल एजेंसी बनाने की पहल कर रही है वहीं दूसरी ओर गणपति ने यह बयान देकर नक्सली जमातों के साथ ही प्रशासनिक खेमे में भूचाल ला दिया है। बंदूक के सहारे सत्ता हथियाने की वकालत करने वाले गणपति को आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ गयी कि उन्होंने सरकार में हिस्सेदारी के बगैर ही लाभ उठाने की समझौतावादी लाइन को अख्तियार करने की बात कह डाली। गणपति की मानें तो आजादी के बाद देश का बड़ा हिस्सा विकास की रोशनी से कोसों दूर रहा है। इसलिए संसदीय राजनीति के अंतरविरोधों और जनता के आक्रोश को गोलबंद कर ही उसका लाभ उठाया जा सकता है।
इधर नक्सली जमातों से लेकर प्रशासनिक महकमों तक में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल रही है कि नक्सली प्रमुख मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति लंबे समय से बीमार चल रहे हैं। इस वजह से संगठन के कामों में वे विशेष रूचि नहीं ले रहे हैं। परिणामत: संगठन की जिम्मेदारी आन्ध्रप्रदेश - उड़ीसा स्पेशल एरिया कमिटी के सचिव सब्यसाची पांडा को मिल गयी है। हालांकि इसकी पुष्टि न तो नक्सली खेमा कर रहा है और ही केंद्रीय खुफिया ब्यूरो को इस बात की सही जानकारी है। एमसीसी खेमे से आने वाले 40 वर्षीय पांडा के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने वर्ष 1996 में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। 2006 में कोटापुर जेलब्रेक को अंजाम देने वाले पांडा ने तब 774 पुलिस रायफलें लूटकर माओवादी खेमे में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। नयागढ़ जेलब्रेक में भी रणनीति के तौर पर उनकी भूमिका मानी जाती है। आन्ध्रा पुलिस ने उन पर १० लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा है। राजनीतिक परिवार से आने वाले पांडा के पिता और भाई पहले माकपा के सदस्य थे लेकिन कुछ वर्ष पहले ही उन लोगों ने बीजू जनता दल का दामन थाम लिया।
छनकर आ रही खबरों के मुताबिक इन दिनों भाकपा (माओवादी) के अंदर संघर्ष के तरीकों को लेकर गहरी बहस छिड़ी हुई है और वे नये सिरे से भारतीय उपमहाद्वीप को परिभाषित करने में लगे हुए हैं। विदित हो कि आजादी के बाद से लेकर अबतक माओवादी इस देश को अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक देश मानते रहे हैं। लेकिन माओवादियों की कर्नाटक इकाई देश की अर्द्धसामंती चेहरे कोे सिरे से खारिज कर दिया है जबकि इसी सामंतवाद की बुनियाद पर साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के गांवों में जन्मा नक्सलवाद धुर विप्लवी वामपंथी माओवादी विचारकों चारु मजूमदार और कानू सान्याल समेत दर्जनभर कम्युनिस्टों के जेहन से निकलकर साहित्यकार महाश्वेता देवी की "हजार चौरासी की मां' के कथानक तक विस्तृत हो गया है। कभी कानून-व्यवस्था की समस्या बन चुना नक्सलवाद अब घोषित तौर पर सामाजिक -आर्थिक प्रक्रिया में बदलाव का हामी हो गया है और उसका घटिया संस्करण सबके सामने है। शायद तभी गणपति का सूर भी बदला नजर आ रहा है।
