Friday, December 2, 2016

भारत का विभाजन क्यों?

> मार्क्‍सवादी अमेरिकी इतिहासकार और चिंतक पैरी एंडरसन ने योरोप और विश्व इतिहास पर महत्वपूर्ण काम किया है। वह 1962 से न्यू लैफ्ट रिव्यू के संपादक हैं। एंडरसन ने इधर भारतीय इतिहास पर काम करना शुरू किया है। उनके भारत संबंधी लेखों का संग्रह द इंडियन आइडियालॉजी शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। यह लेख पहले प्रसिद्ध ब्रितानवी पत्रिका लंदन रिव्यू आफ बुक्स में ‘व्हाई पार्टीशन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इस लंबे लेख का यह प्रारंभिक एक तिहाई अंश यथावत दिया जा रहा है। सन् 1945 तक गांधी का युग खत्म होकर नेहरू का जमाना शुरू हो गया था। दोनों के बीच के फर्कों पर बात करने की मानो परंपरा-सी रही है, पर इन फर्कों का स्वतंत्रता के संघर्ष के परिणाम से संबंध ज्यादातर अंधेरे में रहा है। न ही वे फर्क हमेशा साफ-साफ पकड़ में आते हैं। नेहरू एक पीढ़ी छोटे, देखने में सुंदर, काफी ऊंचे सामाजिक वर्ग से आए, पश्चिम की अभिजात शिक्षा प्राप्त, धार्मिक विश्वासों से रहित थे और उनके कई प्रेम-संबंध भी थे, ये बातें सभी को पता हैं। गांधी के साथ उनका अनोखा संबंध यहां राजनीतिक तौर पर ज्यादा प्रासंगिक है। राष्ट्रीय आंदोलन में अपने अमीर पिता, जो 1890 के दशक से ही कांग्रेस के स्तंभ थे, द्वारा भर्ती करवाए गए नेहरू पर गांधी का जादू तब चला जब वह तीस की उम्र के करीब थे और जब उनके अपने राजनीतिक विचार उतने विकसित नहीं हुए थे। एक दशक पश्चात् जब उन्होंने स्वतंत्रता और समाजवाद की संकल्पनाएं ग्रहण कर ली थीं जिनसे गांधी इत्तफाक नहीं रखते थे और लगभग चालीस के हो चुके थे तब भी वह गांधी को लिख रहे थे, ‘क्या मैं आप ही की राजनीतिक औलाद नहीं हूं, गो कि किसी कदर नाफरमां-बरदार और बिगड़ी औलाद?’ वल्दियत वाली बात अपनी जगह सही है; पर नाफरमानी (या अवज्ञा) दरअसल नाफरमानी कम, नखरा ज्यादा था। बहुतों की तरह 1922 में गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की हवा निकाल देने से हताश, 1932 में अछूतों का निर्वाचन मंडल शुरू करने के खिलाफ उनके अनशन से निराश, 1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने के गांधी के कारणों से चकित, नेहरू फिर भी हर बार अपने सरपरस्त के फैसले के आगे अपने आपको झुका देते। राष्ट्रीय आंदोलन का पवित्रीकरण? ‘हमारी राजनीति में इस धार्मिक तत्व के बढऩे से मैं कभी-कभी परेशान हो जाता,’ मगर ‘मुझे अच्छी तरह पता था कि उसमें कोई और चीज है, जो मनुष्यों की गहन आतंरिक लालसा की पूर्ति करती है।’ असहयोग आंदोलन की असफलता? ‘आखिर वह (गांधी) इसके लेखक और प्रवर्तक थे और वह आंदोलन क्या था और क्या नहीं इस बात का निर्णय उनसे बेहतर कौन कर सकता था। और उनके बिना हमारे आंदोलन का अस्तित्व ही कहां था?’ पूना का आमरण अनशन? ‘दो दिनों तक मैं अन्धकार में था और आशा की कोई किरण नहीं नजर आती थी, गांधीजी जो कर रहे थे उस काम के चंद परिणामों के बारे में सोच कर मेरा दिल बैठता जाता …फिर एक अजीब-सी बात हुई। एकदम भावनात्मक संकट जैसा हुआ और उसके बाद मुझे शांति महसूस हुई और भविष्य उतना अंधकारमय नहीं लगा। मनोवैज्ञानिक क्षण में सही चीज करने का अद्भुत कौशल गांधीजी के पास था और मुमकिन है कि उनके किए के – जिसे सही ठहराना मेरे दृष्टिकोण से नामुमकिन सा था- बहुत अच्छे परिणाम होंगे।’ और वह दावा कि बिहार में भूकंप भेज कर ईश्वर ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति अप्रसन्नता दर्शाई थी? बापू की घोषणा ने नेहरू को उनके विश्वास के ‘लंगर से दूर खदेड़ दिया’ मगर यह मानकर कि उनके सरपरस्त का किया सही है उन्होंने ‘जैसे-तैसे समझौता कर लिया।’ क्योंकि ‘आखिरकार गांधीजी क्या ही अद्भुत व्यक्ति थे।’ ये सारी घोषणाएं 1936 के जमाने की हैं जब नेहरू अपने समूचे कैरियर के किसी भी कालखंड के मुकाबले राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा रैडिकल थे। इतने कि साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखते थे। 1939 के आते-आते वे सीधे-सीधे यह प्रमाणित कर रहे थे, ‘भारत का उनके (गांधी के) बिना कुछ नहीं होगा।’ अप्रतिम अभिभावकी nehru-and-gandhiमनोवैज्ञानिक अवलंब की इस मात्रा में अलग-अलग सूत्र आपस में गुंथे हुए थे। नेहरू के गांधी के प्रति संतानवत विमोह में कुछ अनोखा नहीं था। मगर नेहरू के प्रति गांधी के अभिभावकीय स्नेह की गहराई – जो उन्होंने अपनी संतानों के प्रति विशेष सख्ती बरतते हुए अमूमन नहीं दिखाई- अप्रतिम थी। इन भावनात्मक बंधनों में परस्पर हितों का गणित भी समाविष्ट था। जब तक वह कांग्रेस के दायरे में रह कर काम करते रहे, गांधी नेहरू पर यह भरोसा कर सकते थे कि वह वयस्क राजनीतिक मुद्दे उनके समक्ष नहीं उठाएंगे, जबकि गांधी के प्रिय होने की वजह से नेहरू यह मान कर चल सकते थे कि वह कांग्रेस की अगुआई करने और आजादी के बाद देश पर राज करने में अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ देंगे। फिर भी उन दोनों के बीच क्या उतनी भी बड़ी बौद्धिक खाई थी ही नहीं? एक बुनियादी संदर्भ में वास्तव में एक खाई थी। गांधी के अलौकिक स्वप्नों और दुनियावी अप्रचलितों की खातिर नेहरू के पास वक्त नहीं था। उद्योगों और आधुनिकता के फायदों में उनका पूरी तरह लौकिक स्तर पर भरोसा था। फिर भी जब तक राजसत्ता पहुंच से दूर थी तब तक यह विभाजन रेखा उतनी महत्त्वपूर्ण न थी। जहां तक ब्रिटिश राज के तहत राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक नजरिए का संबंध है, तो गुरु और चेले में उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के विभेद की बनिस्बत बहुत कम फर्क है। गांधी के यहां पुस्तकीय ज्ञान अधिक न था। लंदन में उन्हें कानून की अपनी पाठ्य-पुस्तकें रुचिपूर्ण लगीं- संपत्ति कानून पर आधारित पुस्तिका को पढऩा ‘उपन्यास पढऩे जैसा था’ – मगर बेंथम को समझना बेहद मुश्किल था। दक्षिण अफ्रीका में उन्हें इल्हाम हुआ रस्किन और टॉल्सटॉय की पुस्तकों का। भारत में जेल में वह इस नतीजे पर पहुंचे कि गिबन महाभारत का घटिया संस्करण है और यह कि वह स्वयं पूंजी को मार्क्‍स से बेहतर लिख सकते थे। जहां पर आकर उनकी दृष्टि जमी वह थी उन चंद पुस्तकें पर जो उन्होंने हिंद स्वराज लिखना शुरू करने से पहले तक पढ़ रखी थीं और कुछ गिने-चुने हिंदू क्लासिक्स। दक्षिण अफ्रीका छोड़ते समय दुनिया के बारे में उनके मूलभूत विचार मूलत: परवान चढ़ चुके थे। सत्य दूसरी किताबों में नहीं बल्कि खुद उनमें मौजूद था। एक भारतीय आलोचक ने ‘एक अधभरे दिमाग की ऐसी समाश्वस्तता’ के खतरों के प्रति आगाह करते हुए लिखा था कि ‘गांधी जैसी बेफिक्र स्वच्छंदता से प्रथम पुरुष का इस्तेमाल करने वाला, लगभग वैसी ही परिस्थितियों में रहा हुआ दूसरा कोई भी व्यक्ति बहुत खोजने पर भी मुझे नहीं मिला।’ गांधी को जो उच्च शिक्षा नहीं मिली थी वह नेहरू को हासिल हुई, और वह बौद्धिक विकास भी जिसमें अत्यधिक धार्मिक आस्था ने अड़ंगा नहीं डाला था। लेकिन इन सुअवसरों का जो प्रतिफलन हुआ वह अपेक्षा से कम था। प्रतीत होता है कि उन्होंने कैम्ब्रिज में बहुत कम सीखा, जैसे-तैसे प्राकृतिक विज्ञान में औसत डिग्री हासिल की जिसका बाद में नामोनिशां तक न रहा, वकालत के इम्तहानों में उनका प्रदर्शन ठीक नहीं रहा और लौटने पर अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए वकालत की प्रैक्टिस में भी उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। कैम्ब्रिज में दर्शन के मेधावी छात्र रहे सुभाष चंद्र बोस, जो आई.सी.एस. (इंडियन सिविल सर्विस) के एलीट ओहदे की परीक्षा पास करने वाले और फिर देशभक्ति की वजह से उसमें प्रवेश करने से इनकार करने वाले पहले देशी थे, के साथ नेहरू का अंतरध्यान खींचता है। मगर एक मामूली किस्म का आगाज आगे आने वाली बहार को नहीं रोक सकता, और नेहरू समयानुसार एक समर्थ वक्ता और सफल लेखक बन गए। मगर फिर भी वह नाम मात्र की भी साहित्यिक अभिरुचि या बौद्धिक अनुशासन नहीं हासिल कर पाए। उनकी सबसे महत्त्वाकांक्षी कृति द डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत की खोज), जो 1946 में प्रकाशित हुई थी, श्वेर्मराई (अति भावुकता) के वाष्प-स्नान जैसी है। अछूतों के नेता आम्बेडकर बौद्धिक स्तर में कांग्रेस के बहुत से नेताओं से काफी ऊपर थे और कुछ हद तक जिसका कारण लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स और कोलंबिया विश्वविद्यालय में हुई उनकी गंभीर शिक्षा-दीक्षा थी। उनसे नेहरू की तुलना करना उचित नहीं होगा। आम्बेडकर को पढऩा मतलब किसी दूसरी दुनिया में प्रवेश करना है। द डिस्कवरी ऑफ इंडिया – और उसकी पूर्ववर्ती कृति द यूनिटी ऑफ इंडिया को तो रहने ही दीजिये- ये न केवल उनमें औपचारिक विद्वत्ता की कमी और रूमानी मिथकों के प्रति लत को दर्शाती हैं, बल्कि उससे भी कुछ गंभीर बात यह है कि ये बौद्धिक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक सीमा दिखाती है। खुद को धोखा देने का ऐसा सामर्थ्य जिसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम सामने आए। ‘भारत मेरे खून में था और उसमें ऐसा बहुत कुछ था जो सहज रूप से मुझे रोमांचित करता था,’ वह अपने पाठकों को बताते हैं। ”वह बहुत ही प्यारा है और उसकी संतानें उसे नहीं भुला सकतीं चाहे वे कहीं भी चले जाएं या उन पर कैसी भी विपत्तियां आएं। क्योंकि वह अपनी महानता और कमजोरियों में भी उनका हिस्सा है और उसकी संतानों का अक्स उसकी गहरी आंखों में है जिन्होंने बहुत कुछ जीवन का आवेग, हर्ष और मूर्खता को देखा है और ज्ञान के कुएं में भी झांका है।” समूची डिस्कवरी ऑफ इंडिया पुस्तक इस किस्म की बिलकुल नहीं है। मगर बारबरा कार्टलैंड (अपने रोमांटिक उपन्यासों के मशहूर बीसवीं सदी की एक प्रमुख अंग्रेज लेखिका) प्रवृत्ति-सतह से कभी दूर न थी: ”शायद अब भी हम प्रकृति के रहस्यों को अनुभव कर पाएं और उसके जीवन और सौंदर्य राग को सुन पाएं और उससे सत हासिल कर पाएं। यह राग चुनिंदा जगहों पर नहीं गाया जाता और अगर उसे सुन सकने वाले कान हमारे पास हों तो हम उसे लगभग कहीं भी सुन सकते हैं। मगर कुछ जगहें होती हैं जहां वह उन्हें भी लुभा लेता है जो उसके लिए तैयार नहीं होते और कहीं दूर बज रहे तेज वाद्य के गहरे स्वरों की तरह आता है। ऐसी ही पसंदीदा जगहों में है कश्मीर, जहां सुंदरता का बसेरा है और एक इंद्रजाल हमारे होश फाख्ता कर देता है।” ऐसा गद्य लिखने वाले दिमाग से राष्ट्रीय आंदोलन के सामने खड़ी कठिनाइयों के बारे में अधिक यथार्थवाद दिखाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। आम्बेडकर का महत्व जब गांधी डॉ. आम्बेडकर को यह मांग स्वीकार करने के लिए ब्लैकमेल कर रहे थे कि अछूतों के साथ जाति व्यवस्था के परित्यक्तों की तरह नहीं बल्कि उसी के अंतर्गत निष्ठावान हिंदुओं के तौर पर बर्ताव किया जाएगा, तब नेहरू ने आम्बेडकर के समर्थन में या उनके प्रति एकजुटता दर्शाने वाला एक भी लफ्ज न कहा। गांधी अनशन पर थे और बावजूद इसके कि तब अछूतों का भविष्य एक गौण बात थी, जैसे कि नेहरू ने बड़े जोरदार तरीके से उसे खारिज कर दिया, उनका चुप रहना काफी था। हालांकि यहां पर, जिस किसी मुद्दे पर वह राजनीतिक स्टैंड लेते थे उसके विषय में गांधी के साथ असहमति प्रदर्शित करने को लेकर एक मामूली-सी अनिच्छा वाला मामला भर नहीं था। नेहरू, जैसा कि उन्होंने कई बार स्वयं माना है, आस्तिक नहीं थे। हिंदू धर्म के सिद्धांतों की उनकी नजर में बहुत कम या नहीं के बराबर कीमत थी। मगर गांधी की ही तरह एकदम सरल तौर पर वह धर्म को राष्ट्र से जोड़ते थे यह कहते हुए कि ‘हिंदू धर्म राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया था। वह वास्तव में राष्ट्रीय धर्म था जिसमें नस्ली और सांस्कृतिक, सभी गहन प्रवृत्तियों को आकर्षित करने की क्षमता थी और यही चीज आज हर तरफ राष्ट्रवाद की बुनियाद बनी है।’ उसके विपरीत बौद्ध धर्म भारत में उत्पन्न होने के बावजूद इसलिए पिछड़ गया क्योंकि वह ‘अनिवार्यत: अंतरराष्ट्रीय’ था। इस्लाम, जो भारत में उपजा भी नहीं था, तो और भी कम राष्ट्रीय था। इसका नतीजा यह हुआ कि जिस व्यवस्था के हिंदू धर्म की आधारशिला होने की बात पर गांधी जोर देते थे और जिसने इतिहास में उसे बिखरने से बचाया था, उसे सजीले रूप में पेश करना जरूरी था। बेशक जाति की अपनी विकृतियां (कुरूपताएं) थीं और गांधी को भी यह बात तस्लीम करनी पड़ी। नेहरू ने बतलाया था कि वृहत परिप्रेक्ष्य में मगर भारत को उसके लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं थी। ‘जाति कार्य और प्रयोजन पर आधारित एक समूह व्यवस्था थी। उसका मतलब था एक सर्व-समावेशी व्यवस्था जिसमें कोई साझा सिद्धांत न हो और हर समूह को पूरी स्वतंत्रता मिले।’ सौभाग्य से जिस चीज ने यूनानियों को अक्षम बनाया था वह इसमें नहीं थी और ‘यह निम्नतम स्तर वालों के लिए दासप्रथा के मुकाबले बहुत ज्यादा बेहतर थी। हर जाति के अंतर्गत समानता और कुछ हद तक स्वतंत्रता थी; हर जाति उपजीविकाजन्य थी और स्वयं को अपने विशिष्ट कार्य में प्रयुक्त करती थी। इस कारण दस्तकारी और शिल्पकारिता में ऊंचे दर्जे की विशेषज्ञता और कौशल पैदा हो पाया वह भी उस समाज व्यवस्था के अंतर्गत जो प्रतिस्पर्धात्मक और अर्जनशील नहीं थी।’ वास्तव में किसी पदानुक्रमता (हाइरार्की) के सिद्धांत को मूर्त रूप देने से बहुत दूर जाकर जाति ने ‘हर समूह में लोकतांत्रिक प्रवृत्ति बनाए रखी।’ बाद की पीढिय़ां, जिन्हें यह मानने में दिक्कत पेश आ रही होगी कि नेहरू ने ऐसी भयावह बातें लिखी हैं, उन परिच्छेदों की ओर इशारा कर सकती हैं जहां उन्होंने जोड़ा था कि ‘वर्तमान समाज के संदर्भ में – (कालखंड रहित) अतीत के विपरीत- जाति ‘प्रगति की अवरोधक’ बन गई थी, जो राजनीतिक या आर्थिक लोकतंत्र से सुसंगत नहीं थी। जैसा कि आम्बेडकर ने बड़े तीखेपन से नोट किया था, नेहरू ने अस्पृश्यता का कभी जिक्र भी नहीं किया था। यह मानना भूल होगी कि नेहरू द्वारा जाति को अलंकरण प्रदान करना रणनीतिक अथवा सिनिकल था। भारतीय चरित्र और दीगर चीजों पर बहु-सहस्त्राब्दिक ‘एकात्मता की छाप’ की उनकी खोज की ही भांति यह भी उसी ‘श्वेर्मराई’ का हिस्सा था। गांधी ने लिखा था कि इतिहास प्रकृति का व्यवधान है। और इस बात का प्रमाण अप्रासंगिक है। जिस बात का दावा गांधी ने स्वयं के लिए किया था, नेहरू ने उसका सामान्यीकरण कर दिया। नेहरू ने द डिस्कवरी ऑफ इण्डिया में लिखा, ‘सत्य क्या है। मैं निश्चित तौर पर नहीं जानता। मगर व्यक्ति मात्र के लिए सत्य कम से कम वह है जो वह खुद महसूस करता है और जानता है कि वह खरा है। इस व्याख्या के आधार पर अपने सत्य पर दृढ़ रहने वाला गांधी जैसा दूसरा नहीं देखा।’ राष्ट्र के कारज में ‘हमें ऊपर उठाने और सत्य के लिए बाध्य करने हेतु अविचल सत्य के प्रतीक के तौर पर गांधी सदैव उपस्थित थे।’ ऐसे ज्ञानमीमांसात्मक प्रोटोकालों के कारण ही नेहरू एक पृष्ठ पर जाति की समानता और स्वतंत्रता का भली भांति अनुमोदन कर सकते थे और दूसरे पन्ने पर उसके बीत जाने की उम्मीद भी जता सकते थे। एकाधिकारवादी मनोवृत्ति the-indian-ideologyअगर राष्ट्रीय धर्म और उसके मूलभूत संस्थानों के बारे में उनका यह मत था, तो उन धर्मों के मानने वालों की उनके दृष्टिकोण में क्या स्थिति थी जो न तो अपने उद्गम में राष्ट्रीय थे न विस्तारण में? राजनीतिक नेता के तौर पर नेहरू की पहली असली परीक्षा 1937 के चुनावों के साथ आई। अब वह गांधी के सहायक नहीं थे, जो 1934 के बाद नेपथ्य में चले गए थे। चुनावों में कांग्रेस की जीत और उसकी प्रथम क्षेत्रीय सरकारों के गठन के साल में वह कांग्रेस के अध्यक्ष थे। चुनाव परिणामों को लेकर शेखी बघारते हुए नेहरू ने घोषणा की कि भारत में महत्त्व रखने वाली अब दो ही शक्तियां हैं : कांग्रेस और अंग्रेज सरकार। इसमें जरा भी शक नहीं कि खुद को धोखा देने वाले घातक अंदाज में उन्हें इस बात पर भरोसा भी था। दरअसल यह एक इकबालिया जीत थी। इस समय तक कांग्रेस का सदस्यत्व 97 फीसदी हिंदू था। भारत भर के लगभग 90 फीसदी मुसलमान संसदीय क्षेत्रों में उसे खड़े होने के लिए मुसलमान उम्मीदवार तक नहीं मिले। नेहरू के अपने प्रांत उत्तर प्रदेश में, जो अब की तरह उस समय भी भारत का सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र था, कांग्रेस ने सभी हिंदू सीटें जीत ली थीं। मगर एक भी मुस्लिम सीट वह हासिल नहीं पर पाई थी। फिर भी, चुनाव प्रचार के दौरान तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग के ताल्लुकात खराब नहीं थे और जब नतीजे आए तो लीग ने तब लखनऊ में बनने वाले मंत्रिमंडल में कुछ प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन करना चाहा। ‘निजी तौर पर मुझे पक्का यकीन है कि हमारे और मुस्लिम लीग के बीच कोई भी समझौता या गठबंधन बेहद हानिकारक होगा।’ तो नेहरू के आदेश पर मुस्लिम लीग को बड़ी रुखाई से बता दिया गया कि ऐसा कुछ चाहने से पहले वह अपने आप को कांग्रेस में विलीन कर दे। ऊंची जाति के हिंदुओं की मनोवृत्ति को आगे चलकर आम्बेडकर ने एकाधिकारवादी बताया था। इस सामान्यीकरण की वैधता चाहे जो हो, यकीनन संदेहास्पद है, मगर इस बात में कोई शक नहीं कि स्वतंत्रता संघर्ष की वैधता के एकाधिकार पर कांग्रेस का दावा उसका केंद्रीय वैचारिक तत्त्व था। फिर क्यों आम मुसलमानों ने, दीगर हिंदुस्तानियों की तरह पर्याप्त संख्या में कांग्रेस को वोट नहीं दिया? इस पर नेहरू का जवाब यह था कि उन्हें चंद मुस्लिम सामंतों ने बहकाया था और हिंदू भाइयों के साथ अपने साझा सामजिक हितों को जान जाने पर पर वे कांग्रेस के समर्थन में आ जाएंगे। उनके नेतृत्व में मुसलमानों को यह समझाने के लिए एक व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया गया था। मगर बोस के विपरीत नेहरू का जनता के साथ सहज संपर्क बेहद कम था और वह कोशिश जल्द ही ठप्प पड़ गई। जमीनी स्तर पर लामबंदी करने की वह उनकी आखिरी कोशिश थी। दो साल बाद जब वह कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं थे, उन्होंने बोस को निकाल बाहर करने में सांठ-गांठ की। सैद्धांतिक तौर पर बोस पार्टी के वाम पक्ष में उनके हमराह थे मगर नेहरू के विपरीत गांधी के जादू से मुक्त थे और उन्हें गांधी का उत्तराधिकारी बनने से वंचित रखने में सक्षम प्रतिद्वंद्वी थे। नेहरू अब भी स्वतंत्र अभिनेता नहीं थे। नेहरू की जीवनीकार जूडिथ ब्राउन की तथ्यात्मक राय में वह पार्टी के पुराने खूसटों के ‘एकदम भरोसेमंद’ आधार बने रहे। दूसरा विश्व युद्ध छिड़ जाने पर कांग्रेस आलाकमान ने भारत की जनता से पूछे बिना वायसराय द्वारा जर्मनी के खिलाफ जंग छेड़ देने के विरोध में सभी प्रांतीय सरकारों को इस्तीफा देने का निर्देश दिया। इसका तुरंत असर यह हुआ कि एक राजनीतिक खालीपन तैयार हो गया जिसमें जिन्ना ने बड़ी दृढ़ता से अपने पैर जमा दिए। वह इस बात से बाखबर थे कि अपने सबसे महत्त्वपूर्ण साम्राज्य में लंदन को रियाया की वफादारी दिखाने की बेहद जरूरत थी। कांग्रेस मंत्रिमंडलों के अंत को ‘हश्र का दिन’ घोषित कर उन्होंने बिना समय खोये ब्रिटेन की मुश्किल घड़ी में उसके प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया और उसके बदले में युद्धकालीन अनुग्रह हासिल कर लिया। लेकिन उनके सामने काम मुश्किल था। अब तक वह मुस्लिम लीग के निर्विवाद नेता बन चुके थे। मगर उपमहाद्वीप की दूर-दूर तक बिखरी हुई मुस्लिम अवाम बिलकुल एकजुट न थी। बल्कि वह पहेली के उन टुकड़ों की तरह थी जिन्हें साथ मिलाकर कभी एक नहीं किया जा सकता। मुस्लिम लीग की स्थिति Muhammad-Ali-Jinnahऐतिहासिक तौर पर मुस्लिम एलीट का सांस्कृतिक और राजनीतिक हृदय स्थल उत्तर प्रदेश में था, जहां लीग सबसे ज्यादा मजबूत स्थिति में थी बावजूद इसके कि एक तिहाई से भी कम आबादी मुसलमान थी। सुदूर पश्चिम में सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती प्रांत में मुस्लिम जबरदस्त रूप से बहुलता में थे। मगर अंग्रेजों के कब्जे में वे काफी बाद में आए और इस वजह से वे इलाके देहाती पिछड़े हुए क्षेत्र थे, जहां उन स्थानीय नामी-गिरामियों का वर्चस्व था जो न उर्दू जबान बोलते थे और न लीग के प्रति कोई वफादारी रखते थे, और न ही लीग की उन इलाकों में कोई सांगठनिक मौजूदगी थी। पंजाब और बंगाल में, जो भारत के संपन्नतम प्रांत थे और एक दूसरे से काफी दूर स्थित थे, मुसलमान बहुसंख्यक थे। पंजाब में उनका संख्याबल जरा ही अधिक था मगर बंगाल में अधिक मजबूत था। इन दोनों ही प्रांतों में लीग बहुत प्रभावशाली शक्ति नहीं थी। पंजाब में वह नगण्य थी। यूनियनिस्ट पार्टी जिसका पंजाब प्रांत पर नियंत्रण था, बड़े मुस्लिम जमींदारों और संपन्न हिंदू जाट किसानों का गठबंधन था और इन दोनों ही धड़ों के सेना से संबंध मजबूत थे और वे अंग्रेजी राज के प्रति वफादार भी थे। बंगाल में, जहां लीग के नेता प्रांत के पूर्वी हिस्से में बड़ी रियासतों के मालिक कुलीन जमींदार थे, राजनीतिक प्रभाव केपीपी (कृषक प्रजा पार्टी) का था जिसका आधार आम किसान वर्ग था। इस तरह प्रांतीय स्तर पर पर्यवेक्षक जहां भी नजर डालते, मुस्लिम लीग कमजोर नजर आती। हिंदू बहुल इलाकों में उसे कांग्रेस ने सत्ता से परे रखा हुआ था और मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में उसे उसके विरोधी संगठनों ने उपेक्षित कर रखा था। अखिल भारतीय स्तर पर आवश्यक कौशल और जीवट के साथ काम कर सकने वाले एकमात्र मुस्लिम नेता के तौर पर जिन्ना की प्रतिष्ठा ने लीग को बचा लिया। इसी वजह से यूनियनिस्ट, केपीपी और दीगर नेतृत्व अपनी-अपनी प्रांतीय जागीरें बनाए रखते हुए अंग्रेजों के साथ केंद्र में बातचीत की खातिर जिन्ना को अपना नुमाइंदा बनाने को राजी हुए। यह टुकड़ा-टुकड़ा और असंबद्ध आलम ही 1937 के चुनावों में कांग्रेस की हेकड़ी का एक कारण था। कांग्रेस आलाकमान के लिए लीग एक चुकी हुई ताकत थी जिसे नजर-अंदाज किया जा सकता था जबकि दीगर स्थानीय मुस्लिम पार्टियों को अपने सुभीते के अनुसार चुना जा सकता था और अपना सहयोगी बनाया जा सकता था। महायुद्ध ने इस संरचना को तेजी से बदल देना था। अंग्रेज, जो मुसलमानों को गदर के बाद अपनी रियाया का सबसे खतरनाक हिस्सा मानते आए थे, बीसवीं सदी के आते-आते उन्हें हिंदू राष्ट्रवाद के सबसे सुरक्षित प्रत्युत्तर के रूप में देखने लगे। अंग्रेजी राज के खिलाफ साझा संघर्ष में मुसलमान हिंदुओं के साथ गुट न बना लें यह सुनिश्चित करने के लिए अंग्रेजों ने उन्हें पृथक निर्वाचक मंडल भी प्रदान कर दिया। दूसरी तरफ वे यह भी नहीं चाहते थे कि उपमहाद्वीप में कानून और व्यवस्था कायम करने के उनके दावों की कलई सांप्रदायिक हिंसा खोल दे और न ही वे अपेक्षाकृत शक्तिशाली हिंदू समुदाय से, जिसमें उनके अनेक मित्रवत जमींदार और व्यापारी थे, बेजा दुश्मनी ही मोल लेना चाहते थे। सो उन्होंने ध्यान रखा कि वे अपने अनुग्रहों में एकदम पक्षपाती न हो जाएं। मगर कांग्रेस मंत्रिमंडलों के पद त्याग देने के बाद और जब लीग युद्ध कार्य में सरकार को जन समर्थन मुहैया करा रही थी, जिन्ना वायसराय के पसंदीदा संभाषी बन गए। जीवन पद्धति और दृष्टिकोण में पूर्णत: सेकुलर होने के बावजूद कांग्रेस ने जिन्ना को दशकों से अस्वीकार कर रखा था और कांग्रेस के समाजशास्त्रीय यथार्थ से वह भली-भांति परिचित थे। जैसा कि सीनियर नेहरू ने, जो अपने बेटे की तुलना में ज्यादा सुस्पष्ट या यूं कहें कि ज्यादा साफगोई वाले थे, ध्यान दिलाया था कि कांग्रेस अपनी संरचना में अनिवार्यत: एक हिंदू पार्टी थी और केंद्र में उसकी सत्ता के उसकी प्रांतीय सरकारों की बनिस्बत मुसलमानों के प्रति ज्यादा हमदर्द होने की सम्भावना कम थी। जिन्ना की मुश्किलें, नेहरू की मान्यताएं जिन्ना ने, जो अभी तक अपनी बुनियाद के कमजोर होने से वाकिफ थे और उस वजह से सीमित होने को राजी नहीं थे, अंग्रेजी राज के आगे कोई एकदम साफ-साफ मांगें रखना टाले रखा था। अब घटनाक्रम से हौसला पाकर उन्होंने नए कार्यक्रम का खुलासा किया। 1940 में लाहौर में उन्होंने घोषणा की कि उपमहाद्वीप में एक नहीं बल्कि दो राष्ट्र हैं और यह कि आजादी को उन दोनों के सह-अस्तित्व को इस स्वरूप में समायोजित करना होगा जो उन क्षेत्रों को स्वायत्तता और सार्वभौमिकता दे जिनमें मुसलमान बहुसंख्यक हैं। जिन्ना के निर्देशानुसार लीग ने जो प्रस्ताव पारित किया उसका शब्दांकन जानबूझ कर अस्पष्ट रखा गया; उसमें संघटक राज्यों के बारे में बहुवचन में बात की गई थी और ‘पाकिस्तान’ लफ्ज का इस्तेमाल नहीं किया गया था – जिसके बारे में जिन्ना ने बाद में शिकायत की थी कि कांग्रेस ने उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया था। उस पदबंध की अस्पष्टता के पीछे जिन्ना की अनसुलझी कशमकश थी। लगभग समान रूप से मुसलमान बाहुल्य वाले इलाकों को स्वतंत्र राष्ट्र के गठन के लिए संभव उम्मीदवार समझा जा सकता था। मगर क्या कम बाहुल्य वाले इलाकों में भी वही संभाव्यता थी? और सर्वोपरि यह कि बाहुल्य वाले इलाके कल्पित भारत से अगर अलग हो गए, तो पीछे रह जाने वाले उन अल्पसंख्यकों का क्या होगा जो जिन्ना का अपना राजनीतिक आधार थे? क्या उन्हें किसी प्रकार के व्यापक संघ की जरूरत न होगी जिसमें मुस्लिम अवाम बहुसंख्यक हिंदू मर्जी के मनमाने इस्तेमाल से अपना बचाव कर सकें? इन सारी दिक्कतों के मद्देनजर क्या नहीं कहा जा सकता कि जिन्ना स्वयं झांसा दे रहे थे – वास्तविक महत्तम हासिल करने के लिए अवास्तविक मांगों को सौदेबाजी के तौर पर सामने रख रहे थे? उस दौरान बहुत सारे लोगों को ऐसा ही लगा था और उसके बाद भी इस बात को मानने वाले कुछ कम नहीं हैं। लाहौर प्रस्ताव को चाहे जितना चमकाने की कोशिश की जाए, तब तक यह साफ हो चुका था कि आजादी अपने आप में उस शाश्वत एकता की गारंटी नहीं होगी जिसकी बात कांग्रेस के विचारक अक्सर किया करते थे। हिंदू और मुसलमान राजनीतिक अस्मिताओं की प्रतिद्वंद्विता ने उस एकता के लिए पैदा किया खतरा आसन्न और सुस्पष्ट था। नेहरू की प्रतिक्रिया क्या थी? 1935 में अपनी आत्मकथा के एक विशिष्ट परिच्छेद में उन्होंने भारत में एक मुस्लिम राष्ट्र के होने की संभावना को नकार दिया था, ‘राजनीतिक तौर पर यह विचार बेतुका है और आर्थिक रूप से खामख्याली; यह गौर किये जाने लायक है ही नहीं।’ 1938 में उनसे मिलने आए कुछ अमेरिकियों से उन्होंने कहा कि ‘भारत में कोई धार्मिक या सांस्कृतिक संघर्ष नहीं है और सदियों से चली आई उसकी अनिवार्य एकता भारत का अद्भुत और सारभूत तत्व है।’ अपने एक निबंध में उन्होंने दावा किया था कि ‘भारत की एकात्मकता के लिए कार्यरत ताकतें दुर्जेय और जबरदस्त हैं और कोई अलगाववादी प्रवृत्ति इस एकात्मकता को तोड़ डालेगी ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती।’ लाहौर प्रस्ताव के बाद, 1941 में वह प्रवृत्ति उनके सामने मुंह बाए खड़ी थी मगर अपने उस निबंध को पुनर्प्रकाशित करते हुए उन्हें अपने इस दावे को बदलने की कोई जरूरत नहीं महसूस हुई। कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी वेवल जो महायुद्ध के दौरान भारत में फौज के प्रधान सेनापति थे, 1945 के आते-आते वायसराय बन गए। वह जानते थे कि साम्राज्यवादी खेल खत्म हो गया है। उनकी टिप्पणी, ‘अपने खिलाफ बहुत भारी संख्या में खड़े विरोधी पक्ष को देखकर पीछे हटने को मजबूर होने वाली सैन्य शक्ति की जो हालत होती है वैसी ही हमारी वर्तमान स्थिति है।’ महायुद्ध के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन छेडऩे के जुर्म में जेल में बंद नेहरू और उनके सहकारियों को जून में रिहा कर दिया गया और सर्दियों में प्रांतों और केंद्र के चुनाव हुए जो 1935 के मताधिकार पर ही आधारित थे। नतीजे कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी की तरह थे और होने भी चाहिए थे। मुस्लिम लीग न सिमटी थी और न ओझल हुई थी। अपने संगठन को खड़ा करने के, उसकी सदस्यता बढ़ाने के, अपना दैनिक पत्र निकालने के और जिन प्रांतीय सरकारों से अब तक उन्हें दूर रखा गया था उनमें अपने कदम जमाने के कामों में जिन्ना ने महायुद्ध के दौर का इस्तेमाल किया था। 1936 में एक ठंडा पड़ चुका उबाल कहकर नकार दी गई मुस्लिम लीग ने 1945-46 में भारी जीत हासिल की। उसने केंद्र के चुनावों में हर एक मुस्लिम सीट और प्रांतीय चुनावों में 89 प्रतिशत मुस्लिम सीटें जीत लीं। मुसलमानों के बीच अब उनकी प्रतिष्ठा वैसी हो चली थी जैसी हिंदुओं में कांग्रेस की थी। आजादी के लिए सभी दलों को स्वीकार्य संवैधानिक ढांचे के बारे में बातचीत करने के लिए लेबर पार्टी की सरकार ने लंदन से कैबिनेट मिशन भेजा। जिस संघीय रचना का प्रस्ताव मिशन ने अंतत: रखा वह लाहौर में जिन्ना द्वारा सामने रखी गई व्यवस्थाओं से कुछ मिलता-जुलता था। हालांकि अब तक मुस्लिम लीग का रुख काफी कड़ा हो गया था, फिर भी दोनों पार्टियों ने पहलेपहल इस योजना के प्रति अपनी सम्मति दर्शाई। दो हफ्तों बाद नेहरू उस से मुकर गए और घोषणा की कांग्रेस अपने मन की करने के लिए स्वतंत्र है। राजनीतिक नेता के तौर पर यह उनका पहला विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत निर्णय था। उनके कट्टरपंथी सहकर्मी वल्लभभाई पटेल तक ने उसे ‘जज्बाती अहमकपन’ करार दिया मगर कमान से निकला हुआ तीर वापिस नहीं आ सकता था। इसके जवाब में जिन्ना, जिन्होंने सड़कों पर किये जाने वाले विरोध प्रदर्शनों को भीड़ से की गई लापरवाह अपील मानते हुए हमेशा उनकी निंदा की थी, ने संसदीय तरीके को लेकर मुसलमानों का धैर्य अब टूट चुका है यह दर्शाने के लिए ‘सीधी कार्रवाई के दिन’ की घोषणा कर दी। अभिजात स्तर पर दांव खेलने में माहिर सियासतदां के तौर पर जिन्ना का जनसामूहिक कार्रवाई में कोई अनुभव नहीं था और उन्हें उसके संचालन और नियंत्रण का भी अंदाजा नहीं था। कलकत्ते में सांप्रदायिक मारकाट मच गई। मुस्लिम गुंडों द्वारा शुरू की गई यह मारकाट जब खत्म हुई तो दोनों समुदायों के सापेक्ष संख्याबल के मद्देनजर अपरिहार्य रूप से हिंदुओं की तुलना में कहीं ज्यादा मुसलमान मारे जा चुके थे। हर संभव तरीका अपनाकर देख लेने के बाद हार कर वेवल ने एक अंतरिम सरकार बनाई जिसकी अगुवाई प्रधानमंत्री के तौर पर नेहरू कर रहे थे और पटेल आतंरिक मंत्री थे। लीग द्वारा किये गए शुरुआती बहिष्कार के बाद जिन्ना के सहायक लियाकत अली खान अंतरिम सरकार में वित्त मंत्री बने। हर पार्टी दूसरी के आड़े आने पर आमादा थी। प्रांतीय चुनावों के नतीजों के आधार पर नामजद किये गए नुमाइंदों को लेकर बनी संविधान-सभा का लीग ने बहिष्कार किया। संविधान-सभा में कांग्रेस इस कदर हावी थी और इसके लिए सैद्धांतिक रूप से सरकार की ही जिम्मेदारी बनती थी, कि कांग्रेस ने लियाकत के संपत्ति कर के प्रस्ताव को इस आधार पर रोक दिया कि चूंकि ज्यादातर व्यापारी हिंदू हैं, ऐसा करना धार्मिक पक्षपात होगा। तो यह परिस्थिति थी जब फरवरी, 1947 में एटली सरकार ने घोषणा की कि जून, 1948 तक भारत को आजादी मिल जाएगी और हस्तांतरण के प्रभारी के तौर पर वायसराय का काम संभालने माउंटबेटन को रवाना किया। धार्मिक फूट और साम्राज्यवादी नीति माउंटबेटन के आगमन के साथ भारत में धार्मिक फूट को लेकर साम्राज्यवादी नीति का एक चक्र पूरा हुआ। 19 वीं सदी के दूसरे उत्तरार्ध में अंग्रेजी राज को यह शक था कि गदर में पेशकदमी करने वाले मुसलमान थे और हिंदुओं को ज्यादा भरोसेमंद समझा जाता था। बीसवीं सदी के पहले उत्तरार्ध में यह पसंदगी तब बदल गई जब हिंदू राष्ट्रवाद ज्यादा आग्रही हो गया और उसे रोकने के लिए मुस्लिम महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दिया गया। अब अपने अंतिम चक्र में लंदन ने जबर्दस्त झटका देते हुए बहुसंख्यक समुदाय को अपना विशेषाधिकृत सम्भाषी चुन लिया। 1947 में इस भारी परिवर्तन की जज्बाती शिद्दत उभरी थी विचारधारा, रणनीति और शख्सियत के अचानक हुए संगम से। ब्रिटेन की लेबर पार्टी हुकूमत के लिए उनके अपने दृष्टिकोण से सबसे निकटतम भारतीय पार्टी कांग्रेस थी; नेहरू के साथ जुड़ी फेबियन कडिय़ां काफी पुरानी थीं। राष्ट्रीय स्वाभिमान जाकर भावनात्मक अपनेपन से मिल गया। ब्रिटेन ने एक छितरे हुए उपमहाद्वीप को इतिहास में सर्वप्रथम एक एकल राजनीतिक क्षेत्र बना डाला था। सही समझ वाले सारे अंग्रेज देशभक्त, जिनमें सिर्फ एटली जैसे साम्राज्यवादी शिक्षा के उत्पाद ही शामिल नहीं थे, इस बात को बड़े गर्व के साथ अपने साम्राज्य की सबसे उत्कृष्ट सृजनात्मक उपलब्धि मानते और उनकी रवानगी के वक्त उस में दरारें पडऩा उस उपलब्धि पर सवालिया निशान लगने जैसा होता। ब्रिटेन को अगर भारत छोडऩा है तो भारत को वैसे ही रहना होगा जैसा कि अंग्रेजों ने उसे गढ़ा था। ब्रिटेन के पास तब भी सिर्फ मलाया ही नहीं बल्कि एशिया में भी कीमती मिल्कियतें थीं – उनके सबसे फायदेमंद उपनिवेश जो जल्द ही कम्युनिस्ट विद्रोह की रंगभूमि बन जाने वाले थे और जिन्हें छोडऩे की ब्रिटेन को कोई जल्दी नहीं थी। उसी समय उत्तर-पश्चिम सीमा से थोड़ी ही दूर अंग्रेजी राज का पारंपरिक हौवा बैठा हुआ था जो अब सोवियत संघ के रूप में और भी भयंकर था। आला अफसरान इस बात पर एकमत थे कि उपमहाद्वीप के विभाजन से रूसियों को ही फायदा पहुंचेगा। अगर दक्षिण एशिया के दरवाजों को साम्यवाद के खिलाफ मजबूती के साथ बंद किया जाना था तो न सिर्फ ब्रिटेन बल्कि पश्चिम के भी रणनीतिक हितों को संयुक्त भारत के परकोटे की दरकार थी। ये सारी बातें इसी तरफ इशारा कर रही थीं कि मुस्लिम लीग, जो कभी अंग्रेजी राज का नीतिगत साधन हुआ करती थी, अब उसके मामलों के यथेष्ट निपटारे में एक प्रमुख अड़चन थी और उसका साक्षात रूप जिन्ना थे। कांग्रेस के नेता ब्रिटेन द्वारा उन्हें सौंपे जाने वाले विरसे की अखंडता का झंडा उठाये हुए थे और जिन्ना यह उम्मीद नहीं कर सकते थे कि उनके साथ समतुल्य बर्ताव किया जाएगा। मगर इस ढांचागत विषमता में एक असंतुलित व्यक्तिगत आत्मश्लाघिता को मिलाया गया और यह सम्मिश्रण घातक साबित हुआ। ‘वह झूठा, बौद्धिक रूप से सीमित और चालबाज शख्स’ – माउंटबेटन के इस अमिट पोट्रेट के लिए हमें एंड्रयू रॉबट्र्स का शुक्रगुजार होना चाहिए। दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों की सेना के प्रतीकात्मक कमांडर के तौर पर कोलम्बो में अपनी कैडिलैक की पिछली सीट पर बैठे-बैठे खयाली कारनामों में डूबे हुए माउंटबेटन जब दिल्ली आए तो इस बात से बेइंतहा खुश थे कि उन्हें ‘लगभग दिव्य शक्तियों से नवाजा गया है। मैंने महसूस किया कि मुझे दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी बना दिया गया है।’ माउंटबेटन पहनावे और समारोह संबंधी आडम्बर का विकृत रूप थे और झंडों और झालरदार सूटों को लेकर उनका जूनून अक्सर राज्य के मामलों पर तरजीह पा जाता। उनके दो सर्वोपरि सरोकार थे: अंग्रेजी राज के अंतिम शासक के तौर पर एक ऐसी हस्ती बनना जो हॉलीवुड को शोभा दे और खासकर यह सुनिश्चित करना कि भारत राष्ट्रमंडल के अंतर्गत का ही एक राज्य बना रहे, ‘विश्व में प्रतिष्ठा और रणनीति दोनों को लेकर यूनाइटेड किंगडम के लिए यह अत्यधिक महत्त्व की बात होगी।’ माउंटबेटन और नेहरू के संबंध ऐसा माना गया था कि अगर ब्रिटिश राज का बंटवारा होना ही है तो बड़ा हिस्सा- जितना बड़ा उतना अच्छा – ब्रिटिश उद्देश्यों के लिए महत्त्व का होगा। उपमहाद्वीप के भविष्य की योजना बनाने में कांग्रेस अब पसंदीदा सहयोगी क्यों थी इस बात के पीछे के राजनीतिक कारणों में एक व्यक्तिगत कारण भी जुड़ गया था। नेहरू के रूप में माउंटबेटन को एक दिलचस्प साथी मिल गया था, एक से स्वभाव वाले वे दोनों ही सामाजिक तौर पर भी समकक्ष थे। गांधी ने अंग्रेजों के साथ हमेशा अच्छे संबंध बनाए रखना चाहा था। गांधी द्वारा नेहरू को उत्तराधिकारी चुने जाने का अंशत: कारण यह था कि वह अंग्रेजों के साथ अच्छे संबंध रखने के लिए सांस्कृतिक तौर पर सुसज्ज थे जबकि पटेल और अन्य उम्मीदवारों में वह चीज न थी। सारे संबंधित लोगों के लिए यह तसल्ली की बात थी कि कुछ ही हफ्तों में नेहरू वायसराय के न केवल खास दोस्त बन गए बल्कि जल्द ही उनकी बीवी के साथ हमबिस्तर भी हो गए। इस संबंध को लेकर भारतीय राज्य इतना संकोची रहा आया है कि पचास सालों के बाद भी वह इस विषय को छूने वाली एक अमरीकी फिल्म का प्रदर्शन रोकने में दखल दे रहा था। भारतीय राज्य के इतिहासकार भी इस विषय के बगल से चुपचाप निकल जाते हैं। दिल के मामले कदाचित ही हुकूमत के मामलों पर असर डालते हैं। मगर इस मामले में यह इमकान न था कि त्रिकोण के कामुक संबंध ब्रिटिश नीति को लीग के पक्ष में झुका देते। राजनयिकों को इससे कहीं कम गलतियों के लिए चलता कर दिया जाता है। फिर भी एक ऐसे दौर में जब ब्रिटेन प्रकट रूप से भारत में विभिन्न दलों को एक साथ लाने की कोशिश कर ही रहा था और कांग्रेस एकीकृत देश को आजादी की तरफ ले जाने की कोशिश कर रही थी, गौरतलब है कि तब जिन्ना के बारे में माउंटबेटन और नेहरू कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे और एटली उसमें सुर मिला रहे थे। माउंटबेटन के लिए जिन्ना एक ‘पागल’, घटिया आदमी’ और ‘मनोरोगी केस’ थे; नेहरू के लिए वह एक ‘हिटलरी नेतृत्व और नीतियों’ वाली पार्टी की अगुआई कर रहे पैरेनोइड थे और एटली के लिए वह ‘गलतबयानी करने वाले’ थे। विभाजन की ओर माउंटबेटन जब आए तो पंजाब में सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे। एक महीने के अंदर-अंदर उन्होंने फैसला कर लिया कि विभाजन अपरिहार्य है क्योंकि कांग्रेस और लीग के बीच का गतिरोध दूर नहीं हो पा रहा है। मगर समूचे इलाके का बंटवारा कैसे होना था? अनिवार्यत: बात पांच सवालों पर आकर टिक गई। बंगाल और पंजाब इन दो प्रमुख प्रांतों का क्या होगा जहां मुसलमान बहुसंख्यक तो थे मगर उनका संख्याबल उतना जबरदस्त नहीं था? रजवाड़ों के शासन वाले अंचलों को, जहां कांग्रेस और लीग दोनों की ही उपस्थिति नगण्य थी, कैसे आवंटित किया जाएगा? विभाजन के सिद्धांत के बारे में या सरहद कहां खड़ी की जाएगी इस बात को लेकर क्या जनता की राय पूछी जाएगी? विभाजन की प्रक्रिया का पर्यवेक्षण कौन करेगा? इस पर अमल कितनी समयावधि में किया जाएगा? इस मौके पर आकर कांग्रेस और लीग का हिसाब अदल-बदल हो गया। सारे राष्ट्र की नुमाइंदगी करने का कांग्रेस का दावा 1920 के दशक से ही उसकी विचारधारा का केंद्र रहा था। मुस्लिम निर्वाचन मंडल में लीग द्वारा अपनी ताकत दिखाए जाने पर यह दावा धराशायी हो गया था। मगर अपनी नई-नवेली ताकत का लीग क्या करने वाली थी? लाहौर प्रस्ताव के छह साल बीत जाने पर भी जिन्ना को हिंदू-बहुल प्रांतों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के संरक्षण के साथ-साथ मुस्लिम बाहुल प्रांतों की सार्वभौमिकता के लिए कोई संभाव्य समाधान नहीं मिला था। बस इतना भर हुआ था कि पाकिस्तान का नारा, जिसे उन्होंने 1943 में खारिज कर दिया था, मुसलमानों के बीच इतना मकबूल साबित हुआ कि बिना किसी स्पष्टीकरण के जिन्ना ने उसे अपना लिया और यह दावा किया कि लाहौर प्रस्ताव में ‘राज्य’ की जगह ‘राज्यों’ मुद्रण की अशुद्धि के कारण आया था। शायद उन्होंने यह हिसाब लगाया था कि चूंकि अंग्रेजों के सामने लीग और कांग्रेस के परस्पर विरोधी उद्देश्य हैं, वह आखिरकार अपने हिसाब से समय लगाकर दोनों पक्षों पर अपनी पसंद का परिसंघ थोप देंगे। उस परिसंघ में उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बाहुल इलाके स्वशासी होंगे और केंद्रीय सत्ता न इतनी मजबूत होगी कि उन पर चढ़ सके और न ही इतनी कमजोर कि स्वशासी हिंदू-बहुल प्रक्षेत्रों में मुसलमान अल्पसंख्यकों की रक्षा भी न कर सके। अंतत: कैबिनेट मिशन ने जो योजना तैयार की वह जिन्ना के सोच (विजन) के काफी करीब थी। मगर कांग्रेस पार्टी ने हमेशा से एक शक्तिशाली केंद्रीकृत राज्य की आरजू की थी और नेहरू का मानना था कि भारतीय एकता को बचाए रखने के लिए यह जरूरी है। इसलिए ऐसी कोई स्कीम नेहरू के लिए विभाजन से भी खराब थी क्योंकि वह उनकी पार्टी को उस शक्तिशाली केंद्रीकृत राज्य से महरूम कर देती। राष्ट्रीय वैधता के ऊपर अपनी इजारेदारी पर कांग्रेस ने शुरू से जोर दिया था। यह दावा अब बिलकुल स्वीकार नहीं किया जा सकता था। लेकिन अगर बुरी से बुरी स्थिति भी हुई तो भारत के बड़े हिस्से में सत्ता के अबाधित एकाधिकार के मजे लेना अविभाजित भारत में उस सत्ता को बांटकर बंधे पड़े रहने से बेहतर था। इसलिए जब लीग तकसीम की बात कर रही थी तो जिन्ना परिसंघ के बारे में सोच रहे थे, और जब कांग्रेस संघ की बात कर रही थी, तो नेहरू बंटवारे की तैयारी कर रहे थे। कैबिनेट मिशन योजना की लुटिया हस्बे-दस्तूर डुबो दी गई। सारी निगाहें अब इस बात पर आ टिकीं कि लूट का बंटवारा कैसे होगा। अंग्रेज अब भी राजा थे: बंटवारा माउंटबेटन करेंगे। नेहरू इस बात से निश्चिंत थे कि उन पर इनायत जरूर होगी, मगर कितनी इसका अंदाजा पहले से होना मुश्किल था। ब्रिटिश राज से जो भी राज्य उभरेंगे उन्हें पुनर्नामित ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत बनाए रखना माउंटबेटन के लिए सबसे अहम बात थी। इसका मतलब था कि उन राज्यों को आजादी एक स्वतंत्र-उपनिवेश (डोमिनियन) के तौर पर स्वीकार करनी होगी। मुस्लिम लीग को इससे कोई आपत्ति नहीं थी। मगर लंदन में चलने वाली जालसाजियों के आगे भारत के नतमस्तक होने को कांग्रेस 1928 से ही सिद्धांतत: खारिज करती आई थी और इसमें डोमिनियन वाली बात भी जाहिरन शामिल थी। तो जिस छोटी कौम को माउंटबेटन विभाजन के लिए जिम्मेदार मानते थे, उसी कौम के राष्ट्रमंडल का सदस्य बन जाने की अवांछनीय संभावना माउंटबेटन के सामने इस कारण आ खड़ी हुई। वहीं बड़ी कौम जो उनके अनुसार न केवल अपेक्षाकृत दोषरहित थी बल्कि रणनीतिक और वैचारिक तौर पर अधिक महत्त्वपूर्ण भी थी, राष्ट्रमंडल से बाहर रहने वाली थी। इस पहेली को कैसे सुलझाया जाना था? इसे सुलझाया उस घड़ी के तारणहार वी पी मेनन ने। अंग्रेजों की नौकरशाही में केरल के उच्च-पदस्थ हिंदू अधिकारी मेनन माउंटबेटन के व्यकिगत अमले का हिस्सा थे और कांग्रेस के सांगठनिक बाहुबली सरदार पटेल के मित्र भी। क्यों न विभाजन सीधे-सीधे इस तरह हो कि कांग्रेस को बहुत बड़ा क्षेत्र और आबादी हासिल हो जाए जिसकी हकदार वह मजहब के आधार पर थी ही, और तो और अंग्रेजी राज की पूंजी और सैनिक एवं नौकरशाही तंत्र का भी बड़े से बड़ा हिस्सा मिल जाए – और इसके बदले में माउंटबेटन से राष्ट्रमंडल में भारत के प्रवेश का वायदा किया जाए? इतना ही नहीं, मुंह मीठा करने के लिए, मेनन ने रजवाड़ों को भी थाली में परोसने की सलाह दी जिससे कि जिन्ना को मिलने वाले हिस्से की क्षतिपूर्ति हो जाए। कुल मिलाकर रजवाड़े क्षेत्रफल और आबादी में भावी पाकिस्तान के बराबर थे और उस समय तक कांग्रेस ने उन्हें अलंघ्य मान रखा था। नेहरू और पटेल को मनाने में कोई मुश्किल नहीं हुई। अगर मालमत्ता दो महीनों के अंदर-अंदर हस्तांतरित हो जाता है, तो सौदा पूरा। इस रास्ते के हाथ लगने (ब्रेकथ्रू) की सूचना मिलने पर माउंटबेटन फूले नहीं समाये और फिर मेनन को उन्होंने लिखा, ‘बड़ी खुशकिस्मती रही कि आप मेरे स्टाफ में रिफोर्म्स कमिश्नर रहे, और इस तरह हम बहुत शुरुआती दौर में ही एक दूसरे के करीब आ गए, क्योंकि आप वह पहले आदमी थे जो डोमिनियन स्टेटस के मेरे विचार से पूर्णत: सहमत थे और आपने वह हल ढूंढ निकाला जिसके बारे में मैंने सोचा भी नहीं था और उसे सत्ता के अति शीघ्र हस्तांतरण से पहले ही स्वीकार्य बना दिया। इस निर्णय की इतिहास हमेशा बेहद कद्र करेगा और इस बात के लिए मैं आपका आभारी हूं।’ इतिहास उतना कद्रदान नहीं साबित हुआ जितनी उन्हें उम्मीद थी। आखिरी घड़ी में एक गड़बड़ हो गई। स्वतंत्रता और विभाजन का लंदन द्वारा स्वीकृत मसौदा शिमला में सभी पक्षों के आगे रखने से पहले माउंटबेटन को पूर्वबोध हुआ कि औरों के देखने से पहले उन्हें वह मसौदा गुप्त रूप से नेहरू को दिखा देना चाहिए। उसे देखकर नेहरू आग-बबूला हो गए: मसौदे में यह बात पर्याप्त रूप से साफ नहीं की गई थी कि भारतीय संघ अंग्रेजी राज का उत्तराधिकारी राज्य होगा और इस वजह से उसे सारी चीजें हासिल होंगी और यह भी कि पाकिस्तान उसे अलग हो रहा है। माउंटबेटन ने अपने अंतर्ज्ञान के लिए किस्मत का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि अगर वह मसौदा नेहरू को नहीं दिखाते तो खुद वह और उनके आदमी ‘देश की सरकार के सामने निरे अहमक साबित हो जाते कि उन्होंने सरकार को इस खुशफहमी में रखा था कि नेहरू मसौदा स्वीकार कर लेंगे’ और ‘डिकी माउंटबेटन बर्बाद हो गए होते और अपना बोरिया-बिस्तर बांध चुके होते’। मेनन का अमूल्य साथ तो था ही, और मुश्किल टल गई जब उन्होंने नेहरू की पसंद वाला मसौदा तैयार किया। जून के पहले हफ्ते में माउंटबेटन ने घोषणा की कि ब्रिटेन 14 अगस्त को सत्ता का हस्तांतरण कर देगा, उस तारीख को बाद में उन्होंने स्वयं ही ‘हास्यास्पद रूप से जल्दबाज’ बताया था। इस जल्दबाजी की वजह साफ थी, और वह बताने में माउंटबेटन ने कोई गोलमाल नहीं किया। ‘हम क्या कर रहे हैं? प्रशासकीय तौर पर एक पक्की इमारत बनाने और एक झोंपड़ी या तम्बू तानने में फर्क है। जहां तक पाकिस्तान की बात है, हम एक तंबू तान रहे हैं। इससे ज्यादा हम कुछ नहीं कर सकते।’ साभार: थ्री एसेज कंबाइन द्वारा प्रकाशित इंडियन आइडियोलॉजी से