माओवादी राजनीति में एक ही साथ कई समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। मसलन कभी दक्षिण एशिया में माओवादी आंदोलन को हवा देने वाला नक्सलियों का अगुवा नेपाल संसदीय रास्ता अख्तियार कर लिया है और दुनिया के माओवादियों के बीच यह संदेश दे रहा है कि वर्तमान समय में बंदूक के सहारे सत्ता हथियाने का रास्ता बंद हो चुका है। सूत्रों का कहना है कि माओवादियों की एक बड़ी जमात नेपाल के प्रचंड लाइन का मौखिक समर्थन कर रहा है। ऐसे में माओवादियों के बीच इस बात की बहस चल पड़ी है कि जब चीन में ही माओत्सेतुग्ड अप्रसांगिक हो गये तो फिर विविधताओं से भरे भारत में बंदूक के सहारे सत्ता कैसे हासिल की जा सकती है? वैसे ही लोग इस बात की वकालत कर रहे हैं कि जरूरत है अतीत की विरासत, वर्तमान के अनुभव और भविष्य की आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर ही नयी विचारधारा और परिर्वतन की रणनीति बनाने की।
नौंवे दशक में अचानक उत्तर भारत में दलित और पिछड़े संसदीय नेताओं का राजनीति में उभार होना भी नक्सलियोंं के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। यही कारण है वोट बहिष्कार को तिलांजलि देते हुए नक्सल समर्थक लोग अब जमकर मतदान में हिस्सा ले रहे हैं। बिहार, झारखंड, उड़ीसा समेत नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों के गांवों से बड़े जोतदारों और जमींदारों का पलायन हो चुका है। यानी उन लोगों ने नक्सलियों की हुकूमत स्वीकार कर ली है।
केंद्रीय नेतृत्व इन सारी बातों पर आत्ममंथन ही कर रहा था कि अचानक छत्तीसगढ़ राज्य इकाई की दंडकारण्य कमिटी ने सरकार से शांति वार्ता का प्रस्ताव रख डाला। मजे की बात यह है कि इसबात की जानकारी केंद्रीय नेतृत्व तक को नहीं है। यही नहीं, आन्ध्र प्रदेश इकाई के राज्य सचिव और केंद्रीय कमिटी के सदस्य सांबासिवुदू ने आत्मसमर्पण करके नेतृत्व की कुशलता पर ही सवाल उठाया है। खबर है कि माओवादियों के शीर्ष नेतृत्व से उनकी अनबन चल रही थी। ये वही माओवादी हैं जिन्होंने अक्तूबर, 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू पर हमले की योजना बनायी थी। इन्होंने 1993 में महमूदनगर जिले से भूमिगत माओवादी राजनीति की शुरुआत की थी। तब से वह लगातार माओवादी राजनीति को फैलाने में लगे रहे। उनके आत्मसमर्पण से माओवादियों के अंदर चल रहे अंतरविरोध खुलकर सामने आ गया है। यह तो बानगी मात्र है। सच्चाई तो यह है बीते चार वर्षों में आन्ध्र से लेकर बिहार तक दर्जनों हार्डकोर माओवादियों ने आत्मसमर्थन किया है। आखिर क्या कारण है कि एक जज्बे के साथ नक्सली बनने वाले हार्डकोर कैडर आत्मसमर्पण करने पर मजबूर हो रहे हैं? इसका मंथन माओवादियों की केंद्रीय कमिटी ने जब शुरू की तो विवाद गहरा गया। जबकि कई ऐसे भी हैं जो नेतृत्व को अनदेखा करते हुए रॉबिनहुड बनने के चक्कर में गिरफ्तार हो चुके हैं। नक्सलियों की लगातार हो रही गिरफ्तारी पर केंद्रीय नेतृत्व भी सकते में है और गंभीर आत्मचिंतन में लगा हुआ है। खबर है कि बीते साल बिहार और झारखंड के सीमाई इलाकों के घने जंगलों में आयोजित केंद्रीय कमिटी की बैठक में जब दो धारी संघर्ष (टू लाइन स्ट्रगल) शुरू हुआ तो पार्टी सकते में आ गयी और आनन-फानन में कई ऐसे फैसले ले लिये जिसे अगर सार्वजनिक कर दिया जाये तो नक्सल आंदोलन में भूचाल आये