Thursday, December 1, 2016

रेल दुर्घटनाओं के गुनाहगार और असलियत

जब-जब रेल दुर्घटना हुआ, देष में कोहराम मचा है। बात चाहे आज अहले सुबह कानपुर में पटरी से उतरी पटना-इंदौर एक्सप्रेस की हो या फिर बंगाल में चार साल पहले हुए ज्ञानेष्वरी एक्सप्रेस की। दुर्घटना के पीछे कारण चाहे जो भी हो लेकिन आरोप-प्रत्यारोप में खत्म हो जाती है असली कारणों की तहकीकात और अपने नीयत चाल से पटरियों पर दौड़ पड़ती है रेल। सवारियों की जान-जोखिम में डाल पटरी पर दौड़ती रेलवे प्रशासन क्या इस बार अपनी मुंह खोलेगा और मामले की सही तहकीकात कर दोषियों पर कोई कार्रवाई होगी?
सवाल इसलिये कि आज से करीब 12 साल पहले हावडा-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस के दो बोगी मगध के लाल गलियारे स्थित रफीगंज स्टेशन के समीप मदार नदी में गिर गयी थी। सितंबर का महीना था और नदी में बाढ़ आयी हुई थी। देश की वीआईपी गाड़ियों में शुमार राजधानी एक्सप्रेस के मदार नदी में गिरने से करीब 150 यात्रियों की मौत हो गयी थी और 500 से अधिक गंभीर रूप से घायल थे। तब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे और महज संयोग था कि रेल मंत्री थे नीतीश कुमार। जो इस समय बिहार के मुख्यमंत्री हैं। रात्री के करीब 11 बज रहे थे और अधिकांश यात्री गहरी निद्रा में थे। घटना से उत्पन्न हालात बेकाबू हो गये थे। हालांकि उस वक्त बिहारियों की सेवा को देष ने सराहा था। घायलों को रफीगंज जैसे छोटे जगह में समुचित इलाज नहीं हो पा रहा था। चूकि यह इलाका माओवादियों का गढ़ माना जाता था इसलिये भी प्रशासन फूंक-फंूक कर कदम रख रही थी।
बहरहाल, घटनास्थल पर दोपहर बाद पहुंचे तत्कालीन रेलमंत्री नीतीश कुमार मुदार्बाद के नारे लगे थे। वहीं रेलमंत्री ने इस घटना के लिये बिहार सरकार को लताड़ते हुए सुरक्षा में चूक बताया था। जबकि अहले सुबह रफीगंज पहुंचे तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद इस बड़ी घटना के लिये मदार नदी पर सौ साल पहले बने रेल पुल को कमजोर बताया था। कारण चाहे जो भी हो। लेकिन देश की यह बड़ी घटना भी सियासी भेंट चढ़ गया। अबतक न तो बिहार पुलिस इस मामले में किसी नतीजे पर पहुंची और न ही रेलवे प्रशासन।
बताते चले कि इस घटना के पहले कभी भी माओवादियों पर यह तोहमत नहीं लगा कि माओवादी सनसनी फैलाने या फिर रेलवे पैसेंजर को लुटने के ख्याल से पैसेंजर गाड़ियों पर हमला किये हों। हां जब कभी माओवादी पुलिस से हथियार लूटने के ख्याल से रेलवे को निषाना बनाते रहे हैं। बहरहाल, सच्चाई चाहे जो भी हो सियासी भेंट चढ़ चुके राजधानी एक्सप्रेस कांड का अनुसंधान अब भी पुलिस फाइल में चल रहा है। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोप-प्रत्यारोप के इस सियासी दौर में सरकारें चाहें जो करें लेकिन माओवादियों ने उस वक्त इस मामले को गंभीरता से लिया था और इलाके के कई चोर गिरोहों को खुलेआम जनअदालत लगाकर मार दिया था। उसके बाद से दूसरी बार जब बंगाल में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई। इस घटना में भी सौ से अधिक यात्रियों की मौत हुई थी। घायलों की संख्या सैंकडों थी। तब भी रेलवे प्रशासन ने इस घटना के लिये राज्य सरकार को दोषी माना था वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे माओवादी नेता किशन जी की चाल बतायी थी। हालांकि माओवादी इस घटना के लिये सीपीएम को जिम्मेवार बताते हुए अपना पल्ला झाड लिया था। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में एक बार फिर आशंका है कि कानपुर में हुए पटना-इंदौर एक्सप्रेस की जांच कागजों में दब कर रह जायेगी। (लेखक जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक के प्रदेश प्रवक्ता हैं)