बिना नहीं रहेगा। बताया जाता है कि भारतीय समाज का विश्लेषण कर रहे माओवादियों की सर्वोच्च संस्था अब पीपुल्स गुरिल्ला लिबरेशन आर्मी हो गयी है जबकि इसके पहले पार्टी सर्वोच्च संस्था हुआ करती थी। बदले विश्व परिदृश्य में संयुक्त मोर्चा के महत्व को भी नक्सलियों ने समझा है। जबकि इसके पहले नक्सलियों की जमात संयुक्त मोर्चा को सिरे से खारिज करती थी। बंदूक के सहारे समतामूलक समाज निर्माण करने के हिमायती माओवादियों ने अपने 40 वर्षों के संघर्ष में पहली बार संयुक्त मोर्चा में गांधीवादियों से लेकर लोकतंत्रप्रेमियांें के साथ मोर्चा बनाने का निर्णय लिया है ताकि छोटे स्तर के नक्सली वाम भटकाव की ओर अग्रसर नहीं हों।
यही नहीं, पश्चिम बंगाल के गांवों से 1967 में सही किसानों के हाथों में जमीन और किसान कमिटी के हाथों में हुकूमत के हिमायती नक्सलियों ने आधार इलाका बनाने की बात भी फिलहाल स्थगित कर दी है और वे छापामार जोन बनाने पर जोर दे रहे हैं ताकि सरकार से संघर्ष तीखा होने की स्थिति में पुलिस के दमन से आधार इलाके की जनता को बचाया जा सके । इसका परिणाम भी सामने दिखने लगा है। बात चाहे महाराष्ट्र के गढचिरौली जिले में 15 पुलिसकर्मियों को पत्थर से कूच-कूचकर हत्या करने की हो या झारखंड के राहे पुलिस पिकेट के पांच जवानों को चाकू गोदकर मारने की। बिहार के नवादा स्थित कौआकोल में तो नक्सलियों ने हद ही कर दी जहां पीएलजीए की गुरिल्ला आर्मी की महिला दस्ता ने 15 पुलिसकर्मियों के हथियार छिनने के बाद हत्या कर दी। आगे नक्सलियों का कहर कहां बरपेगा, यह कहना मुश्किल है। विदित हो कि पिछले साल केंद्रीय कमिटी के सदस्य और मारक दस्ते का मास्टरमाइंड प्रमोद मिश्र की जब धनबाद में गिरफ्तारी हुई तब इस बात का खुलासा भी हुआ था कि नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदल दी है और अब वे भारतीय सेना से लड़ाई करने के पक्ष में आ गये हैं। बात दीगर है कि अबतक सेना को नक्सली इलाकोें में नहीं उतारा गया है।
आर्थिक सुधारवाद के इस जमाने में नक्सलियों का मानना है कि दलाल पूंजीपतियों के सहयोग से साम्राज्यवादी पूंजी गांवों तक अपनी पैठ बना रही है। इससे निपटने और इसके खतरों से जनता को अवगत कराने के लिए गांधीवादियों से लेकर अन्य समाजवादियों से सांठगांठ कर रही है।

Wednesday, March 4, 2009

कम नहीं आंकिये बसपा को

हालांकि उत्तर प्रदेश को छोड़कर कहीं भी बहुजन समाज पार्टी की सरकार नहीं है और न किसी दूसरे राज्यों में वह सरकार बनाने की ही स्थिति में है। बावजूद इसके आगामी आम चुनाव में बसपा राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक दबदबा बनाने में कामयाब हो सकता है। कुछ महीने पूर्व हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों को देखते हुए बड़े दलों मसलन भाजपा और कांग्रेस इसे नकार कर नहीं चल सकते।
बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को देखते हुए कांग्रेस और भाजपा समेत वाम दलों ने भी इसे बतौर सत्ता प्रेम दलितों को पटाने में लगी है। हालांकि ऊ परी तौर पर दोनों दल यह दिखाने की फिराक में हैं कि फिलहाल बसपा से डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन इन दलों के अंदर झांकने पर तस्वीर कुछ दूसरी उभरकर आ रही है। इसका गवाह केंद्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली ही है जहां कभी बसपा ने दो सीटों (8.5 फीसदी) से खाता खोला था वहां बीते विधानसभा चुनाव में उसे14 फीसदी वोट मिले। कमोवेश यही हाल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में दिखा जहां पिछले विधासनभा चुनाव में अपना वोट बैंक बढ़ाने में कामयाब रहा। एक ओर बसपा ने जहां मध्य प्रदेश में दो सीटों की बढ़ोतरी करते हुए वर्तमान विधानसभा में सात विधायकों को भेजने में सफल रहा वहीं छत्तीसगढ़ में वोट प्रतिशत 6.00 कर लिया। हाथी की मस्त चाल से राजों-रजवाड़ों का गढ़ राजस्थान भी अछूता नहीं रहा। यहां सत्ता की बागडोर भले ही कांग्रेस पार्टी ने संभाली हो लेकिन बसपा ने 4 अतिरिक्त सीटें जीतकर अपना 6 फीसदी वोट बढ़ा लिया। कभी "वोट से लेंगे पीएम-सीएम और मंडल से लेंगे एसपी-डीएम' का राग अलापने वाली बसपा इन दिनों न सिर्फ उत्तर भारत में बल्कि अखिल भारतीय राजनैतिक वजूद बचाने में कामयाब हुई है। विदित हो कि कांशीराम ने जब अपनी नौकरी छोड़कर बामसेफ और डी-फोर के रास्ते बसपा बनाया था उसी समय उन्होंने नया हिन्दुस्तान का सपना भी देखा था उस समय उनका स्पष्ट विचार था कि दलितों और पिछड़ों का भला तब तक नहीं होने वाला जबतक सत्ता पर उनका (दलितों और पिछड़ों) कब्जा नहीं होगा।
वैसे तो बहुत लोगों को यह भ्रम है कि बसपा दलितों की पार्टी है। लेकिन इसके गिरेबां में झांकने पर यह स्पष्ट होता है कि यह दलितों की पार्टी नहीं, बल्कि भारतीय संविधान पर खरा उतरने वाली एकमात्र पार्टी है जिसके संस्थापक कांशीराम ने 1987 में ही हरियाणा विधानसभा में पिछड़ों को आरक्षण देने की वकालत की थी। तब मंडल कमीशन की रिपोर्ट केंद्रीय सचिवालय में धूल खा रही थी। उसी समय कांशीराम ने आजादी के बाद के हुक्मरानों पर तरस के साथ ही आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि आखिर क्या कारण रहा कि इतने दिनों के बाद भी अनुसूचित जाति, जनजाति के साथ ही पिछड़ों को न तो सामाजिक मान्यता ही मिली और न ही कोई अधिकार ही दिये गये।
यही नहीं, सीएसडीएस की ओर से जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार 1999 में 13 फीसदी गैर-यादवों के वोट बसपा को मिली। कहने का तात्पर्य यह कि कांशीराम ने बसपा में दलितों के साथ ही पिछड़ों और मुसलमानों को भी जोड़ने का प्रयास किया। एक कदम आगे बढ़ते हुए वर्ष 2007 में पार्टी सुप्रीमो मायावती ने बसपा में सवर्णों में ब्राहणों के साथ ही वैश्यों को जोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया और सोशल इंजीनियर बन गयी। कमाल करते हुए मायावती ने प्रदेश में 30 फीसदी वोट और 206 सीटें पाकर अपने दम पर सरकार बना ली। अगर सबक ुछ ठीकठाक रहा तो आगामी लोकसभा चुनाव में वह 40-50 सीट आसानी से जीत सकती है। अगर ऐसा हुआ तो बिना बसपा के सहयोग के केंद्र की सरकार चलाना मुश्किल होगी। फिर गठबंधन की राजनीति उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि देश की बड़ी वामपंथी पार्टी सीपीएम पहले ही मायावती के पक्ष में खड़ा हो चुकी है। वहीं सांप्रदायिकता के नाम पर भाजपा विरोध अभी भी वामपंथियों का जारी है। फिर दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में जिस तरीके से हाथी मस्तानी चाल चली है उसका भी संकेत सकारात्मक ही है।