सिसकियां भर रहा मगध का लाल गलियारा



कभी बमों के धमाके तो कभी गोलियों की गूंज से आसमान गूंजायमान। भूख से तड़पते बच्चे। मार्च का महीना आते ही हलक बूझाने लायक पानी मयस्सर नहीं। एक तो गांवों में स्कूल का नामोनिषान नहीं, कहीं स्कूल दिख भी गये तो पढ़ाने लायक मास्टर नहीं। दवा और डाॅक्टर के अभाव में दम तोड़ते मरीज। यही पहचान रह गयी है मगध के नवादा, गया और औरंगाबाद के एंटी नक्सल अभियान चलाये जा रहे इलाकों की। वह मगध जिससे कभी दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाया था। बौद्धिक संपन्नता के लिये दुनिया मगध की ओर आकर्षित होती थी। नालंदा का बौद्ध विहार आज भी शोध का विषय बना हुआ है तो नये जमाने में मगध की पहचान भूख, अषिक्षा, गरीबी, कुपोषण के साथ ही मानवता को शर्मसार करने वाले कुकृत्यों से हो रहा है। आज मगध पहचाना जा रहा है जातीय जहर से। मगध की पहचान हो रही है साम्प्रदायिक उन्माद से। मगध पहचाना जा रहा है दलाल नेताओं से। गरीबों के शोषण से। मगध पहचाना जा रहा है सामंती उत्पीड़न से। मगध की पहचान हो गयी है लाष पर राजनीति करने वाले सियासतदानों से। अपने में गौरवषाली अतीत समेटे मगध पहचाना जा रहा है नक्सल के नाम पर गोलियों की तड़तड़ाहट से। बमांे के धमाकों से। देषद्रोह और देषभक्तों के वैचारिक संघर्षों से।
अपने गौरवषाली इतिहास पर इतराता मगध एक लाख वर्ष पहले से जाना जा रहा है। बात चाहे ऋग्वेद या अर्थववेद की करें या फिर द्वापर के कृष्ण और त्रेता के राम की। हर युग में मगध की अपनी पहचान रही है। प्यार-मोहब्बत से दुनिया पर राज करने वाला मगध सिसक रहा है। कराह रहा है। अपनों से। सियासतदानों से। कानून के रखवालों से। संविधान के रक्षकों से। लोकतंत्र के नाम पर तांडव मचाने वाले सियासतदानों से। सामंती देषभक्तों से। कू्रर नौकरषाहों से। मगध के जिन इलाकांे में सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन का विषेष नक्सल विरोधी अभियान चल रहा है, उस मगध में बेजुबानों पर बहादुर बन रही है सीआरपीएफ। कहीं गांवों में एंटी नक्सल के नाम पर झोपड़ियां उजाड़ी जा रही है। किषोरियों के साथ दुष्कर्म हो रहे हैं। बुर्जुगों को पीटा जा रहा है। महिलाआंे को माओवादियों की पत्नी बताया जा रहा है तो संविधान और मानवता की दुहाई देने वाले नौजवानों को नक्सली कह कर जेलों में ठूंसा जा रहा है। अघोषित कफ्र्यू लागू है मगध के जंगली और पहाडी इलाकों में। हद तो यह कि नक्सल आॅपरेषन से लौटते वक्त जवान गांवों से मुर्गियां और बकरे अपने साथ उठा ला रहे हैं। कभी गांवों में पुलिस की लाल टोपी देखते ही जंगलों और पहाड़ों में दुबकने वाले ग्रामीण आजादी के 70 वर्षों के बाद भी सैंकड़ों की संख्या में सीआरपीएफ को देख पहाड़ों को अपना बसेरा बना रहे हैं तो ऐसे ग्रामीणों को कोबरा और पारा मिलिटी के जवान नक्सल कह गोलियों से भून रहे हैं।
क्या देष का गृह मंत्री यह बता सकता है कि मगध के किस गांव और किस जंगली इलाके से माओवादियों के किसी बड़े नेता की गिरफ्तारी हुई है? कब हुई? क्यों जंगलों में नहीं पकड़े जाते माओवादी चिंतक और कुख्यात माओवादी? जब माओवादी नेताआंे की गिरफ्तारी शहरों से हो रही है तो फिर क्यों माओवादियों के नाम पर जंगलों और पहाड़ों में खाक छान रही है पुलिस। अपनी बंदूकों से किसे डराना चाह रही है सीआरपीएफ? सवाल यह भी कि किस नेटवर्क से हथियारों का जखीरा पहुंच रहा है माओवादियों के पास। क्या 50 सालों के नक्सल विरोधी अभियान मंे यह बताने का साहस आला अधिकारी करेंगे कि किन रास्तों से असमाजित तत्वों तक पहंुच रहा है कारतूस, गोला-बारूद, डायना माइट और हथियारों का जखीरा? आखिर इन सवालों पर क्यों चूप्पी साध लेते हैं एंटी नक्सल आॅपरेषन में लगे अधिकारी और सियासतदान? आष्चर्य तो यह भी अब माओवादियों के पास राॅकेट लांचर तक की उपलब्धता बतायी जा रही है तो फिर सवाल है कि अािखर सरकार का खुफिया तंत्र कर क्या रहा है? क्यों नहीं खुफिया अधिकारियों को जानकारी हो पाती है माओवादी गतिविधियों की? इस चूक की वजह से आम लोग तो परेषान हैं ही। अर्द्ध सैनिक बलों के जवान भी मलेरिया जैसी भयंकर बीमारी से परेषान हो रहे हैं। कई जवानों की मौत मलेरिया से हो चुकी है।
सवाल कई हो सकते हैं। इस सबके बीच, जहां तक मुझे जानकारी है। माओवादी वर्ग-संघर्ष की राजनीति करते हैं। माओवादियों के सिद्धांत में एक वर्ग शोषकों का है तो दूसरा शासकों का। माओवादी मानते हैं कि दूसरा वर्ग गरीबों का दुष्मन है। कानून को अपने तरीके से चलाता है। संविधान को रौंदता है। देष में दिनोंदिन चैड़ी होती जा रही आर्थिक विषमता की खाई का हवाला देते हुए माओवादी कहते हैं कि देष की 90 फीसद अकूत संपत्ति पर एक फीसद लोगों का कब्जा है और यही एक फीसद लोगों की अर्थव्यवस्था 99 फीसद लोगों पर थोपी जा रही है। एक माओवादी चिंतक ने बताया कि पूंजीपतियों की रखैल बन चुके सियासतदान कहीं विषमता की खाई में देष को ही न डूबो दें!
बहरहाल, सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन पुलिसिया आंकडें बताते हैं कि देष में माओवादियों के एकाध-दो नेता को छोड़ किसी भी बड़े माओवादी की गिरफ्तारी जंगलों-पहाड़ों से नहीं हुई है। बात चाहे आॅक्सफोर्ड में रीडर रह चुके माओवादी प्रो कोबार्ड गांधी की हो या फिर तमिल साहित्य के बड़े जानकार व पोलित ब्यूरो सदस्य सुधाकर रेड्डी की। माओवादी प्रमोद मिश्रा की हो या फिर विजय कुमार आर्य, सुषील राय, नारायण सान्याल, शीला दीदी, पुलेंदू शेखर मुखर्जी, वाराणासी सुबह्णयम समेत दूसरे माओवादी चिंतकों की।
इस सबके बीच, एंटी नक्सल आॅपरेषन में लगे जवानों और अधिकारियों के अपने तरीके हैं। लेकिन क्या सरकार का कोई आला अधिकारी बता सकता है कि मगध के औरंगाबाद स्थित मदनपुर ब्लाॅक के पचरूखिया और लंगुआही समेत आस-पड़ोस के आधा दर्जन ग्रामीणों का क्या गुनाह है जिसकी वजह से सैंकड़ों लोग गांवों से पलायन कर चुके हैं। इन गांवों में रह रही हैं तो सिर्फ बूढ़ी महिलाएं। लाचार बुर्जुग। बिना दूध देने वाली कुछ गाय और भैंस। मुसहरों के जीविकोपार्जन का असली ताकत सुअर। औरंगाबाद के पत्रकार गणेष कुमार ने बताया कि पचरूखिया और लंगुआही समेत उस इलाके में जाने के कोई सीधे रास्ते नहीं हैं। एक बार पत्रकारों की टोली वायु सेना के हेलीकाॅप्टर से उस दुर्गम गांव में पहुंची थी। दुखद लेकिन रोमांचकारी आपबीती सुनाई गणेष कुमार ने। बतौर गणेष कुमार-इलाके को देखने से नहीं लगता यह मगध का कोई गांव है। लोगों के बदन पर कपड़े नहीं हैं। गांवों में घरों के नाम पर झोपड़ियां हैं। पहुंचने के रास्ते नहीं हैं। घरों में खाने को समुचित अन्न नहीं हैं। लोग आज भी पीने के पानी पाॅच किलोमीटर दूर गैलन में भरकर लाते हैं। लोगों की सूखी अंतड़िया हैं। शरीर की बनावट ऐसी मानों कंकाल हो।
इस सबके बीच, आजादी के 70 वर्षों के बाद भी इस इलाके में न तो पीडीएस सिस्टम का नामोनिषान है और न ही पीने के पानी मयस्सर है। स्कूल और अस्पताल अबतक ग्रामीण नहीं देख पाये हैं। गरीबों के लिये सरकारी योजनाएं होती क्या है? इसकी भनक लोग नहीं जानते।
आष्चर्य तो यह कि पिछले करीब 26 वर्षों से सूबे में सामाजिक न्याय की सरकार है। इस सरकार के रहते लगातार इलाके से नक्सल के नाम पर हो रहे इंतहां जुर्म से आजीज आ चुके ग्रामीणों का होता पलायन यह बताने के लिये काफी है कि सामाजिक न्याय औरंगाबाद के पंचरूखिया, लंगुआही, गया के रजौल, फुलवरिया डैम के अंदर बसे दर्जनों गांव, इमामगंज, बांकेबाजार, मोहनपुर, नवादा ककोलत, कौआकोल समेत अन्य पहड़तली इलाके में रह रहे मुसहर, भोक्ता समेत अन्य दलितों, पिछड़े समुदायांे के लिये जुमला के सिवा कुछ नहीं है।

Thursday, July 23, 2009

"सुशासन' में कहां से "दु:शासन?'

हिन्दुओं में यह कथा प्रचलित है कि अगर समाज में दु:शासन बनकर कोई द्रोपदी का चीरहरण करना चाहेगा तो कृष्ण बनकर कोई उसकी लाज भी बचाने अवश्य ही आयेगा, लेकिन यह क्या? बिहार में सुशासन की बात करने वाली नीतीश सरकार में ही राजधानी पटना में 23 जुलाई को एक लड़की का सरेआम चीरहरण होते रहा और कानून के रखवाले तमाशबीन बने सबकुछ देखते रहे। 25 वर्षीया वह लड़की राजधानी के व्यस्त इलाकों में से एक एक्जीविशन रोड में करीब एक घंटे तक चीखती रही, चिल्लाती रही, न्याय की भीख मांगती रही। आतताइयों से बचाने की गुहार लगाती रही। बावजूद इसके इंसानियत को तार-तार कर देने वाली इस घटना पर किसी की संवेदना नहीं जागी। आखिर जागती भी तो कैसे? लड़कियां या महिलाएं जो उपभोग की वस्तु समझी जाती हैं। सभ्य समाज, आधुनिकता और खुलेपन की वकालत करने वाले सैकड़ों लोग पूरी घटना के गवाह बने रहे। फिर भी मौन स्वीकारोक्ति। आखिर क्यों? क्या वे भूल गये कि झारखंड की यह इकलौती बेटी नहीं है जो अपने घर से अकेले ही रोजी-रोगजार की तलाश में निकली है? ग्लोबल दुनिया में लाखों लड़कियां प्रतिदिन रोजगार की तलाश में घरों से बाहर जा रही हैं। महानगरों में अकेली रह रही हैं। तो फिर इस लड़की का गुनाह क्या था? यही न कि उसने किसी पर विश्वास करके घर से अकेली ही बाहर निकली थी। क्या आज के समाज में किसी पर विश्वास करना गुनाह हो गया है? इन सारे प्रश्नों का जवाब सरकार के साथ ही सभ्य समाज के लोगों को देना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं, जब मनचलों की हरकतों से देश और दुनिया की सारी गलियां, सड़कें और चौक-चौराहे तबाह हो जायेंगे।
और फिर कानून के रखवाले पुलिस...।
अपनी नाकामी को छुपाने के लिए एक से एक मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने लगी। इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिये जब पूरा देख इस घटना का गवाह बना तो भी करीब दो घंटों बाद पुलिस की नींद खुली। उसमें भी ट्रैफिक पुलिस की। घंटों ड्यूटी से गायब रहे पेट्रोलिंग दारोगा शिवनाथ सिंह। मामले की गंभीरता को देखते हुए दारोगा को निलंबित कर दिया गया है। फिर भी इस घटना की जवाबदेही से नहीं बच सकती। आइपीएस अधिकारी एडीजी नीलमणि के बयान और भी चौकाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि लड़की देह व्यापार के धंधे में लिप्त थी। क्या नीलमणि को किसी ने इस तरह के संवेदनहीन बयान देने के लिए बाध्य किया था? क्या सरकार की यह जिम्मेवारी नहीं बनती है कि राजधानी समेत अन्य जगहों पर चोरी छिपे चल रहे देह व्यापार के अड्डे को बंद कराया जाये? आखिर तबतक दूसरे की इज्जत से खिलवाड़ करती रहेगी बिहार पुलिस। क्या नीलमणि कभी बिहार पुलिस के गिरेबां में झांकने की कोशिश किये हैं। ठीक है थोड़े समय के लिए नीलमणि की बातों पर विश्वास भी कर लिया जाये तो भी क्या देह व्यापार करने वाली लड़कियों से पेश आने का यही तरीका है? पुलिस प्रवक्ता होने के नाते आखिर वे क्यों भूल जाते हैं कि सुशासन की सरकार के करीब चार वर्षों में ही सूबे में करीब तीन हजार महिलाओं के अस्मत के साथ खिलवाड़ किया है मनचलों ने। फिर वे किस कानून का हवाला देकर कहते हैं झारखंड की यह लड़की देह व्यापार करती थी। क्या सरकार के पास मजबूरीवश देह व्यापार करने वाली लड़कियों को इस दलदल से निकालने की कोई योजना है? अगर है तो फिर क्यों नहीं, वैसी लड़कियों को इस धंधे से मुक्त कराने के प्रयास किये जा रहे हैं। देर-सबेर इसका जवाब सरकार को देना ही पड़ेगा।

Wednesday, July 15, 2009

भारतीय मीडिया का दोरंगा चरित्र क्यों?

क्या हो गया है भारतीय मीडिया को? इंडिया और भारत के बीच बंटा हिन्दुस्तान आखिर तबतक इस विभाजन के कड़वाहट से रूबरू होता रहेगा? आखिर अपने-आप को चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया तब जागेगा? आखिर तब असली भारत की तस्वीर से देश और दुनिया को अवगत करायेगा? लाख टके का सवाल यह है कि नक्सली गूंज की धधक को शेयर मार्केट और संसद के गलियारे में गंभीरता से कब रखा जायेगा? आखिर क्यों नहीं मीडिया को 12 जुलाई को छत्तीसगढ के राजनांदगांव में नक्सलियों की घात में मारे गये पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे समेत 39 सुरक्षा बलों की शहादत याद आयी? इसका जवाब न तो मीडिया घरानों के पास है और ही सियासतदानों की संजीदगी ऐसी घटनाओं पर होती है।
भारतीय मीडिया का चरित्र जानने के लिए सिर्फ चार उदाहरण ही काफी है। एक तो अभी की ताजातरीन छत्तीसगढ की घटना है, जिसमें एक आइपीएस अधिकारी समेत 39 पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवान मारे गये। दूसरी घटना है बरसात के पानी से मुंबई का डूबना। तीसरी घटना भी मुंबई की है, जहां बीते वर्ष आतंकवादियों ने ताज होटल में घुसकर कहर बरपाया था। और चौथी है दिल्ली उच्च न्यायालय का वह फैसला जिसमें समलैंगिक लोगों को कानूनी मान्यता की बात है। यह फैसला प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सप्ताह भर तक छाया रहा। देश में नई बहस शुरू हो गयी। हर साल की भांति इस साल भी मुंबई बरसात के पानी में डूबा। यह खबर भी कई दिनों तक सुर्खियों में बना रहा और दो आपराधिक घटनाएं...
चारों घटनाओं को भारतीय मीडिया ने अपने नजरिये से देखा। हमारी समझ में मीडिया के कुछ सामाजिक सरोकार भी हैं, लेकिन इन घटनाआंें में भारतीय मीडिया पूरी तरह से सामाजिक सरोकार को भूलकर अपने सरोकार से देश को देखा। जब मैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर कर रहा था तब पढाया गया था कि मीडिया सदा ही कमजोर पक्ष के साथ खड़ा रहा है लेकिन आज का भारतीय मीडिया...
छत्तीसगढ में अर्द्धसैनिक बलों के जवान नक्सलियों से लोहा ले रहे थे उस वक्त इलेक्ट्रानिक चैनल अपनी ही धून में खबरों को प्रसारित करने में मशगूल थे। शाम होते ही राष्ट्रीय चैनल "राखी का स्वयंवर' और सलमान खान का "दस का दम' दिखाने में व्यस्त दिखे। अबतक की देश की सबसे बड़ी नक्सली वारदात (नरसंहार) के बावजूद आखिर सीआरपीएफ के जवानों की शहादत को उस रूप में क्यों नहीं याद किया गया जिस रूप में ताज हमलों में शहीद हुए एटीएस प्रमुख करकरे, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर और एसीपी काम्टे को याद किया गया? आश्चर्य तो यह कि किसी भी फिल्मी हस्ती और खिलाड़ियों को विदेश में पुरस्कार जीतते ही बधाई पत्र जारी करने वाला राष्ट्रपति भवन भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए शहीद हुए इन जवानों पर श्रद्धा के एक शब्द भी कहना मुनासिब नहीं समझा, आखिर क्यों? वह भी तब, जबकि नक्सली हमले में मारे गये एसपी विनोद कुमार चौबे को कभी यही राष्ट्रपति भवन बहादुरी का पुरस्कार दिया था।
कहा जा सकता है कि मुंबई महानगर है। देश की आर्थिक राजधानी है। यहां सैलानियों का जमावड़ा है और...
छत्तीसगढ...। यह ग्रामीण भारत है, जिसकी खुबसूरती कभी महात्मा गांधी देखा करते थे। आजादी के 60 वर्षों में गांवों की खुबसूरती को सियासतदानों ने पैरों तले रौंद दिया। शायद यही कारण है कि भारतीय मीडिया भी सियासतदानों की बहुरंगी चाल में फंसती चली जा रही है, जहां मुंबई और दिल्ली की चकाचौंध तो दिखाती देती है लेकिन गांवों की...
उन दिनों घटी देश की प्रमुख घटनाओं में से एक है दिल्ली में मेट्रो पुल गिरने से छह लोगों की मौत। लगातार दो दिनों तक यह खबर न्यूज चैनलों के टीवी स्क्रीन पर चलती रही। इसी दौरान इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के बीच एशेज का पहला टेस्ट ड्रॉ होने का विश्लेषण विशेषज्ञों द्वारा करवाया जा रहा है। "राखी का स्वयंवर' और सलमान खान के टीवी शो "कंगना रानौत की' उपस्थिति और हॉलीवुड में मल्लिका शेरावत की धूम और न जाने क्या-क्या..., उस वक्त टीवी चैनलों की सुर्खियां थे जबकि छत्तीसगढ में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में मारे गये सुरक्षाकर्मी सिर्फ और सिर्फ चलताउ खबर।
सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह कि पूरे मामले पर देश का सियासतदान मौन है। इससे भी बड़ा आश्चर्य यह कि जिस दिन नक्सलियों की बंदूकें राजनांदगांव में गरज रही थी उसी दिन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी-8 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए दिल्ली से उड़ान भर गये। फिर रक्षा मंत्री और गृह मंत्री भी मौन। सदा की तरह राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील भी चुप रहना ही मुनासिब समझी। आखिर क्यों? इसलिये की नक्सली ग्रामीण भारत को लहुलूहान कर रहे थे?
60 साल के लोकतंत्र में क्या यह हास्यास्पद बात नहीं है कि मेनका गांधी का इकलौता वारिस वरूण गांधी हिन्दुत्ववादी राजनीति से प्रेरित होकर एक समुदाय विशेष (मुसलमान) के खिलाफ नफरत की आग उगलता है। उसके बाद मीडिया उसे हाथोंहाथ ले लेता है। जनता उसे लोकसभा सदस्य चुनती है और वह सांसद हो जाता है। तथाकथित सुरक्षा के मद्देनजर जेड श्रेणी सुरक्षा की मांग भी कर बैठता है। वहीं महाराष्ट्र का एक ऐसा भी नेता है जो भारतीय संप्रभुता पर चोट करते हुए दो प्रांतों के बीच नफरत फैलाकर राजनीति की दुकानदारी चलाना चाहता है। ये दोनों को मुंह खोलने भर की देरी है। इलेक्ट्रानिक चैनल इसे एक-एक क्षण का लाइव प्रसारण करने लगते हैं।
मुंबई घटना की लाइव रिपोर्टिंग करने का दु:साहस दिखलाने वाले किसी पत्रकार ने मदनवाडा और सीतापुर गांव में नक्सलियों से घिरे 200 जवानों और एसपी की बहादुरी और नक्सलियों के तेवर के दिखलाने का साहस आखिर किसी ने क्यों नहीं किया? खबर है कि नक्सलियों के चंगुल में फंस चुके जवान बराबर अपने मोबाइल और वॉकी टॉकी से अपने वरीय अधिकारियों के साथ ही मीडियाकर्मियों को पल-पल की सूचना दे रहे थे। एक बजे तक मोहला थाना प्रभारी विनोद धु्रव और एएसआइ कोमल साहू समेत करीब 21 जवान शहीद हो चुके थे। शाम होते-होते यह संख्या 30 तक हो गयी और देर शाम होते ही यह आंकड़ा 39 तक हो गयी।
प्रिंट मीडिया के पत्रकारों से मिली जानकारी के अनुसार, सुबह में ही खबर मिल गयी थी कि मानपुर इलाके के मदनवाड़ा, सीतापुर समेत पांच गांवों में नक्सलियों ने डेरा जमा लिया है। लेकिन न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार ही इस संगीन और गंभीर मुद्दे पर अपनी सक्रियता दिखलायी। सरकार के साथ ही मीडिया के लिए भी शायद राष्ट्रपति पदक से सम्मानित एक आइपीएस अधिकारी और 39 जवानों की मौत देश को हिला देने वाली खबर नहीं है और न ही इस खबर पर विज्ञापन का कारोबार ही होने वाला है। बाजारवाद के आगे सबकुछ दाव पर लगा देने वाला मीडिया आखिर चिख-चिल्लाकर कुछ बोलता भी तो क्यों? इसका जवाब कौन देगा? लहुलूहान हो रहे रहे लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेवारी सरकार के साथ ही मीडिया को भी है, आखिर कब जागेगा भारतीय मीडिया।
 
 

Thursday, July 9, 2009

पर्दे के पीछे सियासी खेल

झारखंड में दाग़ी पूर्व मंत्रिओं की गिरफ्तारी के मुद्दे पर चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है। कांग्रेस की कुचालों से यूपीए में ऊहापोह की िस्थति उत्पन्न हो गयी है।
झारखंड के दो पूर्व मंत्रिओं एनोस एक्का और हरिनारायण राय के खिलाफ निगरानी अदालत द्वारा जारी वारंट की तामील को लेकर इन दिनों खूब राजनीतिक जोर-आजमाइश चल रही है। सुरक्षा में लगी पुलिस भी इन दोनों के साथ कहां गायब है, इसका पता सरकार नहीं कर सकी है। इस खेल का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि कांग्रेस की खुटचाल ने राज्य में न केवल राजनीतिक अनिश्चिन्तता की िस्थति उत्पन्न कर दी है, बिल्क एक साथ यूपीए के पूरे कुनबे को चकरा कर रख दिया है।
यूपीए में शामिल अन्य दलों और विधायकों को तो उसी समय ऐसी चाल का आभास हो जाना चाहिए था जब कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के समय अपनी शर्तें रखी थीं। चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी धीरज साहू की जीत पक्की करके पर्दे के पीछे से ही सही, कांग्रेस अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गयी है। महीनों से चल रहे सियासी उथल-पुथल के बीच पहले तो कांग्रेस ने दो जुलाई को राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ा दी और फिर चुप्पी साध ली। राजधानी रांची में राजनीतिक हलचल तब तेज हो गयी, जब उसी दिन पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा समेत तीन निर्दलीय विधायकों कमलेश सिंह, भानुप्रपात शाही और बंधु तिर्की पर निगरानी विभाग में एक मुकदमा दर्ज हुआ। इन विधायकों पर आय से अधिक सम्पत्ति रखने, पद के दुरुपयोग और अवैध तरीके से विदेश यात्रा करने समेत कई आरोप हैं। पूरे मामले का दिलचस्प पहलू यह है कि उन्हीं विधायकों पर निगरानी का शिकंजा कसा है, जिन्होंने पर्दे के पीछे से राष्ट्रपति शासन का विरोध किया था या जो यूपीए के बैनर तले सरकार बनाने के लिए अधिक सक्रिय दिखे थे।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और निर्दलीय सांसद इंदरसिंह नामधारी "द पब्लिक एजेंडा' से कहा, "यह कैसी विडंबना है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री समेत छह मंत्रिओं पर निगरानी का मुकदमा दर्ज है। इनमें से दो पहले से ही फरार चल रहे हैं। आठ विधानसभा सीटें खाली हैं। सदन की बैठक को हुए छह महीने से अधिक समय हो गये है। ऐसी िस्थति में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाना यह संकेत देना है कि कांग्रेस ने अब भी सरकार बनाने का लालच नहीं छोड़ा है।'
राजनीतिक विश्र्लेषकों का मानना है कि राजनीतिक दांव-पेंच में कांग्रेस माहिर रही है। पार्टी वर्षों तक कुछ इसी तरह की राजनीतिक चाल बिहार और उत्तर प्रदेश में चलती रही, जिसका खामियाजा उन राज्यों में अभी तक उसे भुगतना पड़ रहा है। लेकिन कांग्रेस नेता मनोज यादव कहते हैं, "पार्टी कोई चाल नहीं चल रही है, बिल्क सही तरीके से हालात का जायजा ले रही है।'
प्रदेश में लूट की संस्कृति बिहार से होते हुए यहां आयी है। शायद देश का यह इकलौता प्रदेश है, जहां बात-बात पर सौदेबाजी होती है। वैसे राजनीतिक गलियारे में इस बात पर भी बहस छिड़ी है कि कांग्रेस राज्यसभा चुनाव के समय हुई सौदेबाजी का एक-एक कर सारे विधायकों से बदला लेना चाहती है। यही कारण है कि पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा समेत अन्य मंत्रियों पर निगरानी का कसता शिकंजा राजनीति षड्यंत्र मानी जा रही है। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भानुप्रताप शाही का कहना है, "निर्दलीय विधायक राजनीतिक षड्‌यंत्र के शिकार हो रहे हैं। अगर हम पर लगे आरोप सही हैं तो फिर सरकार क्यों नहीं स्वास्थ्य विभाग में हुई बहालियों की जांच करवा ले रही है।' वहीं मानव संसाधन मंत्री बंधु तिर्की ने कहा, "निर्दलीय के साथ-साथ आदिवासी होना भी इस राज्य में गुनाह हो गया है। गांवों में पुलिस आदिवासियों को नक्सली बताकर गिरफ्तार करती है तो राजनीति में सक्रिय आदिवासियों को अनर्गल आरोपों में फंसाया जा रहा है।' सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन इस बात बहस तेज हो गयी है कि अधिकारी राजनीतिक आकाओं के इशारे पर कार्रवाई कर रहे हैं। यही कारण है कि कई दिनों से फरार चल रहे दोनों मंत्रियों एनोस एक्का और हरि नारायण राय के संदिग्ध ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की गयी। फिर भी ये दोनों पुलिस की पहुंच से अभी तक दूर हैं।
राजनीतिक प्रयोगशाला बन चुके झारखंड में सब कुछ नया होता है, सो इन दोनों की फरारी भी नये तरीके से हुई है। दोनों अपने सरकारी बॉडीगार्ड के साथ फरार हैं। इन दोनों विधायकों पर इसी वर्ष जनवरी में मुकदमा दर्ज हुआ था। उस समय से निगरानी सुस्त रही। फिर आखिर ऐसा क्या हो गया, जिसकी वजह से सक्रियता बढ़ गयी। निगरानी विभाग के डीजी नेयाज अहमद का कहना है, "पुलिस किसी के दबाव में काम नहीं कर रही है। अधिकारी इन दोनों पर लगे आरोपों के साक्ष्य जुटाने में लगे हुए थे।'
झारखंड की 82 सदस्यीय विधानसभा में राजनीतिक जोड़तोड़ शुरू से ही होता रहा है। आंकड़ों के खेल में आदिवासी अस्मिता तार-तार होती रही। पहली विधानसभा ने तो किसी तरह अपना कार्यकाल पूरा कर लिया, लेकिन दूसरी विधानसभा में खूब अटकलें लगीं। चौदहवी लोकसभा में परमाणु करार पर केंद्र सरकार को समर्थन देने का तत्काल फायदा दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मिला। वे कांग्रेस के सहयोग से दूसरी बार सत्तासीन हुए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सौदेबाजी का बदला कांग्रेस लेने ही वाली थी कि तमाड़ विधानसभा उपचुनाव में शिबू सोरेन की हार हो गयी। फिर क्या था, झामुमो की मजबूरी समझ कर कांग्रेस ने पलटा मारा। अब पर्दे के पीछे से कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव की व्यूह रचना कर रही है।