Tuesday, March 3, 2009

...और ओबामा ने बाजी मार ली

...और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के अंतिम वाकयुुद्ध में 46 वर्षीय डेमोक्रेट्‌स उम्मीदवार बराक ओबामा ने बाजी मार ली। अंतिम बहस के बाद न्यूयार्क टाइम्स व सीबीएस की ओर से कराये गये जनमत सर्वेक्षण में बराक अपने प्रतिद्वंदी 76 वर्षीय रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैक्केन से 14 फीसदी मतों से आगे चल रहे थे। जबकि 22 अक्टूबर को वॉल स्ट्रीट जनरल व एनबीसी न्यूज की ओर से कराये गये सर्वेक्षण में भी ओबामा 52 फीसदी मतदाताओं के पसंदीदा बन गये हैं वहीं मैक्केन के समर्थकों का आंकड़ा 42 फीसदी है। दो हफ्ते पहले की गयी रायशुमारी के नतीजों में ओबामा को 4 फीसदी की बढ़त मिल गयी है। फिर भी, इन सर्वेक्षणों का अंतिम प्रतिफल 4 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव के लिए होने वाले मतदान के बाद ही आएगा, जिसका दुनिया बेसब्री से इंतजार कर रही है।
16 अक्टूबर को न्यूयार्क के लंबे-चौड़े भू-भाग में फैले होपस्ट्रा विश्वविद्यालय परिसर के बहस हॉल में दोनों प्रत्याशियों ने आमने-सामने एक-दूसरे पर तीखे प्रहार किये। शब्दवाणों की झड़ी से एक ओर जहां रिपब्लिकन उम्मीदवार मैक्केन बार-बार झल्लाये वहीं डेमोक्रेट्‌स प्रत्याशी व्यक्तिगत हमला झेलने के बावजूद गंभीर बने रहे और शालीनता के साथ मुद्दों को उठाते रहे।
वैसे तो चुनावी माहौल में ओछी राजनीति कोई नई बात नहीं है। एशिया, अफ्रीका समेत दुनिया के अधिकांश देश इस रोग से संक्रमित हैं। लेकिन इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियान में प्रत्याशियों की बयानबाजी ने सारी सीमाओं को लांघ दिया। डेमोक्रेट्‌स उम्मीदवार आतंकी बताए गये तो डेमोक्रेट समर्थकों ने रिपब्लिक उम्मीदवार को हिंसक बताया और कहा कि मैक्केन युद्ध की मानसिकता से ग्रस्त हैं।
अमेरिकी चुनावी इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब पूरे चुनावी अभियान से एकतरफा मुद्दे गायब दिख रहे हैं। आर्थिक सुनामी की मार झेल रहे अमेरिका समेत तीसरी दुनिया के देश व्यक्तिगत बयानबाजी व ओछी राजनीति से हतप्रभ हैं। हद तो यह कि आर्थिक नीतियों पर चर्चा करने की बजाय पूरे चुनावी अभियान में रिपब्लिकन उम्मीदवार मैक्केन हताशा भरी राजनीति करते दिख रहे हैं। चुनावी सर्वेक्षणों के परिणामों से हताश हो चुके मैक्केन ने बिना साक्ष्य जुटाए ही यह प्रचारित करने का भरसक प्रयास किया कि बराक ओबामा का संबंध आतंकवादियों से रहा है। उन्होंने कहा कि बराक सातवें दशक में वियतनाम युद्ध के समय आतंकी संगठन "वेदर अंडरग्राउंड' के संस्थापक सदस्यों में से एक विलियम एयर्स (उस दौरान बम विस्फोटों में नाम आया था) के साथ रहे हैं। रिपब्लिकन उप राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार सारा पेलेन ने भी इस बात का जोर-जोर से प्रचार किया कि बराक का संबंध आतंकवादियों से रहा है।