दागदार हुआ सुशासन

पिछले एक महीने में ही दो इंजीनियर, 16 व्यवसायी समेत 125 लोग मारे गये हैं, जो सुशासन के दावों की पोल खोल रही है।

लोकसभा चुनाव खत्म होते ही बिहार में माफिया राज की वापसी के संकेत मिलने शुरू हो गये हैं। प्रदेश अभियंता संघ नवादा में पदस्थापित कन्नीय अभियंता अरुण कुमार की हत्या को भूला भी नहीं था कि 18 जून को सीतामढ़ी में पदस्थापित कार्यपालक अभियंता योगेंद्र पांडेय की रहस्यमयी परिस्थिति में जिला समाहरणालय परिसर में लाश मिलने से सनसनी फैल गयी। इसके कुछ दिन पहले बिल्डर सत्येंद्र सिंह सत्ता संरक्षित अपराधियों के शिकार हुए। स्पीडी ट्रायल चलाकर अपराधियों को फटाफट सजा दिलवाने का दावा करने वाली नीतीश कुमार की सरकार में सत्येंद्र सिंह हत्याकांड के आरोपी पूर्व सांसद और जदयू नेता विजय कृष्ण अपने बेटे चाणक्य संग फरार चल रहे हैं। इस बाबत पूछते ही डीजीपी डीएन गौतम भड़क गये और उन्होंने कहा, "पुलिस कोई ठेकेदार नहीं, जो तुरंत अपराध नियंत्रण करने का ठेका ले ले। विजय कृष्ण किसी के पॉकेट में नहीं हैं जिन्हें वहां से निकालकर सबके सामने ला दिया जाये।'
एक महीने में ही यह चर्चित हत्याओं का तीसरा मामला है, तो क्या इसे शुरुआत मान लिया जाये? संकेत तो कुछ इसी तरह के मिल रहे हैं। बीते महीने मारे गये ट्रांसपोर्टर संतोष टेकरीवाल के हत्यारों तक पुलिस पहुंच भी नहीं पायी थी कि अपराधियों ने अररिया के लोक अभियोजक देवनारायण मिश्र को गोली मार दी। जबकि स्व.मिश्र कई दफा सुरक्षा की गुहार लगा चुके थे। लोकसभा चुनाव में मिले अपार जनसमर्थन से फूले नहीं समा रही नीतीश कुमार के राज में पिछले एक महीने में ही 16 व्यवसायियों समेत 125 लोग मारे गये हैं।
ये कुछ घटनायें बताती हैं कि प्रदेश में शासन चाहे जिस किसी भी पार्टी की क्यों न हो, ईमानदारी और कतर्व्यनिष्टा से काम करने का खामियाजा अधिकारियों समेत आमलोगों को भुगतना ही पड़ेगा। रंगदारों की दबंगई और ठेका माफियाओं का रुतबा नीतीश राज में भी कायम है। उनकी दबंगई का आलम यह है कि बाढ़ स्थित नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनटीपीसी), जहां प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का निविदाएं निकलती हैं, में सत्ताधारी दल के एक स्थानीय विधायक की इजाजत के बिना पत्ता तक नहीं खड़कता। जेल से फरार चल रहे कई संगीन आरोपों के अभियुक्त विवेका पहलवान अपने गुप्त ठिकाने से माफिया राज चला रहा है तो बेउर जेल में बंद कुख्यात अपराधी बिंदू सिंह का दहशत झारखंड तक बरकरार है। हाल ही में झारखंड पुलिस ने बिंदू सिंह को रिमांड लेकर कड़ी पूछताछ की तो कई संगीन मामलों का खुलासा हुआ। लोकसभा चुनाव में हार के बाद से अधिकतर बाहुबली पर्दे के पीछे से ठेका राज चला रहे हैं। खबर तो यह भी है राजद शासनकाल में दर्जनों हत्या, लूट और अपहरणकांडों के अभियुक्त रीतलाल यादव ने भी पर्दे के पीछे से सत्ताधारी दल के एक विधायक के शह पर दानापुर स्थित डीआरएम कार्यालय में अपना सिक्का जमा लिया है। पूर्व सांसद सूरजभान, प्रभुनाथ सिंह और जदयू विधायक अनंत सिंह समेत ऐसे कई बाहुबली हैं जो गाहे-बगाहे ठेकेदारी के पेशे में अपना दबदबा जमाये हुए हैं और मनमानी वसूली के धंधे में लिप्त हैं। आश्चर्य तो यह कि निविदा कानून का उल्लंघन करने वाले इन बाहुबलियों के कारनामों से सियासी गलियारा अंजान नहीं है। सत्ता संरक्षित अपराध का ऐसा गठजोड़ बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा दूसरे अन्य प्रदेशों में शायद ही देखने को मिलता है।
बिहार में ठेकेदारी को लेकर हिंसा कोई नयी बात नहीं है। पटना के पुनाईचक स्थित सीपीडब्ल्यूडी कार्यालय के बाहर लालू-राबड़ी शासनकाल में बंदूकें गरजा करती थीं। अनिसाबाद स्थित सिंचाई भवन परिसर भी कई दफा बमों के धमाके और गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजा था। उस दौरान 60 इंजीनियरों की हत्याएं सत्ता संरक्षित अपराधियों ने कर दी थी। नीतीश कुमार के शुरुआती शासनकाल में इसपर लगाम लगा था लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरीके से अपराधियों और असामाजिक तत्वों का ग्राफ बढ़ना शुरू हुआ है उससे सुशासन का दावा सवालों के घेरे में आ गया है।
बीते साल औरंगाबाद के कार्यपालक अभियंता अमावस्या राम की मौत हृदयाघात से हो गयी। इस पर भी बवाल मचा। महीनों तक चर्चा का बाजार गर्म रहा कि एक दबंग ठेकेदार के दबाव में आकर विभागीय सचिव ने इंजीनियर को ऐसी डांट पिलाई की उनकी मौत हो गयी। लालू-राबड़ी शासन काल में आइआइटी इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या का मामला आज भी प्रदेश के लोगों के दिलो-दिमाग में है। हालांकि जांच रिपोर्ट में उनकी हत्या लूट-पाट के उद्देश्य की गयी बताया गया है।
इंजीनियर योगेंद्र पांडेय की मौत, एक ही साथ कई सवाल छोड़ गया है। जिला प्रशासन के पास इस बात का जवाब नहीं है कि दो महीने में ही पांच बार लिखित रूप से सुरक्षा की गुहार लगाने के बावजूद कार्यपालक अभियंता की जान-माल की हिफाजत क्यों नहीं की जा सकी? लगातार मिल रही धमकियों की लिखित रूप से शिकायत करने के बावजूद विभागीय अधिकारी (सचिव) आरके सिंह क्यों मौन रहे? जातीय राजनीति का अखाड़ा रहा बिहार इस मामले को भी जातीय चश्मे से देख रहा है। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक अभियंता ने कहा, "विभागीय सचिव, एसपी और ठेकेदार (जिससे विवाद चल रहा था) सभी एक जाति विशेष से आते हैं। इसलिये मामले को रफा-दफा करने की पूरी तैयारी चल रही है।' बिहार अभियंत्रण सेवा संघ के महासचिव राजेश्वर मिश्र ने "द पब्लिक एजेंडा' को बताया, "स्व. पांडेय अगर 2 जून को सड़क निर्माण में घटिया सामग्री (मेटल) लगाने वाली वत्स कंस्ट्रक्शन कंपनी को काली सूची में नहीं डालते तो संभव था कि 6 जून को पुलिस अधीक्षक क्षत्रनील सिंह की मौजूदगी में उनके आवासीय कार्यालय पर हमला नहीं हुआ होता और न ही 18 जून को जिला परिसर में उनकी लाश मिलती।' काली सूची में डाली गयी वत्स कंस्ट्रक्शन कंपनी के निदेशक किशोर सिंह हैं जो पूर्व सांसद धनराज सिंह के दामाद बताये जाते हैं। उनके करीबी दोस्त विवेक सिंह और राजीव सिंह हैं। सीबीआइ इन तीनों को संदिग्ध मान रही है। 15 सदस्यीय जांच टीम का नेतृत्व कर रहे सीबीआइ के संयुक्त निदेशक एसपी सिंह से पूछने पर सिर्फ इतना ही कहा, "प्लीज, इस संबंध में कुछ मत पूछिये। काम करने दीजिये। जल्द ही सबकुछ सामने आ जायेगा।'
इस मामले में एक ही साथ शक की सूई कई ओर घुमती है। सवाल है कि परसौनी के बीडीओ की गाड़ी से उनका शव अस्पताल पहुंचाया गया, तो फिर लावारिस स्थिति में लाश को छोड़कर विभागीय चालक फरार क्यों हो गया? उस समय स्वयं बीडीओ कहां थे? आखिर क्यों लाश को पहले देखने वाले अपर समाहर्त्ता (एडीएम) शैलेन्द्रनाथ चौधरी, उनका चालक विश्वनाथ कापर और सरकारी सुरक्षा गार्ड एक ही साथ संवेदनहीन हो गये? एक जिम्मेवार अधिकारी होने के बावजूद श्री चौधरी ने अपना मुंह बंद रखना क्यों मुनासिब समझा? ये कुछ सवाल हैं जिसका हल ढूंढ़े बिना सही नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। इस बाबत पथ निर्माण मंत्री डॉ प्रेम कुमार ने "द पब्लिक एजेंडा' को गोलमटोल जवाब दिया, "विभाग में किसी की मनमानी नहीं चलने दी जायेगी। दोषियों को सजा होगी। डा। योगेंद्र पांडेय की कुर्बानी ठेकेदारी के पेशे में फैले भ्रष्टाचार को खत्म करने में सहायक सिद्ध होगा।' वहीं विपक्ष इस तर्क को सिरे से खारिज कर रहा है। लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के अनुसार, "योगेंद्र पांडेय ठेकेदारी के पेशे में फैले भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गये।' प्रदेश की लगातार गिरती जा रही कानून-व्यवस्था सुशासन को दागदार कर रही है।
 

Tuesday, June 30, 2009

भ्रांति में फंसी क्रांति

माओवादियों के तेवर और क्रांति के वाम भटकाव के कारण हिंसक संघर्ष की घटनाओं ने सामाजिक-राजनीतिक तनाव को चरम पर ला दिया है।
"लालकिले की धरती को लाल बनाके छोड़ेंगे, पूरे हिंदुस्तान को नक्सलाइट बनाके छोड़ेंगे।'

लालकिले के सामने 15 अगस्त 2001 को जब प्रधानमंत्री देश को संबोधित करने वाले थे, उसके कुछ ही मिनट पहले ही इस नारे की गूंज सुनी गयी थी। नारा लगाने वाले अति वामपंथी छात्र संगठन डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन (डीएसयू) के सदस्य थे। इन छात्रों में से 15 को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया था। उस समय इस नारे के निहितार्थ को समझना आम लोगों के लिए थोड़ा कठिन था, लेकिन आज जब पश्चिम बंगाल का लालगढ़ इलाका माओवादियों की गर्जना से दहल रहा है, अब इस नारे की हकीकत समझ में आ रही है। हालांकि माओवादियों के लिए लालगढ़ पड़ाव है, ठहराव नहीं। ठहराव की खोज में माओवादी देश के 45 फीसदी भू-भाग पर पहुंच चुके हैं। 30 फीसदी जमीन माओवादियों के कब्जे में बतायी जाती है, जहां उनकी अपनी हुकूमत चलती है। नक्सलबाड़ी विद्रोह के समय से ही चीनी कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग को अपना आदर्श मानने वाले नक्सलियों की भाषा ही बंदूक मानी जाती है। लेकिन अचानक माओवादियों की जमात 15वीं लोकसभा चुनाव अभियान के समय से कुछ ज्यादा ही हिंसक हो गयी है। दरअसल बिहार के मैदानी इलाके आंध्र प्रदेश में नक्सलियों के रॉबिनहुड स्टाइल का जनता ने विरोध किया है। माओवादियों को करारा झटका तब लगा जब पांच लाख के इनामी जोनल कमांडर कामेश्र्वर बैठा और दिनकर यादव ने संसदीय रास्ता अख्तियार कर लिया। दूसरी ओर, आंध्र प्रदेश के राज्य सचिव ने इसी वर्ष मार्च में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
सरकार को नक्सलियों के नये हिंसक तेवर का आभास तो 14 अप्रैल को ही हो जाना चाहिए था, जब माओवादियों ने बिहार के कैमूर पहाड़ी पर बीएसएफ के एक अस्थायी कैंप पर रॉकेट लांचर हमला किया था। दिल्ली में बैठी सरकार तब से लेकर अब तक रणनीति बनाने में जुटी हुई है तो दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्से नक्सलियों के हिंसक तेवर से थर्रा रहे हैं। 10 जून को संसद में गृहमंत्री पी चिदंबरम नक्सलियों से निबटने के लिए विशेष योजना बनाने की घोषणा कर रहे थे, तो बिहार-झारखंड-उत्तरी ओड़िशा स्पेशल एरिया कमेटी की गुरिल्ला आर्मी झारखंड के पश्र्चिमी सिंहभूम स्थित सारूगढ़ा घाटी (सारंडा के जंगल) में बारूदी सुरंग विस्फोट कर एक इंस्पेक्टर समेत 11 जवानों को मौत की नींद सुला रही थी। सरकार कुछ समझ पाती, इसके पहले ही 12 जून को माओवादियों ने बोकारो के पास नवाडीह में अर्द्धसैनिक बलों पर हमला बोल दिया, जिसमें 11 जवान मारे गये। 18 जून को जब पुलिस के आला अधिकारी लालगढ़ को माओवादियों के कब्जे से मुक्त कराने के लिए अभियान छेड़ने की योजना बना रहे थे, माओवादी ओड़िशा के कोरापुट जिले के पालुर गांव के पास बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के नौ जवानों को उड़ा रहे थे। यह सिर्फ बानगी है। सच्चाई इससे भी भयावह है। खुद सरकार का मानना है कि 28 में से कम से कम 16 राज्यों के 210 जिले नक्सल प्रभावित हैं। सामाजिक कार्यकर्ता भी माओवादियों के इस तेवर से सकते में हैं। वहीं माओवादी पत्रिका "जन ज्वार के' संपादक त्रिवेणी सिंह ने "द पब्लिक एजेंडा' को बताया, "सामंतवाद से बड़ा दुश्मन बुर्जुवा पूंजीपति है, जिसकी रक्षा के लिए पुलिस और फौज है। माओवादियों को लग रहा है कि वर्तमान शोषण आधारित व्यवस्था को टिकाये रखने के लिए ही फौज और पुलिस है, इसलिए अर्द्धसैनिक बलों पर हमले तेज हो गये हैं।'
देश के ज्यादातर हिस्सों में किसी न किसी रूप में माओवादियों की मौजूदगी देखी जा सकती है। रेड कोरिडोर की पुरानी पड़ चुकी माओवादियों की योजना पर भाकपा (माओवादी) की नौवीं कांग्रेस में ही यह तय हो चुका था कि मुक्त क्षेत्र (लिबरेटेड जोन) बनाकर सरकार को चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके बाद नक्सली गुरिल्ला आधार पर क्षेत्र विस्तार में जुट गये। कभी ओड़िशा में सीआरपीएफ के जवान शहीद हो रहे हैं तो कभी महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों में माओवादी वारदातें हो रही हैं। फिलहाल सरकार नक्सलवादियों की आग को बुझाने के लिए बंदूक सहारा बना रही है। लेकिन सरकार को अपने पुराने अनुभवों से सीखने की जरूरत है। बंदूक का जवाब बंदूक से देने का ही नतीजा है कि दोनों (अर्द्धसैनिक बल और नक्सली) ओर से आक्रामकता और शत्रुता बढ़ती चली गयी।
भाकपा (माओवादी) के प्रवक्ता आजाद की मानें तो, "संसदीय रास्ते से समाज के गरीब तबके का विकास अगर संभव होता तो 60 साल के लोकतांत्रिक इतिहास में विकास की रोशनी से सुदूर ग्रामीण इलाका जगमगा उठता, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।' ग्रामीण विकास की योजनाएं सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ रही हैं। चाहे शिक्षित और संपन्न राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु हो या फिर बीमारू राज्यों में शुमार बिहार, झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश समेत अन्य राज्य, जमीनी स्तर के विकास का हाल हर जगह यही है। खुफिया सूत्रों की मानें तो हाल के दिनों में माओवादियों का फैलाव हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में भी हुआ है। लंबे समय से वाम सोच द्वारा शासित, पश्चिम बंगाल में भी आदिवासियों समेत अन्य पिछड़ी जमातों की समस्या दिनोंदिन विकराल होती जा रही है। परिणामत: रॉबिनहुड स्टाइल होने के बावजूद माओवादियों का समर्थन दिनोंदिन बढ़ता चला जा रहा है।
सन्‌ 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी और फांसी देवा में बंदूक उठाने वाले लोग चाहते थे कि जमींदारों और बड़े किसानों की सरप्लस (सीलिंग) भूमि गरीबों के बीच बांट दी जाये। पश्चिम बंगाल और केरल में इस दिशा में कुछ काम भी हुआ। लेकिन अन्य राज्यों में सरकारें नीतियां ही बनाती रह गयीं। लोग भुखमरी के शिकार होते रहे। उपेक्षा और विक्षोभ से उपजा आक्रोश अब इस कदर उद्वेलित हो गया है कि चाकू से गोदकर और पत्थरों से कूच-कूच कर पुलिस के जवानों की हत्याएं की जा रही हैं। पिछले महीने बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र में ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं। इस बाबत नक्सलियों के जो भी तर्क हों, लेकिन इस कार्रवाई को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता।
समय के साथ नक्सलबाड़ी से उठा तूफान पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया, लेकिन आज उसी के नाम पर राजनीति करने वालों की एक धारा जनसंघर्षों के माध्यम से संसदीय रास्ते पर चल रही है, तो दूसरी धारा, जिसका बड़ा हिस्सा (भाकपा (माओवादी) का शिकार है,) क्रांति के वैचारिक भटकाव के रास्ते पर आगे बढ़ रही है। इतिहास गवाह है कि राजनीति को प्रभावित किये बिना कोई भी आंदोलन ज्यादा दिन तक नहीं टिक सका है। नेपाल इसका ताजा उदाहरण है। हालांकि इसके पहले ही मिजो और नगा विद्रोहियों ने इसे समझा और बंदूक की राजनीति छोड़ दी। समाजवादी देश रूस और माओवादी चीन ने भी समय की गति के साथ अपने आपको बदला है। ऐसी स्थिति में क्या भारत की माओवादी ताकतें दुनिया के अन्य देशों से सबक लेंगी या यों ही क्रांति के वाम भटकाव में जान लेने और देने का क्रूर खेल चलता रहेगा।
हाल में घटी नक्सली घटनाएं

  • 19 जून, 2009 --उड़ीसा के कोरापुट जिले के पालुर गांव के समीप हुए बारूदी सुरंग में सीआरपीएफ के नौ जवान मारे गये।
  • 10 जून, २००९-- झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम से गोइलकेरा थानाक्षेत्र के सारूगढ़ा घाटी (सारंडा के जंगल) में माओवादियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट किया, जिसमें थानाप्रभारी, सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर समेत 11 जवान शहीद हो गये। दूसरी ओर, छत्तीसगढ के बीजापुर स्थित गंगालूर इलाके के कोरचूली इलाके में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ का असिस्टेंड कमांडेंट रामपाल सिंह मारे गये जबकि 5 जवान शहीद हो गये। इसके एक दिन बाद यानी 11 जून को माओवादियों ने इसी प्रदेश के दूसरे हिस्से में विस्फोट करके 11 जवानों को मौत की नींद सुला दिया।
  • 25 मई, 2009----महाराष्ट्र के गढ़चिरौली इलाके में भाकपा (माओवादी) ने एक बारूदी सुरंग में 15 से अधिक अधिकारियों और पुलिसकर्मियों को मौत की नींद सुला दिया।
  • 11 मई, २००९--- छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में घात लगाये नक्सलियों ने पुलिस बल के 15 जवान को गोलियों से भून दिया।
  • 12 अप्रैल, 2009 को ओड़िशा के कोटापुर जिले के नाल्को बॉक्साइड कंपनी पर हमला कर 7 सीआइएसएफ के जवानों को मौत की नींद सुला दी।
  • 11 अप्रैल, 2009 को खूंटी जिले के अड़की थाना क्षेत्र के जरको गांव में सुबह पांच बजे से दोपहर के एक बजे मुठभेड़ में 5 जवान मारे गये।
  • 27 मार्च, 2009 को चतरा में नामांकन करने जा रहे निर्दलीय प्रत्याशी इंदरसिंह नामधारी और कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थकों को नक्सलियोंं जमकर धुनाई की और चुनाव बहिष्कार की धमकी दी।
    15वीं लोकसभा चुनाव के दौरान पूरा देश नक्सली हिंसा से त्रस्त रहा। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अबतक सबसे अधिक हिंसा इसी चुनाव में हुई, जहां नक्सलियों ने 49 अर्द्धसैनिक बल के जवानों को गोलियों से भून दिया।
     

Wednesday, June 24, 2009

ब़ढती ताकत, घटती विचारधारा

पिछले कुछ वर्षों में झारखंड में नक्सलियों की ताकत और खौफ तो खूब ब़ढे हैं लेकिन उनकी वैचारिक प्रतिबधता लगभग खत्म हो चली है।
मलवे में तब्दील हो चुका लातेहार जिले के चियाकी रेलवे स्टेशन पर विरानगी छायी हुई है। यहां बुकिंग कलर्क के अलावा रेलवे के किन्ही अन्य कर्मचारियों का कोई अता-पता नहीं जबकि नक्सली घटना के तीन महीने से अधिक होने को है। भाकपा (माओवादी) से जु़डे नक्सिलयों ने 22 मार्च को इसलिए स्टेशन को डायनामाइट लगाकर उ़डा दिया था कि उनके दो दिवसीय बंदी के फरमान के बावजूद इस स्टेशन से होकर ट्रेनों की आवाजाही बंद नहीं हुई थी। ऐसी बात नहीं है कि माओवादियों का फरमान सिर्फ़ चियाकी रेलवे स्टेशन पर ही दिखा, बल्कि कुछ दिनों के बाद नक्सलियो ने हेहग़डा स्टेशन के समीप रांची-मुगलसराय पैसेंजर ट्रेन को छह घंटों तक बंधक बनाये रखा। घटना दिन में हुई, इसके बावजूद रेलवे के आला अधिकारी और सरकारी मशीनरी मूकदर्शक बनी रही और वे टेलीविजन व अखबारों से ही सूचना हासिल करते रहे। कमोबेश ऐसे ही हालात प्रदेश के अधिकांश इलाकों में है, जहां नक्सलियों की इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं डोलता। एक सूचना के मुताबिक, माओवादियों ने 22 और 23 जून को एक बार फिर दो दिनों की बंदी का ऐलान किया है।
बात चाहे पश्चिम बंगाल और ओरिशा से सटे जमशेदपुर इलाके की करें या फिर छत्तीसगढ़ से लगे गुमला और ग़ढवा जिलो की, हर जगह स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है। राज्य के पश्चिम इलाके यानि पलामू प्रमंडल की स्थिति तो और भी गंभीर है। पलामू प्रमंडल में ग़ढवा, लातेहार, पलामू और चतरा जिलो आते हैं। यहां तो एक तरह से नक्सलियों का ही "राज' कायम हो गया है। माओवादियो के भय से शाम होते ही कुडू होते हुए मेदिनीपुर (डालटेनगंज) जाने वाली स़डक बंद हो जाती है। चंदवा से चतरा जाने में तो आम लोगों के अलावा पुलिस अधिकारियों के भी पांव फूलने लगते हैं। शाम के बाद बरही से चौपारण और हजारीबाग से इटखोरी होते हुए चतरा जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। पारसनाथ से गिरीडीह जाने वाले रास्ते में भी माओवादियों का वर्चस्व है। डुमरी की भी यही कहानी है। चाइबासा भी कोई अलग नहीं है। अगर कहें की पलामू प्रमंडल देश का दूसरा बस्तर बनते जा रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जंगलों और पहा़डों से घिरे इस इलाके के अधिकांश भू-भाग नक्सलियों के कब्जे में चला गया है। जिला मुख्यालय में तो पुलिस अधिकारी दिख भी जाते हैं, लेकिन अधिकतर सुदूर इलाकों और प्रखंड मुख्यालयों में नक्सलियों का ही हुकुमत चलता है। नक्सलियों ने जिस तरीके से इस इलाके को अपनी गिरफ्त में लिया है, उससे आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कहीं यह इलाका दूसरा नक्सलबा़डी न बन जाये। जमीनी हालात तो यही बता रहे हैं कि भारी संख्या में अर्द्धसैनिक बलों की मौजूदगी के बिना पुलिस अधिकारी गांवों में घुसने से भी डरते हैं। नक्सलियों के फैलाव पर मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के प्रदेश सचिव शशिभूषण कहते हैं, "सामाजिक व्यवस्था शोषण पर आधारित है। फिर पलामू और चतरा के सामंती किस्से देश भर में चर्चित रहे हैं। इसकी रोकथाम के लिए सरकार ने कोई सामाजिक प्रयास नहीं किया। जिसकी वजह से भोले-भाले ग्रामीणों का विश्वास जीतने में माओवादी आगे निकल गये।'
उधर नक्सलबा़डी की परंपरा को आत्मसात करने वाली माओवादियों की जमात प्रदेश में कुकूरमुते की तरह उग रहे हैं। 70 के दशक नक्सल्वादिओं के जो आदर्श थे, वे समय की गति के साथ-साथ गुम होते चले गये। जमींदारों की जमीनों के खिलाफ गोलबंद हुए अतिवादी कम्युनिस्ट पार्टी व्यक्तिकत हिंसा और लूट-खसोट पर उतारू होती चली गयीं। 90 के दशक के बाद चली आर्थिक उदारीकरण और बाजारवाद की हवा में नक्सली भी बहने लगे। कमोबेश सारे सामंती दुर्गंध नक्सली गलियारे में पहुंच गये। लातेहार जिला स्थित ब़ढिनया गांव के शंकर मुंडा कहते हैं, "शुरू में माओवादियों के आदर्श ने आदिवासियों को आकिर्षत किया, लेकिन बाद में वे कुकुरमुते की तरह उग आये और अब नक्सली संगठनों के कारण लोगों का जीना हराम हो गया है।' ग्रामीणों को डर एक ओर से नहीं, बल्कि तीन ओर से है। एक ओर जहां पुलिस अधिकारी नक्सलियो को संरक्षण देने के आरोप में ग्रामीणों को प्रतारित करते हैं तो दूसरी ओर, माओवादियो का दोनों ध़डा उन्हें जबर्दस्ती अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहा है।
इन परिस्थितियों बीच क्रांति का सब्जबाग दिखाने वाले नक्सिलयों का आंतरिक कलह भी अब खुलकर सामने आने लगा है। इसके परिणामतस्वरूप आठ साल के झारखंड में आधा दर्जन नक्सली संगठनों का उदय हो गया। एमसीसी के जमाने में पोलित ब्यूरो से नाराज चल रहे केंद्रीय कमेटी के सदस्य भरत ने एक अलग पार्टी ही बना डाली। नाम रखा तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टीपीसी)। ग़ढवा, चतरा और पलामू में यह संगठन सिक्रय है और माओवादियों के आर्थिक स्रोत पर कब्जा जमाने की फिराक में है। अपने आक्रमक तेवर के साथ पीएलएफआइ (पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया) ने उन इलाकों में भाकपा (माओवादी) समर्थकों पर हमले तेज कर दिया है जहां के लोगों ने उसकी अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया है। कभी इनामी माओवादी रहे दिनेश गोप भी एक अलग संगठन चला रहा है। नाम रखा है, जेएलटी (झारखंड लिबरेशन टाइगर)। खूंटी, गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा इलाके में यह संगठन सिक्रय माओवादियों का कहना है इस तरह के अधिकतर संगठन अपने कारनामों से सच्चे नक्सलियों को बदनाम करने पर तूले हुए हैं।
हालात इस कदर बेकाबू होते जा रहा हैं कि माओवादियों ने अपनी करतूतों से दिन और रात का फासला खत्म कर दिया है। जब, जिसे चाहा, उसकी हत्या कर दी। मात्र आठ साल में ही प्रदेश में एक सांसद, दो विधायक, एक एसपी व दो डीएसपी मारे जा चुके हैं, जबकि 400 से अधिक पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवान नक्सली हिंसा के शिकार हुए हैं। जनवाद की बात करने वाली माओवादी जमात ने अबतक एक हजार से अधिक आम लोगों को पुलिस मुखबिर बताकर तो कहीं सामंती सोच के नाम पर गोलियों से भून डाला। खुफिया सूत्रों का कहना है कि सूबे के करीब 130 पुलिस थाने माओवादियों के ही रहमोकरम पर चल रहे हैं। इस बाबत राज्य पुलिस प्रवक्ता एसएन प्रधान ने "द पब्लिक एजेंडा' को बताया, "आज तक यही तय नहीं हो पाया है कि आख़िर माओवादी चाहते क्या हैं? कभी वे निरीह ग्रामीणों की हत्या करते हैं तो कभी छुपकर पुलिसकिर्मयों पर वार करते हैं, क्या इससे क्रांति आ जायेगी?' अधिकारीयों के तर्क अपनी जगह है लेकिन इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि माओवादियों की राजनीतिक लाइन और संघर्ष के तरीकों में आये भटकाव के बावजूद सूबे के करीब 8 हजार नौजवान हथियार बंद होकर सरकार को चुनौती देते फिर रहे हैं।
लाख टके का सवाल है की प्रतिवर्ष पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर करीब एक हजार करो़ड रुपये खर्च होने के बावजूद राज्य मशीनरी माओवादियों के फैलाव को रोकने में क्यों नहीं सफल हो पा रही है? क्यों सियासतदान संगीनों के साये में जीने को मजबूर हैं? क्यों प्राकृतिक संपन्नता के बावजूद ग्रामीणों को पीने का पानी तक मयस्सर नहीं है? जिस दिन इसका जवाब सियासतदानों की फौज खोज लेगी, संभव है उसी दिन माओवादियों की चाल पर लगाम लग जायेगा। फिलहाल कागजी योजनाएं बनाने में मशगूल सरकार इसके समाधान की और आगे ब़ढती नजर नहीं आ रही है।