हालांकि इतने तीखे आरोप के बावजूद बराक शालीनता के साथ चुनावी अभियान में डटे हुए हैं। रिपब्लिकन पार्टी के व्यक्तिगत हमले से आहत बराक ने सफाई देते हुए मतदाताओं से कहा कि इन दिनोें विलियम एयर्स शिकागो के एक महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने मैक्केेन व सारा के इस आरोप को तथ्यहीन बताया और कहा कि आज से 40 साल पहले, जिस वक्त के आरोप हम पर लग रहे हैं उस समय हमारी उम्र मात्र आठ साल की थी। क्या आठ साल का मासूम बालक आतंकवादियों से संबंध रख सकता है? उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर वाकई एयर्स आतंकवादी होते तो पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन के पूर्व राजदूतों व उनके नजदीकी सहयोगियों से उस बोर्ड को आर्थिक मदद नहीं मिलती, जिसमें आज से 10 साल पहले मैं और एयर्स दोनों शामिल थे। फिर भी, बराक ने इस आरोप का जवाब एक इलेक्ट्रॅानिक विज्ञापन के माध्यम से दिया है। इस विज्ञापन में दिखाया गया है कि जब वॉल स्ट्रीट ढह रहा था, उस वक्त मैक्केन बहुत ही लापरवाह थे। मतदाताओं को इसमें बताया जा रहा है कि अमेरिका की गिरती अर्थव्यवस्था व 750 हजार बेरोजगार अमेरिकियों का ध्यान हटाने के लिए ही ओबामा पर व्यक्तिगत प्रहार किये गये हैं। हालांकि अमेरिकी जनता चुनाव पूर्व हुए सर्वेक्षणों में मैक्केन के इस बेतुका आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है।
अपने तूफानी चुनावी अभियान के अंतिम चरण में ओबामा ने सरकार की नीतियों पर प्रहार करते हुए कहा- अगर किसी भी हालत में मैक्केन जीत जाते हैं तो वे भी जॉर्ज बुश की ही तरह अमेरिका का कबाड़ा निकाल देंगे। व्यंग्यात्मक लहजे में ओबामा ने कहा कि मैं अमेरिकी जनता की बेहतरी के लिए कुछ दिन और व्यक्तिगत हमले बर्दाश्त कर ले रहा हूं, लेकिन नहीं चाहता कि अमेरिकी जनता अगले चार साल तक नाकामयाब आर्थिक नीतियों के भरोसे चले। इतना सुनते ही मैक्केन गुस्से में आ गये और डेमोक्रेट्‌स प्रत्याशी को चेताते हुए कहा-"सीनेटर ओबामा, आप संभलकर बात करें, मैं जॉर्ज बुश नहीं हूं।' इतना सुनते ही तपाक से बराक बोले-"बुश की नीतियों को अगर मैं आपकी नीति मानता हूं तो इसमें गलत क्या है? क्योंकि विश्वव्यापी आर्थिक संकट के बावजूद आप अभी भी बुश की आर्थिक नीतियों जो टैक्स, ऊर्जा, खर्च आदि से संबंधित है, का समर्थन कर रहे हैं। मैक्केन का कहना है कि ओबामा वर्गयुद्ध की नीति पर चल रहे हैं।
बीते दिनों जिस तरह से पूरा भारतीय संसद राहुल गांधी के उस भाषण पर ठहर सा गया था जिसमें उन्होंने उड़ीसा के किसी गांव की लीलावती-कलावती की चर्चा की गयी थी। ठीक उसी तरह से ओबामा ने अंतिम बहस में "द प्लंबर' की रोचक गाथा सुनायी। मानों पूरी बहस ही "जो' नामक एक ऐसे प्लंबर पर आकर टिक गई जो ओहियो में ओबामा से मिला था और इनके टैक्स प्रस्ताव से बर्बाद होने का अंदेशा जताया था। मैक्केन ने उसी "जो' को मध्यवर्गीय अमेरिकी प्रतिनिधि का चेहरा मानते हुए कोई ग्यारह बार नाम लिया। शुरू में तो यह रोचक लगा लेकिन बाद में उसका उल्लेख उबाऊ होने लगा। कुछ भी हो लेकिन इन दिनों भारतीय कलावती-लीलावती की ही तरह अमेरिका में "जो' द प्लंबर भी मशहूर हो चुका है।
अंतिम बहस के दौरान दोनों नेताओंं ने जोर-शोर से हिस्सा लिया। एक ओर रिपब्लिकन उम्मीदवार ने जहां अनुभव के अस्र चलाये वहीं डेमोक्रेट प्रत्याशी ने धैर्य से आर्थिक सुनामी का तांडव झेल रही जनता के साथ ही अपने समर्थकों का भी ढांढस बंधाया।
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विशेषज्ञों का आकलन
न्यूयॉर्क में बहस से एक दिन पहले के रुझान :
ओबामा: 49.9 फीसदी- (इलेक्टोरल कॉलेज के 313 वोटों की बढ़त )
मैक्केन: 42 फीसदी-सिर्फ 158 पर रूक गए।
15 अक्टूबर, तीसरी व निर्णायक बहस (स्थान-न्यूयॉर्क के लांग आईलैंड स्थित हाफ्स्डा विश्वविद्यालय के परिसर में)
विषय-वित्तीय संकट
जॉन मैक्केन
पहले 30 मिनट
· जबरदस्त हावी रहे। धाराप्रवाह बोले। चुन-चुन कर आरोप मढ़े।
दूसरे 30 मिनट
· पहले तो हावी होने का भरोसा खुद पर भारी पड़ने लगा। फिर गड़बड़ा गए। आरोप लगाने लगे।
तीसरे 20 मिनट
· एकदम दिशा खो बैठे। निजी प्रहार करने करने। माखौल उड़ाने लगे।
बराक ओबामा
पहले 30 मिनट
· शुरुआत गड़बड़ा गई। शायद भौंचक रह गए कि मैक्केन ऐसा कर सकते हैं। ये, देखिए..मेरी बात तो सुनिए..जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगे।
दूसरे 40 मिनट
· तेजी से संभले। गलती न हो जाए, इसलिए शांत थे। सिर्फ मुद्दों पर ही बोले।
तीसरे 20 मिनट
· संयमित और अविचलित रहे। खूब अच्छा बोले।
बहस के बाद रुझान:
· ओबामा-53 फीसदी
·

Sunday, March 1, 2009

छूटे घुमते उपद्रवी

हिंदू भावनाओं को उभारकर सत्तासीन होने की बेचैनी भाजपा के लिए नयी बात नहीं है। यह बेचैनी दक्षिणी राज्य कर्नाटक में भी दिखनी शुरू हो गयी है। लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचाने को व्याकुल भगवा ब्रिगेड ने इसकी जिम्मेवारी नवोदित चरमपंथी संगठन श्रीराम सेना को दी है। कमोबेश यही काम बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना, मनसे समेत अन्य दूसरे हिंदूवादी संगठन भी करते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व श्रीराम सेना ने पहले मेंगलूर के बालमत्ता रोड स्थित एक पब में आतंक मचाया और दर्जनभर हिंदू लड़कियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। फिर कुछ दिनों के बाद केरल के सीपीएम विधायक सी.एच.के. कुन्हांभू की बेटी को सिर्फ इसलिए घंटों बंधक बनाये रखा क्योंकि वह अपने एक अल्पसंख्यक दोस्त (मुस्लिम) के साथ बस में यात्रा कर रही थी। इससे सेना की वहशी मानसिकता ही छलकती है। ये दोनों उदाहरण तो बानगी मात्र हैं। श्रीराम सेना का आतंक सूबे के छोटे कस्बों और गांवों तक पहुंच गया है। आश्चर्य तो यह कि तथाकथित राष्ट्रवादियों ने प्यार पर ही पहरा लगा दिया है।
एटीएस से मिली जानकारी के अनुसार हिंदू राष्ट्र की कल्पना को साकार करने के लिए सेना ने 1,132 आत्मघाती दस्ते तैयार कर रखे हैं जिनका काम सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काना और हिंदू आतंकवाद को हवा देना है। सेना प्रमुख प्रमोद मुतालिक का संबंध अभिवन भारत नामक संगठन के साथ ही मालेगांव विस्फोट के आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत दर्जनों चरमपंथियों से भी है, जिनकी योजना 2025 तक देश को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की है। संस्कृति के इन ठेकेदारों ने पब के बहाने गंगा-यमुनी संस्कृति के साथ-साथ महिलाओं की आजादी और आधुनिकता का भी विरोध किया है। ये कैसे "रामभक्त' हैं जो पश्चिमी संस्कृति से मुक्ति के नाम पर कहीं महिलाओं पर हमला करते हैं तो कहीं मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काते हैं जबकि आम धारणा है कि स्वयं भगवान राम शाप से मुक्ति के लिए अहिल्याबाई के पास पैदल पहुंचे थे। श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं ने अपनी कार्रवाईयों से साबित कर दिया है कि तालिबानीकरण सिर्फ किसी जाति या संप्रदाय तक ही सीमित नहीं है। भारतीय जनता पार्टी गुजरात के बाद कर्नाटक को हिंदुत्व का दूसरा प्रयोगशाला बना देना चाहती है। इसी के मद्देनजर उसकी तैयारी भी चल रही है। वैसे तो इसकी सुगबुगाहट 2005 में ही शुरू हो गयी थी जब सूबे के विभिन्न हिस्सों में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए थे और गो-हत्या रोकने को लेकर सत्ता संरक्षित बवाल करवाया गया था। लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भगवा ब्रिगेड को यह भरोसा है कि कर्नाटक और आंध्रप्रदेश की सीटें ही केंद्र में भाजपा को सत्ता दिला सकती है। इसी विश्वास के साथ वेंकैया नायडू ने अपनी विजय संकल्प यात्रा के दौरान कहा, "दक्षिण के 132 सीटें केंद्रीय सत्ता की कुंजी है जिसे हर हाल में हासिल करना है।' लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं, "हमारे राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के दिमाग में संघ और भाजपा का अजीब डर बैठ गया है और तथ्यों की पुष्टि के बिना ही आरोप शुरू कर देते हैं।'
दरअसल श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुतालिक का भाजपा की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से गहरा संबंध रहा है। संघ के सूत्रों का कहना है कि मुतालिक 1975 से 2004 तक आरएसएस का सक्रिय सदस्य था। संघ के पदाधिकारियों ने उसकी कतर्व्यनिष्ठा को देखते हुए 2004 में दक्षिण भारत (कर्नाटक) में बजरंग दल का संयोजक बनाया। गत विधानसभा चुनाव में उसने भाजपा का जमकर सहयोग किया। 28 अगस्त, 2005 में वह शिव सेना से जुड़ा। सितंबर, 2008 में राष्ट्र रक्षक सेना के साथ ही श्रीराम सेना का भी गठन किया। वैसे तो आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने इस बात से इंकार किया है कि प्रमोद मुतालिक का संघ से कोई संबंध है और श्रीराम सेना उसका जेबी संगठन है। लेकिन इस बात का जवाब मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा समेत भाजपा के शीर्ष नेताओं के पास है कि आखिर किस तरह वह प्रदेश के 11 जिलों की पुलिस की नजर में वांछित होने के बावजूद खुलेआम कानून को चुनौती देता फिर रहा है। यही नहीं, सूबे के विभिन्न जिलों में मुतालिक पर 45 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। देश में भगवा ब्रिगेड की हरकतों के बारे में गृहमंत्री पी.चिदंबरम कहते हैं, "श्रीराम सेना देश के लिए खतरा है और केंद्र सरकार इस संगठन की गतिविधियों पर नजर रखे हुए है।'